भाग 2
रागिनी रागिनी ने घबराकर कहा, झूठ है। सब झूठ है। डॉक्टर सेन रो पड़े। मैंने बच्चे को मारने की हिम्मत नहीं की। इसलिए उसे मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ आया। सोचा कोई भला इंसान उसे अपना लेगा। निखिल की आंखें भर आई। उसे हरिराम याद आए। वही भला इंसान वही गरीब आदमी जिसने किसी और के बच्चे को अपनी जान से बढ़कर पाला। विक्रम सिंह टूटकर कुर्सी पर बैठ गए। मैंने अपनी बहन को खो दिया और उसके बच्चे को भी।
रागिनी अब भी खुद को बचाने की कोशिश कर रही थी। मैंने जो किया इस घर के लिए यह किया। अगर वह बच्चा आ जाता तो संपत्ति का बंटवारा होता। अवनी का भविष्य खतरे में पड़ता। अवनी ने दर्द से कहा, मेरे भविष्य के नाम पर आपने किसी बच्चे की पूरी जिंदगी छींची। रागिनी चुप हो गई। तभी नीचे से शोर सुनाई दिया। आर्यमान मल्होत्रा अपने पिता के साथ हवेली में पहुंच चुका था। सगाई की तैयारी टूटने वाली थी।
लेकिन असली तूफान अभी बाकी था। आर्यमान ने कमरे में आते ही निखिल को देखा। उसने हंसते हुए कहा तो यही है वह गरीब मैकेनिक जिसके लिए अवनी मुझे ठुकरा रही है। निखिल ने शांत होकर कहा मैं किसी को पाने नहीं आया था। मैं तो सिर्फ बारिश में मदद करने आया था। आर्यमान ने ताली बजाई। वाह! गरीब आदमी की ईमानदारी वाली कहानी। अवनीय आगे बढ़ी। बस कीजिए आर्यमान।
आर्यमान का चेहरा बदल गया। तुम्हें लगता है मैं तुमसे प्यार करता हूं। मुझे तो सिर्फ चौहान ग्रुप चाहिए। तुम बस रास्ता हो। विक्रम सिंह ने पहली बार आर्यमान का असली चेहरा देखा तो यह तुम्हारा सच है। आर्यमान मुस्कुराया। सच यह है कि आपके बिजनेस पर गर्ज है। मेरी कंपनी के बिना आप डूब जाएंगे और अवनी से मेरी शादी नहीं हुई तो कल सुबह तक आपकी सारी डील्स खत्म। विक्रम सिंह चुप रह गए।
निखिल ने समझ लिया कि अवनी किस मजबूरी में थी। उसने धीरे से कहा तो आप लोग इंसानों से नहीं। सौदों से रिश्ते बनाते हैं। आर्यमान ने गुस्से से निखिल का कॉलर पकड़ लिया। तू ज्यादा बोलेगा। निखिल ने उसका हाथ हटाया। हाथ मत लगाइए। आर्यमान ने थप्पड़ उठाया। लेकिन अवनी बीच में आ गई। अगर इन्हें हाथ लगाया तो मैं अभी पुलिस बुलाऊंगी। आर्यमान ने हंसकर कहा, तुम कुछ नहीं कर पाओगी।
तभी निखिल का फोन बजा कॉल उसके पड़ोसी का था। निखिल ने फोन उठाया। दूसरी तरफ से आवाज आई। निखिल बेटा जल्दी आजा। हरेराम काका की तबीयत बहुत बिगड़ गई है। निखिल के हाथ कांप गए। उसने किसी की तरफ नहीं देखा। बस दरवाजे की तरफ भागा। अवनी ने उसे पुकारा। निखिल वह रुका। अवनी ने कहा, “मैं भी चलूंगी।” रागिनी ने ताना मारा। चौहान परिवार की बेटी उस झोपड़ी में जाएगी।
अवनी ने पहली बार दृढ़ आवाज में कहा था क्योंकि वहां इंसानियत रहती है। निखिल ने कुछ नहीं कहा। दोनों बारिश में बाहर निकल गए। हवेली पीछे छूट गई। रात, बारिश और सच तीनों अब उनके साथ थे। जब वे निखिल के छोटे से घर पहुंचे तो हरिराम बिस्तर पर लेटे थे। उनकी सांसे भारी थी। निखिल उनके पैरों के पास बैठ गया। बाबा हरिराम ने आंखें खोली। आगे आ बेटा। निखिल रो पड़ा। बाबा आपने मुझे मंदिर से उठाया था। हरे राम की आंखों में एक पुरानी पीड़ा तैर गई। उन्होंने कांपते हाथ से निखिल का चेहरा छुआ। हां बेटा। लेकिन उस दिन मैंने बच्चा नहीं उठाया था। मैंने अपनी जिंदगी उठा ली थी। निखिल फूट कर रो पड़ा। आप ही मेरे पिता हैं। हरे राम मुस्कुराए। खून से रिश्ता शुरू होता है बेटा। लेकिन पालन से रिश्ता अमर होता है। अवनी दरवाजे पर खड़ी यह सब सुन रही थी। उसके मन में निखिल के लिए सम्मान और गहरा हो गया।
