भाग 2
रस गिराने वाली बच्ची की घटना भी संयोग नहीं थी।
उस संस्था में काम करने वाली एक महिला को पैसे देकर बच्ची को आरव की ओर भेजा गया था। मेहर को उसी क्षण सामने आना था, ताकि आरव उसे भीड़ से अलग समझे।
फिर मेहर ने धीरे-धीरे आरव की पसंद, आदतों और कमजोरियों के बारे में जानकारी जुटाई। उसने उसके पुराने कर्मचारियों से बात की। समाचारों में दिए उसके साक्षात्कार पढ़े। उसकी माँ के बारे में जाना और यह समझ लिया कि आरव के भीतर सबसे गहरा घाव अकेलेपन का है।
उसने उसी घाव को छुआ।
और आरव ने उसे प्रेम समझ लिया।
विवाह के बाद भी मेहर और रिषभ का संबंध समाप्त नहीं हुआ। वे छिपकर मिलते रहे। रिषभ ने अलग नाम से एक छोटा मकान लिया था, जहाँ मेहर उससे मिलने जाती थी।
आरव को लगता था कि मेहर समाजसेवा की बैठकों में जा रही है।
कई बार जब आरव विदेश यात्रा पर होता, रिषभ उसी घर के पास आ जाता, जिसे आरव ने अपने प्रेम से सजाया था।
फिर भी मेहर सावधान थी। उसने कभी ऐसी गलती नहीं की, जिससे आरव को शक हो।
तीन वर्षों तक सब कुछ योजना के अनुसार चलता रहा।
फिर एक दिन आरव ने ऐसा निर्णय लिया, जिसका रिषभ और मेहर लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।
आरव ने अपने सबसे पुराने मित्र और कानूनी सलाहकार देव मल्होत्रा को कार्यालय में बुलाया।
देव बचपन से आरव को जानता था। वह उन कुछ लोगों में से था, जो उससे बिना डरे सच बोल सकते थे।
आरव ने उसके सामने कुछ कागज रखे।
“मैं कंपनी के चालीस प्रतिशत मतदान अधिकार मेहर के नाम करना चाहता हूँ।”
देव ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“चालीस प्रतिशत?”
“हाँ। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मैं चाहता हूँ कि वह समूह को संभाले।”
देव ने कागज उठाकर ध्यान से पढ़े।
“आरव, क्या मेहर ने तुमसे ऐसा करने को कहा है?”
आरव की आँखों में नाराजगी आ गई।
“नहीं। उसे तो पता भी नहीं।”
“तो फिर इतनी जल्दी क्यों?”
“तीन साल जल्दी नहीं होते, देव।”
देव कुर्सी से पीछे हुआ और गंभीर स्वर में बोला, “प्रेम करो, पूरे दिल से करो। लेकिन किसी को अपना दिल देने और अपने सारे निर्णय देने में फर्क होता है।”
आरव ने कहा, “तुम मेहर को नहीं जानते।”
“मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम जब किसी पर भरोसा करते हो, तो आधा भरोसा नहीं करते।”
“और क्या यह गलत है?”
देव कुछ क्षण उसे देखता रहा।
“गलत नहीं है। खतरनाक जरूर है।”
आरव उठकर खिड़की के पास चला गया।
नीचे शहर बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।
“जब मेरी माँ गई थीं, तो मुझे लगा था कि अब कोई मुझे उस तरह नहीं समझेगा। मेहर ने मुझे फिर से जीना सिखाया है। कंपनी मेरी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन मेहर मेरी जिंदगी है।”
देव ने गहरी साँस ली।
“कम से कम कागजों की स्वतंत्र जाँच करवा लो।”
आरव ने कहा, “तुम तैयार कर दो। मैं उसके जन्मदिन पर हस्ताक्षर करूँगा।”
देव ने मित्र होने के नाते चेतावनी दे दी थी। लेकिन आरव का निर्णय हो चुका था।
जब आरव ने उसी रात मेहर को बताया कि उसके जन्मदिन पर उसके लिए एक बहुत बड़ा उपहार है, तो मेहर ने अनजान बनने का अभिनय किया।
“क्या है?”
“अभी नहीं बताऊँगा।”
“हीरे का कोई हार?”
“उससे बड़ा।”
“नया घर?”
