Crime Story

प्रेमी ने पागल साबित कर हड़पना चाहा साम्राज्य, फिर लौटी असली वारिस

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

अवनी सिंघानिया ने जिस अनाथ लड़के को अपना समझकर सब कुछ दिया, उसी ने उसके चाचा के साथ मिलकर उसकी पहचान, दौलत और जिंदगी छीनने की साजिश रच दी। मौत के बाद अवनी को तीन महीने पहले लौटने का दूसरा मौका मिलता है। इस बार उसे अपनी माँ को बचाना है, पिता की मौत का रहस्य खोलना है और पूरे सिंघानिया साम्राज्य में छिपे गद्दारों को बेनकाब करना है। मगर इस लड़ाई में सबसे कठिन सवाल यही है—वह भरोसा किस पर करे?

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आप भाग 4 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 44 मिनट

भाग 4

“नहीं। और आपके व्यवहार के बाद जानने की इच्छा भी नहीं है।”

लोकेश ने उसे घूरा।

“नई प्रशिक्षु हो?”

“हाँ।”

“तो आज ही आखिरी दिन समझो।”

जब अवनी विभाग में पहुँची तो उसे एक और परिचित चेहरा दिखाई दिया।

काव्या।

काव्या ने महँगे कपड़े पहन रखे थे और लोकेश की कुर्सी के पास खड़ी थी।

“अवनी सिंघानिया,” उसने मुस्कराकर कहा, “दिल्ली में नाम बड़ा होगा। यहाँ काम योग्यता से मिलता है।”

अवनी ने उसके गले में लटका अस्थायी पहचान पत्र देखा।

उस पर पद लिखा था—विशेष सलाहकार।

“योग्यता से?” अवनी ने पूछा, “तो तुम्हारा चयन किस परीक्षा से हुआ?”

काव्या का चेहरा उतर गया।

लोकेश बोला, “तुम्हारी नौकरी रद्द की जाती है।”

मानव संसाधन अधिकारी ने कहा, “लेकिन यह राष्ट्रीय फैलोशिप विजेता हैं।”

“मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

तभी पूरे विभाग में लाल संकेत चमकने लगे।

मुख्य सर्वर पर साइबर हमला हुआ था।

आठ हजार कम्प्यूटर चिप एक साथ गलत निर्देश लेने लगी थीं। यदि मॉडल बंद होता तो कम्पनी को हर मिनट लाखों रुपये का नुकसान होता।

लोकेश ने वरिष्ठ इंजीनियरों को बुलाया।

कोई समस्या समझ नहीं पा रहा था।

काव्या ने दिखावा करते हुए कम्प्यूटर के सामने बैठने की कोशिश की, मगर कुछ ही मिनट में उसके हाथ काँपने लगे।

“इसके लिए कम से कम चालीस इंजीनियर चाहिए।”

अवनी पीछे खड़ी स्क्रीन देख रही थी।

“चालीस लोग समस्या को और उलझा देंगे।”

काव्या पलटी।

“तुम कर सकती हो?”

“हाँ।”

लोकेश बोला, “कुछ देर पहले तक तुम नौकरी से बाहर थीं।”

अवनी ने कहा, “और अब?”

लोकेश ने दाँत भींचकर कहा, “यदि तुमने इसे ठीक कर दिया तो नियुक्ति बनी रहेगी। नुकसान हुआ तो जिम्मेदारी तुम्हारी।”

अवनी बैठ गई।

उसने पाया कि हमला सीधे मुख्य सर्वर पर नहीं था। किसी ने सहायक गणना प्रणाली में एक छोटा-सा कोड डाला था, जो धीरे-धीरे हर चिप को गलत निर्देश दे रहा था।

उसने पहले सभी चिप को सुरक्षित स्थिति में भेजा, फिर हमले के कोड को अलग किया।

दस मिनट बाद लाल संकेत बंद हो गया।

एक वरिष्ठ इंजीनियर ने कहा, “सिस्टम बच गया।”

लोकेश के चेहरे पर राहत आई, मगर उसने धन्यवाद नहीं दिया।

“किस्मत अच्छी थी।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

“किस्मत ने कोड नहीं लिखा।”

उसी सिस्टम के भीतर अवनी को एक और चीज़ मिली।

हमले का कोड उसी पुराने वित्तीय मॉडल के रास्ते से अंदर आया था, जिसका उल्लेख उसके पिता की फाइल में था।

मतलब कम्पनी के भीतर कोई व्यक्ति विक्रम के लिए काम कर रहा था।

अवनी ने अपने सुधार वाले कोड में एक छिपा गणितीय हस्ताक्षर जोड़ दिया। यह ऐसा पैटर्न था, जिसे केवल वह पहचान सकती थी।

