Crime Story

प्रेमी ने पागल साबित कर हड़पना चाहा साम्राज्य, फिर लौटी असली वारिस

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

अवनी सिंघानिया ने जिस अनाथ लड़के को अपना समझकर सब कुछ दिया, उसी ने उसके चाचा के साथ मिलकर उसकी पहचान, दौलत और जिंदगी छीनने की साजिश रच दी। मौत के बाद अवनी को तीन महीने पहले लौटने का दूसरा मौका मिलता है। इस बार उसे अपनी माँ को बचाना है, पिता की मौत का रहस्य खोलना है और पूरे सिंघानिया साम्राज्य में छिपे गद्दारों को बेनकाब करना है। मगर इस लड़ाई में सबसे कठिन सवाल यही है—वह भरोसा किस पर करे?

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 1

उस रात दिल्ली पर बादल ऐसे टूटकर बरस रहे थे, मानो आसमान वर्षों से दबा हुआ कोई राज धरती पर उगल देना चाहता हो।

शहर से दूर बने सिंघानिया परिवार के निजी अस्पताल की सातवीं मंज़िल पर लगभग सभी बत्तियाँ बंद थीं। लंबे गलियारे में केवल आपातकालीन रोशनी की फीकी लाल चमक दिखाई दे रही थी।

कमरा संख्या सात सौ नौ के भीतर अवनी सिंघानिया एक सफेद बिस्तर पर पड़ी थी। उसके दोनों हाथ चमड़े की पट्टियों से बँधे हुए थे। शरीर में इतनी दवाइयाँ डाली जा चुकी थीं कि वह अपनी उँगलियाँ तक नहीं हिला पा रही थी, लेकिन उसकी चेतना अभी पूरी तरह मरी नहीं थी।

उसके होंठ सूख चुके थे। आँखों के सामने धुँधला अँधेरा तैर रहा था।

कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।

बाहर दो लोगों की धीमी आवाज़ें आ रही थीं।

पहली आवाज़ अवनी बहुत अच्छी तरह पहचानती थी।

राघव।

वही राघव, जिसके लिए उसने अपने परिवार से झगड़ा किया था। वही राघव, जिसे उसकी माँ सड़क किनारे की झुग्गी से उठाकर घर लाई थीं। वही राघव, जिसे अवनी ने अपने हाथों से अच्छे कपड़े पहनाए, अपने कॉलेज में दाखिला दिलाया और अपने नाम का विशेष बैंक कार्ड तक दे दिया।

दूसरी आवाज़ उसके चाचा विक्रम सिंघानिया की थी।

विक्रम धीमे स्वर में कह रहा था, “देवयानी की हालत अभी काबू में है। डॉक्टर ने कहा है कि दवा ऐसे ही चलती रही तो दो हफ्ते में वह किसी फैसले पर हस्ताक्षर करने लायक नहीं रहेंगी।”

अवनी की साँस अटक गई।

देवयानी उसकी माँ थीं।

राघव ने पूछा, “और अवनी?”

विक्रम हल्का-सा हँसा।

“अवनी की कहानी आज रात खत्म हो जाएगी। कल रिपोर्ट में लिखा जाएगा कि मानसिक तनाव में उसने दवाइयों की अधिक मात्रा ले ली।”

“लेकिन उसके इक्कीसवें जन्मदिन में अभी तीन महीने हैं। उसके हिस्से मेरे नाम कब होंगे?”

“तुम्हारे नाम?”

विक्रम की आवाज़ अचानक कठोर हो गई।

कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर उसने कहा, “अपनी औकात मत भूलो, राघव। तुम्हारा काम अवनी को भावनात्मक रूप से कमजोर करना था। तुमने वही किया। तुमने उससे खाली कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाए, उसे उसके दोस्तों से दूर किया और सबको यकीन दिलाया कि वह मानसिक रूप से अस्थिर है। इसके बदले तुम्हें जितना मिलना था, उससे कहीं अधिक मिल चुका है।”

राघव की आवाज़ काँप गई।

“आपने कहा था कि अवनी के बाद मैं सिंघानिया परिवार का उत्तराधिकारी बनूँगा।”

विक्रम हँस पड़ा।

“जिस लड़के की नसों में सिंघानिया परिवार का खून तक नहीं, वह इस साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा? सपने कम देखा करो।”

अवनी की बंद पलकों के नीचे आँसू भर आए।

तो राघव भी केवल एक मोहरा था।

पर मोहरा होने से उसका अपराध छोटा नहीं हो जाता था।

उसी ने अवनी को उसकी माँ से दूर किया था। उसी ने सबके सामने कहा था कि अवनी पागल है। उसी ने उसकी दवाइयाँ बदलवाई थीं। और उसी ने उसे विश्वास दिलाया था कि पूरी दुनिया उसके खिलाफ है, केवल राघव ही उसका अपना है।

दरवाज़ा खुला।

राघव कमरे के भीतर आया।

कुछ देर वह चुपचाप अवनी को देखता रहा। उसके चेहरे पर पछतावा नहीं था, केवल बेचैनी थी।

वह उसके करीब झुका और बोला, “तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह नहीं थी कि तुमने मुझसे प्यार किया। तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह थी कि मेरे सामने आते ही तुमने सोचना बंद कर दिया।”

अवनी उसे घूरती रही।

वह चीखना चाहती थी, मगर आवाज़ गले से बाहर नहीं निकली।

राघव ने उसके हाथ में लगी नली के भीतर एक पारदर्शी दवा उतार दी।

अवनी के सीने में आग-सी फैल गई।

बाहर बिजली चमकी।

उसे अपनी माँ का चेहरा दिखाई दिया। अपने पिता की मुस्कान याद आई। और फिर एक लड़का याद आया, जो वर्षों तक उसके पीछे शांत भाव से खड़ा रहा था।

अर्जुन राठौड़।

वह हर बार अवनी को सावधान करता था। मगर अवनी ने सबके सामने उसका अपमान किया था।

धीरे-धीरे कमरे की छत धुँधली होने लगी।

अवनी के मन में केवल एक ही बात गूँज रही थी।

काश, उसे एक मौका और मिल जाए।

केवल एक मौका।

वह किसी पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करेगी।

वह अपनी माँ को बचाएगी।

अपने पिता की मौत का सच ढूँढ़ेगी।

और राघव तथा विक्रम को उसी अँधेरे में धकेलेगी, जिसमें उन्होंने उसे मरने के लिए छोड़ दिया था।

अचानक किसी ने मेज़ पर ज़ोर से हाथ मारा।

“अवनी, तुम्हें सुनाई नहीं देता क्या?”

अवनी ने झटके से आँखें खोल दीं।

उसके सामने अस्पताल की सफेद छत नहीं थी।

वह अपने कॉलेज के विशेष भोजन कक्ष में बैठी थी।

चारों ओर विद्यार्थियों की भीड़ थी। सामने लंबी मेज़ पर चाँदी के बर्तन सजे थे। सिंघानिया परिवार के निजी रसोइए भोजन परोस रहे थे।

और उसके ठीक सामने काव्या मल्होत्रा खड़ी थी।

“यह सीट राघव की है,” काव्या ने कहा, “तुम यहाँ कैसे बैठ गईं?”

अवनी की साँस तेज हो गई।

वह अपने हाथों को देखने लगी। उन पर कोई पट्टी नहीं थी। न कलाई पर सुई का निशान, न शरीर में दर्द।

उसने दीवार पर लगा कैलेंडर देखा।

उसके इक्कीसवें जन्मदिन में ठीक तीन महीने बाकी थे।

वह वापस आ चुकी थी।

वही दिन।

वही भोजन कक्ष।

वही क्षण, जब पिछले जीवन में काव्या ने सबके सामने उसे नौकरानी कहा था और वह राघव के नाराज़ हो जाने के डर से चुपचाप बाहर चली गई थी।

दोस्तों, मौत से लौटना जितना चमत्कार था, उससे कहीं कठिन था अपने सामने उन्हीं चेहरों को देखना, जिन्होंने आपको मरते समय अकेला छोड़ दिया हो।

अवनी की निगाह राघव पर पड़ी।

वह मेज़ के दूसरे सिरे पर बैठा मुस्करा रहा था। उसने महँगी घड़ी पहन रखी थी, जो अवनी ने उसे जन्मदिन पर दी थी।

काव्या फिर बोली, “उठो यहाँ से। मालिक के आने से पहले नौकरों को उनकी जगह याद दिलानी पड़ती है क्या?”

