भाग 3
अर्जुन उसे केवल सवाल हल करना नहीं सिखाता था। वह पूछता, “तुमने यह रास्ता क्यों चुना?” “यदि यह मान गलत हो तो?” “एक ही उत्तर तक पहुँचने के कितने तरीके हो सकते हैं?”
अवनी को धीरे-धीरे महसूस हुआ कि पिछले जीवन का उसका ज्ञान अभी भी उसके भीतर था, मगर भय की मोटी परतों के नीचे दबा हुआ।
एक रात तेज़ बारिश होने लगी।
बिजली चमकी तो अवनी का हाथ काँप गया।
उसे अस्पताल का वही कमरा दिखाई देने लगा। राघव का चेहरा। नली में उतरती पारदर्शी दवा।
उसकी साँस रुकने लगी।
अर्जुन ने किताब बंद कर दी।
“अवनी, मेरी ओर देखो।”
वह नहीं देख पाई।
अर्जुन ने कहा, “पाँच चीज़ें बताओ जो तुम्हें दिखाई दे रही हैं।”
“क्या?”
“सिर्फ बताओ।”
अवनी ने काँपते हुए कहा, “मेज़… किताब… खिड़की… तुम्हारी घड़ी… दीया…”
“चार चीज़ें जिन्हें तुम छू सकती हो।”
धीरे-धीरे उसकी साँस सामान्य होने लगी।
अर्जुन ने उससे कोई सवाल नहीं पूछा।
कुछ देर बाद अवनी बोली, “तुम जानना नहीं चाहते कि मुझे क्या हुआ?”
“जब तुम बताना चाहोगी, तब सुनूँगा।”
अवनी की आँखें भर आईं।
“तुम इतने शांत क्यों रहते हो?”
अर्जुन हल्का-सा मुस्कराया।
“क्योंकि तुम्हारे जीवन में शोर करने वाले लोग पहले ही बहुत हैं।”
अवनी ने पहली बार उसके सामने अपने मन की एक परत खोली।
“मैंने एक समय सोचा था कि जो इंसान मेरे लिए सबसे ज़्यादा लड़ता है, वही मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। अब समझ आ रहा है कि कुछ लोग लड़ते इसलिए हैं ताकि आपको बाकी दुनिया से अलग कर सकें।”
अर्जुन ने कहा, “और कुछ लोग चुप रहते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि तुम अपना फैसला खुद करो।”
उन दोनों के बीच कोई प्रेम स्वीकार नहीं हुआ, मगर उसी रात भरोसे का पहला छोटा-सा पुल बन गया।
उधर राघव की हालत बदल रही थी।
विक्रम अब उससे सीधे बात नहीं करता था। उसे केवल आदेश मिलते थे।
एक दिन राघव ने विक्रम के कमरे के बाहर उसे फोन पर कहते सुना, “अवनी हटते ही राघव को भी रास्ते से हटाना होगा। वह बहुत कुछ जानता है।”
राघव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसे पहली बार समझ आया कि जिस जगह को वह अपनी मंज़िल समझ रहा था, वहाँ उसके लिए कोई कुर्सी थी ही नहीं।
वह अवनी को सच बताने के लिए कॉलेज पहुँचा।
मगर उसने अवनी को अर्जुन के साथ हँसते देखा।
उसके भीतर का डर फिर ईर्ष्या बन गया।
“तो मेरे बाद यह उसी के पास चली जाएगी?”
उसने सच बताने का विचार छोड़ दिया।
परीक्षा से एक दिन पहले खबर फैल गई कि राष्ट्रीय फैलोशिप का प्रश्नपत्र किसी ने खरीद लिया है और वह प्रश्नपत्र अवनी के कम्प्यूटर से मिला है।
कॉलेज में हंगामा हो गया।
राघव ने कहा, “मैंने कहा था न, यह बिना बेईमानी के सफल नहीं हो सकती।”
परीक्षा समिति ने अवनी को अयोग्य घोषित करने की तैयारी शुरू कर दी।
अवनी ने समिति के सामने कहा, “मेरा कम्प्यूटर पिछले तीन दिनों से कॉलेज की प्रयोगशाला में था। कोई भी उसमें फाइल डाल सकता था।”
अधिकारी बोला, “तुम्हारे पास इसका सबूत है?”
