भाग 2
उसी समय उसके बॉस दीपक खुराना का फोन आया।
“समीर, साइट देख ली?”
“जी सर, देख रहा हूं।”
“रिपोर्ट जल्दी चाहिए। क्लाइंट बहुत बड़ा है। बस लिख देना कि जमीन खाली है और निर्माण के लिए उपयुक्त है। बाकी कानूनी टीम संभाल लेगी।”
समीर ने धीमे से कहा,
“सर, जमीन खाली नहीं है। वहां दुकानें हैं, पुराना शिक्षा भवन है, लोग उपयोग करते हैं।”
फोन के दूसरी तरफ कुछ पल चुप्पी रही। फिर खुराना की आवाज थोड़ी सख्त हुई।
“समीर, भावुक मत बनो। हर छोटे कस्बे में लोग दो बेंच रखकर जमीन अपनी समझ लेते हैं। हमें टेक्निकल रिपोर्ट देनी है, सामाजिक उपन्यास नहीं लिखना।”
समीर चुप हो गया।
खुराना ने कहा,
“आज दोपहर जगत प्रसाद जी से मिल लेना। वही लोकल कोऑर्डिनेटर हैं। वे कागज दिखा देंगे।”
फोन कट गया।
समीर के मन में बेचैनी बढ़ गई। उसने तय किया कि पहले काव्या से बात करेगा। वह कॉपी सेंटर पहुंचा तो दुकान खुल चुकी थी। काव्या मशीन साफ कर रही थी।
“इतनी सुबह?” उसने पूछा।
समीर ने कहा,
“मुझे कुछ कागज देखने हैं। आपने कहा था कि इस जमीन की कहानी पुरानी है।”
काव्या ने उसे ध्यान से देखा।
“अब आपको कहानी में रुचि क्यों आ गई?”
समीर ने सच कहा,
“क्योंकि मेरी फाइल में लिखा है कि जमीन खाली है। और मेरी आंखों ने कुछ और देखा है।”
काव्या ने कुछ पल उसे परखा, फिर दुकान का शटर आधा गिरा दिया। उसने काउंटर के नीचे से एक नीली फाइल निकाली। फाइल पुरानी थी, किनारे घिस चुके थे। ऊपर लिखा था—
“जनता पाठशाला न्यास — दस्तावेज।”
“यह मेरे पिता की फाइल है,” काव्या ने कहा। “उन्होंने कई बार आवेदन दिया था कि भवन को फिर से बच्चों के लिए खोल दिया जाए। पर हर बार कागज गायब हो जाते थे, या जवाब आता था कि मामला विचाराधीन है।”
समीर ने फाइल खोली। उसमें पुराने नक्शे, ग्राम सभा की प्रतियां, दान पत्र, और कई आवेदन थे। एक कागज पर लिखा था कि बस अड्डे के पीछे की जमीन शिक्षा और सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखी गई थी। निजी गोदाम या व्यावसायिक निर्माण के लिए नहीं।
समीर हैरान रह गया।
“यह कागज आपने पहले किसी अफसर को दिखाए?”
“कई बार,” काव्या बोली, “पर अफसर बदलते रहे। जगत सेठ के आदमी हमेशा पहले पहुंच जाते थे। फिर फाइल कहीं रखी रह जाती थी।”
“जगत सेठ को इससे क्या फायदा?”
काव्या ने कड़वाहट छिपाते हुए कहा,
“वेयरहाउस बनेगा तो आसपास की जमीनें महंगी होंगी। उसकी मंडी, उसकी एजेंसी, उसके ट्रक—सबका फायदा। और हमारे जैसे लोग? हमें कहा जाएगा कि विकास के लिए हटना पड़ेगा।”
समीर के पास तुरंत कोई जवाब नहीं था।
उस दिन दोपहर को वह जगत प्रसाद से मिलने गया। कस्बे में लोग उसे जगत सेठ कहते थे। उम्र पचपन के आसपास, सफेद कुर्ता, सोने की अंगूठियां, और चेहरे पर ऐसी मुस्कान जो दोस्ती कम, हिसाब ज्यादा लगती थी।
जगत सेठ ने समीर का स्वागत बड़े सम्मान से किया। ठंडा शरबत, फल, और एयर कूलर के सामने कुर्सी।
“अरे इंजीनियर साहब, आप तो हमारे मेहमान हैं। बरुआ बाजार को शहर बनाना है। आपकी रिपोर्ट आएगी तो काम आगे बढ़ेगा।”
समीर ने पूछा,
“लेकिन जमीन पर दुकानें और पुराना शिक्षा भवन है।”
जगत सेठ हंसा।
“वो सब भावनात्मक बातें हैं। पुराना भवन कब का बंद पड़ा है। और वो छोटी दुकानें? उन्हें हम दूसरी जगह दिलवा देंगे। विकास में थोड़ा बहुत तो चलता है।”
“जनता पाठशाला न्यास के कागज हैं,” समीर ने सीधे कहा।
जगत सेठ की मुस्कान एक पल को रुकी।
“किसने दिखाए? काव्या ने?”
