Crime Story

जिस पत्नी को दुनिया ने बेवफा कहा, उसी के लिए आईपीएस बनकर लौटा पति

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रुद्रपुर के गरीब युवक कबीर का सपना अफसर बनने का था, और उसकी पत्नी राधिका ने अपने गहने बेचकर उसे दिल्ली भेज दिया। लेकिन कबीर की गैरमौजूदगी में उसका सबसे भरोसेमंद दोस्त विक्रम ही राधिका की जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया। समाज ने राधिका को बेवफा समझ लिया, पुलिस ने कबीर की फरियाद ठुकरा दी, और कबीर टूटकर भी हार नहीं माना। तीन साल बाद जब वह आईपीएस बनकर लौटा, तो एक ऐसा सच सामने आया जिसने दोस्ती, प्यार और न्याय की पूरी परिभाषा बदल दी।

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आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 28 मिनट

भाग 2

यह सुनते ही राधिका के हाथ से स्वेटर और लालटेन छूट कर गिर गए। कबीर के एक्सीडेंट की बात सुनते ही उसका दिमाग सुन्न हो गया। उसने न कोई सवाल किया, न कुछ सोचा। वह बस रोती हुई विक्रम के साथ उसकी जीप की तरफ भागी। बारिश बहुत तेज़ थी। जीप जैसे ही गाँव की सीमा पार करके घने जंगलों वाले रास्ते पर पहुँची, राधिका को कुछ अजीब लगा। उसने रोते हुए पूछा, “विक्रम भाई, यह रास्ता तो शहर नहीं जाता, तुम गाड़ी कहाँ ले जा रहे हो?” विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया, उसने बस एक घिनौनी मुस्कान बिखेरी। इससे पहले कि राधिका कुछ समझ पाती, जीप के पीछे बैठे विक्रम के दो गुर्गों ने अचानक राधिका के मुँह पर क्लोरोफॉर्म से भीगा हुआ कपड़ा दबा दिया। राधिका ने छटपटाने की कोशिश की, कबीर का नाम पुकारा, लेकिन कुछ ही सेकंड में उसकी आँखों के सामने गहरा अँधेरा छा गया।

जब राधिका को होश आया, तो वह किसी अस्पताल में नहीं थी। चारों तरफ सड़ी हुई सीलन की बदबू थी। वह एक पुरानी, आधी ढही हुई हवेली के बेसमेंट में एक लोहे के खंभे से बंधी हुई थी। खिड़की के नाम पर सिर्फ एक छोटी सी झरी थी, जहाँ से दिन का उजाला भी बमुश्किल अंदर आता था। तभी भारी जूतों की आवाज़ गूंजी और लोहे का भारी दरवाज़ा खुला। सामने विक्रम हाथ में शराब की बोतल लिए खड़ा था। राधिका ने चीखते हुए कहा, “विक्रम! यह क्या नीचता है? मेरा कबीर कहाँ है? मुझे उसके पास जाने दो!”

विक्रम ज़ोर से हँसा, उसकी हँसी में एक पागलपन था। उसने राधिका के चेहरे को बेरहमी से पकड़कर कहा, “कबीर को कुछ नहीं हुआ राधिका! वह दिल्ली में मजे में है। लेकिन अब तुम कभी उसके पास नहीं जा पाओगी। मैंने कबीर से बदला ले लिया है। वह अफसर तो बन जाएगा, लेकिन अपनी सबसे कीमती चीज़—यानी तुम्हें—कभी नहीं ढूंढ पाएगा। अब यही तुम्हारी दुनिया है, और मैं तुम्हारा भगवान।” राधिका ने उसके मुँह पर थूक दिया और कहा, “मेरा कबीर तुम्हें छोड़ना नहीं, धरती चीर कर भी वह मुझे ढूंढ निकालेगा।” विक्रम ने गुस्से में उसे एक जोरदार थप्पड़ मारा और वहाँ से चला गया।