कुछ विद्यार्थी हँस पड़े।

अवनी के भीतर वर्षों का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह उठ रहा था। उसका मन हुआ कि वह उसी समय सबके सामने राघव की सच्चाई बता दे।

लेकिन अगले ही क्षण उसे अस्पताल का कमरा याद आया।

विक्रम।

नकली कागज़।

माँ की दवाइयाँ।

यदि उसने अभी सबको बता दिया कि उसे सब पता है, तो असली दुश्मन सावधान हो जाएगा।

अवनी ने अपना गुस्सा भीतर दबा लिया।

उसने सामने खड़े मुख्य रसोइए महेश काका की ओर देखा।

“आज का भोजन किसके आदेश पर यहाँ आया है?”

महेश काका हिचकिचाए।

“घर से आया है, बिटिया।”

“घर में किसने भेजा?”

महेश काका की नज़र अनायास राघव पर चली गई।

बस एक पल के लिए।

मगर अवनी ने देख लिया।

पिछले जीवन में उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया था कि परिवार के कुछ पुराने कर्मचारी भी राघव की बात मानने लगे थे।

अवनी ने शांत स्वर में कहा, “आज का खाना वापस ले जाइए।”

राघव की मुस्कान गायब हो गई।

“यह खाना मेरे लिए आया है।”

अवनी ने उसकी ओर देखकर कहा, “तो घर पर फोन करके दोबारा मँगवा लो।”

काव्या बोली, “तुम्हें मालूम भी है किससे बात कर रही हो? राघव सिंघानिया इस परिवार का इकलौता बेटा है।”

अवनी ने पहली बार सीधे राघव की आँखों में देखा।

“सचमुच?”

उसके इस एक शब्द में ऐसी ठंडक थी कि राघव कुछ पल चुप रह गया।

फिर उसने हँसते हुए कहा, “अवनी की माँ हमारे घर में पुराने समय से काम करती हैं। इसलिए इसे कुछ ज़्यादा ही छूट मिली हुई है।”

अवनी को उस पर हँसी आई।

जिस देवयानी सिंघानिया के एक फैसले से देश की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के शेयर ऊपर-नीचे हो सकते थे, राघव उन्हीं को अपने घर की कर्मचारी बता रहा था।

मगर अवनी ने उसे रोका नहीं।

वह अपनी कुर्सी से उठी और महेश काका से बोली, “सारा खाना वापस ले जाइए। और आज के बाद मेरी अनुमति के बिना कॉलेज में कुछ नहीं आएगा।”

महेश काका ने सिर झुकाया।

“जी, बिटिया।”

काव्या ने गुस्से से कहा, “आप इसकी बात क्यों मान रहे हैं?”

महेश काका ने उत्तर नहीं दिया।

अवनी बाहर निकलने लगी तो राघव उसके पीछे आया।

“यह नया नाटक क्यों कर रही हो?”

अवनी बिना रुके बोली, “नाटक तो अभी शुरू भी नहीं हुआ।”

कॉलेज के मुख्य द्वार पर सिंघानिया परिवार की गाड़ी खड़ी थी। चालक रमेश ने दरवाज़ा खोला।

“बिटिया, घर चलें?”

अवनी कुछ पल उसे देखती रही।

पिछले जीवन में यही रमेश एक दुर्घटना में मारा गया था। तब उसे बताया गया था कि ब्रेक अचानक खराब हो गए थे।

अब अवनी को उस दुर्घटना पर भी शक होने लगा।

वह गाड़ी में बैठी और बोली, “रमेश काका, पिछले छह महीने में घर के वाहनों की देखभाल कौन करा रहा है?”

रमेश ने शीशे में उसे देखा।

“पहले मैं देखता था। अब विक्रम साहब ने नई कम्पनी को काम दे दिया है।”

अवनी के भीतर एक और घंटी बजी।

“आज से किसी भी गाड़ी की जाँच उस कम्पनी से नहीं होगी। पुराने गैराज में ले जाइए।”

“जी।”

घर पहुँचते ही अवनी सीधे अपनी माँ के कमरे में गई।

देवयानी खिड़की के पास बैठी कुछ फाइलें देख रही थीं। उनके चेहरे पर थकान थी। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे दिखाई दे रहे थे।

अवनी दरवाज़े पर ठिठक गई।

पिछले जीवन में माँ की मौत की खबर उसे तब मिली थी, जब राघव उसे पहले ही मानसिक अस्पताल भिजवा चुका था। वह अपनी माँ को अंतिम बार देख भी नहीं पाई थी।

अब उन्हें जीवित देखकर उसकी आँखें भर आईं।

देवयानी ने सिर उठाया।

“आज इतनी जल्दी कॉलेज से वापस?”

अवनी उनके पास गई और बिना कुछ कहे उन्हें गले लगा लिया।

देवयानी हैरान रह गईं।

“क्या हुआ?”

अवनी ने आँखें बंद कर लीं।

“बस आपकी याद आ रही थी।”

देवयानी का हाथ धीरे से उसकी पीठ पर चला गया।

“तुम्हारी तबीयत ठीक है?”

“अब ठीक हो जाएगी।”

देवयानी उसकी बात नहीं समझीं, मगर वर्षों बाद बेटी को अपने इतने करीब पाकर उनकी आँखों में भी नमी आ गई।

कुछ देर बाद अवनी ने पूछा, “आप कौन-सी दवाइयाँ ले रही हैं?”

“विक्रम ने नया डॉक्टर भेजा है। उसने कहा है काम के तनाव के कारण मेरा रक्तचाप बढ़ रहा है।”

अवनी ने मेज़ पर रखी शीशियाँ उठा लीं।

एक दवा की पर्ची पर डॉक्टर की मुहर थी, लेकिन तारीख के ऊपर हल्की खरोंच दिखाई दे रही थी।

उसने बिना माँ को डराए सारी दवाइयों की तस्वीरें अपने फोन में ले लीं।

“माँ, आज से ये दवाइयाँ मत लीजिए।”

देवयानी ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”

“मुझे डॉक्टर पर भरोसा नहीं है।”

“यह डॉक्टर विक्रम ने भेजा है।”

अवनी ने अपनी माँ की आँखों में देखते हुए कहा, “इसीलिए तो भरोसा नहीं है।”

देवयानी कुछ क्षण उसे देखती रहीं।

“तुम्हारे और चाचा के बीच कुछ हुआ है?”

“अभी नहीं। लेकिन बहुत जल्द होगा।”

अपने कमरे में पहुँचकर अवनी ने दरवाज़ा बंद किया और अलमारी के नीचे छिपा छोटा तिजोरीनुमा खाना खोला। उसके पिता ने मरने से कुछ महीने पहले उसे एक चाँदी की कलम और काले रंग की छोटी कम्प्यूटर चिप दी थी।

उन्होंने कहा था, “कभी ऐसा लगे कि घर में किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो यह चिप केवल राठौड़ परिवार के सामने खोलना।”

उस समय अवनी ने बात को मज़ाक समझा था।

पिता की मौत के बाद वह चिप गायब हो गई थी।

अवनी ने पूरा कमरा खोजा।

तिजोरी खाली थी।

चाँदी की कलम भी गायब थी।

तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

अवनी ने दरवाज़ा खोला तो राघव की बहन रिया सामने खड़ी थी। उसके हाथ में कपड़ों की टोकरी थी।

“कुछ चाहिए था?” रिया ने पूछा।

अवनी ने उसकी कलाई पर नज़र डाली। वहाँ नीली स्याही का हल्का निशान था।

उसके पिता की चाँदी की कलम में विशेष नीली स्याही इस्तेमाल होती थी।

अवनी ने कुछ नहीं कहा।

बस मुस्कराकर बोली, “तुम मेरे कमरे में कब आई थीं?”

रिया का चेहरा बदल गया।

“मैं तो रोज़ सफाई करने आती हूँ।”

“आज से मेरे कमरे की सफाई कोई नहीं करेगा।”

रिया ने सिर हिलाया और चली गई।

अवनी जानती थी कि यदि वह अभी उस पर आरोप लगाएगी तो रिया सबूत हटा देगी। इसलिए उसने कमरे में दो छोटे कैमरे लगवाए और घर की सुरक्षा प्रणाली का पासवर्ड बदल दिया।

आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 2

अगले दिन कॉलेज में हर तरफ केवल एक ही नाम की चर्चा थी।

अर्जुन राठौड़।

वह अंतरराष्ट्रीय कम्प्यूटर प्रतिभा प्रतियोगिता में भारत के लिए पहला स्थान जीतकर लौटा था। कॉलेज के मुख्य सभागार में उसका स्वागत किया जा रहा था।

अवनी भीड़ के पीछे खड़ी उसे देखती रही।

साधारण सफेद कुरता, नीली जैकेट और चेहरे पर वही शांत भाव।

अर्जुन कभी दिखावा नहीं करता था। शायद इसी कारण अवनी ने पिछले जीवन में उसकी कीमत नहीं समझी थी।

कार्यक्रम समाप्त हुआ तो अवनी उसके पीछे चली गई।

“अर्जुन।”

वह रुका।

जब उसने अवनी को देखा तो उसके चेहरे पर खुशी नहीं, सावधानी दिखाई दी।

“हाँ?”

