Emotional Story

टूटा हुआ हवाई अड्डा, छुपा हुआ मालिक

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

मुंबई के सबसे ऊँचे काँच के दफ्तर की उनतीसवीं मंजिल पर उस सुबह सूरज की रोशनी कुछ अलग ही लग रही थी। नीचे शहर भाग रहा था, गाड़ियाँ एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थीं, लोग अपने-अपने सपनों के पीछे दौड़ रहे थे, और ऊपर, उस चमकदार बैठक कक्ष में आर्यवर्धन मेहरा चुपचाप खड़ा था। उसके सामने लंबी मेज पर मोटी फाइलें रखी थीं, जिन पर अमेरिका की एक बड़ी कंपनी को खरीदने से जुड़ी सारी रिपोर्टें रखी थीं। कंपनी का नाम था ऑरोरा टेक्नॉलॉजीज। यह सौदा हजारों करोड़ का था। उसके सलाहकार कह रहे थे कि यह सौदा पूरा होते ही मेहरा ग्लोबल दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों में शामिल हो जाएगी।

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आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 85 मिनट

भाग 3

एक और घटना ने कहानी को और गहरा कर दिया। कंपनी में एक सांस्कृतिक सप्ताह आयोजित किया गया। विभिन्न देशों के कर्मचारी अपनी संस्कृति प्रस्तुत कर रहे थे। जब भारतीय कर्मचारियों की बारी आई तो रिचर्ड ने हँसते हुए कहा, “बस मसाले और नाच ही दिखाना, लंबा भाषण मत देना।” यह बात हॉल में बैठे कई लोगों ने सुनी। विवेक का चेहरा झुक गया। अंजलि की आँखों में अपमान की आग थी। काव्या मंच के पास खड़ी थी। वह चुप नहीं रह सकी। उसने माइक उठाया और कहा, “किसी संस्कृति को दो शब्दों में बाँध देना अज्ञानता है, हास्य नहीं। हम यहाँ तमाशा दिखाने नहीं, अपना सम्मान बाँटने आए हैं।” पूरे हॉल में कुछ क्षण चुप्पी रही, फिर धीरे-धीरे तालियाँ बजने लगीं। रिचर्ड का चेहरा लाल हो गया।

उस रात रिचर्ड ने काव्या को अपने कमरे में बुलाया। आर्यवर्धन बाहर दस्तावेज रख रहा था। उसने दरवाजे के पार से आवाज सुनी। रिचर्ड कह रहा था, “तुम अपने आपको बहुत बहादुर समझती हो? याद रखो, तुम्हारा अनुबंध अगले महीने समीक्षा में है। और तुम्हारे वीजा से जुड़ी सिफारिश भी मेरे हाथ में है।” काव्या ने कहा, “आप मुझे डराकर मेरी चुप्पी खरीदना चाहते हैं।” रिचर्ड ने धीमी आवाज में कहा, “मैं तुम्हें बचा भी सकता हूँ और गिरा भी सकता हूँ। मेरे साथ रात्रि भोज पर चलो। फिर बात आसान हो जाएगी।”

आर्यवर्धन ने यह सब अपने छुपे हुए यंत्र में रिकॉर्ड कर लिया। लेकिन वह जानता था कि अकेली रिकॉर्डिंग काफी नहीं थी। उसे पूरा जाल पकड़ना था। अगले दिन रिचर्ड ने काव्या को मजबूरन एक महँगे भोजनालय में बुलाया। काव्या डर और गुस्से के बीच वहाँ पहुँची। उसे लगा था कि शायद पेशेवर चर्चा होगी, पर रिचर्ड ने शुरुआत से ही निजी बात करनी शुरू कर दी। संयोग नहीं, योजना के तहत आर्यवर्धन वहाँ सेवा कर्मचारी की तरह मौजूद था। उसने रिचर्ड की कई बातें रिकॉर्ड कर लीं, जिनमें वह साफ कह रहा था कि शादी से मना करने पर काव्या का भविष्य कंपनी में मुश्किल हो जाएगा।

