भाग 2
वीर ने धीमी आवाज़ में कहा, “डर लगना स्वाभाविक है। लेकिन डर को अपने चेहरे पर मत आने दीजिए। कई बार सामने वाला सिर्फ यही देखना चाहता है कि हम टूटे या नहीं।”
अन्वी ने खुद को संभालने की कोशिश की। उसके होंठ सूख गए थे, लेकिन उसने सिर हिलाकर हां कहा। पीछे वाली गाड़ी अचानक और करीब आ गई। कुछ पल के लिए लगा जैसे वह कार को टक्कर मार देगी। अन्वी ने सीट पकड़ ली। वीर ने गाड़ी को सड़क के किनारे नहीं लगाया, बल्कि बीच की सुरक्षित लेन में संतुलित रखा। उसने रफ्तार न बहुत बढ़ाई, न बहुत घटाई। उसके हर फैसले में एक नापा-तौला संयम था।
आगे जाकर सड़क दो हिस्सों में बंटती थी। बाईं ओर का रास्ता सीधे भीमतालपुर की तरफ जाता था, लेकिन वह बेहद सुनसान था और जंगल से होकर निकलता था। दाईं ओर पुराना मुख्य मार्ग था, जो थोड़ा लंबा था लेकिन बीच में एक पेट्रोल पंप, एक छोटा पुलिस सहायता केंद्र और कुछ ढाबे पड़ते थे। अन्वी को रास्ता पता था। जैसे ही वीर ने दाईं ओर गाड़ी मोड़ी, अन्वी चौंक गई।
“भीमतालपुर तो बाईं तरफ है,” उसने कहा।
वीर ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया, “हां, लेकिन अभी मंजिल से ज्यादा जरूरी सुरक्षित रास्ता है। सुनसान जंगल में जाना इस समय गलती होगी।”
अन्वी चुप हो गई। कुछ ही सेकंड बाद पीछे वाली बोलेरो भी दाईं तरफ मुड़ गई। अब शक की जगह सच्चाई खड़ी थी। वे लोग सचमुच उनका पीछा कर रहे थे।
लगभग दस मिनट बाद सड़क किनारे एक पुराना पेट्रोल पंप दिखाई दिया। उसके ऊपर लगी सफेद ट्यूब लाइट आधी जल रही थी, आधी झपक रही थी। पंप पर दो कर्मचारी थे और एक बूढ़ा चौकीदार लकड़ी की कुर्सी पर बैठा चाय पी रहा था। वीर ने गाड़ी सीधे पंप के पास रोकी। पीछे वाली बोलेरो कुछ दूरी पर जाकर रुक गई, लेकिन उसके अंदर बैठे लोग बाहर नहीं निकले।
वीर ने अन्वी से कहा, “आप अंदर ही बैठिए। दरवाजे लॉक रखिए। मैं सामान्य तरह से पेश आऊंगा।”
वह कार से उतरा और पेट्रोल भरवाने लगा। उसने जानबूझकर कोई घबराहट नहीं दिखाई। पंप कर्मचारी से उसने सामान्य बात की, फिर बिल बनवाने के बहाने चौकीदार के पास गया। अन्वी कार के अंदर से सब देख रही थी। वीर ने चौकीदार से बहुत धीमे स्वर में कुछ कहा। चौकीदार का चेहरा गंभीर हो गया। उसने तुरंत पंप के छोटे ऑफिस में जाकर फोन उठाया।
कुछ मिनट बाद वीर वापस कार में आया। उसने इंजन स्टार्ट किया और सामान्य गति से आगे बढ़ गया। पीछे वाली बोलेरो ने भी थोड़ी दूरी बनाए रखते हुए कार का पीछा शुरू कर दिया।
अन्वी ने पूछा, “आपने चौकीदार से क्या कहा?”