अवनी के मन में वर्षों पुरानी वह घटना घूम गई, जब अर्जुन ने सबके सामने उसे अपने मन की बात बताई थी और उसने राघव को खुश करने के लिए अर्जुन का मज़ाक उड़ा दिया था।

अवनी ने धीमे स्वर में कहा, “मुझे तुमसे माफी माँगनी है।”

अर्जुन चुप रहा।

“मैंने पहले तुम्हारे साथ बहुत गलत व्यवहार किया।”

“आज अचानक?”

“कभी-कभी एक ही रात इंसान को कई साल बड़ा कर देती है।”

अर्जुन उसकी आँखों में देखता रहा।

“लोग एक रात में बदलते नहीं हैं, अवनी। कभी-कभी केवल अपनी चाल बदलते हैं।”

अवनी को उसका संदेह बुरा नहीं लगा।

वह इसी अर्जुन को तो जानती थी। शांत, मगर मूर्ख नहीं।

उसने अपने बैग से पिता की पुरानी डायरी निकाली।

“मेरे पिता ने मरने से पहले राठौड़ परिवार का नाम लिखा था। मुझे एक कम्प्यूटर चिप ढूँढ़नी है। शायद उसमें कुछ ऐसा है, जो तुम्हारे परिवार से भी जुड़ा है।”

अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

“तुम्हें यह बात किसने बताई?”

“पापा ने।”

“और तुम चाहती हो मैं तुम्हारी मदद करूँ?”

“हाँ।”

“क्योंकि तुम्हें मुझ पर भरोसा है?”

अवनी ने ईमानदारी से कहा, “नहीं। अभी मुझे किसी पर भरोसा नहीं है।”

अर्जुन की भौंहें उठीं।

अवनी बोली, “लेकिन मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ। तुम्हारी बात नहीं, तुम्हारे काम।”

कुछ पल बाद अर्जुन ने कहा, “ठीक है। चिप मिल जाए तो मुझे बताना।”

अवनी जाने लगी तो अर्जुन ने पीछे से कहा, “और अवनी।”

वह मुड़ी।

“अगर तुम्हें सच में खतरा है, तो अकेले बहादुर बनने की कोशिश मत करना।”

अवनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “यह सलाह तुम खुद भी याद रखना।”

दो दिन बाद अवनी का जन्मदिन था।

उसी दिन काव्या का भी जन्मदिन था।

राघव ने अवनी से कहा, “काव्या अपने दोस्तों के साथ शाम को हमारे घर आना चाहती है।”

अवनी ने जानबूझकर पूछा, “हमारे घर?”

राघव तुरंत सँभल गया।

“मेरा मतलब सिंघानिया निवास।”

अवनी ने मुस्कराकर कहा, “ज़रूर बुलाओ। मैं पूरे दिन बाहर रहूँगी।”

राघव के चेहरे पर राहत आ गई।

उसे क्या पता था कि अवनी यही चाहती थी।

उसने घर के कर्मचारियों को छुट्टी दे दी, लेकिन सुरक्षा प्रणाली चालू रखी। पिता के पुराने अध्ययन कक्ष, मुख्य तिजोरी और पश्चिमी गलियारे में लगे कैमरों को अपने फोन से जोड़ लिया।

शाम को अर्जुन उसे दिल्ली के एक पुराने इलाके में बने छोटे-से चायघर में ले गया।

वहाँ न महँगी सजावट थी, न चाँदी के बर्तन।

एक कोने में मिट्टी के दीये जल रहे थे। बाहर बारिश की हल्की बूँदें गिर रही थीं।

अर्जुन ने एक छोटा-सा केक मेज़ पर रखा।

“जन्मदिन मुबारक हो।”

अवनी की आँखें उस केक पर टिक गईं।

पिछले जीवन में अपने जन्मदिन के दिन वह काव्या के लिए पार्टी की सजावट कर रही थी। राघव ने उसे शुभकामना तक नहीं दी थी।

अर्जुन ने उसे एक पुरानी नोटबुक दी।

अवनी ने खोला तो उसमें बचपन के गणित के सवाल लिखे थे। कई पन्नों पर लाल स्याही से लिखा था, “अवनी ने सही हल किया।”

“तुमने यह सँभालकर रखी?”

अर्जुन बोला, “तुम हमेशा कहती थीं कि तुम्हें गणित नहीं आता। मुझे लगा कभी तुम्हें सबूत देना पड़ेगा कि तुम गलत हो।”

अवनी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

अर्जुन घबरा गया।

“मैंने कुछ गलत कहा?”

अवनी ने सिर हिलाया।

“नहीं। बस पहली बार किसी ने मुझे ऐसी चीज़ दी है, जिसकी कीमत पैसे से नहीं लग सकती।”

कुछ देर दोनों चुप रहे।

फिर अवनी बोली, “अर्जुन, मुझे अब किसी पर भरोसा करने से डर लगता है।”

अर्जुन ने चाय का प्याला नीचे रखा।

“तो मुझ पर अभी भरोसा मत करो।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

वह बोला, “सिर्फ यह देखती रहो कि मैं क्या करता हूँ। भरोसा माँगा नहीं जाता, कमाया जाता है।”

उसी समय अवनी के फोन पर कैमरे की सूचना आई।

उसने देखा, राघव काव्या और उसके दोस्तों के साथ घर में प्रवेश कर चुका था।

पहले उन्होंने भोजन किया। फिर राघव ने बारह लाख रुपये की अंगूरी पेय की बोतलें मँगवाईं।

कुछ देर बाद रिया चुपके से पश्चिमी गलियारे में गई और पिता के अध्ययन कक्ष का ताला खोला।

वह भीतर से एक नीली फाइल लेकर बाहर आई।

मुख्य दरवाज़े पर चेहरा ढँके एक आदमी को वह फाइल सौंप दी गई।

अवनी ने तुरंत चित्र सुरक्षित कर लिया।

“तुम्हें घर जाना होगा?” अर्जुन ने पूछा।

“अभी नहीं। उन्हें कुछ देर यह यकीन रहने दो कि वे सफल हो गए हैं।”

लगभग एक घंटे बाद अवनी और अर्जुन घर पहुँचे।

मुख्य कक्ष में तेज़ संगीत बज रहा था।

काव्या ने उसे देखते ही कहा, “अरे, नौकरानी वापस आ गई।”

अर्जुन आगे बढ़ा, मगर अवनी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

राघव ने कहा, “आज काव्या का जन्मदिन है। कोई तमाशा मत करना।”

अवनी ने मेज़ पर रखी बोतलों को देखा।

“भुगतान हो गया?”

राघव ने उसका विशेष बैंक कार्ड निकालकर कहा, “अभी हो जाएगा।”

भवन प्रबंधक ने भुगतान यंत्र आगे किया।

अवनी ने उसी क्षण बैंक प्रबंधक को फोन लगाया।

“मेरे नाम का विशेष कार्ड तुरंत बंद कर दीजिए।”

राघव हँसा।

“तुम मुझे डराने की कोशिश कर रही हो?”

यंत्र पर कार्ड लगाया गया।

भुगतान अस्वीकार हो गया।

कमरे का माहौल बदल गया।

काव्या ने पूछा, “क्या हुआ?”

प्रबंधक बोला, “कार्ड रोक दिया गया है।”

राघव अवनी के पास आया।

“तुमने मेरा कार्ड क्यों बंद करवाया?”

अवनी ने शांत भाव से पूछा, “तुम्हारा कार्ड? कार्ड पर नाम किसका है?”

राघव ने कार्ड की ओर देखा।

उस पर साफ लिखा था—अवनी सिंघानिया।

काव्या और उसके दोस्तों ने पहली बार ध्यान से वह नाम पढ़ा।

अवनी बोली, “बारह लाख रुपये का बिल है। तुम चार लोग मिलकर दे सकते हो।”

सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

काव्या की सहेली बोली, “हमें तो राघव ने बुलाया था।”

राघव का चेहरा लाल हो गया।

आखिर अवनी ने भुगतान कर दिया।

मगर वह जीतकर भी मुस्कराई नहीं।

क्योंकि उसके फोन पर माँ के कमरे का आपात संकेत आ चुका था।

वह दौड़ती हुई ऊपर पहुँची।

देवयानी फर्श पर पड़ी थीं।

पास दवा की टूटी शीशी थी।

अवनी ने काँपते हाथों से उन्हें उठाने की कोशिश की।

“माँ!”