अगली सुबह मुख्य सिस्टम फिर बंद हो गया।

लोकेश ने पूरे विभाग के सामने अवनी पर आरोप लगाया।

“तुम्हारे कोड के कारण कम्पनी को बीस करोड़ का नुकसान हुआ है।”

काव्या बोली, “इसे पुलिस को सौंप देना चाहिए।”

अवनी ने कहा, “मेरे कोड की प्रति दिखाइए।”

लोकेश ने स्क्रीन खोली।

अवनी ने कुछ पंक्तियाँ देखीं और मुस्करा दी।

“यह मेरा कोड नहीं है।”

“नाम तुम्हारा लिखा है।”

“नाम बदलने से कोड मेरा नहीं हो जाता।”

उसने बोर्ड पर अपने गणितीय हस्ताक्षर का तरीका समझाया। मूल कोड में हर सातवीं पंक्ति के मान एक विशेष संख्या बनाते थे। बदले हुए कोड में वह पैटर्न गायब था।

“किसी ने मेरे जाने के बाद इसे बदला है।”

काव्या बोली, “कहानी बनाना बंद करो।”

अवनी ने कहा, “सुरक्षा कैमरे खोल दीजिए।”

लोकेश ने मना कर दिया।

तभी मुख्य दरवाज़ा खुला।

अर्जुन भीतर आया।

उसके पीछे कम्पनी के निदेशक और सुरक्षा प्रमुख थे।

पूरा विभाग खड़ा हो गया।

“नए अध्यक्ष आ गए।”

अवनी ने अर्जुन को देखा।

अब उसे समझ आया कि दीपशिखा टेक्नोलॉजीज़ राठौड़ परिवार की कम्पनी थी।

अर्जुन ने लोकेश से कहा, “कैमरे खोलिए।”

लोकेश ने हकलाते हुए कहा, “सर, यह छोटी-सी आंतरिक बात है।”

“जिस बात में कम्पनी के बीस करोड़ और एक निर्दोष कर्मचारी का भविष्य जुड़ा हो, वह छोटी नहीं होती।”

कैमरे की रिकॉर्डिंग सामने आई।

रात में काव्या अवनी के कम्प्यूटर पर बैठी थी। लोकेश दरवाज़े पर निगरानी कर रहा था।

काव्या के चेहरे से रंग उड़ गया।

अर्जुन ने सुरक्षा कर्मियों से कहा, “दोनों को हिरासत में लीजिए।”

काव्या अवनी के सामने गिर पड़ी।

“मेरी बात सुनो। मैंने यह अपनी इच्छा से नहीं किया।”

अवनी ने पूछा, “किसके कहने पर?”

काव्या चुप रही।

“विक्रम?”

उसकी आँखें भर आईं।

“उसने मेरे पिता को बंधक बना रखा है। हमारी कम्पनी पहले ही कर्ज़ में थी। राघव ने कहा था सिंघानिया परिवार का उत्तराधिकारी बनते ही सब बचा लेगा। मगर अब विक्रम हमें खत्म कर देगा।”

अवनी ने कहा, “तुमने मेरी माँ को अगवा करने में मदद की?”

“नहीं। मुझे केवल सिस्टम में बदलाव करने को कहा गया था। लेकिन राघव को जगह पता है।”

“राघव कहाँ है?”

काव्या ने एक पुराने गोदाम का पता दिया।

राघव वहाँ अकेला बैठा मिला।

महँगे कपड़े गायब थे। चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी। जो लड़का कभी खुद को शहर का सबसे अमीर वारिस बताता था, वह अब अँधेरे गोदाम में सस्ता खाना खा रहा था।

अवनी को देखकर वह हँसा।

“आखिर तुम्हें मेरी जरूरत पड़ ही गई।”

“माँ कहाँ हैं?”

“पहले मुझे देश से बाहर भेजने का इंतज़ाम करो।”

अवनी ने कहा, “तुम्हारी शर्तें सुनने नहीं आई।”

“तो अपनी माँ को भूल जाओ।”

अवनी उसके सामने बैठ गई।

“विक्रम तुम्हें मारना चाहता है।”

राघव की मुस्कान टूट गई।

“झूठ।”

अवनी ने उसे वह आवाज़ सुनाई, जो उसने विक्रम के कार्यालय से हासिल की थी।

उसमें विक्रम साफ कह रहा था कि राघव को आखिरी गवाह के रूप में खत्म करना होगा।

राघव कुछ देर तक चुप बैठा रहा।

फिर बोला, “मैंने उसके लिए सब किया। तुम्हें मुझ पर निर्भर बनाया। तुम्हारे दोस्तों को तुमसे दूर किया। तुम्हारे हस्ताक्षर लिए। और अब वह मुझे कुत्ते की तरह फेंक देगा?”

