Emotional Story

टूटा हुआ हवाई अड्डा, छुपा हुआ मालिक

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आगे क्या होने वाला है?

मुंबई के सबसे ऊँचे काँच के दफ्तर की उनतीसवीं मंजिल पर उस सुबह सूरज की रोशनी कुछ अलग ही लग रही थी। नीचे शहर भाग रहा था, गाड़ियाँ एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थीं, लोग अपने-अपने सपनों के पीछे दौड़ रहे थे, और ऊपर, उस चमकदार बैठक कक्ष में आर्यवर्धन मेहरा चुपचाप खड़ा था। उसके सामने लंबी मेज पर मोटी फाइलें रखी थीं, जिन पर अमेरिका की एक बड़ी कंपनी को खरीदने से जुड़ी सारी रिपोर्टें रखी थीं। कंपनी का नाम था ऑरोरा टेक्नॉलॉजीज। यह सौदा हजारों करोड़ का था। उसके सलाहकार कह रहे थे कि यह सौदा पूरा होते ही मेहरा ग्लोबल दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों में शामिल हो जाएगी।

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 85 मिनट

भाग 1

मुंबई के सबसे ऊँचे काँच के दफ्तर की उनतीसवीं मंजिल पर उस सुबह सूरज की रोशनी कुछ अलग ही लग रही थी। नीचे शहर भाग रहा था, गाड़ियाँ एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थीं, लोग अपने-अपने सपनों के पीछे दौड़ रहे थे, और ऊपर, उस चमकदार बैठक कक्ष में आर्यवर्धन मेहरा चुपचाप खड़ा था। उसके सामने लंबी मेज पर मोटी फाइलें रखी थीं, जिन पर अमेरिका की एक बड़ी कंपनी को खरीदने से जुड़ी सारी रिपोर्टें रखी थीं। कंपनी का नाम था ऑरोरा टेक्नॉलॉजीज। यह सौदा हजारों करोड़ का था। उसके सलाहकार कह रहे थे कि यह सौदा पूरा होते ही मेहरा ग्लोबल दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों में शामिल हो जाएगी।

आर्यवर्धन मेहरा सिर्फ एक अमीर आदमी नहीं था। वह एक ऐसा मुख्य कार्यकारी अधिकारी था, जिसने अपने पिता के छोटे से कारखाने को मेहनत, ईमानदारी और अनुशासन से एक विशाल साम्राज्य में बदला था। उसके पास पैसा बहुत था, शक्ति बहुत थी, नाम बहुत था, मगर उसके भीतर एक खालीपन भी था, जिसे वह किसी बैठक, किसी पुरस्कार, किसी नई इमारत या किसी चमकदार गाड़ी से भर नहीं पाया था। लोग उसे दूर से देखकर कहते थे कि यह आदमी किस्मत का लाड़ला है, पर बहुत कम लोग जानते थे कि उसने बचपन में अपने पिता को मजदूरों के साथ बैठकर खाना खाते देखा था। उसके पिता कहा करते थे, “कंपनी ईंटों और मशीनों से नहीं बनती, बेटा। कंपनी उन हाथों से बनती है जिनके पसीने से मशीनें चलती हैं।”

उसी पिता की बात उस सुबह उसके मन में तब गूंज उठी जब उसके निजी सचिव ने एक फाइल धीरे से उसके सामने रखी। फाइल पर लिखा था, “गोपनीय शिकायतें।” आर्यवर्धन ने फाइल खोली तो उसका चेहरा धीरे-धीरे कठोर होता चला गया। उसमें अमेरिका की उसी कंपनी के कर्मचारियों की शिकायतें थीं, जिसे वह खरीदने जा रहा था। शिकायतों में लिखा था कि कंपनी में भारतीय कर्मचारियों के साथ भेदभाव होता है। उन्हें कम वेतन दिया जाता है, उनके विचारों का मजाक बनाया जाता है, बैठकों में उन्हें बोलने नहीं दिया जाता, और कई बार उनके देश, भाषा और रंग पर अपमानजनक टिप्पणियाँ की जाती हैं। कुछ शिकायतों में एक ही नाम बार-बार आ रहा था, रिचर्ड ब्लेक, कंपनी का संचालन प्रबंधक।

