Crime Story

प्रेमी ने पागल साबित कर हड़पना चाहा साम्राज्य, फिर लौटी असली वारिस

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

अवनी सिंघानिया ने जिस अनाथ लड़के को अपना समझकर सब कुछ दिया, उसी ने उसके चाचा के साथ मिलकर उसकी पहचान, दौलत और जिंदगी छीनने की साजिश रच दी। मौत के बाद अवनी को तीन महीने पहले लौटने का दूसरा मौका मिलता है। इस बार उसे अपनी माँ को बचाना है, पिता की मौत का रहस्य खोलना है और पूरे सिंघानिया साम्राज्य में छिपे गद्दारों को बेनकाब करना है। मगर इस लड़ाई में सबसे कठिन सवाल यही है—वह भरोसा किस पर करे?

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 1

उस रात दिल्ली पर बादल ऐसे टूटकर बरस रहे थे, मानो आसमान वर्षों से दबा हुआ कोई राज धरती पर उगल देना चाहता हो।

शहर से दूर बने सिंघानिया परिवार के निजी अस्पताल की सातवीं मंज़िल पर लगभग सभी बत्तियाँ बंद थीं। लंबे गलियारे में केवल आपातकालीन रोशनी की फीकी लाल चमक दिखाई दे रही थी।

कमरा संख्या सात सौ नौ के भीतर अवनी सिंघानिया एक सफेद बिस्तर पर पड़ी थी। उसके दोनों हाथ चमड़े की पट्टियों से बँधे हुए थे। शरीर में इतनी दवाइयाँ डाली जा चुकी थीं कि वह अपनी उँगलियाँ तक नहीं हिला पा रही थी, लेकिन उसकी चेतना अभी पूरी तरह मरी नहीं थी।

उसके होंठ सूख चुके थे। आँखों के सामने धुँधला अँधेरा तैर रहा था।

कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था।

बाहर दो लोगों की धीमी आवाज़ें आ रही थीं।

पहली आवाज़ अवनी बहुत अच्छी तरह पहचानती थी।

राघव।

वही राघव, जिसके लिए उसने अपने परिवार से झगड़ा किया था। वही राघव, जिसे उसकी माँ सड़क किनारे की झुग्गी से उठाकर घर लाई थीं। वही राघव, जिसे अवनी ने अपने हाथों से अच्छे कपड़े पहनाए, अपने कॉलेज में दाखिला दिलाया और अपने नाम का विशेष बैंक कार्ड तक दे दिया।

दूसरी आवाज़ उसके चाचा विक्रम सिंघानिया की थी।

विक्रम धीमे स्वर में कह रहा था, “देवयानी की हालत अभी काबू में है। डॉक्टर ने कहा है कि दवा ऐसे ही चलती रही तो दो हफ्ते में वह किसी फैसले पर हस्ताक्षर करने लायक नहीं रहेंगी।”

अवनी की साँस अटक गई।

देवयानी उसकी माँ थीं।

राघव ने पूछा, “और अवनी?”

विक्रम हल्का-सा हँसा।

“अवनी की कहानी आज रात खत्म हो जाएगी। कल रिपोर्ट में लिखा जाएगा कि मानसिक तनाव में उसने दवाइयों की अधिक मात्रा ले ली।”

“लेकिन उसके इक्कीसवें जन्मदिन में अभी तीन महीने हैं। उसके हिस्से मेरे नाम कब होंगे?”

“तुम्हारे नाम?”

विक्रम की आवाज़ अचानक कठोर हो गई।

कुछ पल सन्नाटा रहा।

फिर उसने कहा, “अपनी औकात मत भूलो, राघव। तुम्हारा काम अवनी को भावनात्मक रूप से कमजोर करना था। तुमने वही किया। तुमने उससे खाली कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाए, उसे उसके दोस्तों से दूर किया और सबको यकीन दिलाया कि वह मानसिक रूप से अस्थिर है। इसके बदले तुम्हें जितना मिलना था, उससे कहीं अधिक मिल चुका है।”

राघव की आवाज़ काँप गई।

“आपने कहा था कि अवनी के बाद मैं सिंघानिया परिवार का उत्तराधिकारी बनूँगा।”

विक्रम हँस पड़ा।

“जिस लड़के की नसों में सिंघानिया परिवार का खून तक नहीं, वह इस साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा? सपने कम देखा करो।”