समीर ने जवाब नहीं दिया।
जगत सेठ थोड़ा आगे झुका।
“देखिए, वह लड़की अच्छी है, पर अपने पिता के पुराने सपनों में अटकी है। सपनों से कस्बे नहीं चलते। पैसे से चलते हैं। आप शहर से आए हैं, समझदार आदमी हैं। रिपोर्ट में ज्यादा उलझिए मत।”
उसने मेज की दराज खोली और एक लिफाफा बाहर रखा।
“यह आपके आने-जाने और सुविधा के लिए है।”
समीर ने लिफाफे की तरफ देखा, फिर जगत सेठ की तरफ।
“मेरी कंपनी मुझे वेतन देती है।”
जगत सेठ ने मुस्कान वापस लाने की कोशिश की।
“अरे, इसे रिश्वत मत समझिए। सम्मान समझिए।”
समीर खड़ा हो गया।
“सम्मान कागज के लिफाफे में नहीं मिलता।”
वह वहां से निकल आया। लेकिन बाहर आते ही उसे समझ आ गया कि अब मामला आसान नहीं रहेगा।
अगले दो दिन में कस्बे का माहौल बदलने लगा। बस अड्डे के आसपास अफवाह फैल गई कि जल्द ही दुकानें हटेंगी। कुछ लोगों ने डरकर दुकानें खाली करने की बात शुरू कर दी। कुछ ने कहा कि कंपनी आएगी तो रोजगार मिलेगा। कुछ बोले, “बड़े लोगों से लड़कर क्या मिलेगा?”
काव्या रोज लोगों को समझाती,
“हम विकास के खिलाफ नहीं हैं। पर बच्चों की जगह छीनकर गोदाम बनाना विकास नहीं है।”
लोग सुनते, पर डरते भी थे।
तीसरे दिन शाम को काव्या की दुकान पर पत्थर फेंका गया। शीशा टूट गया। अंदर बैठे दो बच्चे डरकर रोने लगे। काव्या ने बच्चों को संभाला, लेकिन उसका चेहरा पहली बार कमजोर दिखाई दिया।
समीर उस वक्त वहीं था। उसने बाहर दौड़कर देखा, पर फेंकने वाला भाग चुका था।
“आप पुलिस में शिकायत कीजिए,” उसने कहा।
काव्या ने टूटा कांच उठाते हुए कहा,
“शिकायत कर दूंगी। लेकिन कांच से ज्यादा डर लोगों की आवाज में है। कल से बच्चे शायद यहां न आएं।”
समीर ने कहा,
“मैं मदद करूंगा।”
काव्या ने थके स्वर में पूछा,
“क्यों? क्योंकि आपको मुझ पर दया आ रही है?”
“नहीं,” समीर ने साफ कहा, “क्योंकि मेरी रिपोर्ट से अगर झूठ को ताकत मिली, तो मैं खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा।”
काव्या ने पहली बार उसे थोड़ा अलग नजर से देखा। शायद उसे लगा कि यह आदमी सिर्फ शहर का इंजीनियर नहीं है। इसमें अभी भी सही और गलत समझने की हिम्मत बची है।
उसी रात समीर ने फाइलों की जांच शुरू की। उसने राजस्व रिकॉर्ड की ऑनलाइन कॉपी निकाली, पुराने नक्शों की तुलना की, और पाया कि कंपनी को दिखाई गई जमीन और असली सार्वजनिक जमीन की सीमा में फर्क था। कुछ दस्तावेजों में जानबूझकर पुराना शिक्षा भवन “परित्यक्त ढांचा” लिखा गया था, जबकि ग्राम सभा के रिकॉर्ड में वह “शिक्षा उपयोग हेतु आरक्षित भवन” था।
समीर ने काव्या को फोन किया।
“तुम्हारे पिता सही थे। कागजों में बदलाव हुआ है।”
काव्या की आवाज कांप गई।
“मतलब?”
“मतलब जमीन को खाली और अनुपयोगी दिखाने की कोशिश हुई है।”
“क्या इसे रोका जा सकता है?”
