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बारिश भरी रात, सुनसान रास्ता और एक अजनबी जिसने सब कुछ बदल दिया

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

एक बरसाती रात अन्वी अपने बीमार पिता तक पहुंचने के लिए सुनसान बस अड्डे पर अकेली फंसी हुई थी। कोई बस नहीं, कोई टैक्सी नहीं, और मोबाइल में नेटवर्क भी नहीं। मजबूरी में उसने एक अजनबी युवक वीर से लिफ्ट मांगी, लेकिन जैसे-जैसे सफर आगे बढ़ा, एक काली गाड़ी उनका पीछा करने लगी और रास्ते में कई डरावने मोड़ सामने आए।

अन्वी को लगने लगा कि शायद उसने किसी गलत इंसान पर भरोसा कर लिया है, लेकिन वीर की समझदारी, हिम्मत और इंसानियत धीरे-धीरे उसके हर डर को बदलने लगी। जब वह अपने घर पहुंची, तब उसे पता चला कि असली मुसीबत तो अभी बाकी थी—उसके पिता की हालत बेहद गंभीर थी।

कौन था वीर? वह अपनी पहचान क्यों छिपा रहा था? और उस रात की एक मदद कैसे हजारों लोगों की जिंदगी बदलने वाली थी? यह कहानी भरोसे, सावधानी और इंसानियत की ऐसी मिसाल है जो दिल को छू जाएगी।

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 38 मिनट

भाग 1

रात के करीब साढ़े दस बज चुके थे। पहाड़ों की गोद में बसा छोटा-सा शहर मेघपुर दिनभर की आवाज़ों और हलचल के बाद धीरे-धीरे नींद में डूब चुका था। बाजार की दुकानों के शटर गिर चुके थे, चाय की आखिरी केतली भी ठंडी हो चुकी थी, और बस अड्डे के पुराने लोहे के बेंचों पर अब केवल नमी और खालीपन बचा था। आसमान में घने बादल चुपचाप जमा हो रहे थे। कभी-कभी दूर पहाड़ियों के पीछे बिजली चमकती और अगले ही पल बादलों की धीमी गड़गड़ाहट पूरे इलाके को और डरावना बना देती।

बस अड्डे के एक कोने में एक लड़की बेचैन खड़ी थी। उसका नाम अन्वी शर्मा था। उम्र करीब चौबीस साल। चेहरे पर थकान थी, आंखों में चिंता थी, और हाथों में एक छोटा-सा बैग कसकर पकड़ा हुआ था। उसने हल्के पीले रंग का सूट पहन रखा था, जिस पर सफर की धूल साफ दिखाई दे रही थी। वह बार-बार अपने मोबाइल को ऊपर उठाकर नेटवर्क ढूंढने की कोशिश करती, फिर स्क्रीन देखकर निराश हो जाती। फोन में कभी एक कमजोर-सी लाइन आती, फिर तुरंत गायब हो जाती।

अन्वी को उसी रात अपने गांव भीमतालपुर पहुंचना था। मेघपुर से उसका गांव लगभग साठ किलोमीटर दूर था, लेकिन पहाड़ी रास्तों की वजह से वह दूरी रात में और लंबी लगती थी। शाम को उसकी मां का फोन आया था। मां की आवाज़ कांप रही थी। उन्होंने बताया था कि अन्वी के पिता, शंकरलाल शर्मा, अचानक बेहोश होकर गिर पड़े हैं। गांव के डॉक्टर ने कहा था कि हालत गंभीर हो सकती है और उन्हें शहर के बड़े अस्पताल ले जाना पड़ सकता है।