पीछे से पुलिस के कदमों की आवाज़ आई।

एक अधिकारी ने शीशी उठाई।

“इस पर उँगलियों के निशान हैं।”

जाँच यंत्र से प्राथमिक मिलान किया गया।

निशान अवनी के थे।

अवनी समझ गई।

किसी ने उसी की तस्वीरों वाली दवा की शीशी बदलकर यहाँ रखी थी।

विक्रम सीढ़ियों से नीचे आया। उसके चेहरे पर बनावटी चिंता थी।

“अवनी, तुमने अपनी माँ को क्या दे दिया?”

“मैंने कुछ नहीं किया।”

राघव धीरे-धीरे उसके पास आया।

सबकी नज़र दूसरी ओर थी।

वह उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, “तुम्हें वही पुरानी, बेवकूफ अवनी बने रहना चाहिए था।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

वह बोली, “तुमने गलती कर दी, राघव।”

“कैसी गलती?”

“इस बार तुमने मुझे जिंदा छोड़ दिया।”

पुलिस अवनी को अपने साथ ले गई।

बाहर बारिश तेज़ हो चुकी थी।

और दोस्तों, जिस लड़की ने सोचा था कि मौत से वापस आते ही वह अपनी किस्मत बदल देगी, उसकी दूसरी ज़िंदगी की पहली रात जेल की सलाखों के पीछे शुरू हुई।

भाग दो

पहचान की लड़ाई

पुलिस स्टेशन की लोहे की बेंच पर बैठी अवनी पूरी रात नहीं सोई।

उसकी आँखों के सामने बार-बार माँ का बेहोश चेहरा आ रहा था।

यदि देवयानी को कुछ हो गया, तो दूसरी ज़िंदगी मिलने का क्या फायदा?

सुबह विक्रम एक प्रसिद्ध वकील और परिवार के निजी मनोचिकित्सक के साथ पुलिस स्टेशन पहुँचा।

विक्रम ने अधिकारी से कहा, “अवनी पिछले कुछ महीनों से मानसिक तनाव में थी। वह कई बार अपनी माँ और राघव को नुकसान पहुँचाने की धमकी दे चुकी है।”

वकील ने कुछ वीडियो दिखाए।

एक वीडियो में अवनी राघव पर चिल्ला रही थी।

दूसरे में वह काव्या को थप्पड़ मार रही थी।

तीसरे में वह कह रही थी, “मैं तुम सबको बर्बाद कर दूँगी।”

हर वीडियो अधूरा था। उससे पहले क्या हुआ, यह काट दिया गया था।

मगर बाहर से देखने वाले को अवनी सचमुच अस्थिर दिखाई दे रही थी।

तभी अर्जुन स्टेशन के भीतर आया।

उसके साथ उस चायघर का मालिक और दो कर्मचारी थे।

अर्जुन ने कहा, “जिस समय देवयानी जी को दवा दी गई, अवनी मेरे साथ थी। चायघर के कैमरे में समय साफ दिखाई देगा।”

अधिकारी ने चित्र देखे।

इससे यह साबित हुआ कि अवनी घटना के समय घर पर नहीं थी, लेकिन दवा की शीशी पर उसकी उँगलियों के निशान अब भी एक सवाल थे।

उसे अस्थायी जमानत मिल गई।

घर लौटने पर उसे पता चला कि देवयानी की जान बच गई थी, मगर वह गहरे कोमा में थीं।

उधर विक्रम ने कम्पनी के बोर्ड की आपात बैठक बुला ली।

उसने कहा, “जब तक देवयानी होश में नहीं आतीं और अवनी की मानसिक स्थिति पर चिकित्सकीय रिपोर्ट नहीं आती, तब तक कम्पनी की सुरक्षा के लिए अवनी के सभी अधिकार रोकने होंगे।”

अवनी के पिता की वसीयत के अनुसार उसके इक्कीसवें जन्मदिन पर कम्पनी के इक्यावन प्रतिशत हिस्से उसके नाम होने वाले थे।

लेकिन यदि उसे मानसिक रूप से फैसले लेने में अयोग्य साबित कर दिया जाता, तो उसके हिस्सों का अस्थायी नियंत्रण परिवार के वरिष्ठ सदस्य विक्रम को मिल जाता।

यही असली खेल था।

बोर्ड के अधिकतर सदस्य विक्रम के पक्ष में थे।

अवनी के खाते सीमित कर दिए गए। घर की सुरक्षा उसके हाथ से ले ली गई। यहाँ तक कि माँ से मिलने के लिए भी उसे अनुमति लेनी पड़ती थी।

राघव ने कॉलेज में फिर कहानी फैला दी कि अवनी ने ईर्ष्या में अपनी माँ को नुकसान पहुँचाया।

कई विद्यार्थी उससे दूरी बनाने लगे।

अवनी पहले होती तो टूट जाती।

इस बार उसने अपने कमरे में बैठकर पिता की डायरी खोली।

एक पन्ने पर लिखा था—

“सुरक्षित अभिलेख केवल राष्ट्रीय गणित एवं कम्प्यूटर फैलोशिप के विजेता के लिए खुलेंगे।”

वह फैलोशिप सिंघानिया शोध संस्थान की ओर से आयोजित होती थी। उसके सुरक्षित सर्वर में कम्पनी के पुराने प्रोजेक्ट, वित्तीय रिकॉर्ड और उसके पिता की निजी शोध फाइलें रखी थीं।

अवनी को समझ आ गया कि पिता का छिपा हुआ सच वहीं हो सकता है।

परीक्षा दो सप्ताह बाद थी।

कॉलेज में राघव ने यह खबर सुनी तो हँस पड़ा।

“तुम फैलोशिप की परीक्षा दोगी?”

अवनी ने कहा, “हाँ।”

“तुम पिछली परीक्षा में तैंतालीस अंक लाई थीं।”

“तो?”

“तो यह कि तुम्हें अपने सपने और अपनी औकात दोनों याद रखनी चाहिए।”

अवनी ने पूछा, “एक शर्त लगाओगे?”

राघव का चेहरा खिल गया।

“कैसी शर्त?”

“यदि मेरे अंक तुमसे अधिक आए, तो तुम पूरे कॉलेज के सामने अपने पिता का पूरा नाम, जन्मस्थान और अपनी असली पहचान बताओगे।”

राघव कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला, “और अगर तुम हार गईं?”

“तो मैं कम्पनी के उत्तराधिकार से अपना दावा वापस ले लूँगी।”

यह सुनकर राघव की आँखें चमक उठीं।

उसे लगा विक्रम इससे बहुत खुश होगा।

“मंज़ूर है।”

अर्जुन ने जब यह सुना तो वह नाराज़ हो गया।

“तुमने इतना बड़ा फैसला मुझसे बात किए बिना कैसे कर लिया?”

अवनी ने कहा, “मेरी ज़िंदगी है।”

“और तुम्हें लगता है दो हफ्ते में राष्ट्रीय परीक्षा की तैयारी हो जाएगी?”

“मेरे पास दो हफ्ते नहीं हैं, अर्जुन।”

“मतलब?”

अवनी कुछ पल चुप रही।

वह अपने पिछले जीवन का सच नहीं बता सकती थी।

“मतलब यह कि मुझे बहुत देर हो चुकी है।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा, फिर धीरे से कहा, “ठीक है। आज से हम तैयारी शुरू करेंगे।”

अगले दिनों में अवनी की दुनिया बदल गई।

सुबह कॉलेज, दोपहर माँ का अस्पताल और रात अर्जुन के साथ पढ़ाई।

आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 3

अर्जुन उसे केवल सवाल हल करना नहीं सिखाता था। वह पूछता, “तुमने यह रास्ता क्यों चुना?” “यदि यह मान गलत हो तो?” “एक ही उत्तर तक पहुँचने के कितने तरीके हो सकते हैं?”