“उससे भी बड़ा।”
मेहर हँसते हुए उसके कंधे पर सिर रखकर बोली, “मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस तुम मेरे साथ रहो।”
आरव ने उसका माथा चूम लिया।
उधर उसी रात मेहर ने रिषभ को संदेश भेजा—
“वह कंपनी के अधिकार मेरे नाम करने वाला है। हमारा इंतजार खत्म होने वाला है।”
रिषभ का उत्तर आया—
“बस एक बार कागजों पर हस्ताक्षर हो जाएँ। फिर वह हमारे रास्ते से हट जाएगा।”
कुछ दिन बाद मुंबई में बहुत तेज बारिश हो रही थी।
आरव एक महत्वपूर्ण बैठक समाप्त करके लौट रहा था। उसकी कार के आगे सुरक्षा वाहन चल रहा था। रास्ते में अचानक एक दूसरी गाड़ी फिसलकर उनके सामने आ गई। चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया।
हल्की टक्कर हुई।
आरव सुरक्षित था, लेकिन दूसरी गाड़ी का चालक घायल हो गया था।
आरव स्वयं कार से उतरकर उसके पास गया।
वह व्यक्ति रिषभ था।
दोनों ने एक-दूसरे को पहले कभी आमने-सामने नहीं देखा था।
रिषभ के हाथ पर हल्की चोट लगी थी। बारिश बढ़ती जा रही थी। वाहन ठीक होने तक दोनों पास के एक छोटे भोजनालय में चले गए।
आरव ने रिषभ के लिए प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करवाई।
रिषभ ने कहा, “आपको देखकर लगता नहीं कि इतने बड़े उद्योगपति सड़क पर किसी अनजान आदमी की मदद के लिए रुकेंगे।”
आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “समाचारों में हर बात सच नहीं होती।”
दोनों के बीच सामान्य बातचीत होने लगी।
रिषभ ने अपना परिचय एक स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार के रूप में दिया। उसने यह नहीं बताया कि वह आरव को पहले से बहुत अच्छी तरह जानता था।
रिषभ भीतर से घबराया हुआ था। उसे डर था कि कहीं मेहर का कोई संदेश न आ जाए। उसने अपना दूरभाष यंत्र मेज पर उलटा रख दिया।
बात करते समय उसने अपनी भीगी बाँह ऊपर की।
उसी क्षण आरव की दृष्टि उसकी कलाई पर पड़ी।
गहरे नीले रंग की पट्टी।
चाँदी के किनारे।
वही बारीक नक्काशी।
आरव की आँखें ठहर गईं।
उसने अपनी कलाई की ओर देखा, फिर रिषभ की घड़ी की ओर।
दोनों घड़ियाँ एक जैसी थीं।
उसके भीतर अचानक एक अजीब-सी बेचैनी उठी, लेकिन उसने अपने चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं आने दिया।
“आपकी घड़ी काफी अलग है,” आरव ने सहजता से कहा।
रिषभ ने मुस्कुराकर घड़ी उतारी। “मुझे भी बहुत प्रिय है।”
उसने घड़ी मेज पर रख दी।
आरव ने पीछे की ओर देखा।
वहाँ वही पंक्ति लिखी थी—
“जिंदगी हमें कहीं भी ले जाए, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास लौटेगा।”
कुछ क्षणों के लिए आरव को लगा कि शायद उसने शब्द गलत पढ़े हैं।
उसकी साँस भारी हो गई।
फिर भी उसने स्वयं को संभाला।
“यह कहाँ से मिली?”
रिषभ ने उत्तर दिया, “एक बहुत खास व्यक्ति ने दी है।”
“पत्नी ने?”
रिषभ हल्के से हँसा। “अभी पत्नी नहीं। लेकिन वह स्त्री मुझे महाविद्यालय के दिनों से प्रेम करती है।”
आरव की उँगलियाँ अनायास अपनी घड़ी पर कस गईं।
“ऐसी दूसरी घड़ी भी है?”
रिषभ ने कहा, “नहीं। उसने कहा था कि यह केवल मेरे लिए बनवाई गई है।”
उसी समय रिषभ का दूरभाष यंत्र चमका।
उसने जल्दी से उसे उठाया, लेकिन आरव की नजर संदेश पर पड़ चुकी थी।
भेजने वाले का नाम केवल एक अक्षर से सुरक्षित किया गया था—“म”।
संदेश में लिखा था—
“तुम सुरक्षित पहुँच गए? मुझे चिंता हो रही थी।”
आरव के मन में उसी समय मेहर का भेजा हुआ संदेश घूम गया। कुछ मिनट पहले उसने भी यही लिखा था—
“तुम सुरक्षित पहुँच गए? मुझे चिंता हो रही थी।”
शब्द वही थे।
विराम तक वही।
आरव ने खिड़की के बाहर होती बारिश की ओर देखा।
उसके भीतर पहली बार प्रेम और संदेह आमने-सामने खड़े थे।
उसने स्वयं से कहा—यह केवल संयोग है।
एक जैसी घड़ी भी बन सकती है।
एक जैसे शब्द भी लिखे जा सकते हैं।
नाम का पहला अक्षर “म” होने से कोई व्यक्ति मेहर नहीं हो जाता।
आरव अपने प्रेम को बचाने के लिए कारण खोज रहा था।
वाहन ठीक होने के बाद दोनों बाहर आए। रिषभ ने हाथ मिलाते हुए कहा, “आज की मुलाकात याद रहेगी।”
आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मुझे भी।”
घर पहुँचते ही मेहर दौड़कर उसके पास आई।
“तुम ठीक हो? मैंने सुना रास्ते में दुर्घटना हुई थी।”
उसने आरव का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा।
आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।
उस चेहरे को, जिस पर उसने कभी संदेह नहीं किया था।
“मैं ठीक हूँ,” उसने कहा।
“तुम्हें चोट तो नहीं लगी?”