अन्वी उस समय अपने दफ्तर में थी। वह मेघपुर के एक छोटे से ट्रैवल ऑफिस में अकाउंट असिस्टेंट का काम करती थी। उस दिन महीने का आखिरी दिन था, इसलिए ऑफिस में हिसाब-किताब बंद करना जरूरी था। उसने जैसे-तैसे काम निपटाया, बस पकड़ी और मेघपुर बस अड्डे तक पहुंच गई। मगर वहां आकर पता चला कि भीमतालपुर जाने वाली आखिरी बस तीन घंटे पहले जा चुकी थी। टैक्सी स्टैंड खाली था। जो दो-तीन गाड़ियां दिन में मिल जाती थीं, वे भी बारिश की आशंका देखकर पहले ही गांवों की तरफ लौट चुकी थीं।

अन्वी ने आसपास देखा। बस अड्डे की पीली लाइट टिमटिमा रही थी। टिकट खिड़की बंद थी। एक बूढ़ा सफाई कर्मचारी दूर झाड़ू लगा रहा था और फिर वह भी धीरे-धीरे पीछे बने कमरे में चला गया। अब अन्वी लगभग अकेली थी। सड़क पर कभी कोई बाइक निकल जाती, कभी कोई ट्रक दूर से आता दिखता और फिर धूल, धुआं और आवाज़ छोड़ता हुआ आगे निकल जाता। हर गुजरती गाड़ी के साथ अन्वी की उम्मीद कुछ पल के लिए जागती और फिर बुझ जाती।

उसने फिर मोबाइल देखा। मां को फोन लगाना चाहा, लेकिन कॉल नहीं लगी। उसके मन में तरह-तरह के खयाल आने लगे। पिता की हालत कैसी होगी? मां अकेली कैसे संभाल रही होंगी? अगर रात में कोई साधन न मिला तो वह सुबह तक कैसे इंतजार करेगी? और अगर देर हो गई तो?

तभी दूर से एक काली जीप आती दिखाई दी। अन्वी ने हिम्मत करके हाथ उठाया, लेकिन गाड़ी उसके पास आते-आते धीमी हुई, फिर अंदर बैठे लोगों की हंसी सुनाई दी और गाड़ी तेज़ी से आगे निकल गई। अन्वी ने तुरंत हाथ नीचे कर लिया। उसके अंदर डर और शर्म दोनों आ गए। कुछ देर बाद एक ट्रक आया। उसने सोचा कि शायद ड्राइवर से मदद मांगी जा सकती है, लेकिन ट्रक के केबिन में बैठे दो लोगों की नजरें देखकर उसका मन पीछे हट गया। उसने खुद को समझाया कि मजबूरी अपनी जगह है, लेकिन सावधानी उससे भी बड़ी चीज है।

वह बस अड्डे से थोड़ा आगे सड़क किनारे आकर खड़ी हो गई। वहां एक पुराना बरगद का पेड़ था, जिसके नीचे टूटी हुई पत्थर की दीवार बनी थी। हवा ठंडी होने लगी थी। बादलों की गड़गड़ाहट अब पास सुनाई दे रही थी। अन्वी ने अपना दुपट्टा कसकर ओढ़ लिया। तभी उसे दूर से सफेद रंग की एक कार आती दिखाई दी। कार बहुत तेज नहीं थी। वह धीरे-धीरे चल रही थी, जैसे ड्राइवर किसी रास्ते या पते को समझने की कोशिश कर रहा हो।

अन्वी ने कुछ पल सोचा। क्या वह हाथ दे? क्या यह सुरक्षित होगा? लेकिन फिर उसे पिता का चेहरा याद आया। वह सड़क के किनारे थोड़ी आगे बढ़ी और सावधानी से हाथ उठाया।

कार पहले उसके पास से कुछ कदम आगे निकल गई, फिर अचानक धीमी हुई। कुछ दूरी पर जाकर रुकी। अन्वी का दिल तेज़ धड़कने लगा। कार धीरे-धीरे पीछे आई और उसके सामने आकर रुक गई। ड्राइविंग सीट पर लगभग अट्ठाईस साल का एक युवक बैठा था। साफ चेहरा, हल्की दाढ़ी, गंभीर आंखें और शांत व्यवहार। उसने सफेद कुर्ते के ऊपर गहरे भूरे रंग की जैकेट पहन रखी थी। उसका नाम वीर राणा था।

उसने शीशा नीचे किया और बहुत सामान्य आवाज़ में पूछा, “आपको कोई मदद चाहिए?”

