Crime Story

प्रेमी ने पागल साबित कर हड़पना चाहा साम्राज्य, फिर लौटी असली वारिस

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

अवनी सिंघानिया ने जिस अनाथ लड़के को अपना समझकर सब कुछ दिया, उसी ने उसके चाचा के साथ मिलकर उसकी पहचान, दौलत और जिंदगी छीनने की साजिश रच दी। मौत के बाद अवनी को तीन महीने पहले लौटने का दूसरा मौका मिलता है। इस बार उसे अपनी माँ को बचाना है, पिता की मौत का रहस्य खोलना है और पूरे सिंघानिया साम्राज्य में छिपे गद्दारों को बेनकाब करना है। मगर इस लड़ाई में सबसे कठिन सवाल यही है—वह भरोसा किस पर करे?

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आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 2

अगले दिन कॉलेज में हर तरफ केवल एक ही नाम की चर्चा थी।

अर्जुन राठौड़।

वह अंतरराष्ट्रीय कम्प्यूटर प्रतिभा प्रतियोगिता में भारत के लिए पहला स्थान जीतकर लौटा था। कॉलेज के मुख्य सभागार में उसका स्वागत किया जा रहा था।

अवनी भीड़ के पीछे खड़ी उसे देखती रही।

साधारण सफेद कुरता, नीली जैकेट और चेहरे पर वही शांत भाव।

अर्जुन कभी दिखावा नहीं करता था। शायद इसी कारण अवनी ने पिछले जीवन में उसकी कीमत नहीं समझी थी।

कार्यक्रम समाप्त हुआ तो अवनी उसके पीछे चली गई।

“अर्जुन।”

वह रुका।

जब उसने अवनी को देखा तो उसके चेहरे पर खुशी नहीं, सावधानी दिखाई दी।

“हाँ?”

अवनी के मन में वर्षों पुरानी वह घटना घूम गई, जब अर्जुन ने सबके सामने उसे अपने मन की बात बताई थी और उसने राघव को खुश करने के लिए अर्जुन का मज़ाक उड़ा दिया था।

अवनी ने धीमे स्वर में कहा, “मुझे तुमसे माफी माँगनी है।”

अर्जुन चुप रहा।

“मैंने पहले तुम्हारे साथ बहुत गलत व्यवहार किया।”

“आज अचानक?”

“कभी-कभी एक ही रात इंसान को कई साल बड़ा कर देती है।”

अर्जुन उसकी आँखों में देखता रहा।

“लोग एक रात में बदलते नहीं हैं, अवनी। कभी-कभी केवल अपनी चाल बदलते हैं।”

अवनी को उसका संदेह बुरा नहीं लगा।

वह इसी अर्जुन को तो जानती थी। शांत, मगर मूर्ख नहीं।

उसने अपने बैग से पिता की पुरानी डायरी निकाली।

“मेरे पिता ने मरने से पहले राठौड़ परिवार का नाम लिखा था। मुझे एक कम्प्यूटर चिप ढूँढ़नी है। शायद उसमें कुछ ऐसा है, जो तुम्हारे परिवार से भी जुड़ा है।”

अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।

“तुम्हें यह बात किसने बताई?”

“पापा ने।”

“और तुम चाहती हो मैं तुम्हारी मदद करूँ?”

“हाँ।”

“क्योंकि तुम्हें मुझ पर भरोसा है?”

अवनी ने ईमानदारी से कहा, “नहीं। अभी मुझे किसी पर भरोसा नहीं है।”

अर्जुन की भौंहें उठीं।

अवनी बोली, “लेकिन मैं तुम्हें देखना चाहती हूँ। तुम्हारी बात नहीं, तुम्हारे काम।”

कुछ पल बाद अर्जुन ने कहा, “ठीक है। चिप मिल जाए तो मुझे बताना।”

अवनी जाने लगी तो अर्जुन ने पीछे से कहा, “और अवनी।”

वह मुड़ी।

“अगर तुम्हें सच में खतरा है, तो अकेले बहादुर बनने की कोशिश मत करना।”

अवनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “यह सलाह तुम खुद भी याद रखना।”

दो दिन बाद अवनी का जन्मदिन था।

उसी दिन काव्या का भी जन्मदिन था।

राघव ने अवनी से कहा, “काव्या अपने दोस्तों के साथ शाम को हमारे घर आना चाहती है।”

अवनी ने जानबूझकर पूछा, “हमारे घर?”

