भाग 2
आरव ने सीधा जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा, “उसने वही चुना, जो वह हमेशा से चुनती आई है।”
“पैसा?”
“नहीं,” आरव बोला। “स्टेटस।”
कुछ सेकंड तक गाड़ी में सन्नाटा रहा। फिर ईशानी ने पूछा, “तो अब?”
आरव ने उसकी तरफ देखा। “अब खेल शुरू होगा।”
ईशानी हल्का सा मुस्कुराई। “आखिर तुमने यह शब्द बोल ही दिया।”
उसी समय होटल के अंदर काव्या मंच से नीचे उतर चुकी थी। लोग उसे बधाई दे रहे थे। हर कोई उसके साथ तस्वीर लेना चाहता था।
“बहुत आगे जाओगी।”
“कमाल कर दिया।”
“अब तो तुम्हारा नाम हर जगह होगा।”
काव्या मुस्कुरा रही थी, लेकिन उसकी आंखें बार-बार दरवाजे की तरफ जा रही थीं, जैसे वह किसी ऐसे व्यक्ति का इंतजार कर रही हो, जो अब लौटने वाला नहीं था।
तभी आर्यन उसके पास आया। “तुम ठीक हो?”
“हां,” काव्या ने कहा।
“अच्छा है।” उसने मुस्कुराते हुए पूछा, “वैसे उस लड़के का क्या था?”
“कुछ नहीं,” काव्या ने तुरंत जवाब दिया।
“अच्छा ही है,” आर्यन बोला। “ऐसे लोग बस परेशानी देते हैं।”
काव्या ने उसकी तरफ देखा। “तुम उसे नहीं जानते।”
आर्यन हंसा। “जानने की जरूरत भी नहीं है। मैं लोगों को एक नजर में पहचान लेता हूं।”
उसी वक्त हॉल के दरवाजे फिर खुले। लेकिन इस बार अंदर आने वाले लोग अलग थे। सूट पहने हुए कुछ लोग, उनके साथ एक आदमी और उसके पीछे आरव।
पूरा हॉल एक पल के लिए शांत हो गया। काव्या की आंखें फैल गईं।
“यह वापस क्यों आया?”
आर्यन ने भी उसे देखा। “अब क्या नया ड्रामा करेगा?”
आरव धीरे-धीरे अंदर आया। लेकिन इस बार उसकी चाल बदल चुकी थी। अब उसमें झिझक नहीं थी। उसमें ठहराव और एक अजीब सी ताकत थी।
उसके साथ आए आदमी ने मंच की तरफ बढ़कर आयोजक से कुछ कहा, फिर माइक्रोफोन लिया।
“माफ कीजिएगा, एक जरूरी घोषणा है।”
हॉल में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
“यह कौन है?”
“क्या हो रहा है?”
आदमी ने कहा, “आज की इस घोषणा में एक छोटा सा बदलाव है।”
काव्या के चेहरे का रंग बदल गया। “क्या मतलब?”
आदमी ने आगे कहा, “सिंघानिया मीडिया के नए साझेदार की तरफ से कुछ जानकारी देना जरूरी है।”
मीनाक्षी आगे बढ़ीं। “आप कौन हैं?”
“हम उस कंपनी के प्रतिनिधि हैं, जिसके साथ आपकी साझेदारी होने वाली है।”
पूरा हॉल चुप हो गया।
आदमी ने कुछ सेकंड रुककर कहा, “हमें यह बताते हुए खेद है कि यह साझेदारी अब रद्द की जाती है।”
जैसे किसी ने हॉल की सारी हवा खींच ली हो।
“क्या?” मीनाक्षी चिल्लाईं। “यह मजाक है!”
काव्या का दिल तेज धड़कने लगा। “ऐसा कैसे हो सकता है?”
आदमी ने शांत स्वर में कहा, “यह निर्णय अंतिम है।”
“लेकिन क्यों?” काव्या की आवाज कांप गई।
आदमी ने सीधा जवाब नहीं दिया। उसने पीछे खड़े आरव की तरफ देखा और कहा, “क्योंकि जिस व्यक्ति की सिफारिश पर यह समझौता तय हुआ था, उसने अपनी सिफारिश वापस ले ली है।”
सन्नाटा छा गया।
काव्या ने धीरे से पूछा, “कौन?”