अन्वी कुछ पल उसे देखती रही। वह शब्द ढूंढ रही थी, लेकिन गला सूख रहा था। फिर उसने धीरे से कहा, “मुझे भीमतालपुर जाना है। मेरे पापा की तबीयत बहुत खराब है। यहां कोई बस या टैक्सी नहीं मिल रही। अगर आप उस तरफ जा रहे हों तो मुझे थोड़ा आगे तक छोड़ दीजिए।”

वीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने पहले आसपास देखा। सड़क खाली थी। फिर उसने घड़ी देखी। कुछ पल वह चुप रहा। अन्वी को लगा कि अब वह मना कर देगा। वह मन ही मन खुद को तैयार करने लगी कि कोई बात नहीं, वह किसी और से पूछ लेगी। लेकिन तभी वीर ने कहा, “मैं सीधे भीमतालपुर नहीं जा रहा, लेकिन उसी तरफ के रास्ते से गुजरना है। बैठ जाइए।”

अन्वी ने राहत की सांस ली। उसने कार का पिछला दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी वीर ने कहा, “रुकिए।”

अन्वी का दिल जैसे एक पल को रुक गया। उसके मन में तुरंत डर पैदा हुआ। क्या वह कोई शर्त रखेगा? क्या वह कुछ अजीब बात कहेगा? क्या उसे गाड़ी में बैठना ही नहीं चाहिए?

वीर ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और कहा, “सबसे पहले अपने घर पर फोन कीजिए। अगर यहां नेटवर्क नहीं है तो मैं गाड़ी थोड़ी आगे रोक दूंगा, जहां नेटवर्क आता है। अपने घर वालों को बताइए कि आप किस गाड़ी में बैठ रही हैं। मेरी गाड़ी का नंबर नोट कर लीजिए। चाहें तो मेरी फोटो भी भेज दीजिए।”

अन्वी उसे अविश्वास से देखने लगी। आज के समय में कोई अजनबी खुद अपनी जानकारी देने को कहे, यह उसने सोचा भी नहीं था। वीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “रात है। आप अकेली हैं। मदद से पहले सुरक्षा जरूरी है। भरोसा धीरे-धीरे बनता है, एक झटके में नहीं।”

अन्वी को पहली बार लगा कि शायद वह गलत इंसान के पास नहीं आई है। फिर भी उसने पूरी सावधानी रखी। वह कार में बैठी, लेकिन दरवाजा बंद करने से पहले उसने नंबर प्लेट की फोटो ली। वीर ने बिना कुछ कहे उसे ऐसा करने दिया। फिर उसने गाड़ी थोड़ी आगे बढ़ाई। लगभग दो किलोमीटर बाद मोबाइल में नेटवर्क आ गया। वीर ने कार सड़क किनारे रोकी और खुद बाहर निकल गया। वह बारिश की हल्की बूंदों के बीच कार से थोड़ा दूर खड़ा हो गया ताकि अन्वी आराम से बात कर सके।

अन्वी ने मां को फोन लगाया। इस बार कॉल लग गई। मां की आवाज़ सुनते ही उसकी आंखें भर आईं। उसने जल्दी-जल्दी बताया कि वह एक कार में बैठी है, गाड़ी का नंबर क्या है, ड्राइवर का नाम वीर है और वह थोड़ी देर में भीमतालपुर पहुंचने की कोशिश कर रही है। उसने मां को वीर की फोटो भी भेज दी। मां ने बस इतना कहा, “बेटी, संभलकर आना। भगवान भला करे उस लड़के का।”

फोन कटने के बाद वीर वापस कार में बैठा। उसने रेडियो बंद रखा। कार के अंदर कुछ देर तक चुप्पी रही। बाहर पहाड़ी हवा चल रही थी, कांच पर बूंदें पड़ने लगी थीं और सड़क हेडलाइट की रोशनी में चमक रही थी। वीर ने बहुत सहज स्वर में पूछा, “आपने खाना खाया?”