समीर ने गहरी सांस ली।
“रोका जा सकता है, लेकिन आसान नहीं होगा। हमें सबूत जमा करने होंगे। पुराने रिकॉर्ड, लोगों के बयान, बच्चों की पढ़ाई के प्रमाण, और जल्दी से जल्दी एक आपत्ति पत्र।”
काव्या ने कहा,
“मैं तैयार हूं।”
अगले दिन से दोनों ने काम शुरू कर दिया। काव्या दुकान चलाती, बीच-बीच में लोगों से हस्ताक्षर करवाती। समीर नक्शे ठीक करता, आवेदन की भाषा लिखता, और कानूनी बिंदु जोड़ता। शाम को बच्चे पढ़ने आते तो काव्या उन्हें डरने नहीं देती।
एक दिन एक बूढ़े आदमी रामअवतार काका आए। उन्होंने काव्या को एक पुराना पीला लिफाफा दिया।
“बिटिया, तेरे बाबूजी ने यह मेरे पास रखवाया था। बोले थे, समय आए तो काम आएगा। मुझे लगा अब समय आ गया।”
काव्या ने लिफाफा खोला। अंदर पुरानी तस्वीरें थीं। एक तस्वीर में जनता पाठशाला के उद्घाटन का दृश्य था। बच्चों की भीड़ थी, बीच में काव्या के पिता बाबूलाल मास्टर खड़े थे। उनके पास एक युवा इंजीनियर भी था, जिसने भवन का नक्शा बनाया था।
समीर ने तस्वीर हाथ में ली और अचानक उसकी आंखें ठहर गईं।
“यह…” वह रुक गया।
काव्या ने पूछा,
“क्या हुआ?”
समीर ने तस्वीर में उस युवा इंजीनियर पर उंगली रखी।
“यह मेरे पिता हैं।”
काव्या चौंक गई।
“आपके पिता?”
समीर की आवाज भारी हो गई।
“हां। विजय वर्मा। वे छोटे सार्वजनिक प्रोजेक्ट्स पर काम करते थे। मुझे याद है, वे एक कस्बे की पाठशाला का जिक्र करते थे। कहते थे कि कुछ इमारतें ईंट-पत्थर से नहीं, लोगों की उम्मीद से बनती हैं। मुझे नहीं पता था कि वही जगह यह है।”
काव्या चुप रह गई। कमरे में जैसे समय ठहर गया।
समीर के पिता कई साल पहले एक सड़क हादसे में चले गए थे। उनके जाने के बाद समीर ने खुद को काम में इतना डुबो दिया कि पिता की बातों को याद करने का समय ही नहीं निकाला। आज एक पुरानी तस्वीर ने उसे अचानक उसके अपने अतीत के सामने खड़ा कर दिया था।
काव्या ने धीमे से कहा,
“तो हमारे पिता एक-दूसरे को जानते थे।”
समीर ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
“शायद सिर्फ जानते नहीं थे, एक ही सपना देखते थे।”
उस पल से यह लड़ाई समीर के लिए सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं रही। यह उसके पिता की अधूरी बात भी बन गई।
लेकिन दूसरी तरफ दबाव बढ़ता जा रहा था। कंपनी से रोज फोन आने लगा। खुराना ने साफ कहा,
“समीर, तुम रिपोर्ट क्यों रोक रहे हो? क्लाइंट नाराज है।”
समीर ने कहा,
“सर, जमीन विवादित है। तकनीकी रूप से रिपोर्ट में यह लिखना पड़ेगा।”
खुराना भड़क गया।
“तुम्हें नौकरी करनी है या समाज सेवा?”
समीर ने शांत स्वर में कहा,
“झूठी रिपोर्ट देना मेरी नौकरी का हिस्सा नहीं है।”
फोन कट गया।
उधर जगत सेठ ने भी चाल चली। उसने काव्या की मां सरोज पर दबाव डालना शुरू किया। एक दलाल घर पहुंचा और बोला,
“दुकान छोड़ दो। सेठ जी मुआवजा दे देंगे। लड़की जवान है। लड़ाई में नाम खराब होगा। चुपचाप कहीं और दुकान खोल लो।”
सरोज डर गई। रात को उसने काव्या से कहा,
“बेटी, हम छोटे लोग हैं। तेरे पिता होते तो बात और थी। मुझे डर लगता है।”
काव्या ने मां का हाथ पकड़ा।
“मां, डर मुझे भी लगता है। लेकिन अगर हम चुप हो गए तो पापा की पाठशाला हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।”
सरोज की आंखों में आंसू आ गए।
“तू अकेली कितनी लड़ेगी?”