अवनी को धीरे-धीरे महसूस हुआ कि पिछले जीवन का उसका ज्ञान अभी भी उसके भीतर था, मगर भय की मोटी परतों के नीचे दबा हुआ।

एक रात तेज़ बारिश होने लगी।

बिजली चमकी तो अवनी का हाथ काँप गया।

उसे अस्पताल का वही कमरा दिखाई देने लगा। राघव का चेहरा। नली में उतरती पारदर्शी दवा।

उसकी साँस रुकने लगी।

अर्जुन ने किताब बंद कर दी।

“अवनी, मेरी ओर देखो।”

वह नहीं देख पाई।

अर्जुन ने कहा, “पाँच चीज़ें बताओ जो तुम्हें दिखाई दे रही हैं।”

“क्या?”

“सिर्फ बताओ।”

अवनी ने काँपते हुए कहा, “मेज़… किताब… खिड़की… तुम्हारी घड़ी… दीया…”

“चार चीज़ें जिन्हें तुम छू सकती हो।”

धीरे-धीरे उसकी साँस सामान्य होने लगी।

अर्जुन ने उससे कोई सवाल नहीं पूछा।

कुछ देर बाद अवनी बोली, “तुम जानना नहीं चाहते कि मुझे क्या हुआ?”

“जब तुम बताना चाहोगी, तब सुनूँगा।”

अवनी की आँखें भर आईं।

“तुम इतने शांत क्यों रहते हो?”

अर्जुन हल्का-सा मुस्कराया।

“क्योंकि तुम्हारे जीवन में शोर करने वाले लोग पहले ही बहुत हैं।”

अवनी ने पहली बार उसके सामने अपने मन की एक परत खोली।

“मैंने एक समय सोचा था कि जो इंसान मेरे लिए सबसे ज़्यादा लड़ता है, वही मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। अब समझ आ रहा है कि कुछ लोग लड़ते इसलिए हैं ताकि आपको बाकी दुनिया से अलग कर सकें।”

अर्जुन ने कहा, “और कुछ लोग चुप रहते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि तुम अपना फैसला खुद करो।”

उन दोनों के बीच कोई प्रेम स्वीकार नहीं हुआ, मगर उसी रात भरोसे का पहला छोटा-सा पुल बन गया।

उधर राघव की हालत बदल रही थी।

विक्रम अब उससे सीधे बात नहीं करता था। उसे केवल आदेश मिलते थे।

एक दिन राघव ने विक्रम के कमरे के बाहर उसे फोन पर कहते सुना, “अवनी हटते ही राघव को भी रास्ते से हटाना होगा। वह बहुत कुछ जानता है।”

राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उसे पहली बार समझ आया कि जिस जगह को वह अपनी मंज़िल समझ रहा था, वहाँ उसके लिए कोई कुर्सी थी ही नहीं।

वह अवनी को सच बताने के लिए कॉलेज पहुँचा।

मगर उसने अवनी को अर्जुन के साथ हँसते देखा।

उसके भीतर का डर फिर ईर्ष्या बन गया।

“तो मेरे बाद यह उसी के पास चली जाएगी?”

उसने सच बताने का विचार छोड़ दिया।

परीक्षा से एक दिन पहले खबर फैल गई कि राष्ट्रीय फैलोशिप का प्रश्नपत्र किसी ने खरीद लिया है और वह प्रश्नपत्र अवनी के कम्प्यूटर से मिला है।

कॉलेज में हंगामा हो गया।

राघव ने कहा, “मैंने कहा था न, यह बिना बेईमानी के सफल नहीं हो सकती।”

परीक्षा समिति ने अवनी को अयोग्य घोषित करने की तैयारी शुरू कर दी।

अवनी ने समिति के सामने कहा, “मेरा कम्प्यूटर पिछले तीन दिनों से कॉलेज की प्रयोगशाला में था। कोई भी उसमें फाइल डाल सकता था।”

अधिकारी बोला, “तुम्हारे पास इसका सबूत है?”

“नहीं।”

राघव मुस्कराया।

तभी अर्जुन ने कहा, “परीक्षा रद्द मत कीजिए। अवनी को सबके सामने नया प्रश्नपत्र दीजिए।”

समिति के अध्यक्ष ने पूछा, “नया प्रश्नपत्र कहाँ से आएगा?”

अर्जुन ने कहा, “राष्ट्रीय शोध केन्द्र का पिछले वर्ष का अंतिम स्तर का प्रश्नपत्र। इसे आज तक किसी छात्र ने पूरे समय में पूरा नहीं किया।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

अर्जुन ने केवल इतना कहा, “मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास है। अब तुम्हें खुद पर करना होगा।”

अगले दिन कॉलेज का सभागार भर गया।

कैमरे लगाए गए। कई प्रोफेसर निगरानी में बैठे।

अवनी के सामने नया प्रश्नपत्र रखा गया।

पहले कुछ सवाल कठिन थे, लेकिन हल हो सकते थे। अंतिम सवाल में एक जटिल गणितीय मॉडल दिया गया था।

अवनी ने आधे घंटे तक उसे देखा।

फिर उसने हाथ उठाया।

राघव हँसा, “हार मान ली?”

अवनी ने कहा, “प्रश्न गलत है।”

सभागार में फुसफुसाहट फैल गई।

समिति अध्यक्ष नाराज़ हुआ।

“यह सवाल देश के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने बनाया है।”

अवनी ने बोर्ड पर जाकर पूरा मॉडल लिखा।

“यहाँ तीसरी शर्त और पाँचवीं शर्त एक-दूसरे को काट रही हैं। यदि दोनों सही मानी जाएँ तो कोई समाधान संभव नहीं। लेकिन यदि तीसरी शर्त में ऋण चिह्न की जगह धन चिह्न हो, तो तीन अलग समाधान निकलते हैं।”

उसने एक-एक करके तीनों समाधान लिख दिए।

प्रोफेसर अपनी सीटों से उठ गए।

प्रश्नपत्र की मूल प्रति मँगाई गई।

वास्तव में छपाई में चिह्न बदल गया था।

समिति अध्यक्ष ने कहा, “इस छात्रा ने केवल सवाल हल नहीं किया। इसने हमारे प्रश्न की गलती पकड़ी है।”

परिणाम घोषित हुआ।

अवनी ने पूरे अंक प्राप्त किए।

राघव उससे बहुत पीछे था।

कॉलेज के मैदान में विद्यार्थियों की भीड़ जमा हुई।

अवनी उसके सामने खड़ी हुई।

“अब हमारी शर्त।”

राघव बोला, “मैं सिंघानिया परिवार का बेटा हूँ। मुझे किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं।”

अवनी ने पूछा, “तुम्हारे पिता का पूरा नाम?”

राघव चुप।

“सिंघानिया परिवार का पहला कारखाना किस शहर में लगा था?”

राघव चुप।

“मेरे दादा हर साल किस मंदिर में जाते थे?”

राघव के चेहरे पर पसीना आ गया।

काव्या बोली, “हर बच्चे को अपने परिवार की हर बात याद हो, यह ज़रूरी नहीं।”

अवनी ने कहा, “ठीक है। यह बता दो कि देवयानी सिंघानिया के पति का जन्मदिन कब था।”

राघव ने गलत तारीख बता दी।

भीड़ में खुसर-पुसर होने लगी।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

“क्योंकि वह उनका बेटा नहीं है।”

सभी मुड़े।

देवयानी व्हीलचेयर पर बैठी थीं। शरीर कमजोर था, मगर आँखों में वही पुराना तेज़ था।

अवनी दौड़कर उनके पास गई।

“माँ!”

देवयानी ने उसका हाथ थामा।

फिर सबके सामने बोलीं, “राघव वर्मा को हमने बचपन में आश्रय दिया था। उसे शिक्षा और घर दिया। मगर वह हमारा बेटा नहीं है। मेरी एक ही संतान है—अवनी सिंघानिया।”

राघव की बनाई दुनिया सबके सामने टूट गई।

काव्या पीछे हट गई।

“तुमने मुझसे झूठ कहा?”