वीर ने कहा, “मैंने उनसे आगे वाले पुलिस सहायता केंद्र को सूचना देने को कहा है। नंबर प्लेट पूरी तरह साफ नहीं दिखी, लेकिन गाड़ी का रंग और दिशा बता दी गई है।”
“अगर पुलिस समय पर नहीं मिली तो?” अन्वी ने घबराकर पूछा।
वीर ने शांत स्वर में कहा, “तब भी हमने सही काम किया होगा। खतरे में अकेले बहादुर बनने से अच्छा है कि सिस्टम को शामिल किया जाए। मदद मांगना कमजोरी नहीं होती।”
करीब पंद्रह-बीस मिनट बाद सड़क थोड़ी चौड़ी हुई। दूर एक पुलिस जीप की लाल-नीली लाइट हल्के-हल्के चमकती दिखाई दी। दो पुलिसकर्मी सड़क किनारे खड़े थे। वीर ने अपनी कार धीरे से उनके पास रोकी। जैसे ही पीछे वाली बोलेरो ने पुलिस की गाड़ी देखी, उसने अचानक ब्रेक लगाया, फिर तेजी से दूसरी कच्ची सड़क की ओर मुड़कर भाग गई। पुलिसकर्मियों ने तुरंत अपनी गाड़ी मोड़ी और उसके पीछे निकल गए।
अन्वी ने पहली बार गहरी सांस ली। उसका शरीर अभी भी कांप रहा था। वीर ने उसे पानी की बोतल दी। उसने कुछ घूंट पानी पिया। उसके चेहरे पर राहत और हैरानी दोनों थे।
“आपको डर नहीं लगा?” उसने पूछा।
वीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “डर मुझे भी लगा। लेकिन डर लगने और डर के हिसाब से गलत फैसला लेने में फर्क होता है।”
अन्वी ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। उसकी आंखों में कोई दिखावा नहीं था। वह अपने किए हुए काम का शोर नहीं बना रहा था। वह बस आगे का रास्ता देख रहा था, जैसे मदद करना उसके लिए कोई असाधारण बात नहीं, बल्कि सामान्य जिम्मेदारी हो।
पुलिसकर्मियों से बात करके वीर फिर आगे बढ़ा। बारिश अब थोड़ी कम हो गई थी। बादलों की गड़गड़ाहट दूर चली गई थी, लेकिन रात अभी भी गहरी थी। मुख्य मार्ग से भीमतालपुर का दूसरा रास्ता निकलता था, जो लंबा जरूर था मगर अपेक्षाकृत सुरक्षित था। वीर ने वही रास्ता पकड़ा।
कुछ देर बाद वे एक छोटे पुल के पास पहुंचे। पुल के नीचे पहाड़ी नाला बह रहा था। बारिश के कारण पानी का बहाव तेज़ था। पुल पार करने से ठीक पहले अन्वी ने देखा कि सड़क के किनारे एक बाइक गिरी हुई है। थोड़ी दूर एक आदमी जमीन पर पड़ा कराह रहा था। उसके सिर से खून बह रहा था।
“वीर जी, रोकिए!” अन्वी ने तुरंत कहा। “किसी का एक्सीडेंट हुआ है।”
वीर ने गाड़ी थोड़ी दूर रोक दी, लेकिन तुरंत बाहर नहीं निकला। उसने पहले हेडलाइट को ऊंचा किया, फिर टॉर्च से आसपास रोशनी डाली। सड़क खाली थी। पेड़ों के पीछे कोई हलचल नहीं थी। उसने पुलिस सहायता नंबर पर फोन मिलाया, अपनी लोकेशन बताई और कहा कि शायद कोई घायल व्यक्ति है।
अन्वी बेचैन हो रही थी। “हम देर कर रहे हैं,” उसने कहा।
वीर ने गंभीर स्वर में कहा, “अगर यह सचमुच हादसा है, तो हम मदद करेंगे। अगर यह जाल है, तो बिना सोचे दौड़ना हमें भी मुसीबत में डाल सकता है। सावधानी मदद को कमजोर नहीं करती, उसे सुरक्षित बनाती है।”
यह बात सुनकर अन्वी चुप हो गई। वीर ने फर्स्ट एड बॉक्स लिया और धीरे-धीरे उस घायल व्यक्ति के पास गया। वह सचमुच घायल था। बाइक फिसलने से उसका सिर पत्थर से टकरा गया था। वह होश में था, लेकिन बोल नहीं पा रहा था। वीर ने उसके सिर पर कपड़ा दबाया, फिर पट्टी बांधी। अन्वी ने कार से पानी और टॉर्च पकड़ा दी, लेकिन वीर ने उसे कार के पास ही रहने को कहा।
कुछ ही मिनट में पुलिस की जीप लौटती दिखाई दी। उनके साथ एक छोटी एंबुलेंस भी आ गई, जिसे सहायता केंद्र से भेजा गया था। पुलिस अधिकारी ने घायल व्यक्ति को देखकर कहा, “अच्छा हुआ आपने पहले सूचना दे दी। इस मौसम में ऐसी जगह रुकना जोखिम भरा होता है।”