राघव तुरंत सँभल गया।

“मेरा मतलब सिंघानिया निवास।”

अवनी ने मुस्कराकर कहा, “ज़रूर बुलाओ। मैं पूरे दिन बाहर रहूँगी।”

राघव के चेहरे पर राहत आ गई।

उसे क्या पता था कि अवनी यही चाहती थी।

उसने घर के कर्मचारियों को छुट्टी दे दी, लेकिन सुरक्षा प्रणाली चालू रखी। पिता के पुराने अध्ययन कक्ष, मुख्य तिजोरी और पश्चिमी गलियारे में लगे कैमरों को अपने फोन से जोड़ लिया।

शाम को अर्जुन उसे दिल्ली के एक पुराने इलाके में बने छोटे-से चायघर में ले गया।

वहाँ न महँगी सजावट थी, न चाँदी के बर्तन।

एक कोने में मिट्टी के दीये जल रहे थे। बाहर बारिश की हल्की बूँदें गिर रही थीं।

अर्जुन ने एक छोटा-सा केक मेज़ पर रखा।

“जन्मदिन मुबारक हो।”

अवनी की आँखें उस केक पर टिक गईं।

पिछले जीवन में अपने जन्मदिन के दिन वह काव्या के लिए पार्टी की सजावट कर रही थी। राघव ने उसे शुभकामना तक नहीं दी थी।

अर्जुन ने उसे एक पुरानी नोटबुक दी।

अवनी ने खोला तो उसमें बचपन के गणित के सवाल लिखे थे। कई पन्नों पर लाल स्याही से लिखा था, “अवनी ने सही हल किया।”

“तुमने यह सँभालकर रखी?”

अर्जुन बोला, “तुम हमेशा कहती थीं कि तुम्हें गणित नहीं आता। मुझे लगा कभी तुम्हें सबूत देना पड़ेगा कि तुम गलत हो।”

अवनी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

अर्जुन घबरा गया।

“मैंने कुछ गलत कहा?”

अवनी ने सिर हिलाया।

“नहीं। बस पहली बार किसी ने मुझे ऐसी चीज़ दी है, जिसकी कीमत पैसे से नहीं लग सकती।”

कुछ देर दोनों चुप रहे।

फिर अवनी बोली, “अर्जुन, मुझे अब किसी पर भरोसा करने से डर लगता है।”

अर्जुन ने चाय का प्याला नीचे रखा।

“तो मुझ पर अभी भरोसा मत करो।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

वह बोला, “सिर्फ यह देखती रहो कि मैं क्या करता हूँ। भरोसा माँगा नहीं जाता, कमाया जाता है।”

उसी समय अवनी के फोन पर कैमरे की सूचना आई।

उसने देखा, राघव काव्या और उसके दोस्तों के साथ घर में प्रवेश कर चुका था।

पहले उन्होंने भोजन किया। फिर राघव ने बारह लाख रुपये की अंगूरी पेय की बोतलें मँगवाईं।

कुछ देर बाद रिया चुपके से पश्चिमी गलियारे में गई और पिता के अध्ययन कक्ष का ताला खोला।

वह भीतर से एक नीली फाइल लेकर बाहर आई।

मुख्य दरवाज़े पर चेहरा ढँके एक आदमी को वह फाइल सौंप दी गई।

अवनी ने तुरंत चित्र सुरक्षित कर लिया।

“तुम्हें घर जाना होगा?” अर्जुन ने पूछा।

“अभी नहीं। उन्हें कुछ देर यह यकीन रहने दो कि वे सफल हो गए हैं।”

लगभग एक घंटे बाद अवनी और अर्जुन घर पहुँचे।

मुख्य कक्ष में तेज़ संगीत बज रहा था।

काव्या ने उसे देखते ही कहा, “अरे, नौकरानी वापस आ गई।”

अर्जुन आगे बढ़ा, मगर अवनी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

राघव ने कहा, “आज काव्या का जन्मदिन है। कोई तमाशा मत करना।”

अवनी ने मेज़ पर रखी बोतलों को देखा।

“भुगतान हो गया?”

राघव ने उसका विशेष बैंक कार्ड निकालकर कहा, “अभी हो जाएगा।”

भवन प्रबंधक ने भुगतान यंत्र आगे किया।

अवनी ने उसी क्षण बैंक प्रबंधक को फोन लगाया।

“मेरे नाम का विशेष कार्ड तुरंत बंद कर दीजिए।”

राघव हँसा।

“तुम मुझे डराने की कोशिश कर रही हो?”

यंत्र पर कार्ड लगाया गया।

भुगतान अस्वीकार हो गया।

कमरे का माहौल बदल गया।

काव्या ने पूछा, “क्या हुआ?”