“नहीं।”
राघव मुस्कराया।
तभी अर्जुन ने कहा, “परीक्षा रद्द मत कीजिए। अवनी को सबके सामने नया प्रश्नपत्र दीजिए।”
समिति के अध्यक्ष ने पूछा, “नया प्रश्नपत्र कहाँ से आएगा?”
अर्जुन ने कहा, “राष्ट्रीय शोध केन्द्र का पिछले वर्ष का अंतिम स्तर का प्रश्नपत्र। इसे आज तक किसी छात्र ने पूरे समय में पूरा नहीं किया।”
अवनी ने उसकी ओर देखा।
अर्जुन ने केवल इतना कहा, “मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास है। अब तुम्हें खुद पर करना होगा।”
अगले दिन कॉलेज का सभागार भर गया।
कैमरे लगाए गए। कई प्रोफेसर निगरानी में बैठे।
अवनी के सामने नया प्रश्नपत्र रखा गया।
पहले कुछ सवाल कठिन थे, लेकिन हल हो सकते थे। अंतिम सवाल में एक जटिल गणितीय मॉडल दिया गया था।
अवनी ने आधे घंटे तक उसे देखा।
फिर उसने हाथ उठाया।
राघव हँसा, “हार मान ली?”
अवनी ने कहा, “प्रश्न गलत है।”
सभागार में फुसफुसाहट फैल गई।
समिति अध्यक्ष नाराज़ हुआ।
“यह सवाल देश के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने बनाया है।”
अवनी ने बोर्ड पर जाकर पूरा मॉडल लिखा।
“यहाँ तीसरी शर्त और पाँचवीं शर्त एक-दूसरे को काट रही हैं। यदि दोनों सही मानी जाएँ तो कोई समाधान संभव नहीं। लेकिन यदि तीसरी शर्त में ऋण चिह्न की जगह धन चिह्न हो, तो तीन अलग समाधान निकलते हैं।”
उसने एक-एक करके तीनों समाधान लिख दिए।
प्रोफेसर अपनी सीटों से उठ गए।
प्रश्नपत्र की मूल प्रति मँगाई गई।
वास्तव में छपाई में चिह्न बदल गया था।
समिति अध्यक्ष ने कहा, “इस छात्रा ने केवल सवाल हल नहीं किया। इसने हमारे प्रश्न की गलती पकड़ी है।”
परिणाम घोषित हुआ।
अवनी ने पूरे अंक प्राप्त किए।
राघव उससे बहुत पीछे था।
कॉलेज के मैदान में विद्यार्थियों की भीड़ जमा हुई।
अवनी उसके सामने खड़ी हुई।
“अब हमारी शर्त।”
राघव बोला, “मैं सिंघानिया परिवार का बेटा हूँ। मुझे किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं।”
अवनी ने पूछा, “तुम्हारे पिता का पूरा नाम?”
राघव चुप।
“सिंघानिया परिवार का पहला कारखाना किस शहर में लगा था?”
राघव चुप।
“मेरे दादा हर साल किस मंदिर में जाते थे?”
राघव के चेहरे पर पसीना आ गया।
काव्या बोली, “हर बच्चे को अपने परिवार की हर बात याद हो, यह ज़रूरी नहीं।”
अवनी ने कहा, “ठीक है। यह बता दो कि देवयानी सिंघानिया के पति का जन्मदिन कब था।”
राघव ने गलत तारीख बता दी।
भीड़ में खुसर-पुसर होने लगी।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
“क्योंकि वह उनका बेटा नहीं है।”
सभी मुड़े।
देवयानी व्हीलचेयर पर बैठी थीं। शरीर कमजोर था, मगर आँखों में वही पुराना तेज़ था।
अवनी दौड़कर उनके पास गई।
“माँ!”
देवयानी ने उसका हाथ थामा।
फिर सबके सामने बोलीं, “राघव वर्मा को हमने बचपन में आश्रय दिया था। उसे शिक्षा और घर दिया। मगर वह हमारा बेटा नहीं है। मेरी एक ही संतान है—अवनी सिंघानिया।”
राघव की बनाई दुनिया सबके सामने टूट गई।
काव्या पीछे हट गई।
“तुमने मुझसे झूठ कहा?”