“नहीं।”
मेहर ने उसे गले लगा लिया।
आरव ने भी अपनी बाँहें उसके चारों ओर रख दीं, लेकिन आज पहली बार उसे उस आलिंगन में शांति नहीं मिली।
रात को मेहर उसके पास सो गई।
आरव जागता रहा।
कमरे की हल्की रोशनी में उसने अपनी कलाई की घड़ी को देखा।
वही वादा।
वही पंक्ति।
वही प्रेम, जो शायद केवल उसका नहीं था।
सुबह उसने मेहर से अचानक पूछा, “क्या तुमने मुझसे पहले कभी किसी से प्रेम किया था?”
मेहर के हाथ एक क्षण के लिए रुक गए।
फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “यह सवाल अचानक क्यों?”
“बस ऐसे ही।”
मेहर उसके पास आई और उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “नहीं। तुम पहले व्यक्ति हो, जिससे मैंने सच में प्रेम किया।”
आरव के भीतर कुछ टूटकर गिरा।
अगर वह सच कह देती, तो शायद वह उसे समझने की कोशिश करता।
लेकिन उसने उसकी आँखों में देखकर झूठ कहा था।
उस दिन आरव कार्यालय पहुँचा, लेकिन किसी काम पर ध्यान नहीं लगा सका। उसने देव को बुलाया।
देव कमरे में आया तो आरव खिड़की के सामने खड़ा था।
“कंपनी के अधिकारों का हस्तांतरण रोक दो,” आरव ने बिना मुड़े कहा।
देव कुछ क्षण चुप रहा।
“क्या हुआ?”
आरव ने धीरे से अपनी घड़ी उतारी और मेज पर रख दी।
“मुझे नहीं पता। लेकिन अब मुझे सच जानना है।”
दोस्तों, कई बार धोखे का पहला प्रमाण कोई बड़ी तस्वीर या खुला हुआ संदेश नहीं होता। कभी-कभी वह बस एक छोटी-सी वस्तु होती है, जो अचानक हमारे पूरे अतीत पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।
आरव के लिए वह वस्तु एक घड़ी थी।
और अब कहानी उस मोड़ पर पहुँच चुकी थी, जहाँ प्रेम को सच साबित होना था—या पूरी तरह बिखर जाना था।
कंपनी के अधिकारों का हस्तांतरण रोकने के बाद आरव ने स्वयं को काम में व्यस्त दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसका मन लगातार उसी घड़ी पर अटका हुआ था।
वह जितना उस घटना को भूलना चाहता, उतना ही हर छोटी बात उसे रिषभ की ओर ले जाती।
मेहर का देर रात तक संदेश लिखना।
अचानक बाहर जाने के लिए नए कारण बनाना।
कुछ दूरभाष वार्ताएँ, जिन्हें वह आरव के कमरे में आते ही बंद कर देती थी।
पहले आरव ने कभी इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था। वह इसे मेहर की स्वतंत्रता समझता था। उसे गर्व था कि वह अपनी पत्नी पर निगरानी नहीं रखता।
अब वही विश्वास उसे अपनी सबसे बड़ी भूल जैसा लगने लगा था।
लेकिन आरव अभी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहता था।
उसके भीतर दो आवाजें थीं।
एक कहती—मेहर झूठ बोल रही है।
दूसरी कहती—तुम उस स्त्री पर शक कर रहे हो, जिसने तुम्हारे सबसे कमजोर क्षणों में तुम्हारा साथ दिया।
आरव ने तय किया कि वह बिना प्रमाण मेहर से कोई प्रश्न नहीं करेगा।
उसने देव से कहा, “मैं किसी निजी जासूस को उसके पीछे नहीं लगाना चाहता।”
देव ने उत्तर दिया, “फिर सच कैसे पता चलेगा?”
आरव ने धीमे स्वर में कहा, “मैं चाहता हूँ कि मैं गलत साबित हो जाऊँ।”
देव ने अपने मित्र की ओर देखा। उसे पहली बार समझ आया कि आरव सच खोजने से ज्यादा अपने प्रेम को बचाने की कोशिश कर रहा था।
आरव ने मेहर को बताया कि कानूनी प्रक्रिया में कुछ कठिनाइयों के कारण कंपनी के कागजों पर हस्ताक्षर कुछ समय के लिए टालने पड़ेंगे।
मेहर ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में घबराहट उभर आई।
“कितने समय के लिए?”
“पता नहीं। शायद कुछ सप्ताह।”
“पर तुमने तो कहा था सब तैयार है।”
आरव ने उसकी प्रतिक्रिया ध्यान से देखी।
“तुम इतनी चिंतित क्यों हो?”
मेहर तुरंत उसके पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं अपने लिए चिंतित नहीं हूँ। मुझे लगा तुमने बहुत सोचकर फैसला लिया होगा। अगर अचानक कुछ रुक गया है, तो शायद कोई परेशानी होगी।”
“हो सकती है।”
“क्या देव ने कुछ कहा है?”
“तुम्हें क्यों लगता है कि देव ने कहा होगा?”
मेहर चुप हो गई।