प्रबंधक बोला, “कार्ड रोक दिया गया है।”

राघव अवनी के पास आया।

“तुमने मेरा कार्ड क्यों बंद करवाया?”

अवनी ने शांत भाव से पूछा, “तुम्हारा कार्ड? कार्ड पर नाम किसका है?”

राघव ने कार्ड की ओर देखा।

उस पर साफ लिखा था—अवनी सिंघानिया।

काव्या और उसके दोस्तों ने पहली बार ध्यान से वह नाम पढ़ा।

अवनी बोली, “बारह लाख रुपये का बिल है। तुम चार लोग मिलकर दे सकते हो।”

सभी एक-दूसरे की ओर देखने लगे।

काव्या की सहेली बोली, “हमें तो राघव ने बुलाया था।”

राघव का चेहरा लाल हो गया।

आखिर अवनी ने भुगतान कर दिया।

मगर वह जीतकर भी मुस्कराई नहीं।

क्योंकि उसके फोन पर माँ के कमरे का आपात संकेत आ चुका था।

वह दौड़ती हुई ऊपर पहुँची।

देवयानी फर्श पर पड़ी थीं।

पास दवा की टूटी शीशी थी।

अवनी ने काँपते हाथों से उन्हें उठाने की कोशिश की।

“माँ!”

पीछे से पुलिस के कदमों की आवाज़ आई।

एक अधिकारी ने शीशी उठाई।

“इस पर उँगलियों के निशान हैं।”

जाँच यंत्र से प्राथमिक मिलान किया गया।

निशान अवनी के थे।

अवनी समझ गई।

किसी ने उसी की तस्वीरों वाली दवा की शीशी बदलकर यहाँ रखी थी।

विक्रम सीढ़ियों से नीचे आया। उसके चेहरे पर बनावटी चिंता थी।

“अवनी, तुमने अपनी माँ को क्या दे दिया?”

“मैंने कुछ नहीं किया।”

राघव धीरे-धीरे उसके पास आया।

सबकी नज़र दूसरी ओर थी।

वह उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, “तुम्हें वही पुरानी, बेवकूफ अवनी बने रहना चाहिए था।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

इस बार उसकी आँखों में डर नहीं था।

वह बोली, “तुमने गलती कर दी, राघव।”

“कैसी गलती?”

“इस बार तुमने मुझे जिंदा छोड़ दिया।”

पुलिस अवनी को अपने साथ ले गई।

बाहर बारिश तेज़ हो चुकी थी।

और दोस्तों, जिस लड़की ने सोचा था कि मौत से वापस आते ही वह अपनी किस्मत बदल देगी, उसकी दूसरी ज़िंदगी की पहली रात जेल की सलाखों के पीछे शुरू हुई।

भाग दो

पहचान की लड़ाई

पुलिस स्टेशन की लोहे की बेंच पर बैठी अवनी पूरी रात नहीं सोई।

उसकी आँखों के सामने बार-बार माँ का बेहोश चेहरा आ रहा था।

यदि देवयानी को कुछ हो गया, तो दूसरी ज़िंदगी मिलने का क्या फायदा?

सुबह विक्रम एक प्रसिद्ध वकील और परिवार के निजी मनोचिकित्सक के साथ पुलिस स्टेशन पहुँचा।

विक्रम ने अधिकारी से कहा, “अवनी पिछले कुछ महीनों से मानसिक तनाव में थी। वह कई बार अपनी माँ और राघव को नुकसान पहुँचाने की धमकी दे चुकी है।”

वकील ने कुछ वीडियो दिखाए।

एक वीडियो में अवनी राघव पर चिल्ला रही थी।

दूसरे में वह काव्या को थप्पड़ मार रही थी।

तीसरे में वह कह रही थी, “मैं तुम सबको बर्बाद कर दूँगी।”

हर वीडियो अधूरा था। उससे पहले क्या हुआ, यह काट दिया गया था।

मगर बाहर से देखने वाले को अवनी सचमुच अस्थिर दिखाई दे रही थी।

तभी अर्जुन स्टेशन के भीतर आया।

उसके साथ उस चायघर का मालिक और दो कर्मचारी थे।

अर्जुन ने कहा, “जिस समय देवयानी जी को दवा दी गई, अवनी मेरे साथ थी। चायघर के कैमरे में समय साफ दिखाई देगा।”

अधिकारी ने चित्र देखे।

इससे यह साबित हुआ कि अवनी घटना के समय घर पर नहीं थी, लेकिन दवा की शीशी पर उसकी उँगलियों के निशान अब भी एक सवाल थे।