हरिराम ने अवनी की तरफ देखा। बिटिया मेरा बेटा गरीब है। लेकिन इसका दिल बहुत अमीर है। इसे कभी अपने घर की दीवारों में कैद मत करना। अवनीय की आंखें भर आई। मैं वादा करती हूं। तभी निखिल ने अवनीय की तरफ देखा। आपने हवेली में मेरा नाम क्यों लिया था? अवनी कुछ पल चुप रही। फिर बोली क्योंकि मुझे एक झूठ से बचने के लिए एक सच की जरूरत थी और उस रात तुम सबसे सच्चे इंसान लगे।
निखिल ने कहा लेकिन मैं तुम्हारी जिंदगी का हिस्सा कैसे बन सकता हूं। अवनी ने धीमी आवाज में कहा, शायद जिंदगी ने हमें हिस्सा बनने के लिए नहीं। एक दूसरे को सच तक पहुंचाने के लिए मिलाया है। बाहर बारिश धीरे-धीरे थमने लगी थी। लेकिन निखिल की जिंदगी में उठे सवाल अभी थमे नहीं थे। सुबह होते-होते पूरा शहर जान चुका था कि चौहान हवेली में सगाई टूट गई है और एक गरीब मैकेनिक को चौहान परिवार का खोया हुआ वारिस बताया जा रहा है।
अब हर नजर निखिल पर थी। हर रिश्ता बदलने वाला था और हर दुश्मन जागने वाला था। सुबह का सूरज निकला तो देवगढ़ शहर में सिर्फ एक ही चर्चा थी। चौहान परिवार का खोया हुआ वारिस मिल गया था। अखबारों में खबर छपी। टीवी चैनलों पर बहस होने लगी। सोशल मीडिया पर लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। लेकिन जिस इंसान की जिंदगी सबसे ज्यादा बदल गई थी, वह खुद सबसे ज्यादा परेशान था। निखिल कल तक वह एक साधारण मैकेनिक था। आज अचानक लोग उसे करोड़ों की संपत्ति का उत्तराधिकारी बता रहे थे, लेकिन उसे इनमें से किसी बात की खुशी नहीं थी। उसके मन में सिर्फ एक चिंता थी। हरे राम। जिस बूढ़े आदमी ने उसे पाला था, जिसने कभी उसे यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उसका सगा बेटा नहीं है। निखिल पूरे दिन उनके पास बैठा रहा।
दोपहर को हरिराम ने उसे पास बुलाया। बेटा एक बात पूछूं। जी बाबा अगर तुझे कल यह सब पता चल जाता और मैं जिंदा नहीं होता तो क्या तू मुझे भूल जाता? निखिल की आंखें भर आई। उसने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया। ऐसी बात मत कीजिए। हरेराम मुस्कुराए। जवाब दे। निखिल ने रोते हुए कहा, “ज आदमी ने मुझे चलना सिखाया, मैं उसे कैसे भूल सकता हूं?” हरिराम की आंखों में संतोष उतर आया। उन्होंने धीरे से कहा, बस यही सुनना था।
उसी समय बाहर कुछ गाड़ियों के रुकने की आवाज आई। विक्रम सिंह आए थे। साथ में उनके वकील और कुछ लोग भी थे। निखिल बाहर निकला। विक्रम सिंह कुछ पल उसे देखते रहे। फिर बोले, क्या मैं अंदर आ सकता हूं? निखिल ने सिर हिला दिया। विक्रम सिंह हरिराम के पास पहुंचे। कुछ क्षण तक दोनों चुप रहे। फिर विक्रम सिंह अचानक उनके पैरों में झुक गए। कमरे में मौजूद सभी लोग हैरान रह गए। मुझे माफ कर दीजिए।
