भाग 2
सब चौंक गए।
मीरा ने नौकर से कहा, “आरव के लिए भी नाश्ता लगाओ।”
वसुंधरा ने भौंहें चढ़ाईं। “आज सूरज पश्चिम से निकला है क्या?”
मीरा ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा, “वह इस घर का दामाद है।”
आरव ने मीरा की तरफ देखा। उसके चेहरे पर कोई विजय नहीं थी। बस एक थकी हुई कोमलता थी। जैसे वह जानता हो कि मीरा के भीतर कुछ बदल रहा है, लेकिन वह उस बदलाव को अपने नाम से बांधना नहीं चाहता।
करण ने यह सब देखा और उसके भीतर आग लग गई। उसने उसी दिन अपने आदमी को फिर बुलाया। “उसके बैंक, उसके पुराने मोहल्ले, उसके दोस्तों, सबकी जांच करो। और अगर कुछ न मिले तो उसे मजबूर करो कि वह खुद बोले।”
करण का तरीका साफ था—कमजोर आदमी को दबाओ, और ताकतवर आदमी को बदनाम करो। पर आरव इनमें से कौन था, यह वह समझ नहीं पा रहा था।
उधर शहर में एक बड़ी खबर फैल रही थी। “विरासत इंफ्रा” नाम की कंपनी, जो पिछले कई सालों से गुमनाम निवेशकों के दम पर बढ़ रही थी, अब चौहान ग्रुप के साथ एक बड़ा समझौता करने वाली थी। यह समझौता चौहान परिवार को आर्थिक संकट से बचा सकता था। शेखर की बीमारी और करण की गलत डीलों ने कंपनी की जड़ें हिला दी थीं। अगर यह समझौता न होता तो चौहान ग्रुप का नाम बाजार से मिट सकता था।
वसुंधरा और करण ने इसे अपनी जीत बताया। करण हर किसी से कहता, “देखना, यह डील मैं साइन कराऊंगा। फिर पूरा बोर्ड मेरे सामने झुकेगा।”
मीरा ने चुपचाप फाइलें देखीं। उसे पता चला कि विरासत इंफ्रा का असली मालिक कोई नहीं जानता। उसके प्रतिनिधि एक रहस्यमय महिला थीं—कावेरी देसाई। वह जिन कंपनियों में निवेश करती थीं, वे अचानक खड़ी हो जाती थीं। लोग कहते थे कि उनके पीछे कोई बड़ा नाम है, कोई ऐसा आदमी जो सामने नहीं आता।
मीरा ने एक शाम आरव से पूछा, “तुमने विरासत इंफ्रा का नाम सुना है?”
आरव ने किताब बंद की। “हाँ।”
“कौन है उसका मालिक?”
“कभी-कभी मालिक नाम से नहीं, फैसलों से पहचाना जाता है।”
मीरा झुंझला गई। “तुम हर बात पहेली में क्यों कहते हो?”
आरव ने शांत स्वर में कहा, “क्योंकि सीधे जवाब कभी-कभी लोगों की जिंदगी बदल देते हैं। और हर कोई बदलाव के लिए तैयार नहीं होता।”
मीरा उसकी तरफ देखती रह गई। उसे पहली बार लगा कि वह आरव को नहीं जानती। उसने सिर्फ उसका अपमान देखा था, उसकी चुप्पी देखी थी, उसकी गरीबी देखी थी। मगर शायद वह सब पर्दा था।
कुछ दिनों बाद चौहान विला में एक धार्मिक समारोह रखा गया। शहर के बड़े लोग बुलाए गए। करण ने खास तौर पर विराज, नील और समर को भी बुलाया, ताकि आरव को फिर नीचा दिखाया जा सके। क्लब वाली घटना के बाद उनकी अकड़ टूट गई थी, मगर करण ने उन्हें भरोसा दिया कि आरव का सच कुछ नहीं है।
समारोह के बीच एक बुजुर्ग महिला आईं। सफेद साड़ी, माथे पर हल्का सा चंदन, और आंखों में गहरी उदासी। उन्हें देखते ही आरव के हाथ रुक गए। वह तुरंत आगे बढ़ा और उनके पैर छुए।
वसुंधरा ने ताना मारा, “अब नई रिश्तेदारी भी शुरू हो गई?”
