Crime Story

जिस पत्नी को दुनिया ने बेवफा कहा, उसी के लिए आईपीएस बनकर लौटा पति

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रुद्रपुर के गरीब युवक कबीर का सपना अफसर बनने का था, और उसकी पत्नी राधिका ने अपने गहने बेचकर उसे दिल्ली भेज दिया। लेकिन कबीर की गैरमौजूदगी में उसका सबसे भरोसेमंद दोस्त विक्रम ही राधिका की जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया। समाज ने राधिका को बेवफा समझ लिया, पुलिस ने कबीर की फरियाद ठुकरा दी, और कबीर टूटकर भी हार नहीं माना। तीन साल बाद जब वह आईपीएस बनकर लौटा, तो एक ऐसा सच सामने आया जिसने दोस्ती, प्यार और न्याय की पूरी परिभाषा बदल दी।

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 28 मिनट

भाग 1

पंजाब और हिमाचल की सीमा पर बसा एक छोटा सा पहाड़ी गाँव था—’रुद्रपुर’। यह गाँव अपनी शांत वादियों, देवदार के ऊँचे पेड़ों और सर्दियों में गिरने वाली बर्फ के लिए जाना जाता था। यहाँ की ज़िंदगी पहाड़ों की ढलान की तरह धीमी और संभलकर चलती थी। गाँव के ज़्यादातर लोग या तो सेब के बागानों में मज़दूरी करते थे या सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करते थे। इसी गाँव के एक छोर पर, जहाँ से पथरीला रास्ता जंगलों की तरफ जाता था, एक पुरानी लकड़ी और पत्थरों से बनी ढहती हुई कोठरी थी। इस कोठरी में रहता था कबीर।

कबीर एक बेहद स्वाभिमानी, शांत और गहरी आँखों वाला नौजवान था। गाँव के दूसरे लड़कों की तरह उसने कभी सेना में जाने या शहर के किसी कारखाने में काम करने की नहीं सोची थी। उसकी आँखों में एक अलग ही आग थी—वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में जाकर देश की प्रशासनिक व्यवस्था को बदलना चाहता था। लेकिन रुद्रपुर जैसे पिछड़े गाँव में, जहाँ ढंग की बिजली भी सिर्फ कुछ घंटों के लिए आती थी, कबीर का यह सपना लोगों के लिए एक मज़ाक से कम नहीं था। जब भी कबीर हाथ में मोटी-मोटी किताबें लेकर पोस्ट ऑफिस की टूटी बेंच पर बैठता, तो गाँव के ज़मींदार और बुज़ुर्ग हँसते हुए कहते, “ओए कबीर! बाप पूरी ज़िंदगी दूसरों के खेतों में कुदाल चलाता रहा, और बेटा राजा बाबू बनने के ख्वाब देख रहा है। ज़मीन पर आ जा, नहीं तो ऊपर से गिरेगा तो हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी।” कबीर इन तानों को सुनता, अपनी आँखें नीचे करता और चुपचाप वहाँ से उठ जाता। उसने खुद से वादा किया था कि वह अपनी जुबान से नहीं, बल्कि अपनी कलम और कामयाबी से इन सब का मुँह बंद करेगा।