हरिराम घबरा गए। अरे साहब यह क्या कर रहे हैं? विक्रम सिंह की आंखों में आंसू थे। जिस बच्चे को मैं नहीं बचा पाया उसे आपने आदमी बना दिया। हरिराम कुछ नहीं बोले क्योंकि कई बार सम्मान शब्दों से नहीं खामोशी से स्वीकार किया जाता है। कुछ देर बाद वकील ने एक फाइल निकाली। सर दस्तावेज तैयार हैं। निखिल समझ गया। यह संपत्ति के कागज होंगे।
विक्रम सिंह ने फाइल उसकी तरफ बढ़ाई। यह सब तुम्हारा है। निखिल ने फाइल खोली। कई पन्ने थे। कंपनियां, जमीनें, शेयर, होटल, फैक्ट्रियां, अरबों की संपत्ति। उसने फाइल बंद कर दी। मुझे नहीं चाहिए। कमरे में सन्नाटा छा गया। वकील चौंक गया। विक्रम सिंह भी, क्या मतलब? मतलब मुझे यह सब नहीं चाहिए। लेकिन यह तुम्हारा अधिकार है। निखिल ने शांत स्वर में कहा, अधिकार और लालच में फर्क होता है। विक्रम सिंह उसे देखते रह गए। निखिल आगे बोला, “मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन भूखा नहीं हूं। मैंने जिंदगी में मेहनत करके खाना सीखा है तो तुम कुछ नहीं लोगे।” लूला क्या?
निखिल ने कहा, अपनी मां की यादें। कमरे में फिर खामोशी छा गई। विक्रम सिंह की आंखें भर आई। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि उनके सामने खड़ा लड़का सिर्फ खून से नहीं चरित्र से भी उनकी बहन का बेटा है। उधर रागिनी चौहान की मुश्किलें बढ़ती जा रही थी। डॉक्टर सेन का बयान पुलिस तक पहुंच चुका था। पुराने रिकॉर्ड फिर से खोले गए। कई गवाह सामने आने लगे। जिस सच को 25 साल तक दबाया गया था, वह अब बाहर आ चुका था।
रागिनी लगातार खुद को बचाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन हर झूठ के सामने एक नया सबूत खड़ा हो जाता। कुछ दिनों बाद पुलिस उसे पूछताछ के लिए ले गई। जाते समय उसने अवनी को देखा। मैंने यह सब तुम्हारे लिए नहीं किया था। अवनी की आंखों में दर्द था। नहीं आपने यह सब अपने लिए किया था। रागिनी के पास कोई जवाब नहीं बचा। वह चली गई और पहली बार चौहान हवेली का माहौल हल्का महसूस हुआ।
लेकिन असली खतरा अभी खत्म नहीं हुआ था। आर्यमान मल्होत्रा हार मानने वालों में से नहीं था। सगाई टूटने के बाद उसका गुस्सा और बढ़ गया था। उसने चौहान ग्रुप के खिलाफ अपनी सारी व्यासायिक ताकत लगा दी। बैंक दबाव डालने लगे। निवेशक पीछे हटने लगे। कंपनी के शेयर गिरने लगे। विक्रम सिंह परेशान रहने लगे। एक शाम अवनी हवेली की बालकनी में खड़ी थी।
तभी निखिल वहां आया। अंकल परेशान है। अवनी ने सिर हिलाया। कर्ज कितना है? बहुत ज्यादा। निखिल कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला समस्या कर्ज नहीं है। तू क्या है? लोगों का भरोसा। अवनी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। निखिल मुस्कुराया। गैराज में काम करते हुए एक बात सीखी है। मशीन टूटती नहीं। लोग उसे छोड़ देते हैं। अगले दिन निखिल ने विक्रम सिंह से बात की। उसने कंपनी के पुराने कर्मचारियों से मुलाकात की। फैक्ट्री में गया। मजदूरों से बात की। उनकी समस्याएं सुनी। पहली बार किसी मालिक के परिवार का सदस्य उनके बीच बैठा था।