अगले दिन दिल्ली में कबीर का इंटरव्यू था, लेकिन उसका मन बहुत बेचैन था। उसने राधिका को फोन करने की कोशिश की, लेकिन गाँव का हर फोन बंद आ रहा था। उसने सोचा कि शायद पहाड़ी मौसम के कारण नेटवर्क ठप होगा। इंटरव्यू खत्म होने के बाद उसने फिर कोशिश की, लेकिन कोई संपर्क नहीं हो पाया। दो दिन, तीन दिन बीत गए, कबीर की बेचैनी अब एक गहरे डर में बदल चुकी थी। उसने गाँव के एक पड़ोसी को फोन मिलाया। पड़ोसी ने झिझकते हुए कहा, “कबीर भाई… राधिका तो तीन दिन से गाँव में नहीं है। वह विक्रम के साथ कहीं गई थी और तब से दोनों का कुछ पता नहीं है। गाँव में बातें हो रही हैं कि…” पड़ोसी की बात पूरी होने से पहले ही कबीर के हाथ से फोन छूट गया।

कबीर बिना एक पल गंवाए पहली बस पकड़कर रुद्रपुर पहुँचा। जब वह अपनी कोठरी में दाखिल हुआ, तो वहाँ सिर्फ सन्नाटा और बिखरा हुआ सामान था। चूल्हा ठंडा पड़ा था, और ज़मीन पर वह आधा बुना हुआ स्वेटर पड़ा था जिसे राधिका उसके लिए बना रही थी। कबीर पागलों की तरह गाँव की गलियों में भागा। तभी सामने से विक्रम आता हुआ दिखा। विक्रम के चेहरे पर एक झूठी चिंता और मायूसी थी। उसने कबीर को गले लगाते हुए कहा, “कबीर भाई! मैं बर्बाद हो गया। मैं राधिका भाभी को नहीं बचा पाया। तीन दिन पहले वह किसी शहर के आदमी के साथ जीप में बैठकर कहीं चली गई। मैंने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी। पूरे गाँव में बदनामी हो रही है भाई।”

कबीर ने विक्रम के कॉलर को पकड़ लिया और चिल्लाया, “झूठ! सफेद झूठ! मेरी राधिका ऐसा कभी नहीं कर सकती। वह मेरे लिए अपने गहने बेच सकती है, अपनी जान दे सकती है, लेकिन मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती।” कबीर सीधे थाने पहुँचा। वहाँ के भ्रष्ट और सुस्त थानेदार ने कबीर की बात सुनने से साफ़ मना कर दिया। थानेदार ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, “ओए लड़के! रोज़ का काम है हमारा। पहाड़ की लड़कियाँ शहर के चकाचौंध में किसी के भी साथ भाग जाती हैं। तुम्हारे पास कोई सबूत है तो लाओ, नहीं तो यहाँ आकर हमारा वक्त मत बर्बाद करो।” कबीर गिड़गिड़ाया, रोया, पैर पकड़े, लेकिन उस गरीब और बेबस कबीर की सुनने वाला कोई नहीं था। उस दिन कबीर को समझ आया कि इस देश में न्याय भी सिर्फ अमीरों की जागीर है।

दिन हफ़्तों में और हफ़्तों महीनों में बदलने लगे। कबीर पागलों की तरह हर बस स्टैंड, हर अस्पताल, हर रेलवे स्टेशन पर राधिका की तस्वीर लेकर भटकता रहा। गाँव वालों ने भी धीरे-धीरे कबीर से बात करना बंद कर दिया, सब मान चुके थे कि राधिका भाग गई है। विक्रम हर वक्त कबीर के साथ रहने का नाटक करता, उसे दिलासा देता, जबकि पीठ पीछे वह राधिका के पास जाकर उस पर ज़ुल्म ढाता था। कबीर पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन एक रात, जब वह राधिका की तस्वीर के सामने बैठा था, उसकी आँखों के आँसू सूख कर अंगारे बन गए। उसने आसमान की तरफ देखकर कहा, “अगर यह सिस्टम मेरी राधिका को नहीं ढूंढ सकता, तो मैं खुद इस सिस्टम का सबसे बड़ा हिस्सा बनूँगा। मैं लौटूँगा राधिका, इस खाकी वर्दी में लौटूँगा, और जो भी इस साज़िश के पीछे है, उसे पाताल से भी खोद निकालूँगा।” कबीर ने अपनी बिखरी हुई किताबों को समेटा और एक नए, खौफनाक संकल्प के साथ फिर से पढ़ाई में जुट गया।