बैठक में बैठे लोगों ने इसे मामूली बात बताने की कोशिश की। एक वरिष्ठ सलाहकार ने कहा, “सर, बड़ी कंपनियों में ऐसी शिकायतें आती रहती हैं। सौदा रोकना ठीक नहीं होगा। हमने कानूनी जोखिम देख लिया है। कागजों में सब नियंत्रण में है।” आर्यवर्धन ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं था, लेकिन ऐसी शांति थी जो किसी तूफान से पहले आती है। उसने धीरे से कहा, “कागजों में सब सही होना और इंसानों के साथ सब सही होना, दोनों अलग बातें हैं। मैं ऐसी कंपनी नहीं खरीद सकता जहाँ किसी को उसके देश या रंग के कारण छोटा समझा जाता हो।”

दूसरा सलाहकार बोला, “लेकिन सर, अगर हमने अभी संदेह दिखाया तो सामने वाली कंपनी सतर्क हो जाएगी।” आर्यवर्धन ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “इसीलिए मैं मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनकर नहीं जाऊँगा। मैं वहाँ एक साधारण भारतीय इंजीनियर बनकर जाऊँगा। मुझे देखना है कि जब सामने कोई मालिक नहीं, कोई निवेशक नहीं, कोई बड़ा नाम नहीं होता, तब वे लोग एक भारतीय को कैसे देखते हैं।” कमरे में सन्नाटा छा गया। किसी को विश्वास नहीं हुआ कि हजारों करोड़ का मालिक खुद अपनी पहचान छुपाकर एक नौकरी माँगने जाएगा। मगर आर्यवर्धन ने निर्णय ले लिया था।

दो दिन बाद वह अमेरिका के लिए रवाना हुआ। उसके साथ कोई बड़ा दल नहीं था, कोई चमकदार स्वागत नहीं था, कोई विशेष व्यवस्था नहीं थी। उसके पास सिर्फ एक साधारण सूटकेस, एक नकली परिचय और एक नया नाम था, आर्यन शर्मा। दस्तावेजों में वह भारत से आया एक अनुभवी तकनीकी इंजीनियर था, जो ऑरोरा टेक्नॉलॉजीज में नौकरी के लिए आवेदन करने वाला था। विमान में बैठकर वह बार-बार उन शिकायतों को पढ़ता रहा। हर पंक्ति उसे भीतर तक चुभ रही थी। उसे यह सोचकर तकलीफ हो रही थी कि कहीं किसी देश से हजारों मील दूर, कोई भारतीय सिर्फ इसलिए अपमान सह रहा है क्योंकि वह भारतीय है।

अमेरिका के विशाल हवाई अड्डे पर जब वह उतरा, तब शाम हो चुकी थी। काँच की दीवारों के पार नारंगी रोशनी फैल रही थी। लोग अपने-अपने प्रियजनों से मिल रहे थे। कहीं बच्चे पिता से लिपट रहे थे, कहीं बुजुर्ग माँ की आँखें भर आई थीं, कहीं कोई फूलों का गुच्छा लेकर किसी का इंतजार कर रहा था। उसी भीड़ में आर्यवर्धन की नजर एक लड़की पर जाकर रुक गई। वह लड़की सफेद और हल्के नीले रंग के साधारण कपड़ों में थी। उसके हाथ में ताजे फूलों का गुच्छा था। उसके चेहरे पर ऐसी मासूम खुशी थी जैसे वह किसी बहुत अपने का इंतजार कर रही हो। उसकी आँखें बार-बार आगमन द्वार की ओर उठतीं और फिर घड़ी की ओर लौट आतीं।

वह लड़की काव्या थी। वह पिछले तीन साल से अमेरिका में काम कर रही थी। उसने अपने परिवार के लिए बहुत संघर्ष किया था। उसका प्रेमी निखिल भारत से अमेरिका आ रहा था। काव्या ने पूरे दिन छुट्टी ली थी, फूल खरीदे थे, और मन में हजारों बातें तैयार की थीं। वह सोच रही थी कि निखिल उसे देखते ही मुस्कुराएगा, शायद उसे गले लगाएगा, शायद कहेगा कि अब सब ठीक हो जाएगा। मगर जीवन कई बार सबसे सुंदर उम्मीदों को सबसे निर्दयी तरीके से तोड़ता है।