इस मुश्किल सफर में अगर कोई कबीर की रीढ़ की हड्डी बनकर खड़ी थी, तो वह थी उसकी पत्नी राधिका। राधिका पास के ही एक सीधे-साधे परिवार की बेटी थी। वह दिखने में जितनी सौम्य और शांत थी, भीतर से उतनी ही दृढ़ संकल्पी थी। कबीर और राधिका की शादी को अभी जुम्मा-जुम्मा दो साल ही हुए थे, लेकिन राधिका ने कबीर के सपनों को इस कदर अपना लिया था कि अब दोनों की साँसें एक ही मकसद के लिए चलती थीं। दिनभर राधिका दूसरों के घरों में सिलाई-कढ़ाई का काम करती, ताकि घर का चूल्हा जल सके, और रात होते ही वह कबीर की परछाई बन जाती। पहाड़ी रातों में जब कबीर टेबल लैंप की मद्धम रोशनी में इतिहास और भूगोल के पन्ने पलटता, तो राधिका बिना कहे उसके पास आकर बैठ जाती। कभी वह उसके सिर पर तेल की मालिश करती, तो कभी कड़कड़ाती ठंड में अदरक वाली गर्मागर्म चाय बनाकर लाती। कई बार रात के दो-तीन बज जाते, कबीर पढ़ते-पढ़ते थक जाता, लेकिन राधिका की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं होता था। कबीर जब उससे कहता, “राधिका, तुम सो जाओ, सुबह तुम्हें काम पर भी जाना है,” तो वह मुस्कुराकर कहती, “जब तक आप इस लाल बत्ती वाली गाड़ी का सपना पूरा नहीं कर लेते, मेरी आँखों को सोने का कोई हक नहीं है। मुझे पता है कि हमारी ये काली रातें एक दिन बहुत खूबसूरत सुबह लेकर आएंगी।”

इसी गाँव में कबीर का एक लंगोटिया यार था, जिसका नाम था विक्रम। विक्रम गाँव के एक रसूखदार और संपन्न परिवार से था। उसके पिता के पास सेब के कई बड़े बागान थे। विक्रम और कबीर बचपन से एक ही स्कूल में पढ़े थे, एक ही थाली में खाना खाया था और गाँव की गलियों में साथ बड़े हुए थे। पूरे रुद्रपुर में उनकी दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं। कबीर को विक्रम पर अपनी जान से भी ज़्यादा भरोसा था। वह अक्सर राधिका से कहता था, “अगर इस दुनिया में मेरे माता-पिता के बाद कोई मेरा अपना है, तो वह विक्रम है। उसके रहते मुझे किसी बात की चिंता नहीं होती।” विक्रम भी बाहर से ऐसा ही दिखाता था। जब भी कबीर को किताबों के लिए या फॉर्म भरने के लिए पैसों की तंगी होती, विक्रम सबसे पहले आगे आकर कबीर की जेब में पैसे डाल देता था। अगर गाँव का कोई रसूखदार कबीर का मज़ाक उड़ाता, तो विक्रम उससे लड़ने पर उतारू हो जाता था। राधिका भी विक्रम को अपने सगे भाई की तरह मानती थी और जब भी वह घर आता, उसके लिए बड़े चाव से पहाड़ी पकवान बनाती थी।

लेकिन इंसानी दिमाग की परतें बहुत गहरी होती हैं। विक्रम के इस दोस्ताना चेहरे के पीछे एक गहरा, काला और डरावना राज छुपा था, जिससे कबीर और राधिका पूरी तरह अनजान थे। कॉलेज के दिनों में विक्रम राधिका को एकतरफा चाहने लगा था। उसने कभी किसी से अपने दिल की बात नहीं कही थी, क्योंकि राधिका हमेशा कबीर के प्रति समर्पित थी। जब कबीर और राधिका की शादी तय हुई, तो विक्रम के पैरों तले जमीन खिसक गई थी, लेकिन उसने अपनी नफरत और जलन को दोस्ती के एक बेहद खूबसूरत मुखौटे के पीछे छुपा लिया। वह अंदर ही अंदर कबीर की सादगी, उसकी पढ़ाई और सबसे ज़्यादा राधिका के उसके प्रति अगाध प्रेम से जलता था। वह सही मौके के इंतज़ार में था, जहाँ वह कबीर को इस कदर बर्बाद कर सके कि वह कभी उठ न पाए।