बुजुर्ग महिला ने आरव के सिर पर हाथ रखा। “बेटा, तू इतना बदल गया, पर आंखें वही हैं। तेरी मां की आंखें।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मीरा ने पूछा, “आप कौन हैं?”
महिला ने कहा, “मेरा नाम सरला है। मैं उस अनाथालय की देखभाल करती थी जहां आरव बच्चा था।”
करण की आंखों में चमक आई। यही तो वह चाहता था—आरव का अतीत सामने आए, लेकिन अपने हिसाब से। उसने तुरंत कहा, “अच्छा, तो बताइए माताजी, यह सच में अनाथ था न? या कोई और कहानी है?”
सरला ने करण को देखा। “अनाथ वह बच्चा नहीं होता जिसके मां-बाप मर जाते हैं। अनाथ वह होता है जिसे अपना सच छुपाना पड़े।”
आरव ने धीरे से कहा, “मांजी, अभी नहीं।”
सरला की आंखें भर आईं। “कब तक नहीं, बेटा? तेरे पिता की मौत को पच्चीस साल हो गए। तेरी मां की चिता की राख भी ठंडी हो गई। मगर उनके हत्यारे आज भी सांस ले रहे हैं।”
मीरा का दिल जोर से धड़कने लगा। वसुंधरा के चेहरे पर डर की लकीर उभरी। शेखर के कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था; वह सब सुन रहे थे।
आरव ने सरला को अंदर ले जाकर बिठाया। बाद में मीरा ने सरला से अकेले में मिलने की कोशिश की। उसने हाथ जोड़कर कहा, “मुझे सच जानना है। मैं आरव की पत्नी हूं।”
सरला ने पूछा, “पत्नी? क्या तुमने उसे कभी पति माना?”
मीरा के पास जवाब नहीं था। उसकी आंखें झुक गईं।
सरला ने धीरे-धीरे कहानी शुरू की। “बहुत साल पहले इस शहर में रायसिंह परिवार का नाम सबसे बड़ा था। उनके पास दौलत थी, लेकिन उससे भी ज्यादा सम्मान था। आरव का असली नाम आरव रायसिंह है। उसके पिता आदित्य रायसिंह थे, और मां ईशा। उन्होंने मजदूरों के लिए, अनाथ बच्चों के लिए, और किसानों के लिए बहुत काम किया। लेकिन उनके साझेदारों को उनकी ईमानदारी पसंद नहीं थी। एक रात उनकी कार घाटी में गिरा दी गई। सबने कहा दुर्घटना थी, पर वह हत्या थी।”
मीरा के हाथ ठंडे पड़ गए। “तो आरव बच गया?”
“हाँ। उसकी मां ने मरने से पहले उसे धक्का देकर कार से बाहर फेंक दिया था। एक चरवाहे ने उसे पाया और अनाथालय पहुंचाया। हम जानते थे कि अगर उसका असली नाम सामने आया तो वह भी मारा जाएगा। इसलिए हमने उसे आरव वर्मा बना दिया।”
“और मेरे पापा?”
सरला ने गहरी सांस ली। “शेखर चौहान आदित्य रायसिंह के दोस्त थे। उन्होंने मरते समय ईशा का लिखा हुआ पत्र पाया। उसमें लिखा था कि अगर आरव बचे तो उसे बचा लेना। शेखर ने उसे छुपाकर बड़ा किया। लेकिन जब आरव बड़ा हुआ, उसने अपने पिता की संपत्ति वापस लेने की जगह अपने पिता के सपनों को आगे बढ़ाने का फैसला किया। विरासत इंफ्रा उसी की कंपनी है।”
मीरा कुर्सी पकड़कर बैठ गई। उसे लगा जैसे उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई हो।
“तो वह गरीब नहीं है?”
सरला ने कड़वी मुस्कान से कहा, “गरीब? बेटी, जिन लोगों को तुम अमीर समझती हो, उनमें से आधे उसकी एक फाइल पर निर्भर हैं। लेकिन उसने कभी अपने नाम का ढोल नहीं पीटा, क्योंकि वह बदला नहीं, सच चाहता था।”
मीरा की आंखों से आंसू गिरने लगे। उसे अपने हर शब्द याद आने लगे—ड्राइवर, नौकर, बोझ, गलती। उसने उस आदमी को तोड़ने की कोशिश की थी जो पहले ही अपने मां-बाप की राख लेकर जी रहा था।
उसी रात मीरा ने आरव को छत पर पाया। वह शहर की रोशनी देख रहा था। मीरा उसके पास गई और बहुत देर तक कुछ नहीं बोली। फिर उसने कहा, “मुझे माफ कर दो।”
आरव ने उसकी तरफ देखा। “किस बात के लिए?”