राघव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

“मैं सब ठीक कर दूँगा।”

काव्या ने उसे थप्पड़ मार दिया।

लेकिन दोस्तों, यह जीत इतनी आसान नहीं थी।

विक्रम उसी समय कुछ वकीलों के साथ वहाँ पहुँचा।

उसने एक फाइल खोलकर कहा, “अवनी कम्पनी की उत्तराधिकारी हो सकती है, लेकिन उसने छह महीने पहले अपनी इच्छा से अपने हिस्सों का अस्थायी प्रबंधन मेरे नाम कर दिया था।”

अवनी के सामने उसके हस्ताक्षर वाले कागज़ रखे गए।

हस्ताक्षर असली थे।

उसे याद आया, राघव कई बार कॉलेज की छात्रवृत्ति और कार्यक्रमों के नाम पर उससे खाली कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाता था।

उसकी अपनी लापरवाही अब उसके खिलाफ खड़ी थी।

विक्रम बोला, “और जब तक देवयानी पूरी तरह स्वस्थ नहीं होतीं, मैं कानूनी रूप से कम्पनी का कार्यकारी प्रमुख हूँ।”

अवनी ने कागज़ उठाए।

“नकली कागज़ ज़्यादा समय नहीं चलते, चाचा।”

विक्रम मुस्कराया।

“तो उन्हें नकली साबित कर दो।”

फैलोशिप जीतने के कारण अवनी को पिता के सुरक्षित डिजिटल अभिलेखों तक पहुँच मिली।

वह और अर्जुन रात में शोध केन्द्र पहुँचे।

सर्वर में एक पुरानी फाइल मिली। उसमें अवनी के पिता और राठौड़ कम्पनी के बीच गुप्त संदेश थे।

एक चित्र में अर्जुन के पिता उस रात सिंघानिया भवन में मौजूद थे, जिस रात अवनी के पिता की कार दुर्घटना हुई थी।

अवनी का दिल बैठ गया।

“तुम्हें यह पता था?”

अर्जुन चुप रहा।

“अर्जुन, तुम्हें पता था कि तुम्हारे पिता उस रात मेरे घर आए थे?”

“हाँ।”

“और तुमने मुझसे छिपाया?”

अर्जुन ने कहा, “मैं पूरी बात साबित होने से पहले कुछ नहीं कहना चाहता था।”

“या तुम अपने परिवार को बचा रहे थे?”

“अवनी, मेरे पिता तुम्हारे पिता की मदद कर रहे थे।”

“हर कोई यही कहता है। राघव ने कहा वह मुझे बचा रहा है। विक्रम कहते हैं वह कम्पनी बचा रहे हैं। अब तुम कह रहे हो तुम मुझे बचा रहे थे।”

अर्जुन ने गहरी साँस ली।

“मैं राठौड़ टेक्नोलॉजीज़ का उत्तराधिकारी हूँ।”

अवनी पीछे हट गई।

“तुमने यह भी छिपाया।”

“हमारे परिवार की परंपरा है कि पढ़ाई पूरी होने से पहले पहचान सार्वजनिक नहीं की जाती।”

“फिर वही बात। तुमने तय किया कि मुझे कितना सच जानना चाहिए।”

“मैं तुम्हें खतरे से दूर रखना चाहता था।”

अवनी की आँखों में आँसू आ गए।

“मुझे खतरे से नहीं, झूठ से डर लगता है।”

वह वहाँ से चली गई।

अगली सुबह देवयानी ने अवनी को अकेले बुलाया।

उनकी आवाज़ बहुत कमजोर थी।

“तुम्हारे पिता की मौत दुर्घटना नहीं थी।”

अवनी उनके करीब बैठ गई।

“किसने किया?”

देवयानी ने कहा, “विक्रम अकेला नहीं था। दूसरा आदमी…”

अचानक अस्पताल की बिजली चली गई।

कमरा अँधेरे में डूब गया।

अवनी ने माँ का हाथ पकड़ना चाहा, मगर बिस्तर खाली था।

किसी ने पीछे से उसे धक्का दिया।

जब आपात रोशनी जली, खिड़की खुली थी और देवयानी गायब थीं।

दीवार पर लाल रंग से लिखा था—

“अपने पिता की सुरक्षित फाइल लेकर पुराने मिल में आओ। पुलिस आई तो माँ की लाश मिलेगी।”

अवनी के हाथ काँपने लगे।

अर्जुन पर उसका भरोसा टूट चुका था।

कम्पनी विक्रम के हाथ में थी।

राघव कहीं गायब था।

और अब उसकी माँ भी दुश्मनों के कब्ज़े में थी।

दोस्तों, पहली बार अवनी को लगा कि शायद दूसरी ज़िंदगी मिलने के बाद भी वह अपने अतीत को बदल नहीं पाएगी।

लेकिन इस बार वह रोकर बैठने वाली नहीं थी।

उसने दीवार पर लिखे शब्दों की तस्वीर ली और धीमे स्वर में कहा—

“अब मैं तुम्हारे बनाए खेल में नहीं खेलूँगी, चाचा। अब खेल मेरे नियमों से होगा।”

भाग तीन

सिंघानिया साम्राज्य का आखिरी राज

अवनी ने पिता की सुरक्षित फाइल रात भर पढ़ी।

उसमें सीधे किसी अपराध का नाम नहीं था। न विक्रम का, न राघव का।

मगर हजारों वित्तीय लेन-देन के बीच एक अजीब पैटर्न छिपा था।

सिंघानिया समूह से छोटी-छोटी रकम अलग-अलग तकनीकी प्रोजेक्टों के नाम पर एक ही कम्पनी तक पहुँच रही थी।

उस कम्पनी का नाम था—दीपशिखा टेक्नोलॉजीज़।

वह देश की सबसे बड़ी एआई और कम्प्यूटर सुरक्षा कम्पनी थी।

फाइल में अवनी के पिता का एक संदेश था—

“यदि मुझे कुछ हो जाए तो दीपशिखा के मुख्य मॉडल में छिपे खाते जाँचना। धन चुराने वाला व्यक्ति कम्पनी के भीतर नहीं, दोनों परिवारों के बीच बैठा है।”

अवनी समझ गई।

पुराना मिल केवल माँ को छिपाने की जगह नहीं था। विक्रम चाहता था कि अवनी सुरक्षित फाइल लेकर वहाँ पहुँचे, ताकि वह एकमात्र असली सबूत भी मिटा सके।

सीधे मिल जाना आत्महत्या होता।

पहले उसे फाइल के भीतर का पूरा रहस्य खोलना था।

दीपशिखा टेक्नोलॉजीज़ में नए शोध प्रशिक्षुओं की भर्ती चल रही थी। राष्ट्रीय फैलोशिप जीतने के कारण अवनी को सीधा इंटरव्यू मिला।

उसने किसी को बताए बिना आवेदन कर दिया।

बेंगलुरु पहुँचने के बाद वह पहली बार अर्जुन से मिली।

वह दीपशिखा भवन के बाहर उसका इंतजार कर रहा था।

अवनी उसे देखकर रुक गई।

अर्जुन ने कहा, “मुझे देवयानी जी के बारे में पता चला।”

“तुम्हें हर बात पता चल जाती है।”

उसकी आवाज़ में दर्द था।

अर्जुन ने कोई सफाई नहीं दी।

उसने एक डिजिटल चाबी अवनी की ओर बढ़ाई।

“इसमें मेरे पिता के सारे निजी रिकॉर्ड हैं। तुम्हारे पिता से उनकी बातचीत, उस रात की गाड़ी की लोकेशन और विक्रम के साथ हुए संदेश भी।”

अवनी ने चाबी नहीं ली।

“मुझे कैसे पता यह भी आधा सच नहीं?”

अर्जुन ने चाबी मेज़ पर रख दी।

“तुम्हें मुझ पर भरोसा करने की जरूरत नहीं। खुद जाँच लो।”

“और अगर तुम्हारे पिता दोषी निकले?”

अर्जुन ने कुछ पल बाद कहा, “तो मैं खुद उन्हें कानून के सामने ले जाऊँगा।”

अवनी ने पहली बार उसकी आँखों में डर देखा।

वह अपने पिता को खोने से नहीं, अवनी का भरोसा हमेशा के लिए खोने से डर रहा था।

फिर भी अवनी ने दूरी बनाए रखी।

“मैं यह चाबी ले रही हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”

“मैं माफी माँग भी नहीं रहा। पहले सच सामने आ जाए।”

दीपशिखा में अवनी का पहला दिन आसान नहीं था।

तकनीकी विभाग का प्रमुख लोकेश चौहान गलियारे में उससे टकराया। उसके हाथ की चाय उसके जूतों पर गिर गई।

लोकेश चिल्लाया, “नीचे झुककर साफ करो।”

अवनी ने कहा, “आप मुझसे टकराए थे।”

“जानती हो मैं कौन हूँ?”

आप भाग 4 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 4

“नहीं। और आपके व्यवहार के बाद जानने की इच्छा भी नहीं है।”

लोकेश ने उसे घूरा।

“नई प्रशिक्षु हो?”