अन्वी ने सिर हिलाकर ना कहा। सच यह था कि दोपहर से उसने कुछ ठीक से नहीं खाया था। चिंता, भागदौड़ और सफर में उसे भूख का एहसास ही नहीं हुआ था। वीर ने कुछ नहीं कहा। कुछ दूर आगे एक छोटा ढाबा था, जिसकी आधी लाइटें बंद हो चुकी थीं। वह वहां रुका। ढाबे वाला दुकान बंद कर रहा था। वीर ने उससे पानी की दो बोतलें, कुछ बिस्कुट और एक गर्म चाय पैक करवाने को कहा।

अन्वी ने पैसे निकालने चाहे, लेकिन वीर ने शांत आवाज़ में कहा, “रहने दीजिए। इसे एहसान मत समझिए। रास्ते में साथ सफर कर रहे हैं, तो इतनी जिम्मेदारी बनती है।”

अन्वी ने बिस्कुट हाथ में लिए, लेकिन उसके गले से निवाला नहीं उतर रहा था। वीर ने उसे मजबूर नहीं किया। बस इतना कहा, “थोड़ा खा लीजिए। चिंता में शरीर जल्दी थक जाता है।”

धीरे-धीरे कार आगे बढ़ती रही। रास्ता अब शहर से बाहर निकल चुका था। दोनों तरफ पहाड़, घने पेड़ और बीच-बीच में छोटे-छोटे मोड़। रात गहरी हो रही थी। बारिश तेज़ होने लगी थी। सड़क पर फिसलन थी, इसलिए वीर ने गाड़ी की रफ्तार कम कर दी। वह हर मोड़ पर सावधानी से हॉर्न देता, हेडलाइट को नीचे रखता और गाड़ी को संतुलित तरीके से चलाता।

कुछ किलोमीटर बाद सड़क किनारे तीन युवक खड़े दिखाई दिए। उन्होंने हाथ देकर कार रोकने का इशारा किया। बारिश में वे भीगे हुए थे। अन्वी को उन पर दया आई। वह कुछ कहती, उससे पहले ही वीर ने गाड़ी के सारे दरवाजे लॉक कर दिए और बिना रोके आगे निकल गया।

अन्वी ने धीरे से पूछा, “आपने उन्हें लिफ्ट क्यों नहीं दी?”

वीर ने सामने देखते हुए कहा, “हो सकता है उन्हें सचमुच मदद चाहिए हो। लेकिन इस समय मेरी कार में आप हैं, और आप मेरी जिम्मेदारी हैं। हर मदद सही समय, सही जगह और सही तरीके से करनी चाहिए। अंधेरे सुनसान रास्ते पर बिना सोचे गाड़ी रोकना कभी-कभी मदद नहीं, खतरा बन जाता है।”

अन्वी चुप हो गई। उसे समझ आया कि अच्छा होना और लापरवाह होना अलग-अलग बातें हैं। वीर किसी की मदद करने से मना नहीं कर रहा था, लेकिन वह समझदारी से फैसला ले रहा था।

थोड़ी दूर आगे एक मोड़ पर पेड़ की बड़ी टहनी सड़क पर गिरी हुई थी। कार रुक गई। अन्वी घबरा गई। वीर ने टॉर्च उठाई, चारों तरफ ध्यान से देखा, फिर उससे कहा, “दरवाजे लॉक रखिए। जब तक मैं न कहूं, बाहर मत आइए।”