अवनी की बंद पलकों के नीचे आँसू भर आए।

तो राघव भी केवल एक मोहरा था।

पर मोहरा होने से उसका अपराध छोटा नहीं हो जाता था।

उसी ने अवनी को उसकी माँ से दूर किया था। उसी ने सबके सामने कहा था कि अवनी पागल है। उसी ने उसकी दवाइयाँ बदलवाई थीं। और उसी ने उसे विश्वास दिलाया था कि पूरी दुनिया उसके खिलाफ है, केवल राघव ही उसका अपना है।

दरवाज़ा खुला।

राघव कमरे के भीतर आया।

कुछ देर वह चुपचाप अवनी को देखता रहा। उसके चेहरे पर पछतावा नहीं था, केवल बेचैनी थी।

वह उसके करीब झुका और बोला, “तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह नहीं थी कि तुमने मुझसे प्यार किया। तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह थी कि मेरे सामने आते ही तुमने सोचना बंद कर दिया।”

अवनी उसे घूरती रही।

वह चीखना चाहती थी, मगर आवाज़ गले से बाहर नहीं निकली।

राघव ने उसके हाथ में लगी नली के भीतर एक पारदर्शी दवा उतार दी।

अवनी के सीने में आग-सी फैल गई।

बाहर बिजली चमकी।

उसे अपनी माँ का चेहरा दिखाई दिया। अपने पिता की मुस्कान याद आई। और फिर एक लड़का याद आया, जो वर्षों तक उसके पीछे शांत भाव से खड़ा रहा था।

अर्जुन राठौड़।

वह हर बार अवनी को सावधान करता था। मगर अवनी ने सबके सामने उसका अपमान किया था।

धीरे-धीरे कमरे की छत धुँधली होने लगी।

अवनी के मन में केवल एक ही बात गूँज रही थी।

काश, उसे एक मौका और मिल जाए।

केवल एक मौका।

वह किसी पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करेगी।

वह अपनी माँ को बचाएगी।

अपने पिता की मौत का सच ढूँढ़ेगी।

और राघव तथा विक्रम को उसी अँधेरे में धकेलेगी, जिसमें उन्होंने उसे मरने के लिए छोड़ दिया था।

अचानक किसी ने मेज़ पर ज़ोर से हाथ मारा।

“अवनी, तुम्हें सुनाई नहीं देता क्या?”

अवनी ने झटके से आँखें खोल दीं।

उसके सामने अस्पताल की सफेद छत नहीं थी।

वह अपने कॉलेज के विशेष भोजन कक्ष में बैठी थी।

चारों ओर विद्यार्थियों की भीड़ थी। सामने लंबी मेज़ पर चाँदी के बर्तन सजे थे। सिंघानिया परिवार के निजी रसोइए भोजन परोस रहे थे।

और उसके ठीक सामने काव्या मल्होत्रा खड़ी थी।

“यह सीट राघव की है,” काव्या ने कहा, “तुम यहाँ कैसे बैठ गईं?”

अवनी की साँस तेज हो गई।

वह अपने हाथों को देखने लगी। उन पर कोई पट्टी नहीं थी। न कलाई पर सुई का निशान, न शरीर में दर्द।

उसने दीवार पर लगा कैलेंडर देखा।

उसके इक्कीसवें जन्मदिन में ठीक तीन महीने बाकी थे।

वह वापस आ चुकी थी।

वही दिन।

वही भोजन कक्ष।

वही क्षण, जब पिछले जीवन में काव्या ने सबके सामने उसे नौकरानी कहा था और वह राघव के नाराज़ हो जाने के डर से चुपचाप बाहर चली गई थी।

दोस्तों, मौत से लौटना जितना चमत्कार था, उससे कहीं कठिन था अपने सामने उन्हीं चेहरों को देखना, जिन्होंने आपको मरते समय अकेला छोड़ दिया हो।

अवनी की निगाह राघव पर पड़ी।

वह मेज़ के दूसरे सिरे पर बैठा मुस्करा रहा था। उसने महँगी घड़ी पहन रखी थी, जो अवनी ने उसे जन्मदिन पर दी थी।

काव्या फिर बोली, “उठो यहाँ से। मालिक के आने से पहले नौकरों को उनकी जगह याद दिलानी पड़ती है क्या?”

