शहर में उस दिन बारिश कुछ ज्यादा ही तेज थी। सड़कों पर पानी की पतली परत चमक रही थी और लोग जल्दी-जल्दी अपने काम में लगे हुए थे। हर किसी को बस अपनी मंजिल तक पहुंचना था। किसी को भी किसी और से मतलब नहीं था। भीड़ के बीच एक आदमी भी था जो बाकी लोगों से बिल्कुल अलग दिख रहा था। उसके कपड़े भीगे हुए थे। पैरों में टूटी चप्पल थी और चेहरे पर थकान के साथ एक अजीब सी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी। वह तेजी से भाग रहा था। जैसे समय उसके हाथ से फिसलता जा रहा हो और अगर वह अभी नहीं पहुंचा तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। उसका नाम शिवम था।
जब वह एयरपोर्ट के गेट तक पहुंचा तो सुरक्षाकर्मियों ने उसे तुरंत रोक लिया। रुको कहां जा रहे हो? एक गार्ड ने उसे ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा, शिवम ने हांते हुए जवाब दिया, “मेरी उड़ान है। आधे घंटे में मुझे अंदर जाना है। बहुत जरूरी है। गार्ड ने हंसते हुए दूसरे गार्ड की तरफ देखा। फिर शिवम की तरफ मुड़कर बोला तू और उड़ान कभी अपने आप को आईने में देखा है? पास खड़े कुछ लोग भी मुस्कुराने लगे। किसी ने धीरे से कहा आजकल हर कोई कुछ भी बन जाता है। शिवम ने अपने हाथ जोड़ लिए। उसकी आवाज में घबराहट थी लेकिन साथ ही एक सच्चाई भी थी जिसे कोई समझना नहीं चाहता था।

कृपया मुझे जाने दीजिए। मेरा टिकट अंदर है। मेरे मैनेजर के पास है। गार्ड का चेहरा सख्त हो गया। उसने शिवम को हल्का सा धक्का देते हुए कहा, यहां कोई बस अड्डा नहीं है कि कोई भी उठकर अंदर चला जाए। चलो यहां से निकलो। शिवम लड़खड़ा कर पीछे गिर पड़ा। बारिश का पानी उसके कपड़ों से होकर जमीन पर फैल गया। वह उठने की कोशिश कर रहा था। लेकिन उसके आसपास खड़े लोग बस देख रहे थे। किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। उस पल में उसे साफ महसूस हुआ कि इस शहर में गिरना आसान है। लेकिन उठाना किसी को नहीं आता।
वह फिर से खड़ा हुआ और एक बार फिर कोशिश करने लगा। मेरी बात सुन लीजिए। सिर्फ एक बार मुझे अंदर जाना ही होगा। तभी एक चमकदार काली गाड़ी एयरपोर्ट के सामने आकर रुकी। गाड़ी का दरवाजा खुला और बाहर उतरी एक लड़की उसके चलने का अंदाज ही बता रहा था कि वह इस जगह की आम व्यक्ति नहीं है। वह थी दृष्टि। शहर के सबसे बड़े उद्योगपति परिवार की बेटी। आत्मविश्वास उसके चेहरे पर साफ दिखाई देता था और उसके आसपास खड़े लोग खुद ब खुद रास्ता छोड़ देते थे। उसकी नजर शिवम पर पड़ी। वह एक पल के लिए रुकी जैसे कुछ पहचानने की कोशिश कर रही हो।
लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर सख्ती आ गई। तुम यहां क्या कर रहे हो? उसने सीधा सवाल किया। शिवम ने उसे देखा। जैसे उसे अचानक कोई सहारा मिल गया हो। मुझे अमेरिका जाना है। बहुत जरूरी है। यह लोग मुझे अंदर नहीं जाने दे रहे। दृष्टि ने हल्की सी हंसी छोड़ी। अमेरिका उसने तिरस्कार से कहा, तुम्हें अमेरिका की स्पेलिंग भी आती है। भीड़ में फिर से हंसी गूंजी। शिवम चुप रहा। उसके पास जवाब था। लेकिन वह जवाब देने की स्थिति में नहीं था। वह सिर्फ मदद चाहता था। किसने करवाई तुम्हारी टिकट?