उसे अस्थायी जमानत मिल गई।

घर लौटने पर उसे पता चला कि देवयानी की जान बच गई थी, मगर वह गहरे कोमा में थीं।

उधर विक्रम ने कम्पनी के बोर्ड की आपात बैठक बुला ली।

उसने कहा, “जब तक देवयानी होश में नहीं आतीं और अवनी की मानसिक स्थिति पर चिकित्सकीय रिपोर्ट नहीं आती, तब तक कम्पनी की सुरक्षा के लिए अवनी के सभी अधिकार रोकने होंगे।”

अवनी के पिता की वसीयत के अनुसार उसके इक्कीसवें जन्मदिन पर कम्पनी के इक्यावन प्रतिशत हिस्से उसके नाम होने वाले थे।

लेकिन यदि उसे मानसिक रूप से फैसले लेने में अयोग्य साबित कर दिया जाता, तो उसके हिस्सों का अस्थायी नियंत्रण परिवार के वरिष्ठ सदस्य विक्रम को मिल जाता।

यही असली खेल था।

बोर्ड के अधिकतर सदस्य विक्रम के पक्ष में थे।

अवनी के खाते सीमित कर दिए गए। घर की सुरक्षा उसके हाथ से ले ली गई। यहाँ तक कि माँ से मिलने के लिए भी उसे अनुमति लेनी पड़ती थी।

राघव ने कॉलेज में फिर कहानी फैला दी कि अवनी ने ईर्ष्या में अपनी माँ को नुकसान पहुँचाया।

कई विद्यार्थी उससे दूरी बनाने लगे।

अवनी पहले होती तो टूट जाती।

इस बार उसने अपने कमरे में बैठकर पिता की डायरी खोली।

एक पन्ने पर लिखा था—

“सुरक्षित अभिलेख केवल राष्ट्रीय गणित एवं कम्प्यूटर फैलोशिप के विजेता के लिए खुलेंगे।”

वह फैलोशिप सिंघानिया शोध संस्थान की ओर से आयोजित होती थी। उसके सुरक्षित सर्वर में कम्पनी के पुराने प्रोजेक्ट, वित्तीय रिकॉर्ड और उसके पिता की निजी शोध फाइलें रखी थीं।

अवनी को समझ आ गया कि पिता का छिपा हुआ सच वहीं हो सकता है।

परीक्षा दो सप्ताह बाद थी।

कॉलेज में राघव ने यह खबर सुनी तो हँस पड़ा।

“तुम फैलोशिप की परीक्षा दोगी?”

अवनी ने कहा, “हाँ।”

“तुम पिछली परीक्षा में तैंतालीस अंक लाई थीं।”

“तो?”

“तो यह कि तुम्हें अपने सपने और अपनी औकात दोनों याद रखनी चाहिए।”

अवनी ने पूछा, “एक शर्त लगाओगे?”

राघव का चेहरा खिल गया।

“कैसी शर्त?”

“यदि मेरे अंक तुमसे अधिक आए, तो तुम पूरे कॉलेज के सामने अपने पिता का पूरा नाम, जन्मस्थान और अपनी असली पहचान बताओगे।”

राघव कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला, “और अगर तुम हार गईं?”

“तो मैं कम्पनी के उत्तराधिकार से अपना दावा वापस ले लूँगी।”

यह सुनकर राघव की आँखें चमक उठीं।

उसे लगा विक्रम इससे बहुत खुश होगा।

“मंज़ूर है।”

अर्जुन ने जब यह सुना तो वह नाराज़ हो गया।

“तुमने इतना बड़ा फैसला मुझसे बात किए बिना कैसे कर लिया?”

अवनी ने कहा, “मेरी ज़िंदगी है।”

“और तुम्हें लगता है दो हफ्ते में राष्ट्रीय परीक्षा की तैयारी हो जाएगी?”

“मेरे पास दो हफ्ते नहीं हैं, अर्जुन।”

“मतलब?”

अवनी कुछ पल चुप रही।

वह अपने पिछले जीवन का सच नहीं बता सकती थी।

“मतलब यह कि मुझे बहुत देर हो चुकी है।”

अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा, फिर धीरे से कहा, “ठीक है। आज से हम तैयारी शुरू करेंगे।”

अगले दिनों में अवनी की दुनिया बदल गई।

सुबह कॉलेज, दोपहर माँ का अस्पताल और रात अर्जुन के साथ पढ़ाई।

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