भाग 5
पर्दे पर नए कागज दिखाई दिए।
वे दस्तावेज, जिनमें रिषभ ने मेहर को भी धोखा देने की योजना बनाई थी।
विदेशी कंपनी के सभी अधिकार केवल रिषभ के नाम थे। मेहर के नाम कोई हिस्सा नहीं था।
मेहर अविश्वास से पर्दे को देखती रही।
“यह झूठ है,” उसने रिषभ की ओर देखते हुए कहा।
रिषभ चुप रहा।
“रिषभ, कुछ बोलो।”
वह बोला, “अभी इन बातों का समय नहीं है।”
मेहर उसके पास जाने लगी, लेकिन सुरक्षा कर्मचारियों ने रोक दिया।
“तुमने कहा था हम दोनों साथ रहेंगे,” मेहर रोते हुए बोली।
रिषभ ने नजरें फेर लीं।
आरव ने उसे देखा।
एक समय वह इस दृश्य की कल्पना करके संतोष पा सकता था। उसे लग सकता था कि जिस स्त्री ने उसे धोखा दिया, अब उसे भी धोखा मिला है।
लेकिन उसे कोई खुशी नहीं हुई।
केवल गहरा खालीपन था।
आरव ने सभा की ओर मुड़कर कहा, “मैं यहाँ अपने विवाह की निजी बातें सार्वजनिक करने नहीं आया था। लेकिन जब निजी धोखा हजारों कर्मचारियों और निवेशकों के भविष्य को खतरे में डालने लगे, तो वह केवल निजी नहीं रहता।”
उसने देव को संकेत किया।
कानूनी अधिकारियों ने रिषभ को वित्तीय धोखाधड़ी, दस्तावेजों की जालसाजी और षड्यंत्र के आरोप में हिरासत में ले लिया।
मेहर वहीं खड़ी रो रही थी।
एक अधिकारी उसके पास भी आया।
आरव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
“मेहर से अभी कोई कठोर व्यवहार नहीं होगा। वह जाँच में सहयोग करेगी।”
देव ने धीमे स्वर में कहा, “आरव, उसके विरुद्ध भी पर्याप्त प्रमाण हैं।”
“मुझे पता है।”
“फिर?”
आरव ने कहा, “न्याय होगा। अपमान नहीं।”
समारोह समाप्त कर दिया गया।
समाचार माध्यमों को केवल इतना बताया गया कि कंपनी के विरुद्ध एक वित्तीय षड्यंत्र पकड़ा गया है। आरव ने निजी संबंधों के विवरण सार्वजनिक नहीं होने दिए।
उसने मेहर को सबके सामने अपमानित करने से बचाया।
शायद इसलिए नहीं कि वह इसकी पात्र थी।
बल्कि इसलिए कि आरव अब भी अपने प्रेम की गरिमा बचाना चाहता था।
उस रात सिंघानिया भवन असामान्य रूप से शांत था।
मेहर अपने कमरे में बैठी थी। उसके सामने दो सूटकेस खुले थे। अलमारी से वस्त्र निकालते समय उसके हाथ काँप रहे थे।
आरव दरवाजे पर खड़ा था।
मेहर ने उसकी ओर देखा।
“तुम मुझे पुलिस के हवाले क्यों नहीं कर रहे?”
आरव ने कहा, “जाँच होगी। कानून निर्णय करेगा।”
“तुम चाहो, तो मेरा जीवन समाप्त कर सकते हो।”
“मैंने तुम्हें जीवन दिया था या नहीं, यह नहीं जानता। लेकिन मैं तुम्हारा जीवन समाप्त करने वाला व्यक्ति नहीं बनना चाहता।”
मेहर रोते हुए उसके पास आई।
“मैंने गलती की।”
आरव ने कहा, “गलती?”