“हर बात के लिए। तुम्हें छोटा समझने के लिए। तुम्हें छिपाने के लिए। तुम्हारा साथ न देने के लिए।”
आरव ने लंबी सांस ली। “मीरा, माफी से अतीत मिटता नहीं। लेकिन शायद भविष्य बदल सकता है।”
मीरा ने रोते हुए कहा, “क्या मैं तुम्हारे भविष्य में जगह पा सकती हूं?”
आरव ने जवाब नहीं दिया। उसके चेहरे पर दर्द था। “मुझे नहीं पता।”
यह शब्द मीरा के लिए किसी थप्पड़ से कम नहीं थे, लेकिन वह जानती थी कि यह थप्पड़ उसने खुद कमाया है।
अगले दिन विरासत इंफ्रा की डील के लिए बोर्ड मीटिंग थी। करण ने पूरी तैयारी कर रखी थी। उसने कुछ नकली दस्तावेज बनवाए थे जिनसे साबित होता कि शेखर ने कंपनी के शेयर उसके नाम कर दिए हैं। वह चाहता था कि डील के बाद चौहान ग्रुप उसके नियंत्रण में आ जाए।
मीटिंग हॉल में सभी बैठे थे। वसुंधरा, मीरा, करण, बोर्ड के सदस्य, और विरासत इंफ्रा की प्रतिनिधि कावेरी देसाई। आरव भी चुपचाप पीछे खड़ा था। करण ने उसे देखकर कहा, “तुम यहां क्या कर रहे हो? चाय सर्व करने आए हो?”
कई लोग हंस पड़े। पर कावेरी ने आरव को देखकर तुरंत खड़े होकर सिर झुका दिया। “सर।”
हॉल में जैसे हवा थम गई।
करण की हंसी रुक गई। “सर? किसे कह रही हैं आप?”
कावेरी ने कहा, “जिन्होंने विरासत इंफ्रा बनाई। श्री आरव रायसिंह।”
मीरा ने आंखें बंद कर लीं। सच अब सबके सामने था।
वसुंधरा कुर्सी से उठ गई। “यह मजाक है। यह आदमी तो…”
आरव ने पहली बार मेज के पास आकर कहा, “हाँ, वही आदमी जिसे आपने इस घर में नौकर से भी कम समझा।”
करण ने गुस्से में कहा, “यह डील मेरे बिना नहीं होगी। चौहान ग्रुप का नियंत्रण मेरे पास है।”
कावेरी ने फाइल खोली। “आपके दस्तावेज नकली हैं। असली शेयर अभी भी शेखर चौहान और उनकी बेटी मीरा के नाम हैं। और जो कर्ज आपने कंपनी पर चढ़ाया, उसके सबूत हमारे पास हैं।”
करण का चेहरा सफेद हो गया।
मीरा ने धीमे से कहा, “करण भैया, आपने पापा की बीमारी का फायदा उठाया?”
करण चिल्लाया, “हाँ! क्योंकि यह कंपनी मेरी भी थी। शेखर ने हमेशा तुम्हें चुना, तुम्हारी मां को चुना, और मुझे सिर्फ बाहरी आदमी समझा। मैं अपना हिस्सा ले रहा था।”
तभी दरवाजा खुला और शेखर व्हीलचेयर पर अंदर आए। उनके साथ डॉक्टर और दो वकील थे। शेखर की आवाज कमजोर थी, पर शब्द मजबूत थे। “हिस्सा हक से मिलता है, धोखे से नहीं।”
करण बौखला गया। “आप सब मिलकर मुझे फंसा रहे हैं।”
आरव ने कहा, “तुम्हें किसी ने नहीं फंसाया। तुम खुद अपने लालच में फंस गए।”
मीटिंग खत्म होने से पहले ही करण के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। उसी शाम करण गायब हो गया। और रात को मीरा के फोन पर एक संदेश आया—”अगर आरव को बचाना चाहती हो तो अकेली पुराने कारखाने में आओ।”
मीरा का खून जम गया। उसने आरव को बताने की सोची, लेकिन संदेश के नीचे एक फोटो थी—शेखर के कमरे की। इसका मतलब था कि घर पर भी नजर रखी जा रही है।
मीरा अकेली कार लेकर निकल पड़ी। रास्ते भर उसके मन में डर था, लेकिन उससे ज्यादा पछतावा। जिस आदमी ने बार-बार उसकी रक्षा की, आज वह उसके लिए पहली बार कुछ करने जा रही थी।
पुराने कारखाने में अंधेरा था। अंदर करण खड़ा था, उसके साथ राघव भाटी के लोग भी थे। मीरा ने हैरानी से पूछा, “तुम राघव से मिले हुए हो?”