काव्या जब बाहर निकली तो उसकी आँखें भर आई थीं। उसने आर्यन को देखा और पहली बार उसके सामने अपने आँसू नहीं छुपाए। “क्यों होता है ऐसा?” उसने पूछा। “क्यों एक लड़की की मेहनत किसी आदमी की इच्छा से छोटी कर दी जाती है? क्यों कोई मुझे मेरे काम से नहीं देखता?” आर्यवर्धन ने बहुत धीरे से कहा, “क्योंकि कुछ लोग शक्ति को जिम्मेदारी नहीं, हथियार समझ लेते हैं। पर हथियार हमेशा चलाने वाले के हाथ में नहीं रहता। कभी-कभी सच भी हथियार बन जाता है।” काव्या ने उसकी ओर देखा। “तुम मेरे साथ क्यों खड़े रहते हो?” उसने पूछा। आर्यवर्धन ने जवाब देने में देर की। फिर बोला, “क्योंकि जिस दिन मैंने तुम्हें हवाई अड्डे पर देखा था, उस दिन तुम टूटी जरूर थीं, लेकिन हारी नहीं थीं। मुझे हार न मानने वाले लोग अच्छे लगते हैं।”

काव्या का दिल उस रात पहली बार थोड़ा हल्का हुआ। निखिल के जाने के बाद उसे लगता था कि वह किसी के लिए पर्याप्त नहीं थी। लेकिन आर्यन की बातें उसे यह एहसास करातीं कि शायद समस्या उसमें नहीं थी। शायद उसने गलत व्यक्ति को अपनी कीमत तय करने दे दी थी। धीरे-धीरे वह मुस्कुराने लगी। वह आर्यन के लिए चाय लाती, कभी पूछती कि उसने खाना खाया या नहीं, कभी उसके थके चेहरे को पढ़ लेती। आर्यवर्धन हर बार अपने मन को रोकता। वह उसे सच बताना चाहता था, मगर सच बताने का मतलब था पूरी जाँच को खतरे में डालना। वह चाहता था कि काव्या उस पर उसके पद के कारण नहीं, उसके व्यवहार के कारण भरोसा करे।

फिर निखिल लौटा। जिस आदमी ने हवाई अड्डे पर उसे छोड़ दिया था, वही एक दिन कंपनी में निवेश साझेदार के प्रतिनिधि के रूप में आया। उसके साथ वही अमीर लड़की नहीं थी। उसे पता चला था कि काव्या ऑरोरा की महत्वपूर्ण योजना का हिस्सा है और कंपनी का भविष्य बदलने वाला सौदा होने जा रहा है। निखिल ने काव्या से मिलने की कोशिश की। उसने कहा, “मैंने गलती की थी। उस दिन हालात अलग थे। सारा से भी बात नहीं बनी। मुझे समझ आया कि तुम ही मेरे लिए सही थीं।” काव्या ने उसे शांत आँखों से देखा। पहले वाली काव्या शायद रो पड़ती, सवाल करती, उसे वापस स्वीकार कर लेती। मगर अब उसके भीतर टूटन से पैदा हुई मजबूती थी।

उसने कहा, “तुमने मुझे छोड़ा था क्योंकि तुम्हें लगा था कि मैं तुम्हारे बड़े सपनों के लायक नहीं हूँ। अब तुम लौटे हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे फायदे के लायक हूँ। दोनों बार तुमने मुझे नहीं, अपनी जरूरत देखी। मैं तुम्हें माफ कर सकती हूँ, लेकिन अपनी जिंदगी में वापस जगह नहीं दे सकती।” निखिल स्तब्ध रह गया। आर्यवर्धन दूर खड़ा यह सब देख रहा था। उस क्षण उसे काव्या पर गर्व हुआ। प्रेम शायद यही था, किसी को जीतना नहीं, उसे खुद को जीतते हुए देखकर भीतर से खुश होना।

लेकिन रिचर्ड की नजरें सब पर थीं। उसे अब आर्यन से खतरा महसूस होने लगा था। एक चपरासी इतना शांत क्यों है? वह हर जगह मौजूद क्यों रहता है? काव्या उस पर भरोसा क्यों करती है? भारतीय कर्मचारी उससे धीरे-धीरे खुलकर बात क्यों करने लगे हैं? रिचर्ड ने अपने सहायक से उसकी जानकारी निकलवाई, पर उसे कुछ खास नहीं मिला। नकली परिचय सावधानी से बनाया गया था। इससे उसका शक और बढ़ गया।