उसकी आवाज पहली बार कठोर हुई।
“गलती तब होती है, जब कोई गलत तिथि लिख दे। तुमने मेरे जीवन में प्रवेश करने की योजना बनाई। मेरी माँ के बारे में जानकारी जुटाई। मेरे अकेलेपन को समझा। मुझसे विवाह किया। तीन साल तक किसी और से मिलती रहीं। मेरी कंपनी छीनने की योजना बनाई। फिर मुझे मानसिक रूप से अस्थिर घोषित करना चाहा।”
मेहर के पास कोई उत्तर नहीं था।
आरव की आँखें लाल हो गईं।
“इन सब में कौन-सा हिस्सा गलती था?”
मेहर ने सिर झुका लिया।
कुछ देर बाद उसने कहा, “शुरुआत में सब योजना थी।”
आरव की साँस रुक गई।
वह अब भी भीतर कहीं एक उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था।
“और बाद में?”
मेहर रोने लगी।
“बाद में सब वैसा नहीं रहा।”
“क्या मतलब?”
“तुम वैसे नहीं थे, जैसा रिषभ ने बताया था। उसने कहा था तुम अहंकारी होगे, कठोर होगे, मुझे केवल एक सजावट की तरह रखोगे। लेकिन तुमने मुझे सम्मान दिया। मेरे पिता की देखभाल की। मेरी हर बात सुनी।”
आरव ने पूछा, “क्या तुमने कभी मुझसे प्रेम किया?”
मेहर ने उसकी ओर देखा।
“मुझे नहीं पता।”
आरव की आँखों से आँसू बह निकले।
“तीन साल बाद भी तुम्हें नहीं पता?”
“मैं तुम्हारी परवाह करने लगी थी।”
“परवाह और प्रेम में फर्क होता है।”
“मुझे डर था कि रिषभ को छोड़ दूँगी, तो मेरा पुराना जीवन झूठ हो जाएगा। और अगर तुम्हारे साथ रहूँगी, तो मुझे हर दिन अपने अपराध के साथ जीना पड़ेगा।”
आरव ने कहा, “तुमने दोनों में से कोई रास्ता नहीं चुना। तुमने केवल झूठ चुना।”
मेहर फूट-फूटकर रोने लगी।
“मुझे एक अवसर दे दो।”
आरव ने धीरे से पूछा, “किसलिए?”
“सब ठीक करने के लिए।”
“क्या तुम वह रात वापस ला सकती हो, जब मैं तुम्हें अपनी माँ के कमरे में लेकर गया था?”
मेहर चुप रही।
“क्या तुम हमारे विवाह का पहला दिन वापस ला सकती हो?”
उसने सिर झुका लिया।
“क्या तुम मेरी हर उस याद से अपना झूठ निकाल सकती हो, जिसे मैंने अब तक प्रेम समझकर सँभाला?”
मेहर के पास कोई उत्तर नहीं था।
आरव ने कहा, “कुछ चीजें ठीक नहीं होतीं, मेहर। केवल स्वीकार की जाती हैं।”
मेहर ने रोते हुए पूछा, “क्या तुम मुझे कभी क्षमा कर पाओगे?”
