भाग 1
मुंबई की उस सुबह में भी वही भागदौड़ थी, जो हर दिन शहर की पहचान बनकर सड़कों पर उतर आती थी। समुद्र के किनारे बने ऊँचे काँच के भवनों पर सूरज की हल्की किरणें पड़ रही थीं और शहर की सबसे ऊँची इमारतों में से एक के ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—सिंघानिया समूह।
इस विशाल व्यापारिक साम्राज्य का मालिक था आरव सिंघानिया।
उम्र लगभग बयालीस वर्ष, लंबा कद, शांत चेहरा और ऐसी गहरी आँखें, जिन्हें देखकर लोग अक्सर समझ नहीं पाते थे कि उनके पीछे क्या चल रहा है। व्यापार की दुनिया में आरव का नाम सम्मान के साथ-साथ थोड़े डर से भी लिया जाता था। वह निर्णय लेने में कभी देर नहीं करता था। करोड़ों की परियोजना हो या किसी पुराने विभाग को बंद करने का कठिन फैसला, उसकी आवाज कभी काँपती नहीं थी।
लेकिन दोस्तों, हर मजबूत दिखाई देने वाला इंसान भीतर से उतना ही मजबूत हो, यह जरूरी नहीं होता।
आरव की जिंदगी में एक खालीपन था, जिसे उसकी दौलत कभी भर नहीं सकी।
जब आरव केवल बारह साल का था, तभी उसकी माँ सविता सिंघानिया का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। उसकी माँ ही उसके जीवन में एकमात्र ऐसी व्यक्ति थीं, जिन्होंने उसे बिना किसी अपेक्षा के प्रेम किया था। आरव के पिता महेंद्र सिंघानिया व्यापार के प्रति इतने कठोर थे कि उनके लिए भावनाएँ भी किसी सौदे की तरह थीं।
माँ के जाने के बाद आरव का बचपन अचानक समाप्त हो गया।
जिस उम्र में बच्चे अपने दोस्तों के साथ खेलते हैं, उस उम्र में आरव अपने पिता के कार्यालय में बैठकर हिसाब की पुरानी किताबें देखा करता था। उसे सिखाया गया कि किसी पर भरोसा मत करो, किसी के सामने कमजोर मत पड़ो और किसी को इतना अधिकार मत दो कि वह तुम्हें चोट पहुँचा सके।
आरव ने ये सभी बातें सीख लीं।
बस एक बात नहीं सीख पाया—अकेलेपन के साथ कैसे जिया जाए।
समय बीतता गया। महेंद्र सिंघानिया की मृत्यु के बाद आरव ने बिखरते हुए व्यापार को न केवल संभाला, बल्कि उसे देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में शामिल कर दिया। उसके पास निजी विमान था, समुद्र किनारे विशाल घर था, कई देशों में संपत्तियाँ थीं और उसके एक संकेत पर सैकड़ों लोग काम में लग जाते थे।
फिर भी जब वह रात में अपने विशाल शयनकक्ष में लौटता, तो कमरे की खामोशी उसे अपनी माँ की अनुपस्थिति और भी गहराई से महसूस कराती थी।
फिर उसकी जिंदगी में मेहर आई।
उनकी पहली मुलाकात दिल्ली में आयोजित एक परोपकारी समारोह में हुई थी। आरव उस समारोह का मुख्य अतिथि था। कार्यक्रम अनाथ बच्चों की शिक्षा के लिए धन इकट्ठा करने हेतु आयोजित किया गया था।
आरव मंच से उतरकर एक तरफ खड़ा कुछ लोगों से बात कर रहा था, तभी एक छोटी बच्ची दौड़ते हुए उससे टकरा गई। बच्ची के हाथ में रखा रस आरव के महँगे वस्त्रों पर गिर गया।
सुरक्षा कर्मचारी तुरंत बच्ची की ओर बढ़े, लेकिन उससे पहले मेहर वहाँ पहुँच गई।
उसने बच्ची को अपने पीछे किया और आरव की ओर देखकर बोली, “गलती से हुआ है। इसे डाँटने की जरूरत नहीं है।”
सुरक्षा कर्मचारियों ने उसकी ओर ऐसे देखा, जैसे किसी ने राजा के सामने ऊँची आवाज में बोलने का अपराध कर दिया हो।
लेकिन आरव चुप रहा।
मेहर ने अपने रूमाल से आरव के वस्त्र साफ करने की कोशिश की, फिर अचानक रुककर बोली, “वैसे ये दाग उतर जाएगा। लेकिन अगर बच्ची डर गई, तो शायद उसका डर जल्दी नहीं जाएगा।”

आरव ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
सादे सफेद वस्त्र, बिना किसी भारी आभूषण के, चेहरे पर आत्मविश्वास और आँखों में ऐसी सहजता, जैसे उसे सामने खड़े व्यक्ति की दौलत या पद का कोई प्रभाव ही न पड़ा हो।
वह मुस्कुराया और सुरक्षा कर्मचारियों को पीछे हटने का संकेत दिया।
उस छोटी-सी घटना के बाद मेहर और आरव की बातचीत शुरू हुई। मेहर ने बताया कि वह उस संस्था के साथ स्वयंसेवक के रूप में काम करती है। वह बच्चों को संगीत और चित्रकला सिखाती है।
आरव ने उसे देखकर कहा, “आपको पता है, लोग मुझसे बात करते समय शब्द चुनते हैं।”
मेहर मुस्कुराई। “शायद उन्हें डर होता होगा कि कहीं गलत शब्द की कीमत न चुकानी पड़े।”
“और आपको डर नहीं लगा?”