कुछ विद्यार्थी हँस पड़े।

अवनी के भीतर वर्षों का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह उठ रहा था। उसका मन हुआ कि वह उसी समय सबके सामने राघव की सच्चाई बता दे।

लेकिन अगले ही क्षण उसे अस्पताल का कमरा याद आया।

विक्रम।

नकली कागज़।

माँ की दवाइयाँ।

यदि उसने अभी सबको बता दिया कि उसे सब पता है, तो असली दुश्मन सावधान हो जाएगा।

अवनी ने अपना गुस्सा भीतर दबा लिया।

उसने सामने खड़े मुख्य रसोइए महेश काका की ओर देखा।

“आज का भोजन किसके आदेश पर यहाँ आया है?”

महेश काका हिचकिचाए।

“घर से आया है, बिटिया।”

“घर में किसने भेजा?”

महेश काका की नज़र अनायास राघव पर चली गई।

बस एक पल के लिए।

मगर अवनी ने देख लिया।

पिछले जीवन में उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया था कि परिवार के कुछ पुराने कर्मचारी भी राघव की बात मानने लगे थे।

अवनी ने शांत स्वर में कहा, “आज का खाना वापस ले जाइए।”

राघव की मुस्कान गायब हो गई।

“यह खाना मेरे लिए आया है।”

अवनी ने उसकी ओर देखकर कहा, “तो घर पर फोन करके दोबारा मँगवा लो।”

काव्या बोली, “तुम्हें मालूम भी है किससे बात कर रही हो? राघव सिंघानिया इस परिवार का इकलौता बेटा है।”

अवनी ने पहली बार सीधे राघव की आँखों में देखा।

“सचमुच?”

उसके इस एक शब्द में ऐसी ठंडक थी कि राघव कुछ पल चुप रह गया।

फिर उसने हँसते हुए कहा, “अवनी की माँ हमारे घर में पुराने समय से काम करती हैं। इसलिए इसे कुछ ज़्यादा ही छूट मिली हुई है।”

अवनी को उस पर हँसी आई।

जिस देवयानी सिंघानिया के एक फैसले से देश की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के शेयर ऊपर-नीचे हो सकते थे, राघव उन्हीं को अपने घर की कर्मचारी बता रहा था।

मगर अवनी ने उसे रोका नहीं।

वह अपनी कुर्सी से उठी और महेश काका से बोली, “सारा खाना वापस ले जाइए। और आज के बाद मेरी अनुमति के बिना कॉलेज में कुछ नहीं आएगा।”

महेश काका ने सिर झुकाया।

“जी, बिटिया।”

काव्या ने गुस्से से कहा, “आप इसकी बात क्यों मान रहे हैं?”

महेश काका ने उत्तर नहीं दिया।

अवनी बाहर निकलने लगी तो राघव उसके पीछे आया।

“यह नया नाटक क्यों कर रही हो?”

अवनी बिना रुके बोली, “नाटक तो अभी शुरू भी नहीं हुआ।”

कॉलेज के मुख्य द्वार पर सिंघानिया परिवार की गाड़ी खड़ी थी। चालक रमेश ने दरवाज़ा खोला।

“बिटिया, घर चलें?”

अवनी कुछ पल उसे देखती रही।

पिछले जीवन में यही रमेश एक दुर्घटना में मारा गया था। तब उसे बताया गया था कि ब्रेक अचानक खराब हो गए थे।

अब अवनी को उस दुर्घटना पर भी शक होने लगा।

वह गाड़ी में बैठी और बोली, “रमेश काका, पिछले छह महीने में घर के वाहनों की देखभाल कौन करा रहा है?”

रमेश ने शीशे में उसे देखा।

“पहले मैं देखता था। अब विक्रम साहब ने नई कम्पनी को काम दे दिया है।”

अवनी के भीतर एक और घंटी बजी।

“आज से किसी भी गाड़ी की जाँच उस कम्पनी से नहीं होगी। पुराने गैराज में ले जाइए।”

“जी।”

घर पहुँचते ही अवनी सीधे अपनी माँ के कमरे में गई।

देवयानी खिड़की के पास बैठी कुछ फाइलें देख रही थीं। उनके चेहरे पर थकान थी। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे दिखाई दे रहे थे।

अवनी दरवाज़े पर ठिठक गई।

पिछले जीवन में माँ की मौत की खबर उसे तब मिली थी, जब राघव उसे पहले ही मानसिक अस्पताल भिजवा चुका था। वह अपनी माँ को अंतिम बार देख भी नहीं पाई थी।

अब उन्हें जीवित देखकर उसकी आँखें भर आईं।

देवयानी ने सिर उठाया।

“आज इतनी जल्दी कॉलेज से वापस?”