एक रात रिचर्ड ने योजना बनाई। उसने कंपनी के गोपनीय दस्तावेजों की एक प्रति गायब करवाई और आरोप आर्यन पर लगा दिया। अगले दिन सुबह दफ्तर में हंगामा मचा। सुरक्षा कर्मी आए। रिचर्ड ने सबके सामने कहा, “मैंने पहले ही कहा था, ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हमने इसे काम दिया, और इसने चोरी की।” दफ्तर में लोग जमा हो गए। विवेक, अंजलि, हरमीत सब डर गए। काव्या आगे आई। उसने कहा, “यह झूठ है। आर्यन ऐसा नहीं कर सकता।” रिचर्ड ने तीखे स्वर में कहा, “तुम्हारा भावनात्मक लगाव तुम्हें अंधा कर रहा है, काव्या। यह आदमी चपरासी है, और तुम इसके लिए अपनी नौकरी दाँव पर लगा रही हो?”

काव्या ने पहली बार बिना डरे कहा, “अगर इंसान की सच्चाई नौकरी से छोटी हो जाए, तो ऐसी नौकरी बचाकर भी क्या मिलेगा?” पूरा दफ्तर चुप हो गया। आर्यवर्धन ने काव्या की ओर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, मगर डर नहीं था। उस क्षण उसे समझ आया कि उसने उसका भरोसा पा लिया है, बिना अपनी असली पहचान बताए। यही भरोसा सबसे कठिन था।

सुरक्षा कर्मी आर्यवर्धन को बाहर ले जाने लगे। रिचर्ड के चेहरे पर जीत की मुस्कान थी। लेकिन वह नहीं जानता था कि जिसे वह चपरासी समझकर फँसा रहा है, वही उस सौदे की अंतिम कुंजी है। आर्यवर्धन ने जाते-जाते बस इतना कहा, “रिचर्ड, झूठ की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसे सच से ज्यादा याद रखना पड़ता है।” रिचर्ड हँसा। “और सच की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह देर से आता है,” उसने कहा। आर्यवर्धन ने शांत स्वर में जवाब दिया, “हाँ, लेकिन जब आता है तो अकेला नहीं आता। अपने साथ परिणाम भी लाता है।”

उस शाम कंपनी की अंतिम खरीद बैठक तय थी। रिचर्ड को विश्वास था कि वह आर्यन को हटा चुका है, भारतीय कर्मचारियों को फिर डरा चुका है, और काव्या को भी झुका देगा। उसे नहीं पता था कि आर्यवर्धन के पास अब संदेश, रिकॉर्डिंग, गवाहियाँ, अस्वीकार किए गए जीवनवृत्त, वेतन अंतर की रिपोर्टें और रिचर्ड की धमकियों के प्रमाण एकत्र हो चुके थे। खेल अब उसके हाथ से निकल चुका था। तूफान आने वाला था, पर दफ्तर में अभी भी लोग उसे सिर्फ हल्की हवा समझ रहे थे।

भाग तीसरा
जब चपरासी मालिक निकला

ऑरोरा टेक्नॉलॉजीज की अंतिम खरीद बैठक उस शाम कंपनी के सबसे बड़े सभागार में होने वाली थी। बाहर से सब कुछ सामान्य दिख रहा था। काँच की दीवारों पर कंपनी का चमकदार प्रतीक चमक रहा था, स्वागत कक्ष में महँगे फूल रखे थे, बड़े निवेशक आने वाले थे, और हर कर्मचारी को निर्देश दिया गया था कि वह मुस्कुराए, व्यवस्थित रहे और कोई नकारात्मक बात बाहर न जाए। रिचर्ड ब्लेक ने पूरे दफ्तर को चेतावनी दी थी कि आज कोई गलती नहीं होनी चाहिए। उसकी आवाज में ऐसा अधिकार था जैसे वह सिर्फ बैठक नहीं, पूरी कंपनी की आत्मा को नियंत्रित कर रहा हो।