वीर ने सिर्फ इतना कहा, “आदमी की सांस चल रही थी, उसे छोड़ना भी ठीक नहीं था।”
अन्वी यह सब देखती रही। उसके मन में वीर के लिए सम्मान और गहरा होता गया। उसने सोचा कि लोग अक्सर इंसानियत की बातें करते हैं, मगर जब परीक्षा सामने आती है, तब ही पता चलता है कि कौन सच में समझदार और साहसी है।
घायल व्यक्ति को एंबुलेंस में भेजने के बाद वे फिर आगे बढ़े। रात अब लगभग डेढ़ बज चुकी थी। रास्ता लंबा होने के कारण समय ज्यादा लग रहा था। अन्वी बेचैन थी। तभी उसका फोन अचानक बजा। स्क्रीन पर मां का नाम था। उसने तुरंत कॉल उठाया।
“अन्वी… जल्दी आ बेटा,” मां की आवाज़ रोते हुए आ रही थी। “तेरे पापा को फिर से सांस लेने में दिक्कत हो रही है। गांव के डॉक्टर कह रहे हैं कि देर हुई तो मुश्किल हो जाएगी। एंबुलेंस खराब पड़ी है। दूसरी गाड़ी मिलने में समय लगेगा।”
अन्वी की आंखों से आंसू बह निकले। “मां, मैं आ रही हूं। बस थोड़ी देर में पहुंचूंगी। आप घबराना मत।”
कॉल कटते ही अन्वी टूट गई। वह रोते हुए बोली, “अगर पापा को कुछ हो गया तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी।”
वीर ने उसकी ओर एक क्षण देखा और फिर पूरी सावधानी के साथ गाड़ी की रफ्तार थोड़ी बढ़ा दी। “आपके पिता को अस्पताल पहुंचाना होगा। लेकिन हम जल्दबाजी में गलती नहीं करेंगे। हम समय भी बचाएंगे और सुरक्षित भी पहुंचेंगे।”
रास्ते भर वह बेहद ध्यान से गाड़ी चलाता रहा। हर मोड़ पर हॉर्न, हर ढलान पर नियंत्रित ब्रेक, हर पानी भरे हिस्से पर धीमी गति। अन्वी को पहली बार समझ आया कि तेज चलाना हमेशा जल्दी पहुंचना नहीं होता। सुरक्षित तरीके से सही गति बनाए रखना ही असली कुशलता है।
करीब चालीस मिनट बाद दूर गांव की पहली रोशनी दिखाई दी। भीमतालपुर पहाड़ियों के बीच बसा शांत गांव था। रात में वहां केवल कुछ घरों में लाइटें जल रही थीं। बाकी गांव सोया हुआ था। अन्वी ने कांपती आवाज़ में रास्ता बताया। गाड़ी संकरी गलियों से गुजरती हुई उसके घर के सामने रुकी।
दरवाजा खुलते ही अन्वी की मां दौड़ती हुई बाहर आईं। उन्होंने बेटी को गले लगाया। उनके चेहरे पर कई घंटों की घबराहट, नींद की कमी और रोने की थकान साफ दिख रही थी। फिर उन्होंने वीर को देखा और हाथ जोड़ दिए। “बेटा, तू न होता तो मेरी बेटी कैसे आती?”
वीर ने तुरंत हाथ जोड़कर कहा, “आंटी, अभी धन्यवाद बाद में। पहले अंकल को अस्पताल ले चलते हैं।”
घर के अंदर अन्वी के पिता चारपाई पर लेटे थे। उनका चेहरा पीला था, सांस तेज़ चल रही थी। गांव के डॉक्टर उनके पास बैठे थे। उन्होंने कहा, “इन्हें तुरंत मेघपुर अस्पताल ले जाइए। मुझे दिल से जुड़ी समस्या लग रही है।”
समस्या यह थी कि गांव की जीप किसी शादी में गई हुई थी, एंबुलेंस खराब थी और रात में दूसरी गाड़ी आने में कम से कम एक घंटा लगना था। वीर ने बिना एक पल गंवाए कहा, “मेरी कार बाहर है। सीट पीछे कर देंगे। हम अभी निकलते हैं।”
गांव के दो आदमी मदद के लिए आ गए। उन्होंने सावधानी से शंकरलाल जी को कार की पिछली सीट पर लिटाया। अन्वी मां के साथ पीछे बैठी। डॉक्टर ने कुछ दवाएं दीं और कहा कि रास्ते में हालत बिगड़े तो तुरंत फोन करना।
वीर फिर ड्राइविंग सीट पर बैठा। यह सफर पहले से भी कठिन था। अब केवल एक लड़की को घर पहुंचाना नहीं था; अब एक बीमार आदमी की जान समय पर अस्पताल पहुंचने पर निर्भर थी। लेकिन वीर का चेहरा फिर भी शांत था। उसने गाड़ी शुरू की और वापस मेघपुर की दिशा में निकल पड़ा।