भाग 3: प्रतिशोध और न्याय की सुबहवक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा। एक साल, दो साल और फिर देखते-देखते तीन साल का लंबा समय बीत गया। इन तीन सालों में रुद्रपुर गाँव में बहुत कुछ बदल गया था, लेकिन कबीर की कोठरी का वह अँधेरा और कबीर के दिल की आग वैसी ही थी। कबीर अब वह पुराना, सीधा-साधा लड़का नहीं रह गया था। उसकी आँखों में एक कठोरता आ चुकी थी और चेहरे की मासूमियत की जगह एक फौलादी दृढ़ता ने ले ली थी। इन तीन सालों में उसने दिन-रात को एक कर दिया था। आखिरकार, यूपीएससी (UPSC) का अंतिम परिणाम आया और कबीर ने पूरे देश में शीर्ष रैंक हासिल की। वह भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के लिए चुना गया था।

पूरे रुद्रपुर गाँव में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। जो लोग कभी कबीर को ताने मारते थे, वे अब उसके घर के बाहर गुलदस्ते लेकर खड़े थे। कबीर गाँव आया, लेकिन उसके चेहरे पर कामयाबी की कोई खुशी नहीं थी। उसने अपनी झोपड़ी में कदम रखा और सीधे राधिका की तस्वीर के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी आँखें बंद कीं और धीरे से कहा, “राधिका, मैं अफसर बन गया हूँ। तुम्हारी माँ के गहनों की कीमत आज मैंने चुका दी है। लेकिन तुम कहाँ हो? मेरा यह ताज तुम्हारे बिना अधूरा है।” कबीर की आँखों से एक आँसू टपक कर राधिका की तस्वीर पर गिर गया।

उधर, उस घने जंगल के बीच स्थित पुरानी हवेली के तहखाने में राधिका के लिए ये तीन साल किसी नरक से बदतर रहे थे। विक्रम और उसके आदमियों ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से इस कदर तोड़ा था कि उसका शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा रह गया था। उसके लंबे और खूबसूरत बाल अब बिखरे और उलझे हुए थे, चेहरा पीला पड़ चुका था और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे बन गए थे। विक्रम रोज़ वहाँ आता, उसे कभी खाना देता तो कभी भूखा छोड़ देता, और हर बार कहता, “अब तो मान जा राधिका, कबीर अब बड़ा अफसर बन गया है, वह दिल्ली की मेमों के साथ ऐश कर रहा होगा। वह तुझे भूल चुका है।” लेकिन राधिका के भीतर की लौ अभी भी जल रही थी। वह अपनी कमज़ोर आवाज़ में हर बार यही कहती, “मेरा कबीर मुझे कभी नहीं भूलेगा। वह आएगा… वह यमराज के मुँह से भी मुझे छीन लाएगा।”

एक शाम, विक्रम बेहद नशे में धुत होकर उस तहखाने में आया। कबीर के आईपीएस बनने की खबर ने उसके दिमाग का संतुलन बिगाड़ दिया था। वह राधिका के सामने आकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने और चिल्लाने लगा, “वह बन गया! कबीर साला आईपीएस बन गया! लेकिन क्या फायदा? वह आज भी अपनी पत्नी के लिए तड़प रहा है। राधिका, तूने मुझे ठुकराकर उस भिखारी को चुना था ना? देख, आज तीन साल हो गए, वह लाल बत्ती की गाड़ी में घूमता है पर तुझे इस कालकोठरी से नहीं निकाल पाया।” विक्रम नशे में अंधा होकर बड़बड़ाता रहा और गुस्से में उसने हवेली के पुराने चौकीदार को लात मार दी। वह यह भूल गया कि उस हवेली के बाहर, घने जंगलों में एक बूढ़ा गड़रिया अपनी भेड़ों को ढूंढते हुए बारिश से बचने के लिए हवेली के टूटे हुए बरामदे में छुपा बैठा था। उस बूढ़े गड़रिये ने विक्रम की चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें और ‘कबीर’ और ‘राधिका’ का नाम साफ-साफ सुन लिया था। वह बूढ़ा रुद्रपुर का ही रहने वाला था और कबीर की कहानी से अच्छी तरह वाकिफ था।