आदमी ने हाथ से इशारा किया। सबकी नजरें आरव पर टिक गईं। काव्या जैसे जम गई।
आर्यन हंस पड़ा। “यह मजाक कर रहे हैं।”
लेकिन कोई नहीं हंसा।
आरव आगे बढ़ा। उसका हर कदम भारी था।
“हां,” उसने शांत स्वर में कहा। “मैंने यह डील रुकवाई है।”
“तुम?” काव्या की आवाज में अविश्वास था। “क्यों?”
आरव ने सीधा जवाब दिया, “क्योंकि मैं कर सकता हूं।”
अब पहली बार काव्या की आंखों में डर साफ दिखाई दिया। “तुम आखिर हो कौन?”
आरव कुछ सेकंड चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “वही, जिसे तुमने कुछ देर पहले इस जगह के लायक नहीं समझा था।”
उसी पल खेल सच में शुरू हो चुका था।
हॉल में सन्नाटा इतना गहरा था, जैसे किसी ने सारी आवाजें बंद कर दी हों। हर नजर अब एक ही इंसान पर टिकी थी—आरव पर। कुछ देर पहले तक वही आदमी इस जगह के लायक नहीं समझा गया था, लेकिन अब उसके एक फैसले ने पूरा माहौल बदल दिया था।
काव्या की उंगलियां कांप रही थीं। “तुम आखिर हो कौन?” उसकी आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें डर साफ था।
आरव कुछ कदम आगे बढ़ा। अब उसकी आंखों में वह उदासी नहीं थी, जो पहले थी। वहां एक ठहराव और अजीब सी ताकत थी।
उसने चारों तरफ देखा—हर चेहरा, हर नजर और हर वह इंसान, जिसने कुछ देर पहले उसे तुच्छ समझा था।
फिर उसने धीरे से कहा, “तुम लोगों ने हमेशा मुझे वही समझा, जो मैं दिखता था। लेकिन कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं असल में क्या हूं।”
आर्यन ने हंसने की कोशिश की। “ड्रामा मत करो। सीधा-सीधा बोलो।”
आरव ने उसकी तरफ देखा। “ड्रामा?” वह हल्का सा मुस्कुराया। “ड्रामा तो तुम लोग कर रहे थे। मैं तो बस सच बोल रहा हूं।”
तभी पीछे खड़ा वही आदमी आगे आया, जिसने डील रद्द होने की घोषणा की थी।
“अब समय आ गया है पूरी सच्चाई बताने का,” उसने कहा।
मीनाक्षी बेचैन हो गईं। “देखिए, हमें यह सब सुनने की जरूरत नहीं है।”
“जरूरत है,” आदमी ने शांत लेकिन सख्त आवाज में कहा।
फिर उसने सबके सामने कहा, “यह हैं आरव मेहरा। ये उस कंपनी के मुख्य सलाहकार हैं, जिसके साथ आपकी डील होने वाली थी।”
हॉल में हलचल मच गई।
“क्या?”
“और सिर्फ इतना ही नहीं,” वह आगे बोला। “पिछले दो सालों में जिस भी बड़े प्रोजेक्ट ने इस कंपनी को आगे बढ़ाया, उन सबके पीछे इनका दिमाग था।”
अब हॉल में खुसर-पुसर शुरू हो चुकी थी। काव्या की आंखें फैल गईं।
“यह सच नहीं हो सकता।”
आरव ने उसकी तरफ देखा। “सच हमेशा वैसा नहीं होता, जैसा हम देखना चाहते हैं।”
आर्यन ने बीच में कहा, “अगर यह इतना बड़ा आदमी है, तो फिर यह यहां ऐसे क्यों आया?”
आरव ने तुरंत जवाब दिया, “क्योंकि मैं यह देखना चाहता था कि तुम्हारे लिए इंसान की कीमत क्या है।”
फिर उसने सीधे काव्या की तरफ देखा। “और मुझे जवाब मिल गया।”
काव्या के होंठ कांप गए। “आरव, मैंने…”
“मत बोलो,” आरव ने रोक दिया। “अब कुछ भी बोलने का कोई मतलब नहीं है।”
हॉल में खामोशी और गहरी हो गई।
तभी दरवाजे फिर खुले। इस बार अंदर एक लड़की आई। सफेद कपड़ों में साधारण, लेकिन बेहद आत्मविश्वासी। वह ईशानी थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई।
“अब बताओगे या मैं बताऊं?”