राघव ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।
“मैं सब ठीक कर दूँगा।”
काव्या ने उसे थप्पड़ मार दिया।
लेकिन दोस्तों, यह जीत इतनी आसान नहीं थी।
विक्रम उसी समय कुछ वकीलों के साथ वहाँ पहुँचा।
उसने एक फाइल खोलकर कहा, “अवनी कम्पनी की उत्तराधिकारी हो सकती है, लेकिन उसने छह महीने पहले अपनी इच्छा से अपने हिस्सों का अस्थायी प्रबंधन मेरे नाम कर दिया था।”
अवनी के सामने उसके हस्ताक्षर वाले कागज़ रखे गए।
हस्ताक्षर असली थे।
उसे याद आया, राघव कई बार कॉलेज की छात्रवृत्ति और कार्यक्रमों के नाम पर उससे खाली कागज़ों पर हस्ताक्षर करवाता था।
उसकी अपनी लापरवाही अब उसके खिलाफ खड़ी थी।
विक्रम बोला, “और जब तक देवयानी पूरी तरह स्वस्थ नहीं होतीं, मैं कानूनी रूप से कम्पनी का कार्यकारी प्रमुख हूँ।”
अवनी ने कागज़ उठाए।
“नकली कागज़ ज़्यादा समय नहीं चलते, चाचा।”
विक्रम मुस्कराया।
“तो उन्हें नकली साबित कर दो।”
फैलोशिप जीतने के कारण अवनी को पिता के सुरक्षित डिजिटल अभिलेखों तक पहुँच मिली।
वह और अर्जुन रात में शोध केन्द्र पहुँचे।
सर्वर में एक पुरानी फाइल मिली। उसमें अवनी के पिता और राठौड़ कम्पनी के बीच गुप्त संदेश थे।
एक चित्र में अर्जुन के पिता उस रात सिंघानिया भवन में मौजूद थे, जिस रात अवनी के पिता की कार दुर्घटना हुई थी।
अवनी का दिल बैठ गया।
“तुम्हें यह पता था?”
अर्जुन चुप रहा।
“अर्जुन, तुम्हें पता था कि तुम्हारे पिता उस रात मेरे घर आए थे?”
“हाँ।”
“और तुमने मुझसे छिपाया?”
अर्जुन ने कहा, “मैं पूरी बात साबित होने से पहले कुछ नहीं कहना चाहता था।”
“या तुम अपने परिवार को बचा रहे थे?”
“अवनी, मेरे पिता तुम्हारे पिता की मदद कर रहे थे।”
“हर कोई यही कहता है। राघव ने कहा वह मुझे बचा रहा है। विक्रम कहते हैं वह कम्पनी बचा रहे हैं। अब तुम कह रहे हो तुम मुझे बचा रहे थे।”
अर्जुन ने गहरी साँस ली।
“मैं राठौड़ टेक्नोलॉजीज़ का उत्तराधिकारी हूँ।”
अवनी पीछे हट गई।
“तुमने यह भी छिपाया।”
“हमारे परिवार की परंपरा है कि पढ़ाई पूरी होने से पहले पहचान सार्वजनिक नहीं की जाती।”
“फिर वही बात। तुमने तय किया कि मुझे कितना सच जानना चाहिए।”
“मैं तुम्हें खतरे से दूर रखना चाहता था।”
अवनी की आँखों में आँसू आ गए।
“मुझे खतरे से नहीं, झूठ से डर लगता है।”
वह वहाँ से चली गई।
अगली सुबह देवयानी ने अवनी को अकेले बुलाया।
उनकी आवाज़ बहुत कमजोर थी।
“तुम्हारे पिता की मौत दुर्घटना नहीं थी।”
अवनी उनके करीब बैठ गई।
“किसने किया?”