अवनी ने कहा, “तुम्हें दुख इस बात का नहीं कि तुमने मेरे साथ क्या किया। तुम्हें दुख है कि तुम्हें इनाम नहीं मिला।”

राघव ने गुस्से से कहा, “अगर तुम पहले जैसी रहतीं तो यह सब नहीं होता।”

“पहले जैसी?”

“तुम मेरी हर बात मानती थीं। मुझे जरूरत थी तुम्हारी।”

“नहीं, राघव। तुम्हें उस लड़की की जरूरत थी, जिसे अपने ऊपर भरोसा नहीं था।”

कुछ देर बाद राघव ने पुराने सिंघानिया कपड़ा मिल का पता बताया।

उसने सोचा अवनी उसे पैसे देगी।

उसे नहीं मालूम था कि उसकी पूरी बातचीत रिकॉर्ड हो चुकी थी।

रात को अवनी, अर्जुन और पुलिस की विशेष टोली मिल पहुँची।

वह मिल वर्षों से बंद थी। टूटी खिड़कियों से हवा सीटी बजाती हुई भीतर आ रही थी। दीवारों पर सिंघानिया परिवार के पुराने चित्र लगे थे।

इसी जगह अवनी के दादा ने पहली फैक्टरी शुरू की थी।

अंदर देवयानी एक कुर्सी से बँधी थीं।

विक्रम उनके पास खड़ा था।

“मुझे पता था तुम फाइल लेकर आओगी।”

अवनी ने कहा, “पहले माँ को छोड़िए।”

विक्रम हँसा।

“तुम्हारे पिता भी ऐसे ही थे। परिवार से अधिक कर्मचारियों और आदर्शों की चिंता करते थे।”

अवनी ने पूछा, “आपने उन्हें क्यों मारा?”

विक्रम के चेहरे पर वर्षों का दबा गुस्सा उभर आया।

“उन्होंने तय किया था कि कम्पनी के मुनाफे का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों में बाँटा जाएगा। परिवार का नियंत्रण कम किया जाएगा। जिस साम्राज्य को हमारे पिता ने बनाया, वह उसे दान में बाँटना चाहते थे।”

“इसलिए आपने उनकी कार के ब्रेक खराब करवाए?”

“मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की थी।”

“और जब वह नहीं माने तो मार दिया।”

विक्रम चिल्लाया, “मैंने कम्पनी बचाई!”

देवयानी ने कमजोर आवाज़ में कहा, “तुमने कम्पनी नहीं बचाई, विक्रम। तुमने अपनी कुर्सी बचाई।”

विक्रम ने बंदूक निकाल ली।

तभी पीछे से राघव अंदर आया।

“आपने कहा था मैं वारिस बनूँगा।”

विक्रम ने उसे देखकर कहा, “तुम यहाँ कैसे पहुँचे?”

“आपने मुझे इस्तेमाल किया।”

“और तुम खुशी से इस्तेमाल हुए।”

विक्रम ने उसकी ओर बंदूक कर दी।

गोली चली।

राघव ने अवनी को धक्का देकर बचा लिया। गोली उसके कंधे में लगी।

वह जमीन पर गिर पड़ा।

यह कोई अचानक जागी अच्छाई नहीं थी। उसकी आँखों में अब भी बदला था।

वह विक्रम को देखता हुआ बोला, “मैं आपका मोहरा था… लेकिन आपकी आखिरी चाल नहीं बनूँगा।”

उसी समय अर्जुन और पुलिस भीतर घुसे।

विक्रम को पकड़ लिया गया।

देवयानी को मुक्त कराया गया।

राघव को अस्पताल ले जाया गया और ठीक होने के बाद धोखाधड़ी, अपहरण में सहायता और हत्या की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।

उसने जो किया था, एक गोली खाकर उसका अपराध समाप्त नहीं हो सकता था।

तीन दिन बाद अवनी का इक्कीसवाँ जन्मदिन था।

सिंघानिया समूह की आपात बोर्ड बैठक बुलाई गई।

विक्रम के वकीलों ने दावा किया कि उसके खिलाफ कोई सीधा प्रमाण नहीं है।

तभी अवनी बैठक कक्ष में दाखिल हुई।

उसके साथ देवयानी, अर्जुन, काव्या के पिता, पुलिस अधिकारी और कई वरिष्ठ कर्मचारी थे।