एक शाम, जब आसमान में काले बादल घिरे थे और पहाड़ों पर ठंडी हवाएं चल रही थीं, कबीर अपनी कोठरी के बाहर एक लकड़ी के स्टूल पर बैठा था। उसके सामने देश के सबसे कठिन इम्तिहान का सिलेबस खुला हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कहीं दूर शून्य में तैर रही थीं। राधिका ने चूल्हे से हाथ धोए और उसके पास आकर बैठ गई। उसने कबीर के कंधे पर हाथ रखकर पूछा, “क्या बात है कबीर? आज पन्ने पलट नहीं रहे, बस ठहर गए हैं। कोई परेशानी है?” कबीर ने एक ठंडी और लंबी साँस ली और राधिका का हाथ थामते हुए बोला, “राधिका, मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे साथ अन्याय कर रहा हूँ। गाँव की इस छोटी सी कोठरी में बैठकर, बिना किसी कोचिंग और सही किताबों के, मैं कभी आईएएस (IAS) की परीक्षा पास नहीं कर पाऊँगा। दिल्ली या चंडीगढ़ जैसे बड़े शहर जाना ही होगा। वहाँ रहने, खाने और बड़ी कोचिंग की फीस के लिए लाखों रुपये चाहिए। और हमारे पास… हमारे पास तो अगले महीने के राशन के भी पूरे पैसे नहीं हैं।” कबीर की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी।

राधिका कुछ पल के लिए शांत रही। उसने कबीर की आँखों में छिपी उस लाचारी को देखा जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। वह उठी, कमरे के अंदर गई और काफी देर तक बाहर नहीं आई। कबीर को लगा कि शायद राधिका उदास हो गई है। लेकिन जब वह बाहर आई, तो उसके हाथों में एक मखमली पुराना कपड़ा था। उसने कबीर के सामने वह कपड़ा खोला। उसके अंदर राधिका के सोने के कंगन, गले का हार और झुमके चमक रहे थे—यह वह इकलौता जेवर था जो राधिका की माँ ने उसे शादी में दिया था। कबीर झटके से खड़ा हो गया और बोला, “नहीं राधिका! यह कभी नहीं होगा। मैं तुम्हारी माँ की आखिरी निशानी बेचकर अपने सपनों की लाश नहीं सजाऊँगा। मैं मज़दूरी कर लूँगा, लेकिन इन गहनों को हाथ नहीं लगाने दूँगा।”

राधिका की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसके चेहरे पर एक गजब का आत्मबल था। उसने कबीर का हाथ पकड़ा और उन गहनों को उसकी हथेली पर रखते हुए कहा, “कबीर, गहने तो सिर्फ शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन आपका सपना इस आत्मा की शोभा है। अगर आज ये गहने नहीं बिके, तो कल ये समाज आपकी काबिलियत को बेच खाएगा। जब आप बड़े अफसर बन जाएंगे, तो मुझे इससे भी सुंदर गहने दिला देना। पर आज, आपको दिल्ली जाना ही होगा।” कबीर राधिका के इस त्याग के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया। उस रात दोनों बहुत रोए, लेकिन उन आँसूओं में उम्मीद की एक नई किरण थी।

अगले दिन, राधिका ने शहर जाकर अपने सारे गहने बेच दिए। जब यह खबर गाँव में फैली, तो लोगों ने थू-थू करना शुरू कर दिया। चाय के टपरों पर बातें होने लगीं कि “कबीर कैसा मर्द है जो लुगाई के गहने बेचकर अय्याशी करने शहर जा रहा है।” लेकिन राधिका ने अपने कान बंद कर लिए। उसे सिर्फ कबीर की आँखों का वह संकल्प दिखाई दे रहा था।

वह दिन भी आ गया जब कबीर को दिल्ली की बस पकड़नी थी। सुबह से ही रुद्रपुर का मौसम बेहद भावुक था। हल्के कोहरे के बीच कबीर, राधिका और विक्रम गाँव के बस स्टॉप पर खड़े थे। बस आने में कुछ ही मिनट बाकी थे। कबीर के कंधे पर एक पुराना कपड़ा का थैला था, जिसमें राधिका के बेचे हुए गहनों के पैसे, कुछ जोड़ी कपड़े और ढेर सारी उम्मीदें थीं। राधिका ने अपने आँसूओं को जबरन रोकते हुए कबीर के पैर छुए और कहा, “कबीर, वहाँ जाकर सिर्फ पढ़ाई करना। इस गाँव की, मेरी या इन तानों की फिक्र मत करना। बस एक बात याद रखना, जब लौटना तो पीठ दिखाकर मत लौटना।” कबीर ने उसके सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराया।