“नहीं। मुझे लगा कि आपके वस्त्रों से ज्यादा जरूरी उस बच्ची का चेहरा है।”
उस रात आरव अपने घर लौटते समय पहली बार किसी अनजान स्त्री के बारे में सोच रहा था।
दोस्तों, कभी-कभी हमारे जीवन में कोई व्यक्ति अचानक आता है और हमें लगता है कि हम उसे बहुत पहले से जानते हैं। आरव के साथ भी यही हुआ।
अगले कुछ महीनों में उनकी मुलाकातें बढ़ने लगीं। शुरुआत में वे संस्था के काम को लेकर मिलते थे। फिर कभी भोजन के लिए, कभी किसी कला प्रदर्शनी में और कभी केवल समुद्र किनारे टहलने के लिए।
मेहर आरव से उसकी दौलत के बारे में बहुत कम पूछती थी। वह उससे उसकी माँ के बारे में पूछती, उसके बचपन के बारे में पूछती और कभी-कभी ऐसी बातें पूछती, जिनका उत्तर आरव ने स्वयं से भी नहीं माँगा था।
एक शाम समुद्र किनारे बैठते हुए मेहर ने पूछा, “आपको सबसे ज्यादा डर किस बात से लगता है?”
आरव हँस पड़ा। “मेरे बारे में कहा जाता है कि मुझे किसी बात का डर नहीं लगता।”
“दुनिया जो कहती है, मैं वह नहीं पूछ रही।”
आरव कुछ देर चुप रहा।
फिर धीमे स्वर में बोला, “मुझे डर है कि एक दिन मेरी जिंदगी समाप्त हो जाएगी और मुझे पता चलेगा कि मेरे पास सब कुछ था, बस कोई अपना नहीं था।”
मेहर ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं। उसने केवल अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।
वह साधारण-सा स्पर्श आरव के लिए किसी बड़े वादे जैसा था।
धीरे-धीरे आरव ने अपने भीतर बंद सभी दरवाजे मेहर के लिए खोल दिए। उसने उसे अपनी माँ का कमरा दिखाया, जिसे उनकी मृत्यु के बाद लगभग वैसा ही रखा गया था। उसने उसे अपनी पुरानी डायरी पढ़ने दी। उसने वह छोटा लकड़ी का डिब्बा भी दिखाया, जिसमें उसकी माँ की चूड़ियों के कुछ टूटे हुए टुकड़े रखे थे।
मेहर ने हर बात को बहुत ध्यान से सुना।
जब आरव अपनी माँ के बारे में बताते हुए भावुक हुआ, तो उसने उसके आँसू पोंछे और कहा, “तुम्हें हर समय मजबूत बनने की जरूरत नहीं है। कम से कम मेरे सामने तो नहीं।”
यही वह वाक्य था, जिसने आरव का दिल पूरी तरह जीत लिया।
कुछ महीनों बाद आरव ने मेहर को विवाह का प्रस्ताव दिया।
वह कोई बहुत भव्य दृश्य नहीं था। न हजारों फूल थे, न बड़ी सभा और न ही समाचार माध्यम। आरव उसे अपनी माँ के पुराने घर में ले गया था। घर के आँगन में वही अमलतास का पेड़ था, जिसके नीचे वह बचपन में बैठा करता था।
आरव ने एक छोटी-सी अंगूठी निकालकर कहा, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे उस चीज के लिए स्वीकार करो, जो इन सबके पीछे है। एक ऐसा आदमी, जिसे अब भी कभी-कभी रात में अकेलेपन से डर लगता है।”
मेहर की आँखें नम हो गईं।
उसने हाँ कह दी।
उनका विवाह पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। बड़े उद्योगपति, प्रसिद्ध कलाकार, राजनेता और विदेशी मेहमान समारोह में आए। लेकिन आरव के लिए उस दिन भीड़ में केवल एक चेहरा मायने रखता था—मेहर का।
विवाह के बाद आरव सचमुच बदल गया।
पहले वह रात के दो बजे तक कार्यालय में रहता था। अब वह शाम को घर लौटने की कोशिश करता। पहले उसके घर में त्योहार केवल कर्मचारियों के लिए आयोजित कार्यक्रम हुआ करते थे। अब मेहर स्वयं दीये सजाती, रंगोली बनाती और आरव को हर रस्म में शामिल करती।
कभी वह उसकी आँखों पर हाथ रखकर रसोई तक ले जाती और कहती, “आज मैंने तुम्हारे लिए कुछ बनाया है।”
आरव जानता था कि मेहर अच्छा भोजन नहीं बना पाती, फिर भी वह हर बार पूरे उत्साह से खाता।
एक दिन उसने नमक के स्थान पर चीनी डाल दी थी। आरव ने बिना शिकायत पूरा व्यंजन खा लिया।