आरव कुछ देर शांत रहा।
फिर बोला, “शायद एक दिन।”
मेहर ने आशा से उसकी ओर देखा।
लेकिन आरव ने आगे कहा, “पर क्षमा का अर्थ यह नहीं कि मैं तुम्हें दोबारा अपने जीवन में वही स्थान दे दूँ। मैं तुम्हारे प्रति घृणा लेकर नहीं जीना चाहता। लेकिन मैं स्वयं के प्रति अन्याय करके तुम्हें वापस भी नहीं स्वीकार कर सकता।”
मेहर ने अपनी अंगूठी उतारकर मेज पर रख दी।
आरव ने उसे नहीं रोका।
घर से निकलते समय मेहर मुख्य द्वार पर एक बार पीछे मुड़ी।
आरव सीढ़ियों के पास खड़ा था।
कभी वह उसकी वापसी की प्रतीक्षा करता था।
आज वह उसे जाते हुए देख रहा था।
दरवाजा बंद हो गया।
कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
रिषभ के विरुद्ध जालसाजी, धोखाधड़ी और षड्यंत्र के गंभीर आरोप सिद्ध हुए। जाँच में यह भी सामने आया कि उसने कई अन्य लोगों को वित्तीय योजनाओं में धोखा दिया था।
मेहर ने जाँच में सहयोग किया। उसने अपने सभी संदेश, खाते और दस्तावेज अधिकारियों को सौंप दिए। इस कारण उसे रिषभ की तुलना में कम दंड मिला, लेकिन उसे भी अपने अपराधों की कीमत चुकानी पड़ी।
आरव ने किसी अधिकारी पर दबाव नहीं डाला।
न उसने दंड बढ़वाया, न कम करवाया।
देव ने उससे पूछा, “तुम चाहो तो उसके लिए कठिनाई बढ़ सकती है।”
आरव ने कहा, “मैं न्याय चाहता हूँ, बदला नहीं।”
आने वाले महीनों में आरव के जीवन में बहुत परिवर्तन आया।
वह पहले की तरह काम में डूबने लगा, लेकिन अब उसका उद्देश्य अलग था। उसने कर्मचारियों के लिए बने न्यास को मजबूत किया। कंपनी के मुनाफे का एक हिस्सा कर्मचारियों के परिवारों की शिक्षा और चिकित्सा के लिए निर्धारित किया गया।
उसने अपनी माँ सविता सिंघानिया के नाम पर एक संस्था बनाई, जो ऐसे बच्चों की सहायता करती थी, जिन्होंने कम उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था।
संस्था के उद्घाटन के दिन देव ने उससे पूछा, “तुम ठीक हो?”
आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “ठीक होने का अर्थ बदल गया है।”
“कैसे?”
“पहले मुझे लगता था ठीक होने के लिए किसी का साथ होना जरूरी है। अब समझ आया है कि कभी-कभी स्वयं का साथ भी काफी होता है।”
फिर भी कुछ रातें कठिन होती थीं।
कभी वह अनायास दो कप चाय बनवा देता।
कभी घर लौटते समय दूर से किसी स्त्री को देखकर उसे मेहर समझ बैठता।
कभी किसी पुरानी धुन को सुनकर उसे वह शाम याद आ जाती, जब मेहर ने उसके कंधे पर सिर रखकर कहा था कि उसे कुछ नहीं चाहिए।
आरव ने उन यादों से भागना बंद कर दिया।
उसने समझ लिया कि उसका प्रेम झूठा नहीं था।
जिसने धोखा दिया, उसका व्यवहार झूठा था।
लेकिन जिसने सच्चे मन से प्रेम किया, उसकी भावनाएँ अपमानित नहीं हो जातीं।
लगभग एक वर्ष बाद आरव उसी सड़क से गुजर रहा था, जहाँ उसकी कार रिषभ की गाड़ी से टकराई थी।
बारिश हो रही थी।
उसने चालक से गाड़ी रोकने को कहा।
वह उसी छोटे भोजनालय में गया।
वही खिड़की, वही कोने की मेज और बाहर बरसती हुई बूँदें।
आरव वहाँ अकेला बैठ गया।
उसने अपनी जेब से वह पुराना घड़ी का डिब्बा निकाला।
घड़ी अब उसमें नहीं थी।
कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद वह घड़ी उसे वापस मिल गई थी, लेकिन उसने उसे पहनना छोड़ दिया था।
उसने घड़ी को नष्ट भी नहीं किया।
वह उसके लिए धोखे का प्रतीक जरूर थी, लेकिन उसके अपने प्रेम की याद भी थी।
कुछ देर बाद एक छोटा लड़का मेज के पास आया। वह भोजनालय के मालिक का बेटा था।
उसने डिब्बे को देखकर पूछा, “इसमें क्या है?”
आरव मुस्कुराया।
“एक पुरानी कहानी।”
“अच्छी कहानी?”
आरव ने बाहर बारिश की ओर देखते हुए कहा, “शुरुआत बहुत अच्छी थी।”
“और अंत?”