तभी पास खड़े विक्रम ने आगे बढ़कर कबीर को गले लगा लिया। उसने कबीर की पीठ थपथपाते हुए कहा, “भाई कबीर, तू जा और दिल्ली फतह कर। यहाँ रुद्रपुर में तेरी राधिका और तेरे घर की जिम्मेदारी मेरी है। जब तक तेरा यह भाई ज़िंदा है, राधिका भाभी को कोई तकलीफ नहीं होगी। तू बस आँखें बंद करके अपनी किताबों में डूब जा।” कबीर की आँखों में विक्रम के लिए सम्मान और बढ़ गया। उसने कहा, “विक्रम, मुझे पता है कि तेरे जैसा भाई हो तो इंसान दुनिया की हर जंग जीत सकता है। राधिका का ख्याल रखना।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।

बस हॉर्न बजाती हुई आई और कबीर उसमें सवार हो गया। खिड़की वाली सीट पर बैठकर कबीर ने आखिरी बार पीछे देखा। राधिका हाथ हिला रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, और उसके ठीक पीछे खड़ा था विक्रम, जिसके चेहरे पर एक बेहद अजीब, रहस्यमयी मुस्कान थी। वह मुस्कान किसी दोस्त की नहीं, बल्कि एक शिकारी की थी जिसे पता था कि उसका शिकार अब पूरी तरह अकेला हो चुका है। बस धीरे-धीरे मुड़कर पहाड़ों के पीछे ओझल हो गई। कबीर दिल्ली की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ उसे किताबों से लड़ना था, लेकिन वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि रुद्रपुर में उसकी ज़िंदगी की सबसे खौफनाक और घिनौनी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी थी।

भाग 2: अँधेरी सुरंग और विश्वासघातदिल्ली पहुँचने के बाद कबीर को एहसास हुआ कि हकीकत किताबों में लिखी बातों से कहीं ज़्यादा कड़वी होती है। करोल बाग की तंग गलियों में, जहाँ सूरज की रोशनी भी बमुश्किल पहुँचती थी, उसने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। उस कमरे की दीवारें सीलन से भरी थीं और छत से प्लास्टर गिरता रहता था। कोचिंग की भारी फीस देने के बाद कबीर के पास जो पैसे बचे थे, उन्हें वह फूंक-फूंक कर खर्च कर रहा था। कबीर सुबह पाँच बजे उठता, दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में तैयार होकर लाइब्रेरी जाता और रात के ग्यारह बजे तक वहीं बैठा रहता। पैसों की कमी के कारण वह दिन में सिर्फ एक बार ढाबे पर आधी प्लेट दाल और दो रोटियाँ खाता था। कई बार भूख के मारे उसके पेट में मरोड़ उठती, सिर चकराने लगता, लेकिन जैसे ही वह हार मानने की सोचता, वह अपनी जेब से राधिका की एक छोटी सी मुड़ी-तुड़ी तस्वीर निकाल लेता। उस तस्वीर को देखकर उसके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता और वह फिर से किताबों के पन्नों में खो जाता।

उधर रुद्रपुर गाँव में राधिका की ज़िंदगी एक अलग ही इम्तिहान से गुज़र रही थी। कबीर के जाने के बाद कोठरी का सन्नाटा उसे काटने को दौड़ता था। वह दिनभर खेतों में मज़दूरी करती, रात को आकर सिलाई का काम करती ताकि कबीर को हर महीने कुछ पैसे भेज सके। पहाड़ों में नेटवर्क की भारी समस्या थी, इसलिए हफ्ते में सिर्फ एक या दो बार कबीर का फोन पीसीओ (PCO) पर आता था। वह पाँच मिनट की बातचीत ही राधिका के जीने का सहारा थी। कबीर हमेशा कहता, “राधिका, मैं ठीक हूँ, तुम अपना ख्याल रखना।” और राधिका अपने छाले पड़े हाथों को छुपाकर कहती, “मैं यहाँ रानी की तरह हूँ कबीर, आप बस पढ़ाई पर ध्यान दो।”