काव्या ने जवाब दिया,
“अब शायद अकेली नहीं हूं।”
उसका इशारा समीर की तरफ था, मगर उसने नाम नहीं लिया।
कुछ दिनों बाद तहसील में सुनवाई तय हुई। काव्या, समीर, रामअवतार काका, कुछ दुकानदार और शाम की पाठशाला के बच्चों के अभिभावक वहां पहुंचे। दूसरी तरफ जगत सेठ अपने वकील और कंपनी के प्रतिनिधि के साथ आया।
सुनवाई शुरू हुई। जगत सेठ के वकील ने कहा,
“यह जमीन वर्षों से खाली पड़ी है। कुछ अस्थायी कब्जे हैं। विकास कार्य में बाधा डालने की कोशिश हो रही है।”
काव्या खड़ी हुई। उसके हाथ में फाइल थी, लेकिन आवाज में हल्का कंपन था। उसने अपने पिता की तरह बोलने की कोशिश की।
“साहब, यह जमीन खाली नहीं है। यहां बच्चों ने पढ़ना सीखा है। यहां बुजुर्गों ने अखबार पढ़ना सीखा है। यहां कई लड़कियों ने पहली बार फार्म भरना सीखा है। अगर किसी कागज में यह खाली लिखा है, तो कागज अधूरा है।”
कमरे में कुछ लोग चुप हो गए।
फिर समीर ने नक्शे रखे। उसने बताया कि जमीन की सीमा गलत दिखाई गई है, भवन का उपयोग दर्ज है, और रिपोर्ट में कई तथ्य छिपाए गए हैं। उसने अपने पिता की पुरानी तस्वीर भी प्रमाण के तौर पर लगाई, जिससे यह साबित हुआ कि भवन सार्वजनिक शिक्षा योजना के तहत बना था।
अधिकारी ने फाइल देखी।
“मामला गंभीर है। अंतिम आदेश तक निर्माण या जमीन हस्तांतरण पर रोक लगाई जाती है।”
काव्या की आंखों में पहली बार राहत चमकी। बच्चे बाहर खड़े थे। जैसे ही खबर मिली, उन्होंने तालियां बजा दीं। लेकिन समीर जानता था कि यह जीत अभी पूरी नहीं है। यह सिर्फ पहली दीवार थी, असली लड़ाई अभी बाकी थी।
सुनवाई के बाद बाहर आते ही जगत सेठ ने समीर को रोक लिया।
“इंजीनियर साहब,” उसने धीमे स्वर में कहा, “आपने अपने लिए मुश्किल बना ली।”
समीर ने उसकी आंखों में देखा।
“मुश्किल तो आपने उन बच्चों के लिए बनाई थी, जिनकी जगह पर गोदाम बनाना चाहते थे।”
जगत सेठ ने हंसकर कहा,
“देखते हैं किसकी रिपोर्ट भारी पड़ती है।”
समीर ने जवाब दिया,
“इस बार रिपोर्ट सिर्फ कागज पर नहीं, लोगों के साथ लिखी जाएगी।”
काव्या थोड़ी दूर खड़ी यह सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखों में भरोसा था।
उस दिन शाम को जब दोनों कॉपी सेंटर लौटे, तो टूटे शीशे की जगह अस्थायी प्लास्टिक लगा था। बच्चे फिर पढ़ने आए थे। छोटी बच्ची, जिसने कविता प्रिंट करवाई थी, खड़ी हुई और बोली,
“दीदी, आज कविता सुनाऊं?”
काव्या मुस्कुराई।
“हां, सुनाओ।”
बच्ची ने पढ़ना शुरू किया—
“जो दीप बुझे नहीं आंधी से,
वो घर-घर रोशनी करता है।”
समीर ने काव्या की तरफ देखा। काव्या ने बच्चों की तरफ।
और उस शाम दोनों ने महसूस किया कि लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं है।
लड़ाई उस रोशनी की है, जिसे कुछ लोग बेकार समझकर बुझा देना चाहते हैं।
तहसील की रोक के बाद बरुआ बाजार में हलचल मच गई। कुछ लोग खुश थे, कुछ हैरान, और कुछ डर गए थे। जो लोग कल तक कह रहे थे कि बड़े लोगों से लड़ना बेकार है, अब धीरे-धीरे काव्या की दुकान पर आने लगे।
“बिटिया, हमारे भी हस्ताक्षर जोड़ लो।”
“हमने भी उस पाठशाला में पढ़ा था।”
“मेरे पिता वहां चौकीदार थे।”
“मेरी बेटी शाम को तुम्हारे यहां पढ़ने आती है, मैं भी बयान दूंगा।”
काव्या को लगा जैसे जिन आवाजों को वह अकेले जगाने की कोशिश कर रही थी, वे धीरे-धीरे खुद उठने लगी हैं।
लेकिन हर लड़ाई की कीमत होती है।
एक सप्ताह बाद समीर को कंपनी की तरफ से आधिकारिक मेल मिला। उसमें लिखा था कि उसकी रिपोर्ट में देरी और क्लाइंट के साथ असहयोग के कारण उसे प्रोजेक्ट से हटाया जा रहा है। साथ ही उसे लखनऊ ऑफिस लौटकर स्पष्टीकरण देना था।