करण हंसा। “मैं नहीं, तुम्हारे प्यारे आरव का अतीत उससे जुड़ा है। राघव वही आदमी है जिसने आदित्य रायसिंह की दुर्घटना को दुर्घटना बनाया था। बस तब वह छोटा गुंडा था, अब बड़ा हो गया है।”
मीरा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
करण ने कहा, “आरव को बुलाओ। आज या तो वह अपनी सारी संपत्ति मेरे नाम करेगा, या तुम्हारी लाश उसके हाथ में जाएगी।”
मीरा ने कांपते हाथों से फोन उठाया। मगर कॉल लगने से पहले ही बाहर गाड़ियों की आवाज आई। दरवाजा टूटा और आरव अंदर आया।
उसके चेहरे पर वह शांति नहीं थी जो हमेशा रहती थी। आज उसकी आंखों में तूफान था।
“करण,” उसने कहा, “तुमने गलती की। मुझे चोट पहुंचाते तो शायद माफ कर देता। मीरा को हाथ लगाया, अब नहीं।”
करण हंसा। “हीरो मत बनो। यहां राघव के आदमी हैं।”
अंधेरे से राघव भाटी निकला। पर इस बार उसकी आंखों में डर नहीं, पछतावा था। उसने बंदूक नीचे रख दी और आरव के सामने घुटनों पर बैठ गया।
“मुझे माफ कर दो, साहब। मैं तुम्हारे पिता की मौत में शामिल था। पर असली आदेश किसी और ने दिया था।”
आरव की सांस भारी हो गई। “किसने?”
राघव ने धीरे से कहा, “देवव्रत चौहान।”
आरव के चेहरे पर जैसे बिजली गिर गई। वही देवव्रत, जो पार्टी में उसके आगे झुका था। वही आदमी जिसने सम्मान दिखाकर सच छुपाया था।
मीरा ने उस पल आरव को देखा तो उसे समझ आया कि सच का बोझ दौलत से कहीं भारी होता है। वह चाहती थी कि आरव टूटकर रो दे, चीखे, बदला ले, पर आरव सिर्फ खड़ा रहा। उसकी चुप्पी में तूफान था। यही चुप्पी करण को सबसे ज्यादा डरा रही थी। उसे लगा था कि वह आरव की कमजोरी मीरा को बना देगा, लेकिन अब उसे समझ आ गया कि मीरा कमजोरी नहीं, आरव की अधूरी ताकत बन चुकी है।
कारखाने के बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। हर बूंद जैसे पुराने पापों की धूल धो रही थी। राघव ने सिर झुकाकर कहा, “मैं अदालत में सच बोलूंगा। चाहे मेरी जान चली जाए।” आरव ने उसे देखा और कहा, “सच बोलने से जान नहीं जाती, राघव। झूठ में जीते-जी आदमी मर जाता है।”
कारखाने की टूटी छत से चांदनी भीतर गिर रही थी। हवा में धूल थी, लोहे की गंध थी और उन शब्दों की चोट थी जो अभी-अभी राघव ने कहे थे—देवव्रत चौहान। आरव ने अपना पूरा जीवन यह सोचकर बिताया था कि उसके पिता के दुश्मन किसी अंधेरे कोने में छुपे अपराधी होंगे। मगर अब सच सामने था कि दुश्मन उसी दुनिया का था जहां मुस्कानें सोने की और दिल पत्थर के होते हैं।
मीरा ने आरव के चेहरे को देखा। उसे लगा वह आदमी, जो हर अपमान सहकर भी नहीं टूटा था, आज भीतर से हिल गया है। वह आगे बढ़ी, पर आरव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। वह खुद को संभालना चाहता था।
“राघव,” आरव ने धीमे स्वर में कहा, “अगर तुम झूठ बोल रहे हो तो आज तुम्हें कोई नहीं बचाएगा।”