देवयानी ने कहा, “विक्रम अकेला नहीं था। दूसरा आदमी…”
अचानक अस्पताल की बिजली चली गई।
कमरा अँधेरे में डूब गया।
अवनी ने माँ का हाथ पकड़ना चाहा, मगर बिस्तर खाली था।
किसी ने पीछे से उसे धक्का दिया।
जब आपात रोशनी जली, खिड़की खुली थी और देवयानी गायब थीं।
दीवार पर लाल रंग से लिखा था—
“अपने पिता की सुरक्षित फाइल लेकर पुराने मिल में आओ। पुलिस आई तो माँ की लाश मिलेगी।”
अवनी के हाथ काँपने लगे।
अर्जुन पर उसका भरोसा टूट चुका था।
कम्पनी विक्रम के हाथ में थी।
राघव कहीं गायब था।
और अब उसकी माँ भी दुश्मनों के कब्ज़े में थी।
दोस्तों, पहली बार अवनी को लगा कि शायद दूसरी ज़िंदगी मिलने के बाद भी वह अपने अतीत को बदल नहीं पाएगी।
लेकिन इस बार वह रोकर बैठने वाली नहीं थी।
उसने दीवार पर लिखे शब्दों की तस्वीर ली और धीमे स्वर में कहा—
“अब मैं तुम्हारे बनाए खेल में नहीं खेलूँगी, चाचा। अब खेल मेरे नियमों से होगा।”
भाग तीन
सिंघानिया साम्राज्य का आखिरी राज
अवनी ने पिता की सुरक्षित फाइल रात भर पढ़ी।
उसमें सीधे किसी अपराध का नाम नहीं था। न विक्रम का, न राघव का।
मगर हजारों वित्तीय लेन-देन के बीच एक अजीब पैटर्न छिपा था।
सिंघानिया समूह से छोटी-छोटी रकम अलग-अलग तकनीकी प्रोजेक्टों के नाम पर एक ही कम्पनी तक पहुँच रही थी।
उस कम्पनी का नाम था—दीपशिखा टेक्नोलॉजीज़।
वह देश की सबसे बड़ी एआई और कम्प्यूटर सुरक्षा कम्पनी थी।
फाइल में अवनी के पिता का एक संदेश था—
“यदि मुझे कुछ हो जाए तो दीपशिखा के मुख्य मॉडल में छिपे खाते जाँचना। धन चुराने वाला व्यक्ति कम्पनी के भीतर नहीं, दोनों परिवारों के बीच बैठा है।”
अवनी समझ गई।
पुराना मिल केवल माँ को छिपाने की जगह नहीं था। विक्रम चाहता था कि अवनी सुरक्षित फाइल लेकर वहाँ पहुँचे, ताकि वह एकमात्र असली सबूत भी मिटा सके।
सीधे मिल जाना आत्महत्या होता।
पहले उसे फाइल के भीतर का पूरा रहस्य खोलना था।
दीपशिखा टेक्नोलॉजीज़ में नए शोध प्रशिक्षुओं की भर्ती चल रही थी। राष्ट्रीय फैलोशिप जीतने के कारण अवनी को सीधा इंटरव्यू मिला।
उसने किसी को बताए बिना आवेदन कर दिया।
बेंगलुरु पहुँचने के बाद वह पहली बार अर्जुन से मिली।
वह दीपशिखा भवन के बाहर उसका इंतजार कर रहा था।
अवनी उसे देखकर रुक गई।
अर्जुन ने कहा, “मुझे देवयानी जी के बारे में पता चला।”
“तुम्हें हर बात पता चल जाती है।”
उसकी आवाज़ में दर्द था।
अर्जुन ने कोई सफाई नहीं दी।
उसने एक डिजिटल चाबी अवनी की ओर बढ़ाई।
“इसमें मेरे पिता के सारे निजी रिकॉर्ड हैं। तुम्हारे पिता से उनकी बातचीत, उस रात की गाड़ी की लोकेशन और विक्रम के साथ हुए संदेश भी।”
अवनी ने चाबी नहीं ली।
“मुझे कैसे पता यह भी आधा सच नहीं?”
अर्जुन ने चाबी मेज़ पर रख दी।
“तुम्हें मुझ पर भरोसा करने की जरूरत नहीं। खुद जाँच लो।”
“और अगर तुम्हारे पिता दोषी निकले?”
अर्जुन ने कुछ पल बाद कहा, “तो मैं खुद उन्हें कानून के सामने ले जाऊँगा।”
अवनी ने पहली बार उसकी आँखों में डर देखा।
वह अपने पिता को खोने से नहीं, अवनी का भरोसा हमेशा के लिए खोने से डर रहा था।
फिर भी अवनी ने दूरी बनाए रखी।
“मैं यह चाबी ले रही हूँ। इसका मतलब यह नहीं कि मैंने तुम्हें माफ कर दिया।”
“मैं माफी माँग भी नहीं रहा। पहले सच सामने आ जाए।”
दीपशिखा में अवनी का पहला दिन आसान नहीं था।
तकनीकी विभाग का प्रमुख लोकेश चौहान गलियारे में उससे टकराया। उसके हाथ की चाय उसके जूतों पर गिर गई।
लोकेश चिल्लाया, “नीचे झुककर साफ करो।”
अवनी ने कहा, “आप मुझसे टकराए थे।”
“जानती हो मैं कौन हूँ?”