दृष्टि ने फिर पूछा या फिर बस सपना देखिए। शिवम ने धीमी आवाज में कहा। कृपया मेरी मदद कर दो। दृष्टि का चेहरा और ठंडा हो गया। उसने एक कदम पीछे लिया। मुझे छूने की कोशिश मत करना। उसने सख्ती से कहा और यहां कोई तमाशा मत करना। मुझे यहां किसी तरह की परेशानी नहीं चाहिए। उसके शब्द सीधे शिवम के दिल में उतर गए। वह वही लड़की थी जिसे उसने कभी अलग समझा था।
कुछ साल पहले की बात उसके दिमाग में ताजा हो गई। एक अस्पताल का कमरा जहां उसकी मां इलाज के लिए भरती थी। वहीं उसने पहली बार दृष्टि को देखा था। वह रोज आती थी। मरीजों से बात करती थी। उन्हें हिम्मत देती थी। उस दिन उसने उसकी मां का हाथ पकड़ा था और मुस्कुराकर कहा था कि सब ठीक हो जाएगा। उस एक पल ने शिवम को बदल दिया था। उसे लगा था कि यह लड़की बाकी लोगों जैसी नहीं है।
उसने पहली बार किसी अमीर इंसान में इंसानियत देखी थी। लेकिन आज वही लड़की उसके सामने खड़ी थी और उसे पहचानने से भीख इंकार कर रही थी। वह कुछ बोलने ही वाला था कि तभी एक तेज आवाज आई। शिवम साहब सबकी नजर उस दिशा में गई। एक व्यक्ति तेजी से उनकी तरफ आ रहा था। वह था नितिन रायजादा।
उसका नाम शहर में इतना बड़ा था कि लोग उसे देखते ही सम्मान में खड़े हो जाते थे। लेकिन वह सीधे शिवम के पास आकर रुका। आप यहां क्या कर रहे हैं? हम आपको ढूंढ रहे थे। उसने चिंतित होकर कहा, दृष्टि और उसके साथ खड़ा ऋषभ दोनों चौंक गए। उनके चेहरे पर साफ लिखा था कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि यह क्या हो रहा है। नितिन ने बिना समय गवाए शिवम का हाथ पकड़ा और कहा, जल्दी आइले। समय बहुत कम है और वह उसे अंदर ले गया जैसे वह कोई आम आदमी नहीं बल्कि कोई बहुत जरूरी व्यक्ति हो।
दृष्टि वही खड़ी रह गई। उसके दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था कि आखिर यह आदमी है कौन? अंदर पहुंचते ही शिवम तेजी से आगे बढ़ा। उसका प्रबंधक पहले से उसका इंतजार कर रहा था। यह रही आपकी टिकट और आपका फोन। जल्दी गेट नंबर तीन पर पहुंचिए। उसने कहा, शिवम ने बिना कुछ कहे टिकट ली और दौड़ पड़ा। लेकिन जैसे ही वह गेट के पास पहुंचा, अचानक एक आदमी उससे टकरा गया।
अंधा है क्या? सामने वाले ने गुस्से में कहा। शिवम तुरंत संभाला पर बोला मुझसे गलती हो गई। मैं जल्दी में था। आदमी ने उसे घूरते हुए कहा, तुझे पता भी है तू किससे टकराया है। पास खड़े एक आदमी ने धीरे से कहा, “यह उसके एयरलाइन का मालिक है।” शिवम ने तुरंत हाथ जोड़ दिए।
कृपया मुझे जाने दीजिए। मेरी उड़ान छूट जाएगी। उस आदमी ने उसकी टिकट छीन ली और उसे देखते हुए मुस्कुराया। तू उड़ान भरेगा। उसने कहा और अगले ही पर टिकट के टुकड़े कर दिए। कागज के छोटे-छोटे टुकड़े जमीन पर गिरते रहे। कुछ सेकंड के लिए सब शांत हो गया।
शिवम नीचे झुका। उसने उन टुकड़ों को देखा। फिर धीरे-धीरे खड़ा हो गया। उसकी आंखों में अब डर नहीं था। उसने जेब से फोन निकाला और एक नंबर मिलाया। 10 मिनट। उसने बस इतना कहा और फोन काट दिया।
सामने वाला आदमी हंसने लगा। क्या करेगा तू 10 मिनट में? शिवम ने कोई जवाब नहीं दिया।
ठीक 10 मिनट बाद पूरे एयरपोर्ट में घोषणा हुई कि उस एयरलाइन की सभी उड़ाने तुरंत बंद कर दी गई हैं। सामने खड़ा आदमी सन्न रह गया। उसके चेहरे से रंग उड़ गया। यह कैसे हो सकता है? उसने बड़बड़ाते हुए कहा।
शिवम ने उसकी तरफ देखा और शांत आवाज में कहा, “तुमने मेरी टिकट फाड़ी थी। अब मैंने तुम्हारा पूरा कारोबार रोक दिया। उस आदमी के पास कोई जवाब नहीं था। तभी शिवम का फोन बजा। उधर से आवाज आई। अब आपको आने की जरूरत नहीं है। जिस व्यक्ति के लिए आप जा रहे थे। वह अब सुरक्षित है। शिवम ने आंखें बंद की और गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति आ गई। वह बिना कुछ कहे वहां से वापस मुड़ गया।