अवनी उनके पास गई और बिना कुछ कहे उन्हें गले लगा लिया।

देवयानी हैरान रह गईं।

“क्या हुआ?”

अवनी ने आँखें बंद कर लीं।

“बस आपकी याद आ रही थी।”

देवयानी का हाथ धीरे से उसकी पीठ पर चला गया।

“तुम्हारी तबीयत ठीक है?”

“अब ठीक हो जाएगी।”

देवयानी उसकी बात नहीं समझीं, मगर वर्षों बाद बेटी को अपने इतने करीब पाकर उनकी आँखों में भी नमी आ गई।

कुछ देर बाद अवनी ने पूछा, “आप कौन-सी दवाइयाँ ले रही हैं?”

“विक्रम ने नया डॉक्टर भेजा है। उसने कहा है काम के तनाव के कारण मेरा रक्तचाप बढ़ रहा है।”

अवनी ने मेज़ पर रखी शीशियाँ उठा लीं।

एक दवा की पर्ची पर डॉक्टर की मुहर थी, लेकिन तारीख के ऊपर हल्की खरोंच दिखाई दे रही थी।

उसने बिना माँ को डराए सारी दवाइयों की तस्वीरें अपने फोन में ले लीं।

“माँ, आज से ये दवाइयाँ मत लीजिए।”

देवयानी ने हैरानी से पूछा, “क्यों?”

“मुझे डॉक्टर पर भरोसा नहीं है।”

“यह डॉक्टर विक्रम ने भेजा है।”

अवनी ने अपनी माँ की आँखों में देखते हुए कहा, “इसीलिए तो भरोसा नहीं है।”

देवयानी कुछ क्षण उसे देखती रहीं।

“तुम्हारे और चाचा के बीच कुछ हुआ है?”

“अभी नहीं। लेकिन बहुत जल्द होगा।”

अपने कमरे में पहुँचकर अवनी ने दरवाज़ा बंद किया और अलमारी के नीचे छिपा छोटा तिजोरीनुमा खाना खोला। उसके पिता ने मरने से कुछ महीने पहले उसे एक चाँदी की कलम और काले रंग की छोटी कम्प्यूटर चिप दी थी।

उन्होंने कहा था, “कभी ऐसा लगे कि घर में किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो यह चिप केवल राठौड़ परिवार के सामने खोलना।”

उस समय अवनी ने बात को मज़ाक समझा था।

पिता की मौत के बाद वह चिप गायब हो गई थी।

अवनी ने पूरा कमरा खोजा।

तिजोरी खाली थी।

चाँदी की कलम भी गायब थी।

तभी बाहर से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

अवनी ने दरवाज़ा खोला तो राघव की बहन रिया सामने खड़ी थी। उसके हाथ में कपड़ों की टोकरी थी।

“कुछ चाहिए था?” रिया ने पूछा।

अवनी ने उसकी कलाई पर नज़र डाली। वहाँ नीली स्याही का हल्का निशान था।

उसके पिता की चाँदी की कलम में विशेष नीली स्याही इस्तेमाल होती थी।

अवनी ने कुछ नहीं कहा।

बस मुस्कराकर बोली, “तुम मेरे कमरे में कब आई थीं?”

रिया का चेहरा बदल गया।

“मैं तो रोज़ सफाई करने आती हूँ।”

“आज से मेरे कमरे की सफाई कोई नहीं करेगा।”

रिया ने सिर हिलाया और चली गई।

अवनी जानती थी कि यदि वह अभी उस पर आरोप लगाएगी तो रिया सबूत हटा देगी। इसलिए उसने कमरे में दो छोटे कैमरे लगवाए और घर की सुरक्षा प्रणाली का पासवर्ड बदल दिया।

भाग 1/4 अगला →
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