काव्या अपने केबिन में बैठी थी, पर उसका मन काम में नहीं लग रहा था। सुबह जो कुछ हुआ था, उसने उसे भीतर तक हिला दिया था। आर्यन को चोर कहकर ले जाया गया था, और वह कुछ कर नहीं पाई थी। उसने कई बार खुद से पूछा कि वह एक ऐसे आदमी के लिए इतनी बेचैन क्यों है जिसे वह कुछ ही दिनों से जानती है। जवाब साफ था, क्योंकि आर्यन ने उसे उस समय सम्मान दिया था जब वह खुद को सम्मान के योग्य महसूस नहीं कर पा रही थी। उसने उसे सहारा दिया था, लेकिन कभी उस सहारे का बोझ नहीं बनाया। उसने उसकी कमजोरी देखी थी, मगर उसे कमजोर नहीं कहा था। ऐसे लोग जीवन में बार-बार नहीं मिलते।

विवेक, अंजलि और हरमीत धीरे से उसके पास आए। विवेक ने कहा, “हमने तय किया है, अगर आज आर्यन पर आरोप रखा गया तो हम सच बोलेंगे।” अंजलि ने डरते हुए कहा, “नौकरी जा सकती है, वीजा पर असर पड़ सकता है, मगर अगर हम आज भी चुप रहे तो फिर कभी बोल नहीं पाएँगे।” काव्या ने उनकी ओर देखा। उसके भीतर भी वही संघर्ष था। डर था, पर उससे बड़ा था सच। उसने कहा, “आज हम किसी के खिलाफ नहीं, अपने सम्मान के लिए बोलेंगे।”

उधर रिचर्ड अंतिम तैयारी कर रहा था। उसने अपने कमरे में आईने के सामने खड़े होकर टाई ठीक की। उसे लगता था कि यह सौदा पूरा होते ही उसका पद और ऊँचा हो जाएगा। उसने कंपनी के मौजूदा मालिकों को विश्वास दिला दिया था कि सब कुछ नियंत्रण में है। उसने भारतीय कर्मचारियों की शिकायतों को “भावनात्मक प्रतिक्रिया” कहा था। उसने काव्या को “अस्थिर” कहा था। उसने आर्यन को “संदिग्ध निचले स्तर का कर्मचारी” बताकर हटाने की कोशिश की थी। उसे लगता था कि उसने हर रास्ता बंद कर दिया है।

शाम के पाँच बजे सभागार भरने लगा। कंपनी के संस्थापक, बोर्ड सदस्य, सलाहकार, कानूनी प्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिकारी अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गए। मेहरा ग्लोबल की ओर से भी प्रतिनिधि दल आया, पर आर्यवर्धन मेहरा स्वयं दिखाई नहीं दे रहा था। रिचर्ड ने मन ही मन सोचा कि शायद मालिक ने किसी प्रतिनिधि को भेज दिया होगा। उसे राहत मिली। अगर सामने बड़ा मालिक नहीं होगा तो वह बातें आसानी से संभाल लेगा।

बैठक शुरू हुई। प्रस्तुतियाँ दी गईं। लाभ, विस्तार, बाजार, भविष्य, सब पर चमकदार शब्दों में चर्चा हुई। काव्या ने अपनी योजना प्रस्तुत करनी थी। वह मंच पर गई तो उसकी आवाज में हल्का कंपन था, पर शब्द मजबूत थे। उसने कंपनी की तकनीकी क्षमता, ग्राहकों की जरूरतों और नई रणनीति पर बात की। पूरा सभागार ध्यान से सुन रहा था। रिचर्ड को यह पसंद नहीं आया कि काव्या को प्रशंसा मिल रही है। प्रस्तुति खत्म होते ही उसने कहा, “काव्या प्रतिभाशाली है, पर इसे अभी बहुत मार्गदर्शन की जरूरत है। इसी कारण मैंने इसका काम खुद देखा है।” काव्या ने उसकी ओर देखा। वह जानती थी कि वह उसके श्रेय को फिर अपने नाम में बाँधने की कोशिश कर रहा है।

तभी सभागार का दरवाजा खुला। अंदर एक आदमी चपरासी की वर्दी में प्रवेश करता दिखाई दिया। हाथ में फाइल थी, कदम शांत थे, चेहरा स्थिर था। लोग मुड़कर देखने लगे। रिचर्ड के चेहरे पर क्रोध आ गया। वह उठकर चिल्लाया, “इसे किसने अंदर आने दिया? यह वही आदमी है जिस पर चोरी का आरोप है। सुरक्षा!” काव्या का दिल जोर से धड़कने लगा। वह आर्यन था।