निखिल आगमन द्वार से बाहर आया। काव्या के चेहरे पर चमक फैल गई। वह तेज कदमों से उसकी ओर बढ़ी। “निखिल,” उसने धीमी पर काँपती आवाज में पुकारा। निखिल ने उसकी ओर देखा, मगर उसके चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जिसका काव्या महीनों से इंतजार कर रही थी। उसके पीछे एक बेहद आत्मविश्वासी, अमीर परिवार की लगती हुई लड़की थी, चमकदार कपड़ों में, हाथ में महँगा बैग लिए हुए। निखिल ने काव्या से फूल नहीं लिए। उसने बस ठंडी आवाज में कहा, “काव्या, अब सब पहले जैसा नहीं रहा। मुझे आगे बढ़ना है। मेरे सपने बड़े हैं। तुम अच्छी हो, पर तुम मेरे जीवन के उस स्तर से मेल नहीं खाती जहाँ मैं अब जाना चाहता हूँ।”

काव्या के हाथ में पकड़े फूल जैसे अचानक पत्थर बन गए। उसने समझना चाहा कि यह मजाक है, कोई गलतफहमी है, कोई थकान है, पर निखिल ने आगे कहा, “मेरे और सारा के परिवारों ने बात कर ली है। हम साथ हैं। तुम अपने लिए अच्छा सोचो।” यह कहकर वह उस अमीर लड़की के साथ आगे बढ़ गया। काव्या वहीं खड़ी रह गई। उसके हाथ से फूल गिर गए। भीड़ अपने रास्ते चलती रही, जैसे किसी की दुनिया टूटना इस दुनिया के लिए कोई बड़ी बात नहीं होती।

आर्यवर्धन ने यह सब देखा। वह चाहता तो आगे बढ़कर उस आदमी को रोक सकता था, उसे डाँट सकता था, पर उसने खुद को रोक लिया। काव्या की आँखों में जो टूटन थी, वह किसी भी बाहरी शोर से और बिखर सकती थी। वह धीरे-धीरे उसके पास गया, नीचे झुककर गिरे हुए फूल उठाए और बहुत शांत स्वर में बोला, “कभी-कभी जो लोग हमें छोड़कर जाते हैं, वे हमारी कीमत कम नहीं करते। वे बस यह साबित करते हैं कि वे उस कीमत को समझने के लायक नहीं थे।”

काव्या ने उसकी ओर देखा। उसके होंठ काँप रहे थे। वह कुछ कहना चाहती थी, पर शब्द गले में अटक गए। आर्यवर्धन ने पानी की बोतल खरीदी और उसके हाथ में थमा दी। उसने पूछा, “आप ठीक हैं?” यह एक साधारण प्रश्न था, पर उस क्षण काव्या के लिए किसी ने सच में पूछा था कि वह ठीक है या नहीं। उसकी आँखों से आँसू बह निकले। उसने धीमे से कहा, “मैंने उसके लिए सब छोड़ दिया था। मैं यहाँ अकेली थी, फिर भी इंतजार करती रही। मुझे लगा था कि वह आएगा तो सब आसान हो जाएगा।”

आर्यवर्धन ने उसकी ओर देखकर कहा, “शायद वह आया ही इसलिए था कि आपको यह समझा सके कि आप अकेली होकर भी अधूरी नहीं हैं।” काव्या ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। उस अजनबी की आँखों में दया नहीं थी, सम्मान था। उसे दया से नफरत थी। लोग जब टूटे हुए इंसान को दया से देखते हैं तो वह और छोटा महसूस करता है। मगर इस आदमी की आवाज में एक अजीब सा भरोसा था, जैसे वह उसे गिरा हुआ नहीं, खड़ा होने की तैयारी में देख रहा हो।

आर्यवर्धन ने उसके लिए गाड़ी बुक कराई। उसने अपना नाम आर्यन बताया। काव्या ने भी अपना नाम बताया, मगर उसके बाद दोनों बहुत देर तक चुप रहे। गाड़ी आने तक वह उसके पास खड़ा रहा। जाने से पहले उसने सिर्फ इतना कहा, “आज रात रो लीजिए, जितना रोना है। लेकिन कल सुबह आईने में खुद को देखकर यह मत सोचिएगा कि आपको किसी ने छोड़ दिया। सोचिएगा कि आप किसी गलत मोड़ से बच गईं।” काव्या ने आँसू पोंछे और हल्का सा सिर हिला दिया। वह चली गई, और आर्यवर्धन उसे जाते हुए देखता रहा। उसके भीतर एक अजीब हलचल थी। वह जानता था कि यह प्रेम कह देने का समय नहीं है। अभी काव्या को प्रेम नहीं, सहारा चाहिए था। वह अपने मन की बात मन में ही दबाकर होटल चला गया।