जब मेहर को अपनी गलती पता चली, तो वह हँसते-हँसते बोली, “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”
आरव ने कहा, “तुमने पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया था। मैं उस याद को शिकायत से खराब नहीं करना चाहता था।”
मेहर ने उसे गले लगा लिया।
आरव के लिए यही प्रेम था।
छोटी-छोटी बातें, जो उसे यह विश्वास दिलाती थीं कि कोई व्यक्ति उसे उसके पद से नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व से प्रेम करता है।
उनकी शादी को तीन साल पूरे होने वाले थे।
मेहर ने उस अवसर पर आरव के लिए एक विशेष घड़ी बनवाई। गहरे नीले रंग की पट्टी, चाँदी के किनारे और भीतर बहुत बारीक नक्काशी। घड़ी के पीछे एक पंक्ति लिखी थी—
“जिंदगी हमें कहीं भी ले जाए, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास लौटेगा।”
मेहर ने घड़ी आरव की कलाई पर बाँधते हुए कहा, “पूरी दुनिया में ऐसी केवल एक घड़ी है।”
आरव लंबे समय तक उस घड़ी को देखता रहा।
“तुम्हें पसंद नहीं आई?” मेहर ने पूछा।
आरव ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में नमी थी।
“मुझे उपहार से ज्यादा उस पर लिखा वादा पसंद आया है।”
उसने मेहर को बाँहों में भर लिया।
उस दिन से आरव ने वह घड़ी लगभग हर समय पहननी शुरू कर दी। बड़ी से बड़ी बैठक हो, विदेश यात्रा हो या किसी कारखाने का निरीक्षण, वह घड़ी उसकी कलाई पर रहती।
व्यापार की दुनिया में लोग कई बार उसकी महँगी घड़ी की प्रशंसा करते। वह गर्व से कहता, “यह मेरी पत्नी ने दी है। ऐसी दूसरी कहीं नहीं मिलेगी।”
अब कहानी में थोड़ा और गहराई से उतरते हैं, दोस्तों।
मेहर बाहर से आरव की आदर्श पत्नी थी। वह उसके हर कार्यक्रम में साथ खड़ी रहती। कर्मचारियों के परिवारों से मिलती। समाजसेवा के कार्यों में भाग लेती। आरव के पुराने मित्रों का सम्मान करती और उसके पिता की बरसी पर स्वयं सारी व्यवस्था संभालती।
लेकिन कुछ रिश्ते बाहर से जितने सुंदर दिखाई देते हैं, भीतर से उतने ही खोखले हो सकते हैं।
मेहर के जीवन में आरव से पहले कोई और था।
उसका नाम था रिषभ खन्ना।
रिषभ और मेहर की मुलाकात महाविद्यालय के दिनों में हुई थी। रिषभ आकर्षक, महत्वाकांक्षी और बहुत चतुर था। उसके पास बड़े सपने थे, लेकिन उन्हें पूरा करने का धैर्य नहीं था। वह जल्दी पैसा कमाना चाहता था, जल्दी प्रभावशाली बनना चाहता था और उसे विश्वास था कि वह किसी भी व्यक्ति को अपनी बातों में फँसा सकता है।
मेहर उससे बहुत प्रेम करती थी।
दोनों ने साथ जीने की कसमें खाई थीं। लेकिन जब पढ़ाई समाप्त हुई, तो वास्तविक जीवन उनके सामने खड़ा था। रिषभ के छोटे-मोटे व्यापार लगातार असफल हो रहे थे। उस पर ऋण बढ़ता जा रहा था।
एक दिन उसने मेहर से कहा, “प्रेम से घर नहीं चलता। हमें कुछ बड़ा करना होगा।”
उसी समय उसे पता चला कि आरव सिंघानिया एक सामाजिक संस्था के कार्यक्रम में आने वाला है।
रिषभ ने योजना बनाई।
मेहर को कार्यक्रम में जाना था। उसे आरव का ध्यान अपनी ओर खींचना था। फिर धीरे-धीरे उसके जीवन में स्थान बनाना था।
शुरुआत में मेहर ने विरोध किया।
“मैं किसी अनजान आदमी की भावनाओं से नहीं खेल सकती,” उसने कहा था।
रिषभ ने उसका हाथ पकड़कर समझाया, “तुम्हें हमेशा उसके साथ थोड़े ही रहना है। बस कुछ वर्ष। जब सही समय आएगा, तुम उसकी संपत्ति में अपना हिस्सा लेकर अलग हो जाना। फिर हम दोनों हमेशा के लिए साथ रहेंगे।”
मेहर ने पूछा, “और अगर वह मुझसे सच में प्रेम करने लगा तो?”
रिषभ हँसा। “उस जैसे लोग किसी से प्रेम नहीं करते। उन्हें केवल अधिकार चाहिए होता है।”
मेहर ने रिषभ की बात मान ली।