धीरे-धीरे लोग उसके साथ जुड़ने लगे क्योंकि वह आदेश नहीं देता था। सुनता था। यही उसकी ताकत थी। कुछ महीनों में कंपनी की हालत सुधरने लगी। नई योजनाएं शुरू हुई। पुराने कर्मचारी वापस लौटे और सबसे बड़ी बात लोगों का भरोसा वापस आने लगा। आर्यमान की कई चाले असफल होने लगी। एक दिन शहर के बड़े व्यापार सम्मेलन में आर्यमान और निखिल आमने-सामने आ गए।
आर्यमान हंसा तो मैकेनिक साहब अब उद्योगपति बन गए। निखिल मुस्कुराया। नहीं आज भी मैकेनिक हूं। कैसे बस इतना है कि पहले मशीनें ठीक करता था। अब रिश्ते ठीक करता हूं। आसपास खड़े लोग मुस्कुरा दिए। आर्यमान का चेहरा उतर गया। उसे पहली बार समझ आया कि पैसा हमेशा सम्मान नहीं खरीद सकता। समय बीतता गया। हरिराम की तबीयत कभी बेहतर होती, कभी बिगड़ती लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा सुकून रहता।
एक शाम उन्होंने निखिल और अवनी दोनों को अपने पास बुलाया। तुम दोनों खुश हो। दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा। फिर मुस्कुरा दिए। हरिराम ने कहा, “मुझे एक बात पहले ही समझ आ गई थी। क्या बाबा? भगवान कुछ लोगों को खून के रिश्ते देने में देर कर देता है ताकि वे पहले दिल के रिश्ते बनाना सीख जाएं। अवनी की आंखें भर आई। निखिल चुप हो गया।
कुछ दिन बाद हरिराम हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए। उनकी अंतिम यात्रा में पूरा शहर शामिल हुआ। गरीब भी, अमीर भी, मजदूर भी, व्यापारी भी क्योंकि उन्होंने जीवन में सिर्फ एक काम किया था। एक अनजान बच्चे को अपना नाम दिया था और कभी बदले में कुछ नहीं मांगा। उनकी चिता के सामने खड़े होकर निखिल ने एक वचन लिया, मैं आपकी अच्छाई को कभी मरने नहीं दूंगा।
एक साल बाद देवगढ़ बदल चुका था। चौहान ग्रुप फिर से मजबूत हो गया था। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव कुछ और था। शहर के बीचोंबीच एक विशाल भवन बना था। उस पर लिखा था हरिराम जीवन केंद्र यह उन बच्चों के लिए था जिनका कोई अपना नहीं था। जिन्हें जिंदगी ने अकेला छोड़ दिया था। निखिल ने अपनी विरासत का बड़ा हिस्सा इसी काम में लगा दिया। उद्घाटन के दिन पूरा शहर मौजूद था। विक्रम सिंह की आंखों में गर्व था। अवनी के चेहरे पर मुस्कान थी और निखिल के दिल में शांति।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद अवनीय उसके पास आई। एक बात पूछूं कुछ अगर उस रात बारिश में मेरी कार खराब नहीं होती तो निखिल हंस पड़ा तो शायद मैं आज भी गैराज में होता और मैं शायद किसी ऐसी जिंदगी में होती जो तुम्हारी नहीं थी। दोनों कुछ पल चुप रहे। फिर अवनी ने धीरे से कहा, “मुझे लगता है भगवान ने उस रात सिर्फ कार नहीं रोकी थी।” फिर क्या रुका था? अवनी मुस्कुराई। दो अधूरी जिंदगियों को टकराने से पहले भटकने से रोका था।
निखिल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में वही सच्चाई थी जो पहली रात थी। लेकिन अब डर नहीं था। सिर्फ भरोसा था। उसी शाम उसी शहर में जहां कभी एक अनजान लड़की बारिश में खड़ी थी। दो लोग एक नई शुरुआत की तरफ बढ़ रहे थे। एक को परिवार मिल गया था। दूसरे को अपना रास्ता और दोनों को वह घर मिल गया था जिसकी तलाश उन्हें हमेशा से थी।