अगली सुबह आर्यवर्धन ने अपनी असली पहचान के सारे चिन्ह छुपा दिए। महँगी घड़ी उतार दी, सामान्य कपड़े पहने, साधारण बैग लिया और ऑरोरा टेक्नॉलॉजीज के दफ्तर पहुँचा। दफ्तर बहुत बड़ा था। बाहर चमकदार नामपट्ट था, भीतर काँच की दीवारें, तेज रोशनी, सुगंधित गलियारे और हर तरफ आधुनिकता का प्रदर्शन। लेकिन आर्यवर्धन जानता था कि कई बार सबसे चमकदार इमारतों की नींव में सबसे गहरी सड़ांध छुपी होती है।

स्वागत कक्ष में उसने नौकरी साक्षात्कार के लिए अपना नाम लिखा। कुछ देर बाद उसे रिचर्ड ब्लेक के कमरे में भेजा गया। रिचर्ड लंबा, कठोर चेहरे वाला आदमी था। उसकी मेज पर महँगे पुरस्कार रखे थे, दीवार पर कंपनी की सफलता की तस्वीरें लगी थीं, और उसकी आँखों में ऐसा अहंकार था जैसे वह सामने बैठे हर व्यक्ति की कीमत कुछ ही सेकंड में तय कर सकता हो। आर्यवर्धन ने अपना परिचय दिया, “मेरा नाम आर्यन शर्मा है। मैं तकनीकी इंजीनियर के पद के लिए आया हूँ।”

रिचर्ड ने उसका जीवनवृत्त हाथ में लिया, पर उसे खोला तक नहीं। उसने बस नाम देखा, फिर चेहरे को देखा और हल्की सी हँसी हँस दी। “भारत से आए हो?” उसने पूछा। आर्यवर्धन ने शांत स्वर में कहा, “जी।” रिचर्ड कुर्सी पर पीछे झुक गया। “हम यहाँ बहुत उच्च स्तर के लोगों को लेते हैं। यह कोई सामान्य जगह नहीं है।” आर्यवर्धन ने कहा, “मेरे अनुभव और योग्यता को देख लीजिए। शायद मैं इस भूमिका के लिए उपयुक्त रहूँ।” रिचर्ड ने फाइल मेज पर फेंक दी। “तुम लोगों की यही समस्या है। हर कोई सोचता है कि वह प्रतिभाशाली है। लेकिन यहाँ सिर्फ मेहनत से काम नहीं चलता, यहाँ संस्कृति चाहिए, प्रस्तुति चाहिए, वैश्विक स्तर चाहिए।”

आर्यवर्धन की मुट्ठी थोड़ी सी कस गई, मगर चेहरा शांत रहा। उसने पूछा, “क्या मेरी योग्यता में कोई कमी है?” रिचर्ड ने मुस्कुराकर कहा, “योग्यता देखने की जरूरत नहीं। तुम्हारे जैसे लोगों के लिए हमारे पास एक जगह है। अगर चाहो तो चपरासी का काम कर सकते हो। कागज उठाना, चाय देना, कमरों की व्यवस्था करना। तनख्वाह कम होगी, पर तुम्हारे लिए ठीक है।”

यह वह क्षण था जब कोई और इंसान अपमान में उठकर चला जाता। मगर आर्यवर्धन वहाँ अपमान से भागने नहीं, अपमान की जड़ खोजने आया था। उसने कुछ सेकंड रिचर्ड को देखा, फिर धीरे से कहा, “ठीक है। मैं चपरासी का काम कर लूँगा।” रिचर्ड को शायद उम्मीद नहीं थी कि वह मान जाएगा। उसने हँसते हुए कहा, “अच्छा है। कम से कम तुम्हें अपनी जगह तो समझ में आई।”

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