अगली सुबह, वह बूढ़ा गड़रिया थरथर कांपता हुआ सीधे कबीर की कोठरी पर पहुँचा। कबीर उस वक्त अपनी वर्दी की टोपी हाथ में लिए घर से निकलने वाला था। बूढ़े ने कबीर के पैर पकड़ लिए और रोते हुए कहा, “कबीर बेटा… कबीर बेटा, अनर्थ हो गया है। तेरी राधिका मरी नहीं है, वह ज़िंदा है!” यह सुनते ही कबीर के हाथ से पुलिस की टोपी छूटकर ज़मीन पर गिर गई। उसने बूढ़े को उठाकर अपने सीने से लगाया और पूछा, “काका! आप क्या कह रहे हैं? मेरी राधिका कहाँ है? सच-सच बताइए!” बूढ़े ने कांपते हुए उस घने जंगल की पुरानी हवेली और रात को विक्रम के मुँह से सुनी सारी बातें कबीर को बता दीं।

कबीर के दिमाग में जैसे कोई बम फूटा हो। तीन साल का सारा सस्पेंस, सारी कड़ियाँ एक पल में जुड़ गईं। वह समझ गया कि जिस विक्रम को वह अपना भाई मानता था, वही इस पूरी तबाही का मास्टरमाइंड था। कबीर का खून खौल उठा, उसकी आँखें लाल हो गईं। उसने तुरंत अपने सीनियर अधिकारियों को फोन किया और भारी पुलिस बल मंगवाया। कबीर खुद अपनी सरकारी गाड़ी में बैठा और पुलिस की कई गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई उस घने जंगल की तरफ दौड़ पड़ीं।

जब पुलिस बल उस पुरानी हवेली के पास पहुँचा, तो कबीर ने गाड़ियाँ दूर ही रुकवा दीं ताकि विक्रम को भनक न लगे। कबीर अपनी पिस्तौल हाथ में लेकर पुलिसकर्मियों के साथ दबे पाँव हवेली के अंदर दाखिल हुआ। हवेली के तहखाने का भारी लोहे का दरवाज़ा बंद था। कबीर ने अपनी पूरी ताकत से उस दरवाज़े पर लात मारी। एक ज़ोरदार धमाके के साथ दरवाज़ा टूट कर गिर गया। अंदर का मंज़र देखकर कबीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

कोने में लोहे की सांकलों से बंधी, एक कमज़ोर, बीमार और टूटी हुई महिला पड़ी थी। कबीर ने चिल्लाया, “राधिका!” राधिका ने बहुत मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। धुंधली रोशनी में उसने खाकी वर्दी पहने, कंधों पर सितारे चमकाए खड़े कबीर को देखा। राधिका की सूखी आँखों से आँसूओं का सैलाब बह निकला। उसने कांपते होठों से कहा, “कबीर… मुझे पता था… मुझे पता था तुम आओगे।” कबीर दौड़कर उसके पास पहुँचा और उसकी सांकलें तोड़ दीं। उसने राधिका को अपनी बाहों में भर लिया। तीन साल का दर्द, तड़प और इंतज़ार उस एक आलिंगन में पिघल गए। राधिका कबीर की छाती से लगकर रोते-रोते बेहोश हो गई। कबीर ने उसे अपनी गोदी में उठाया और चिल्लाकर अपने मातहतों से कहा, “एम्बुलेंस बुलाओ! तुरंत!”