आरव ने हल्की मुस्कान दी। “तुम ही बता दो।”
ईशानी ने सबकी तरफ देखा। “आप लोग जिस कंपनी की बात कर रहे हैं, उसकी मालिक मैं हूं।”
पूरा हॉल जैसे जम गया।
वह कुछ पल रुकी। फिर बोली, “और इस कंपनी को खड़ा करने में सबसे बड़ा योगदान किसका है?” उसने आरव की तरफ इशारा किया। “इनका।”
अब किसी के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।
मीनाक्षी की आवाज टूट गई। “यह सब…”
ईशानी ने सीधे कहा, “आपकी बेटी की डील सिर्फ इसलिए तय हुई थी, क्योंकि आरव ने उसके लिए सिफारिश की थी।”
काव्या का चेहरा सफेद पड़ गया।
“और आज,” ईशानी बोली, “वही आदमी, जिसे आपने अपमानित किया, उसी ने यह डील रद्द कर दी।”
काव्या की आंखों से आंसू निकल आए। “आरव, मुझे नहीं पता था।”
“पता होना चाहिए था,” आरव ने शांत आवाज में कहा। “पता होना चाहिए था कि इंसान की कीमत उसके कपड़ों से नहीं होती। पता होना चाहिए था कि जो तुम्हारे साथ खड़ा रहा, वह तुम्हारे गिरने का इंतजार नहीं करेगा।”
वह एक पल रुका। “और सबसे ज्यादा तुम्हें यह पता होना चाहिए था कि प्यार कभी सौदे की तरह नहीं होता।”
हॉल में खड़े हर इंसान को जैसे अपने आप पर शर्म आ रही थी।
आर्यन अब भी चुप नहीं था। “तो क्या हुआ?” उसने कहा। “पैसा है तुम्हारे पास, तो क्या सब कुछ तुम्हारा हो गया?”
आरव उसकी तरफ मुड़ा। “नहीं, सब कुछ मेरा नहीं हुआ। बस इतना हुआ कि अब मुझे खुद को साबित करने की जरूरत नहीं है।”
आर्यन चुप हो गया।
मीनाक्षी धीरे-धीरे आगे आईं। उनकी आवाज बदल चुकी थी। “आरव बेटा, हमें माफ कर दो।”
आरव ने उन्हें देखा और कुछ सेकंड बाद शांत स्वर में कहा, “माफी उन लोगों से मांगी जाती है, जिनकी इज्जत की जाती है। आपने तो मुझे इंसान ही नहीं समझा था।”
मीनाक्षी की आंखें झुक गईं।
काव्या आगे बढ़ी। उसके कदम भारी थे और आंखें भीगी हुई थीं। वह आरव के सामने आकर रुक गई।
“आरव, मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी।”
आरव चुप रहा।
“मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं। और आज…” उसकी आवाज टूट गई। “आज मुझे समझ आ रहा है कि मैंने क्या खो दिया।”
कुछ सेकंड तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा। फिर आरव ने धीरे से कहा, “तुमने मुझे नहीं खोया। तुमने खुद को खो दिया है।”
काव्या रो पड़ी। “क्या एक मौका भी नहीं?”
आरव ने उसकी आंखों में देखा और धीरे से सिर हिला दिया। “कुछ चीजें एक बार टूट जाती हैं, तो फिर कभी पहले जैसी नहीं होतीं।”
उसने जेब से वही डिब्बा निकाला। वही अंगूठी, जिसे वह उसे देने आया था। उसने उसे कुछ सेकंड तक देखा और फिर धीरे से बंद कर दिया।
“यह अब किसी और के लिए है।”
ईशानी ने उसकी तरफ देखा और हल्का सा मुस्कुरा दी। काव्या वहीं खड़ी रह गई—टूटी हुई और खाली।
तभी आरव ने आखिरी बार सबकी तरफ देखा। “आज आपने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। लोग इंसान को नहीं, उसकी हैसियत को देखते हैं। और यह भी कि असली जीत तब होती है, जब आपको किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती।”
फिर उसने ईशानी की तरफ देखा। “चलें?”
ईशानी ने सिर हिलाया।
दोनों साथ चल पड़े। पीछे हॉल में लोग खड़े थे, लेकिन अब कोई तालियां नहीं बजा रहा था। क्योंकि आज जश्न नहीं हुआ था। आज सच सामने आया था और सच हमेशा चुप कर देता है।
बारिश अब भी हो रही थी। लेकिन इस बार आरव भीग रहा था और मुस्कुरा रहा था, क्योंकि इस बार वह कुछ खोकर नहीं, सब कुछ समझकर जा रहा था।
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