वह कार से उतरा, कुछ दूर तक रोशनी डाली, फिर सावधानी से टहनी हटाने लगा। बारिश तेज़ थी। उसके कपड़े भीग रहे थे, लेकिन वह बिना जल्दबाजी के काम कर रहा था। कुछ मिनट बाद रास्ता साफ हुआ और वह वापस आ गया।

कार फिर आगे चली। अब रात लगभग बारह बजने वाली थी। सड़क और सुनसान हो चुकी थी। अन्वी की आंखें बार-बार बंद हो रही थीं, लेकिन डर उसे सोने नहीं दे रहा था। तभी उसने देखा कि वीर लगातार रियर व्यू मिरर में देख रहा है। उसने भी पीछे झांककर देखा। काफी दूर एक काली बोलेरो जैसी गाड़ी उनकी कार के पीछे-पीछे आ रही थी।

पहले अन्वी ने सोचा कि शायद संयोग होगा। लेकिन कई मोड़, कई छोटे पुल और कई चढ़ाइयां पार करने के बाद भी वह गाड़ी पीछे ही थी। अन्वी का गला सूख गया। उसने धीमी आवाज़ में पूछा, “क्या वह गाड़ी हमारा पीछा कर रही है?”

वीर ने तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने गाड़ी की रफ्तार संतुलित रखी और शांत स्वर में बोला, “अभी पक्का नहीं कह सकते। घबराइए मत।”

लेकिन अन्वी कैसे न घबराती? बाहर अंधेरा था, बारिश थी, पहाड़ी रास्ता था और पीछे एक गाड़ी लगातार चली आ रही थी। अचानक पीछे वाली गाड़ी ने हाई बीम जला दी। तेज़ रोशनी कार के अंदर तक भर गई। फिर जोर-जोर से हॉर्न बजने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे वे लोग कार रुकवाना चाहते हों।

अन्वी की सांसें तेज़ होने लगीं। उसके हाथ कांपने लगे। उसे लगा शायद उसने अजनबी पर भरोसा करके गलती कर दी। लेकिन अगली ही क्षण उसने वीर के चेहरे की ओर देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं था, बल्कि गहरी सावधानी थी। उसने धीरे से कहा, “अन्वी जी, अब मेरी बात ध्यान से सुनिए। जब तक मैं न कहूं, कोई खिड़की नहीं खोलनी है, कोई जवाब नहीं देना है और घर पर फिर से फोन करने की कोशिश करनी है। अगर कॉल न लगे तो मैसेज भेजते रहिए।”

फिर वीर ने अपने मोबाइल पर लोकेशन शेयर की। उसने एक नंबर पर छोटा-सा संदेश भेजा। गाड़ी के दरवाजे फिर चेक किए। मोबाइल की रिकॉर्डिंग चालू की और बेहद शांत आवाज़ में कहा, “हम लड़ने नहीं जा रहे। हम सुरक्षित बाहर निकलने जा रहे हैं।”

अन्वी उसे देखती रह गई। उसे पहली बार लगा कि यह आदमी सिर्फ कार चलाने वाला अजनबी नहीं है। वह किसी भी परिस्थिति में दिमाग से काम लेना जानता है। उस बरसाती रात की असली परीक्षा अब शुरू हो चुकी थी।

पीछे से आती काली बोलेरो की तेज़ लाइटें अब लगातार वीर की कार पर पड़ रही थीं। सड़क पहाड़ी थी, मोड़ खतरनाक थे और बारिश के कारण कांच पर बूंदें इतनी तेजी से गिर रही थीं कि वाइपर भी पूरी तरह साफ दृश्य नहीं दे पा रहे थे। अन्वी सीट पर सिमटी बैठी थी। उसके मन में डर की कई परतें एक साथ उठ रही थीं। एक तरफ पिता की बिगड़ती हालत का डर था, दूसरी तरफ इस पीछा करती गाड़ी का। वह बार-बार अपनी मां को कॉल लगाने की कोशिश करती, लेकिन नेटवर्क फिर गायब हो चुका था।

भाग 1/3 अगला →
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