रात का वही रास्ता अब और भारी लग रहा था। अन्वी अपने पिता का हाथ पकड़े बैठी थी। मां लगातार भगवान का नाम ले रही थीं। वीर बीच-बीच में रियर व्यू मिरर से हालत देखता और गाड़ी नियंत्रित रखता। उसने पुलिस सहायता केंद्र को फिर कॉल किया और बताया कि वह एक गंभीर मरीज को अस्पताल ले जा रहा है। आगे रास्ते में एक बैरिकेड था, जहां पुलिस ने उन्हें बिना रोके रास्ता दे दिया।
मेघपुर अस्पताल पहुंचते-पहुंचते सुबह के करीब तीन बज चुके थे। वीर ने गाड़ी सीधे इमरजेंसी गेट पर रोकी। स्ट्रेचर लाया गया। डॉक्टरों की टीम ने शंकरलाल जी को अंदर लिया। अन्वी और उसकी मां बाहर खड़ी रो रही थीं। वीर ने काउंटर पर जाकर औपचारिकताएं पूरी करवाईं, डॉक्टर को पूरा हाल बताया और दवाओं की पर्ची लेकर मेडिकल स्टोर तक दौड़ा।
करीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर गंभीरता थी, लेकिन आवाज़ में राहत थी। उन्होंने कहा, “मरीज अब खतरे से बाहर हैं। इन्हें समय पर लाया गया। आधा घंटा और देर होती तो हालत बहुत बिगड़ सकती थी।”
यह सुनते ही अन्वी की मां जमीन पर बैठ गईं और रोने लगीं। अन्वी ने वीर की ओर देखा। उसकी आंखों में इतने आंसू थे कि वह कुछ बोल नहीं पाई। उसकी मां वीर के पैरों की ओर झुकने लगीं, लेकिन वीर ने तुरंत उन्हें रोक लिया।
“आंटी, ऐसा मत कीजिए,” उसने कहा। “आप मां जैसी हैं। आपने मुझे बेटा कहा, वही काफी है।”
अन्वी को उस पल लगा कि यह रात केवल डर, बारिश और भागदौड़ की रात नहीं थी। यह रात उसे इंसानियत का असली चेहरा दिखाने आई थी। उसने एक अजनबी से लिफ्ट मांगी थी, लेकिन उस अजनबी ने उसे सिर्फ घर नहीं पहुंचाया। उसने रास्ते में उसकी सुरक्षा का ध्यान रखा, खतरे से बचाया, एक घायल व्यक्ति की मदद की और अब उसके पिता की जान बचाने में भी सबसे आगे खड़ा था।
सुबह की पहली हल्की रोशनी अस्पताल की खिड़कियों से अंदर आने लगी। अन्वी कुर्सी पर बैठी थी, मां भगवान का धन्यवाद कर रही थीं और शंकरलाल जी आईसीयू में डॉक्टरों की निगरानी में थे। वह वीर से पूछना चाहती थी कि वह कौन है, क्यों इतना मददगार है, उसने यह सब करना कैसे सीखा। लेकिन वह इतनी थकी हुई थी कि शब्द ही नहीं निकले।
कुछ देर बाद जब वह पानी लेने गई और वापस लौटी, तो वीर वहां नहीं था। उसने नर्स से पूछा। नर्स ने कहा, “जो युवक आपके साथ आए थे, वे अभी थोड़ी देर पहले चले गए। बोले कि मरीज ठीक हो जाए, वही उनके लिए सबसे बड़ा धन्यवाद होगा।”
अन्वी दरवाजे की ओर देखती रह गई। वह आदमी जिसने पूरी रात उनका साथ दिया, बिना अपना परिचय दिए, बिना कोई प्रशंसा लिए, चुपचाप चला गया था।
और अन्वी के मन में पहली बार यह सवाल बहुत गहराई से उठने लगा—वीर राणा आखिर था कौन?
अस्पताल की उस सुबह के बाद अन्वी के जीवन की दिशा जैसे धीरे-धीरे बदलने लगी। उसके पिता शंकरलाल जी तीन दिन तक डॉक्टरों की निगरानी में रहे। इलाज समय पर शुरू हो गया था, इसलिए बड़ा खतरा टल गया। डॉक्टर ने बताया कि दिल पर अचानक दबाव पड़ा था और अगर उन्हें रात में ही अस्पताल न लाया जाता तो परिणाम बहुत गंभीर हो सकते थे। यह सुनकर अन्वी हर बार अंदर से कांप उठती। उसे बार-बार वही रास्ता याद आता—बारिश, अंधेरा, पीछा करती गाड़ी, घायल बाइक सवार, और फिर पिता को कार में लेकर अस्पताल की ओर भागना।