“हाँ।”

“तो आज ही आखिरी दिन समझो।”

जब अवनी विभाग में पहुँची तो उसे एक और परिचित चेहरा दिखाई दिया।

काव्या।

काव्या ने महँगे कपड़े पहन रखे थे और लोकेश की कुर्सी के पास खड़ी थी।

“अवनी सिंघानिया,” उसने मुस्कराकर कहा, “दिल्ली में नाम बड़ा होगा। यहाँ काम योग्यता से मिलता है।”

अवनी ने उसके गले में लटका अस्थायी पहचान पत्र देखा।

उस पर पद लिखा था—विशेष सलाहकार।

“योग्यता से?” अवनी ने पूछा, “तो तुम्हारा चयन किस परीक्षा से हुआ?”

काव्या का चेहरा उतर गया।

लोकेश बोला, “तुम्हारी नौकरी रद्द की जाती है।”

मानव संसाधन अधिकारी ने कहा, “लेकिन यह राष्ट्रीय फैलोशिप विजेता हैं।”

“मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

तभी पूरे विभाग में लाल संकेत चमकने लगे।

मुख्य सर्वर पर साइबर हमला हुआ था।

आठ हजार कम्प्यूटर चिप एक साथ गलत निर्देश लेने लगी थीं। यदि मॉडल बंद होता तो कम्पनी को हर मिनट लाखों रुपये का नुकसान होता।

लोकेश ने वरिष्ठ इंजीनियरों को बुलाया।

कोई समस्या समझ नहीं पा रहा था।

काव्या ने दिखावा करते हुए कम्प्यूटर के सामने बैठने की कोशिश की, मगर कुछ ही मिनट में उसके हाथ काँपने लगे।

“इसके लिए कम से कम चालीस इंजीनियर चाहिए।”

अवनी पीछे खड़ी स्क्रीन देख रही थी।

“चालीस लोग समस्या को और उलझा देंगे।”

काव्या पलटी।

“तुम कर सकती हो?”

“हाँ।”

लोकेश बोला, “कुछ देर पहले तक तुम नौकरी से बाहर थीं।”

अवनी ने कहा, “और अब?”

लोकेश ने दाँत भींचकर कहा, “यदि तुमने इसे ठीक कर दिया तो नियुक्ति बनी रहेगी। नुकसान हुआ तो जिम्मेदारी तुम्हारी।”

अवनी बैठ गई।

उसने पाया कि हमला सीधे मुख्य सर्वर पर नहीं था। किसी ने सहायक गणना प्रणाली में एक छोटा-सा कोड डाला था, जो धीरे-धीरे हर चिप को गलत निर्देश दे रहा था।

उसने पहले सभी चिप को सुरक्षित स्थिति में भेजा, फिर हमले के कोड को अलग किया।

दस मिनट बाद लाल संकेत बंद हो गया।

एक वरिष्ठ इंजीनियर ने कहा, “सिस्टम बच गया।”

लोकेश के चेहरे पर राहत आई, मगर उसने धन्यवाद नहीं दिया।

“किस्मत अच्छी थी।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

“किस्मत ने कोड नहीं लिखा।”

उसी सिस्टम के भीतर अवनी को एक और चीज़ मिली।

हमले का कोड उसी पुराने वित्तीय मॉडल के रास्ते से अंदर आया था, जिसका उल्लेख उसके पिता की फाइल में था।

मतलब कम्पनी के भीतर कोई व्यक्ति विक्रम के लिए काम कर रहा था।

अवनी ने अपने सुधार वाले कोड में एक छिपा गणितीय हस्ताक्षर जोड़ दिया। यह ऐसा पैटर्न था, जिसे केवल वह पहचान सकती थी।

अगली सुबह मुख्य सिस्टम फिर बंद हो गया।

लोकेश ने पूरे विभाग के सामने अवनी पर आरोप लगाया।

“तुम्हारे कोड के कारण कम्पनी को बीस करोड़ का नुकसान हुआ है।”

काव्या बोली, “इसे पुलिस को सौंप देना चाहिए।”

अवनी ने कहा, “मेरे कोड की प्रति दिखाइए।”

लोकेश ने स्क्रीन खोली।

अवनी ने कुछ पंक्तियाँ देखीं और मुस्करा दी।

“यह मेरा कोड नहीं है।”

“नाम तुम्हारा लिखा है।”

“नाम बदलने से कोड मेरा नहीं हो जाता।”

उसने बोर्ड पर अपने गणितीय हस्ताक्षर का तरीका समझाया। मूल कोड में हर सातवीं पंक्ति के मान एक विशेष संख्या बनाते थे। बदले हुए कोड में वह पैटर्न गायब था।

“किसी ने मेरे जाने के बाद इसे बदला है।”

काव्या बोली, “कहानी बनाना बंद करो।”

अवनी ने कहा, “सुरक्षा कैमरे खोल दीजिए।”

लोकेश ने मना कर दिया।

तभी मुख्य दरवाज़ा खुला।

अर्जुन भीतर आया।

उसके पीछे कम्पनी के निदेशक और सुरक्षा प्रमुख थे।

पूरा विभाग खड़ा हो गया।

“नए अध्यक्ष आ गए।”

अवनी ने अर्जुन को देखा।

अब उसे समझ आया कि दीपशिखा टेक्नोलॉजीज़ राठौड़ परिवार की कम्पनी थी।

अर्जुन ने लोकेश से कहा, “कैमरे खोलिए।”

लोकेश ने हकलाते हुए कहा, “सर, यह छोटी-सी आंतरिक बात है।”

“जिस बात में कम्पनी के बीस करोड़ और एक निर्दोष कर्मचारी का भविष्य जुड़ा हो, वह छोटी नहीं होती।”

कैमरे की रिकॉर्डिंग सामने आई।

रात में काव्या अवनी के कम्प्यूटर पर बैठी थी। लोकेश दरवाज़े पर निगरानी कर रहा था।

काव्या के चेहरे से रंग उड़ गया।

अर्जुन ने सुरक्षा कर्मियों से कहा, “दोनों को हिरासत में लीजिए।”

काव्या अवनी के सामने गिर पड़ी।

“मेरी बात सुनो। मैंने यह अपनी इच्छा से नहीं किया।”

अवनी ने पूछा, “किसके कहने पर?”

काव्या चुप रही।

“विक्रम?”

उसकी आँखें भर आईं।

“उसने मेरे पिता को बंधक बना रखा है। हमारी कम्पनी पहले ही कर्ज़ में थी। राघव ने कहा था सिंघानिया परिवार का उत्तराधिकारी बनते ही सब बचा लेगा। मगर अब विक्रम हमें खत्म कर देगा।”

अवनी ने कहा, “तुमने मेरी माँ को अगवा करने में मदद की?”

“नहीं। मुझे केवल सिस्टम में बदलाव करने को कहा गया था। लेकिन राघव को जगह पता है।”

“राघव कहाँ है?”

काव्या ने एक पुराने गोदाम का पता दिया।

राघव वहाँ अकेला बैठा मिला।

महँगे कपड़े गायब थे। चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी। जो लड़का कभी खुद को शहर का सबसे अमीर वारिस बताता था, वह अब अँधेरे गोदाम में सस्ता खाना खा रहा था।

अवनी को देखकर वह हँसा।

“आखिर तुम्हें मेरी जरूरत पड़ ही गई।”

“माँ कहाँ हैं?”

“पहले मुझे देश से बाहर भेजने का इंतज़ाम करो।”

अवनी ने कहा, “तुम्हारी शर्तें सुनने नहीं आई।”

“तो अपनी माँ को भूल जाओ।”

अवनी उसके सामने बैठ गई।

“विक्रम तुम्हें मारना चाहता है।”

राघव की मुस्कान टूट गई।

“झूठ।”

अवनी ने उसे वह आवाज़ सुनाई, जो उसने विक्रम के कार्यालय से हासिल की थी।

उसमें विक्रम साफ कह रहा था कि राघव को आखिरी गवाह के रूप में खत्म करना होगा।

राघव कुछ देर तक चुप बैठा रहा।

फिर बोला, “मैंने उसके लिए सब किया। तुम्हें मुझ पर निर्भर बनाया। तुम्हारे दोस्तों को तुमसे दूर किया। तुम्हारे हस्ताक्षर लिए। और अब वह मुझे कुत्ते की तरह फेंक देगा?”

अवनी ने कहा, “तुम्हें दुख इस बात का नहीं कि तुमने मेरे साथ क्या किया। तुम्हें दुख है कि तुम्हें इनाम नहीं मिला।”

राघव ने गुस्से से कहा, “अगर तुम पहले जैसी रहतीं तो यह सब नहीं होता।”

“पहले जैसी?”