इसी दौरान गाँव में विक्रम की हलचल बहुत बढ़ गई थी। वह रोज़ शाम को कबीर की कोठरी के चक्कर लगाने लगा था। कभी वह राधिका के लिए बाज़ार से राशन ले आता, तो कभी कुएं से पानी भरने में उसकी मदद करने की ज़िद करता। शुरुआत में राधिका को लगा कि विक्रम एक सच्चे दोस्त का फर्ज निभा रहा है। गाँव की औरतें भी कहती थीं, “धन्य है विक्रम जैसी दोस्ती, कबीर शहर में है पर विक्रम ने राधिका को कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।” लेकिन धीरे-धीरे विक्रम की आँखों की चमक और उसकी बातें बदलने लगीं। वह अक्सर राधिका से कहता, “भाभी, कबीर तो दिल्ली के बड़े शहर में खो गया है। वहाँ बड़ी-बड़ी लड़कियाँ हैं, चकाचौंध है। क्या पता वह तुम्हें याद भी करता है या नहीं? तुम यहाँ इतनी मेहनत क्यों करती हो, मुझसे कहो, मैं तुम्हें ऐश की ज़िंदगी दूँगा।” राधिका को विक्रम की ये बातें खटकने लगीं। उसने विक्रम से दूरी बनानी शुरू कर दी और उसे घर आने से मना कर दिया। राधिका का यह इनकार विक्रम के अहंकार पर एक गहरी चोट था। उसका वह दबा हुआ पागलपन अब एक खतरनाक साज़िश में बदलने लगा था।

वक्त बीतता गया और कबीर की मेहनत रंग लाने लगी। उसने सिविल सेवा की प्रारंभिक (Prelims) और मुख्य (Mains) परीक्षा बड़े अच्छे अंकों से पास कर ली थी। अब सिर्फ इंटरव्यू बाकी था। जब कबीर ने फोन पर राधिका को यह खबर सुनाई, तो राधिका गाँव के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर फूट-फूंट कर रो पड़ी। पूरे रुद्रपुर में सनसनी फैल गई कि एक गरीब का बेटा देश का सबसे बड़ा अफसर बनने की कगार पर है। जो लोग कबीर का मज़ाक उड़ाते थे, वे अब राधिका के आगे-पीछे घूमने लगे थे। लेकिन इस कामयाबी की खबर ने विक्रम के भीतर के शैतान को पूरी तरह जगा दिया था। उसे लगा कि अगर कबीर आईएएस बन गया, तो राधिका हमेशा के लिए उसकी पहुँच से दूर हो जाएगी और वह कबीर के सामने कभी सिर उठाकर नहीं देख पाएगा।

एक रात, रुद्रपुर में आंधी-तूफान का मंज़र था। पहाड़ों पर तेज़ बारिश हो रही थी और बिजली के खंभे गिर जाने से पूरे गाँव में घुप्प अँधेरा था। राधिका अपनी कोठरी में अकेली थी और लालटेन की रोशनी में कबीर के लिए स्वेटर बुन रही थी। अचानक आधी रात को उसके दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई। राधिका का दिल दहल गया। उसने डरते-डरते दरवाज़ा खोला। सामने विक्रम खड़ा था, वह पूरी तरह भीगा हुआ था और उसके चेहरे पर एक नकली खौफ था। उसने हांफते हुए कहा, “राधिका भाभी! अनर्थ हो गया। दिल्ली से कबीर के दोस्त का फोन आया था… कबीर का बहुत भयानक एक्सीडेंट हो गया है। वह अस्पताल में वेंटिलेटर पर है और बार-बार तुम्हारा नाम ले रहा है। जल्दी चलो, मेरी गाड़ी बाहर खड़ी है।”

भाग 1/2 अगला →
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