उस दिन किसी को समझ नहीं आया कि वह कौन था और उसने यह सब कैसे किया। लेकिन एक बात साफ थी जिसे सब ने एक भिखारी समझकर ठुकरा दिया था। वह कोई साधारण आदमी नहीं था और उसकी असली कहानी अभी शुरू ही हुई थी। एयरपोर्ट से बाहर निकलते समय शिवम के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। जैसे जो काम उसे करना था, वह पूरा हो चुका हो। बारिश अब हल्की पड़ चुकी थी, लेकिन उसके अंदर जो तूफान चल रहा था, वह किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। वह सीधे अपनी गाड़ी में बैठा और बिना पीछे देखे निकल गया। उधर एयरपोर्ट के बाहर खड़ी दृश्य अब भी वही खड़ी थी। उसने अपनी जिंदगी में बहुत बड़े-बड़े लोगों को देखा था।
उनके साथ काम किया था। लेकिन आज जो हुआ था, उसने उसके सोचने का तरीका ही बदल दिया था। जिस आदमी को उसने कुछ देर पहले अपमानित किया था, वही आदमी कुछ मिनटों में एक पूरी एयरलाइन को बंद करवा सकता था। उसने धीरे से ऋषभ की तरफ देखा। तुमने देखा उसकी आवाज में पहली बार हल्की घबराहट थी।
ऋषभ ने खुद को संभालते हुए कहा, कुछ तो गड़बड़ है। या तो वह आदमी कोई बड़ा खेल खेल रहा है या फिर हम उसे समझ नहीं पाए।
दृष्टि चुप रही। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही सवाल घूम रहा था। अगर वह सच में इतना बड़ा आदमी है तो फिर उस हालत में वहां क्यों था? शिवम सीधे नारंग मेंशन पहुंचा।
जैसे ही वह अंदर दाखिल हुआ, घर के नौकरों ने उसे उसी नजर से देखा जैसे हमेशा देखते थे। उनके लिए वह बस एक घर जमाई था जो इस घर में किसी बोझ की तरह रह रहा था। उसने बिना कुछ कहे अपना गीला शर्ट बदला और सीधे रसोई में चला गया। वह दृष्टि के लिए खाना तैयार करने लगा। उसके हाथों की आदतें बहुत पुरानी थी। साधारण जिंदगी ने उसे सिखाया था कि काम करने में कोई शर्म नहीं होती। लेकिन उस काम के पीछे आज कुछ और भी छिपा था जो कोई नहीं देख पा रहा था।
उसी समय शहर के हर बड़े व्यापारिक कार्यालय में एक ही खबर चल रही थी। नारंग इन स्ट्रीज को बड़ा झटका। समाचार में बताया जा रहा था कि कंपनी को जो बड़ा ठेका मिलने वाला था, वह अचानक किसी दूसरी कंपनी को दे दिया गया था। इसके बाद निवेशकों ने भी अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया। नारंग इन स्ट्रीज धीरे-धीरे डूबने लगी थी। दृष्टि अपने कार्यालय में बैठी थी। उसके सामने फाइलों का ढेर लगा हुआ था। लेकिन उसकी नजर कहीं और थी। अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम बर्बाद हो जाएंगे। उसके सहयोगी मोहित ने कहा, दृष्टि ने सिर झुका लिया। उसकी आंखों में पहली बार डर दिखाई दे रहा था। नहीं, उसने धीरे से कहा, “मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।” उसके दादाजी ने इस कंपनी को खड़ा किया था। उसने बचपन से देखा था कि किस तरह मेहनत से यह साम्राज्य बना था। वह इसे खत्म होते हुए नहीं देख सकती थी। लेकिन इस बार समस्या बहुत बड़ी थी और उसके पास कोई रास्ता नहीं था।
उसी समय कार्यालय के बाहर हलचाल हुई। शिवम अंदर आ चुका था। सभी कर्मचारी उसे देखकर हैरान हो गए। किसी को समझ नहीं आया कि वह यहां क्यों आया है। तुम यहां क्या कर रहे हो? एक कर्मचारी ने गुस्से में कहा। शिवम ने बिना किसी जवाब के सीधे बैठक कक्ष की तरफ कदम बढ़ा दिए। अंदर एक महत्वपूर्ण बैठक चल रही थी। जैसे ही दरवाजा खुला, सबकी नजरें उसकी तरफ उठ गई। यहां क्या कर रहा है? ऋषभ गुस्से में खड़ा हो गया। इसे बाहर निकालो। उसने सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया लेकिन शिवम वहीं खड़ा रहा। उसने शांत आवाज में कहा, “मुझे दृष्टि से बात करनी है।” तभी दृष्टि ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर गुस्सा था। लेकिन कहीं ना कहीं उसके अंदर एक जिज्ञासा भी थी। यह समय नहीं है। उसने कहा, “मैं बहुत जरूरी बैठक में हूं।” शिवम ने पहली बार थोड़ा जोर देकर कहा, यही सही समय है। कमरे में खामोशी छा गई। ऋषभ ने फिर से चिल्लाकर कहा, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की? तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति बोले पहले इसकी बात सुन लेते हैं। वह थे राजा काका जो इस कंपनी के पुराने सलाहकार थे। दृष्टि ने कुछ पल सोचा फिर कहा ठीक है बोलो।