राधिका को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर लेकिन खतरे से बाहर बताई। होश में आने के बाद राधिका ने मजिस्ट्रेट और कबीर के सामने अपना बयान दर्ज कराया। उसने विक्रम की उस काली रात की साज़िश, धोखे और तीन साल के ज़ुल्म की पूरी दास्तान सुनाई। कबीर चुपचाप सुनता रहा, उसकी मुट्ठियाँ इस कदर कसी हुई थीं कि उसके नाखूनों से खून आने लगा था। लेकिन उसने कानून की शपथ ली थी, वह कोई गैर-कानूनी कदम नहीं उठाना चाहता था। वह विक्रम को ऐसी सज़ा देना चाहता था जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें।

उधर विक्रम को खबर मिल चुकी थी कि पुलिस ने हवेली पर छापा मार दिया है। वह अपनी जीप में पैसे भरकर नेपाल सीमा की तरफ भागने की कोशिश कर रहा था। लेकिन कबीर ने पूरे ज़िले की नाकेबंदी कर दी थी। हाईवे पर कबीर की सरकारी गाड़ी ने विक्रम की जीप को आगे से घेर लिया। विक्रम ने भागने की कोशिश की, लेकिन कबीर ने गाड़ी से उतरकर सीधे उसकी जीप के टायर पर गोली मार दी। जीप पलटते-पलटते बची।

विक्रम गाड़ी से बाहर निकला, उसका चेहरा खौफ से पीला पड़ चुका था। सामने कबीर आईपीएस की वर्दी में, आँखों में साक्षात यमराज का रूप लिए खड़ा था। विक्रम ने घुटनों के बल बैठकर हाथ जोड़ लिए और कहा, “कबीर भाई… मुझे माफ कर दे। मैं भटक गया था। हमारी बचपन की दोस्ती की खातिर मुझे छोड़ दे।” कबीर आगे बढ़ा, उसने विक्रम को कॉलर से उठाकर एक ऐसा जोरदार थप्पड़ मारा कि विक्रम के मुँह से खून निकल आया। कबीर ने कड़कती आवाज़ में कहा, “दोस्ती? तूने सिर्फ मुझसे दुश्मनी नहीं की विक्रम, तूने उस पवित्र रिश्ते का कत्ल किया है। और याद रख, यह कबीर नहीं, इस देश का कानून बोल रहा है। तूने एक औरत की अस्मत और उसकी आज़ादी को ठेस पहुँचाई है, इसकी सज़ा तुझे इसी जनम में और इसी धरती पर भुगतनी होगी।”

मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चला। कबीर ने खुद सारे सबूत, गवाह और फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की। विक्रम और उसके गुर्गों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना था। अदालत ने पूरे मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मानते हुए विक्रम और उसके साथियों को उम्रकैद की सख्त सज़ा सुनाई। जब जज का हथौड़ा टेबल पर पड़ा, तो विक्रम फूट-फूट कर रोने लगा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

इस घटना के दो साल बाद, रुद्रपुर गाँव में एक नई सुबह हुई। कबीर का ट्रांसफर उसी ज़िले के पुलिस कप्तान (SP) के रूप में हो चुका था। एक शाम, कबीर और राधिका अपनी पुरानी कोठरी के बाहर खड़े होकर ढलते हुए सूरज को देख रहे थे। राधिका अब काफी स्वस्थ हो चुकी थी और उसके चेहरे पर वही पुरानी सौम्य मुस्कान लौट आई थी। राधिका ने कबीर की वर्दी पर हाथ रखकर पूछा, “अब तो आपका सपना पूरा हो गया ना कबीर? अब तो आप खुश हैं?”

कबीर ने राधिका का हाथ अपने हाथ में लिया और दूर पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “नहीं राधिका, सपना उस दिन पूरा होगा जब इस देश के किसी गरीब को इंसाफ पाने के लिए, अपनी बात साबित करने के लिए तीन साल का नरक नहीं झेलना पड़ेगा। जब कोई विक्रम किसी राधिका की आज़ादी को छीनने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। मेरा सफर तो अब शुरू हुआ है।” राधिका ने मुस्कुराकर अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। हवाएं चल रही थीं, देवदार के पेड़ झूम रहे थे, और रुद्रपुर की वादियों में यह संदेश गूंज रहा था कि सच्चे रिश्ते और सच्चा प्यार कभी साज़िशों से टूटते नहीं, वे वक्त की आग में तपकर और भी निखर जाते हैं।

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