अवनी ने एक-एक करके सबूत सामने रखे।

माँ की दवाइयों की रिपोर्ट।

जाली कागज़।

रिया द्वारा पिता के कमरे से फाइल निकालने की रिकॉर्डिंग।

राघव का स्वीकार किया हुआ बयान।

काव्या की गवाही।

दीपशिखा के सर्वर में छिपे लेन-देन।

और अंत में पिता का वीडियो संदेश।

स्क्रीन पर अवनी के पिता दिखाई दिए।

उन्होंने कहा—

“यदि यह वीडियो बोर्ड तक पहुँचा है, तो समझिए मेरे साथ कोई दुर्घटना नहीं हुई। विक्रम कम्पनी के धन को तकनीकी खातों के माध्यम से बाहर भेज रहा है। मैंने राठौड़ परिवार के साथ मिलकर प्रमाण जुटाए हैं। मेरी इच्छा है कि कम्पनी का भविष्य केवल परिवार के हाथों में नहीं, उन लोगों के हाथों में भी हो जिन्होंने इसे बनाया है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

विक्रम की शक्ति उसी जगह समाप्त हो गई।

बोर्ड ने उसे सभी पदों से हटा दिया। उसके हिस्से कानूनी जाँच तक रोक दिए गए।

कम्पनी का नियंत्रण अवनी को सौंपने की घोषणा हुई।

सभी ने तालियाँ बजाईं।

लेकिन अवनी खड़ी नहीं हुई।

उसने कहा, “मैं इस परिवार में पैदा हुई हूँ, इसलिए कम्पनी की मालिक हो सकती हूँ। लेकिन केवल जन्म मुझे अच्छा नेता नहीं बनाता।”

सभी चुप हो गए।

“मैं अगले एक वर्ष तक कम्पनी के अलग-अलग विभागों में काम करूँगी। फैक्टरी के कामगारों से लेकर तकनीकी टीम तक हर स्तर को समझूँगी। उसके बाद ही अध्यक्ष की कुर्सी स्वीकार करूँगी।”

देवयानी की आँखों में गर्व उतर आया।

एक वर्ष बीत गया।

अवनी ने अपना समय मीटिंग कमरों से अधिक कारखानों, शोध प्रयोगशालाओं और कर्मचारियों के बीच बिताया। उसने पिता की योजना के अनुसार लाभ का एक हिस्सा कर्मचारियों के लिए सुरक्षित किया।

अर्जुन उसके साथ था, लेकिन उसने कभी उस पर अपने रिश्ते का दबाव नहीं डाला।

दोनों के बीच भरोसा धीरे-धीरे वापस आया।

एक वर्ष बाद अवनी उसी पुराने चायघर पहुँची, जहाँ अर्जुन ने उसका जन्मदिन मनाया था।

अर्जुन पहले से बैठा था।

अवनी ने वह पुरानी नोटबुक उसके सामने रखी।

अर्जुन ने अंतिम पन्ना खोला।

वहाँ लिखा था—

“पहली ज़िंदगी में मैंने उस इंसान को चुना, जिसे मेरे कमजोर रहने की जरूरत थी।

इस ज़िंदगी में मैं उस इंसान के साथ चलना चाहती हूँ, जिसने मेरे मजबूत होने का इंतज़ार किया।”

अर्जुन ने उसकी ओर देखा।

“क्या इसका मतलब है कि मुझे फिर से पूछने का मौका मिलेगा?”

अवनी मुस्कराई।

“इस बार उत्तर सुनने से पहले कोई सच मत छिपाना।”

अर्जुन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“कोई राज नहीं। कोई झूठ नहीं। केवल बराबरी।”

अवनी ने उसका हाथ थाम लिया।

कुछ महीनों बाद दोनों परिवारों की मौजूदगी में उनका विवाह हुआ।

लेकिन अवनी की असली जीत विवाह नहीं था।

उसकी जीत यह थी कि अब उसकी पहचान किसी पुरुष के प्रेम, किसी परिवार के नाम या किसी बड़ी कम्पनी की कुर्सी पर निर्भर नहीं थी।

वह जानती थी कि वह कौन है।

दोस्तों, किसी गलत इंसान से प्यार कर बैठना जीवन की सबसे बड़ी हार नहीं होती।

असली हार तब होती है, जब हम उस इंसान के कारण खुद को खो देते हैं।

और असली जीत?

असली जीत उस दिन होती है, जब हम अपने दर्द से बाहर निकलकर खुद को दोबारा चुनते हैं।

अवनी को दूसरी ज़िंदगी मिली थी।

मगर उसने केवल अपना भाग्य नहीं बदला।

उसने अपनी सोच बदली।

अपने रिश्ते बदले।

और सबसे बढ़कर, उसने उस लड़की को बचा लिया, जिसे पहली ज़िंदगी में वह खुद भी नहीं बचा पाई थी।

वह लड़की थी—अवनी।

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