“तुम मेरी हर बात मानती थीं। मुझे जरूरत थी तुम्हारी।”

“नहीं, राघव। तुम्हें उस लड़की की जरूरत थी, जिसे अपने ऊपर भरोसा नहीं था।”

कुछ देर बाद राघव ने पुराने सिंघानिया कपड़ा मिल का पता बताया।

उसने सोचा अवनी उसे पैसे देगी।

उसे नहीं मालूम था कि उसकी पूरी बातचीत रिकॉर्ड हो चुकी थी।

रात को अवनी, अर्जुन और पुलिस की विशेष टोली मिल पहुँची।

वह मिल वर्षों से बंद थी। टूटी खिड़कियों से हवा सीटी बजाती हुई भीतर आ रही थी। दीवारों पर सिंघानिया परिवार के पुराने चित्र लगे थे।

इसी जगह अवनी के दादा ने पहली फैक्टरी शुरू की थी।

अंदर देवयानी एक कुर्सी से बँधी थीं।

विक्रम उनके पास खड़ा था।

“मुझे पता था तुम फाइल लेकर आओगी।”

अवनी ने कहा, “पहले माँ को छोड़िए।”

विक्रम हँसा।

“तुम्हारे पिता भी ऐसे ही थे। परिवार से अधिक कर्मचारियों और आदर्शों की चिंता करते थे।”

अवनी ने पूछा, “आपने उन्हें क्यों मारा?”

विक्रम के चेहरे पर वर्षों का दबा गुस्सा उभर आया।

“उन्होंने तय किया था कि कम्पनी के मुनाफे का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों में बाँटा जाएगा। परिवार का नियंत्रण कम किया जाएगा। जिस साम्राज्य को हमारे पिता ने बनाया, वह उसे दान में बाँटना चाहते थे।”

“इसलिए आपने उनकी कार के ब्रेक खराब करवाए?”

“मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की थी।”

“और जब वह नहीं माने तो मार दिया।”

विक्रम चिल्लाया, “मैंने कम्पनी बचाई!”

देवयानी ने कमजोर आवाज़ में कहा, “तुमने कम्पनी नहीं बचाई, विक्रम। तुमने अपनी कुर्सी बचाई।”

विक्रम ने बंदूक निकाल ली।

तभी पीछे से राघव अंदर आया।

“आपने कहा था मैं वारिस बनूँगा।”

विक्रम ने उसे देखकर कहा, “तुम यहाँ कैसे पहुँचे?”

“आपने मुझे इस्तेमाल किया।”

“और तुम खुशी से इस्तेमाल हुए।”

विक्रम ने उसकी ओर बंदूक कर दी।

गोली चली।

राघव ने अवनी को धक्का देकर बचा लिया। गोली उसके कंधे में लगी।

वह जमीन पर गिर पड़ा।

यह कोई अचानक जागी अच्छाई नहीं थी। उसकी आँखों में अब भी बदला था।

वह विक्रम को देखता हुआ बोला, “मैं आपका मोहरा था… लेकिन आपकी आखिरी चाल नहीं बनूँगा।”

उसी समय अर्जुन और पुलिस भीतर घुसे।

विक्रम को पकड़ लिया गया।

देवयानी को मुक्त कराया गया।

राघव को अस्पताल ले जाया गया और ठीक होने के बाद धोखाधड़ी, अपहरण में सहायता और हत्या की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

उसने जो किया था, एक गोली खाकर उसका अपराध समाप्त नहीं हो सकता था।

तीन दिन बाद अवनी का इक्कीसवाँ जन्मदिन था।

सिंघानिया समूह की आपात बोर्ड बैठक बुलाई गई।

विक्रम के वकीलों ने दावा किया कि उसके खिलाफ कोई सीधा प्रमाण नहीं है।

तभी अवनी बैठक कक्ष में दाखिल हुई।

उसके साथ देवयानी, अर्जुन, काव्या के पिता, पुलिस अधिकारी और कई वरिष्ठ कर्मचारी थे।

अवनी ने एक-एक करके सबूत सामने रखे।

माँ की दवाइयों की रिपोर्ट।

जाली कागज़।

रिया द्वारा पिता के कमरे से फाइल निकालने की रिकॉर्डिंग।

राघव का स्वीकार किया हुआ बयान।

काव्या की गवाही।

दीपशिखा के सर्वर में छिपे लेन-देन।

और अंत में पिता का वीडियो संदेश।

स्क्रीन पर अवनी के पिता दिखाई दिए।

उन्होंने कहा—

“यदि यह वीडियो बोर्ड तक पहुँचा है, तो समझिए मेरे साथ कोई दुर्घटना नहीं हुई। विक्रम कम्पनी के धन को तकनीकी खातों के माध्यम से बाहर भेज रहा है। मैंने राठौड़ परिवार के साथ मिलकर प्रमाण जुटाए हैं। मेरी इच्छा है कि कम्पनी का भविष्य केवल परिवार के हाथों में नहीं, उन लोगों के हाथों में भी हो जिन्होंने इसे बनाया है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

विक्रम की शक्ति उसी जगह समाप्त हो गई।

बोर्ड ने उसे सभी पदों से हटा दिया। उसके हिस्से कानूनी जाँच तक रोक दिए गए।

कम्पनी का नियंत्रण अवनी को सौंपने की घोषणा हुई।

सभी ने तालियाँ बजाईं।

लेकिन अवनी खड़ी नहीं हुई।

उसने कहा, “मैं इस परिवार में पैदा हुई हूँ, इसलिए कम्पनी की मालिक हो सकती हूँ। लेकिन केवल जन्म मुझे अच्छा नेता नहीं बनाता।”

सभी चुप हो गए।

“मैं अगले एक वर्ष तक कम्पनी के अलग-अलग विभागों में काम करूँगी। फैक्टरी के कामगारों से लेकर तकनीकी टीम तक हर स्तर को समझूँगी। उसके बाद ही अध्यक्ष की कुर्सी स्वीकार करूँगी।”

देवयानी की आँखों में गर्व उतर आया।

एक वर्ष बीत गया।

अवनी ने अपना समय मीटिंग कमरों से अधिक कारखानों, शोध प्रयोगशालाओं और कर्मचारियों के बीच बिताया। उसने पिता की योजना के अनुसार लाभ का एक हिस्सा कर्मचारियों के लिए सुरक्षित किया।

अर्जुन उसके साथ था, लेकिन उसने कभी उस पर अपने रिश्ते का दबाव नहीं डाला।

दोनों के बीच भरोसा धीरे-धीरे वापस आया।

एक वर्ष बाद अवनी उसी पुराने चायघर पहुँची, जहाँ अर्जुन ने उसका जन्मदिन मनाया था।

अर्जुन पहले से बैठा था।

अवनी ने वह पुरानी नोटबुक उसके सामने रखी।

अर्जुन ने अंतिम पन्ना खोला।

वहाँ लिखा था—

“पहली ज़िंदगी में मैंने उस इंसान को चुना, जिसे मेरे कमजोर रहने की जरूरत थी।

इस ज़िंदगी में मैं उस इंसान के साथ चलना चाहती हूँ, जिसने मेरे मजबूत होने का इंतज़ार किया।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“क्या इसका मतलब है कि मुझे फिर से पूछने का मौका मिलेगा?”

अवनी मुस्कराई।

“इस बार उत्तर सुनने से पहले कोई सच मत छिपाना।”

अर्जुन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“कोई राज नहीं। कोई झूठ नहीं। केवल बराबरी।”

अवनी ने उसका हाथ थाम लिया।

कुछ महीनों बाद दोनों परिवारों की मौजूदगी में उनका विवाह हुआ।

लेकिन अवनी की असली जीत विवाह नहीं था।

उसकी जीत यह थी कि अब उसकी पहचान किसी पुरुष के प्रेम, किसी परिवार के नाम या किसी बड़ी कम्पनी की कुर्सी पर निर्भर नहीं थी।

वह जानती थी कि वह कौन है।

दोस्तों, किसी गलत इंसान से प्यार कर बैठना जीवन की सबसे बड़ी हार नहीं होती।

असली हार तब होती है, जब हम उस इंसान के कारण खुद को खो देते हैं।

और असली जीत?

असली जीत उस दिन होती है, जब हम अपने दर्द से बाहर निकलकर खुद को दोबारा चुनते हैं।

अवनी को दूसरी ज़िंदगी मिली थी।

मगर उसने केवल अपना भाग्य नहीं बदला।

उसने अपनी सोच बदली।

अपने रिश्ते बदले।

और सबसे बढ़कर, उसने उस लड़की को बचा लिया, जिसे पहली ज़िंदगी में वह खुद भी नहीं बचा पाई थी।

वह लड़की थी—अवनी।

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