आरव कुछ क्षण सोचता रहा।
फिर बोला, “अंत ने मुझे मजबूत बना दिया।”
लड़का दौड़कर चला गया।
आरव ने डिब्बा बंद किया और उसे अपनी जेब में रख लिया।
उसने समझ लिया था कि कुछ अध्यायों को मिटाया नहीं जाता। उन्हें केवल समाप्त मानकर आगे बढ़ा जाता है।
घर लौटकर उसने वह डिब्बा अपनी माँ की पुरानी अलमारी में रख दिया।
उसके पास ही माँ की टूटी हुई चूड़ियों वाला लकड़ी का डिब्बा था।
आरव ने दोनों को देखा।
एक डिब्बे में उस प्रेम की निशानी थी, जिसने उसे जीवन दिया था।
दूसरे में उस प्रेम की, जिसने उसे तोड़ा था।
लेकिन दोनों ने उसे कुछ सिखाया था।
माँ के प्रेम ने सिखाया कि सच्चा प्रेम मनुष्य को सुरक्षित महसूस कराता है।
मेहर के धोखे ने सिखाया कि प्रेम में स्वयं को पूरी तरह खो देना प्रेम नहीं, आत्मविस्मृति है।
आरव ने अलमारी बंद कर दी।
अगली सुबह वह कंपनी के कर्मचारियों के बीच था। पहली बार उसने अधिकारियों की मेज पर बैठने के बजाय साधारण कर्मचारियों के भोजनालय में उनके साथ भोजन किया।
एक पुराने कर्मचारी ने कहा, “सर, आप बहुत बदल गए हैं।”
आरव मुस्कुराया।
“बदलना बुरा है?”
“नहीं। अब आप पहले से ज्यादा अपने लगते हैं।”
आरव ने उन शब्दों को चुपचाप अपने भीतर रख लिया।
शायद यही उसका वास्तविक पुनर्जन्म था।
कभी वह सोचता था कि मेहर ने उसे चुना है, इसलिए वह महत्वपूर्ण है।
अब वह जानता था कि उसका मूल्य किसी के चुनने या छोड़ने पर निर्भर नहीं करता।
दोस्तों, इस कहानी का अंत किसी नई प्रेमिका के आने से नहीं होता। क्योंकि हर टूटे हुए इंसान की कहानी को पूरा करने के लिए तुरंत नया प्रेम जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी आत्मसम्मान ही सबसे सुंदर नया रिश्ता बन जाता है।
आरव ने मेहर को क्षमा करने का प्रयास किया, लेकिन उसे अपने जीवन में वापस नहीं बुलाया।
उसने रिषभ से बदला नहीं लिया, लेकिन उसे उसके अपराधों से बचाया भी नहीं।
उसने अपनी दौलत को किसी एक व्यक्ति के हाथों में देने के बजाय उन हजारों लोगों के साथ बाँटा, जिन्होंने उसके साथ मिलकर उसे बनाया था।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—उसने दोबारा स्वयं पर भरोसा करना सीखा।
कहानी की अंतिम रात आरव अपने घर की छत पर खड़ा था। नीचे मुंबई की रोशनियाँ चमक रही थीं। समुद्र से ठंडी हवा आ रही थी।
उसने अपनी खाली कलाई की ओर देखा।
जहाँ कभी वह घड़ी बँधी थी, वहाँ अब कुछ नहीं था।
लेकिन पहली बार उसे वह खालीपन बुरा नहीं लगा।
क्योंकि कुछ खाली स्थान हमें किसी नए व्यक्ति के लिए नहीं, स्वयं के लिए चाहिए होते हैं।
आरव ने आसमान की ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा—
“वह मेरे जीवन में मेरी दौलत के लिए आई थी। जाते-जाते वह मेरा भरोसा भी ले जाना चाहती थी। लेकिन उसने अनजाने में मुझे उससे भी कीमती चीज लौटा दी—मेरा आत्मसम्मान।”
समुद्र की लहरें किनारे से टकराती रहीं।
शहर चलता रहा।
और आरव सिंघानिया, जो कभी इस डर में जीता था कि कोई उसे छोड़ न दे, अब इस विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा था कि सही व्यक्ति साथ रहे या न रहे—वह स्वयं को फिर कभी नहीं छोड़ेगा।