भाग 1
देवकुंड की पहाड़ियों पर उस रात बर्फ सामान्य से कहीं ज्यादा तेज गिर रही थी।
ऊंचे देवदार के पेड़ सफेद चादर में गायब हो चुके थे। दूर तक न कोई रास्ता दिखाई दे रहा था, न किसी इंसान के पैरों के निशान। बस पहाड़ों के बीच से आती हवा की डरावनी सीटी और उसके साथ घोड़ों की हांफती हुई आवाज सुनाई दे रही थी।
उसी बर्फीले रास्ते पर एक बंद पालकी तेजी से आगे बढ़ रही थी।
पालकी के अंदर बैठी राजकुमारी अवनी के हाथ कांप रहे थे।
लेकिन ठंड से नहीं।
उसकी गोद खाली थी।
कुछ ही घंटे पहले तक जिस गोद में उसका नवजात बच्चा था, अब वहां सिर्फ उसके छोटे से लाल कपड़े का एक टुकड़ा पड़ा था।
अवनी उस कपड़े को अपनी छाती से लगाए बैठी थी।
उसकी आंखों से आंसू बहते-बहते सूख चुके थे।
वह रोना चाहती थी, चीखना चाहती थी, लेकिन उसके अंदर जैसे आवाज ही नहीं बची थी।
सिर्फ एक सवाल उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था—
“मेरे बच्चे का कसूर क्या था?”
पालकी अचानक रुक गई।
अवनी ने सिर उठाया।
बाहर से सैनिक की आवाज आई—
“राजकुमारी जी, हमें यहीं उतरना होगा।”
राजकुमारी।
अवनी के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान आ गई।
कुछ ही घंटों में उससे यह नाम भी छीन लिया जाने वाला था।
वह धीरे से पालकी से उतरी।
सामने देवकुंड की सबसे खतरनाक जगह थी—नीलकंठ खाई।
उसके नीचे इतनी गहरी बर्फीली घाटी थी कि आज तक वहां गिरने वाला कोई इंसान वापस नहीं लौटा था।
खाई के किनारे दो लोग पहले से खड़े थे।
उन्हें देखकर अवनी के कदम रुक गए।
एक था उसका पति वीराज।
और दूसरी थी उसकी छोटी सौतेली बहन काव्या।
अवनी की मुट्ठी कस गई।
“मुझे यहां क्यों लाया गया है?”
वीराज ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस काव्या की ओर देखा।
काव्या के चेहरे पर वही मुस्कान थी जिसे अवनी बचपन से पहचानती थी।
जब भी अवनी से कुछ छिनता था, काव्या इसी तरह मुस्कुराती थी।
लेकिन इस बार उसने सिर्फ कोई गहना या कपड़ा नहीं छीना था।
उसने अवनी की पूरी जिंदगी छीन ली थी।
काव्या धीरे-धीरे उसके पास आई।
“दीदी, आप अभी तक समझी नहीं?”
अवनी की आंखें लाल हो गईं।
“मेरा बच्चा किसने मारा?”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर वीराज ने बिल्कुल शांत स्वर में कहा—
“मैंने।”
अवनी के शरीर से जैसे प्राण निकल गए।
उसने वीराज को देखा।
यह वही आदमी था जिसके लिए उसने अपने पिता से झगड़ा किया था।
जिसके लिए उसने अपने जीवन की हर खुशी त्याग दी थी।
वही आदमी उसके बच्चे को मारने की बात ऐसे कह रहा था जैसे उसने कोई बेकार वस्तु फेंक दी हो।
“क्यों?”
अवनी की आवाज मुश्किल से निकली।
वीराज ने उसकी ओर देखकर कहा—
“क्योंकि वह मेरा योग्य वारिस नहीं था।”
“वह तुम्हारा बेटा था!”
“नहीं।”
वीराज अचानक गरजा।
“वह एक कलंक था।”
उसने अवनी की बांह पकड़कर उसके कंधे से कपड़ा हटा दिया।
वहां सुनहरी रेखा का रंग लगभग मिट चुका था और उसके नीचे नीले-काले रंग का असली निशान दिखाई दे रहा था।
“मुझे बताया गया था कि मैं देवकुंड की सबसे शुद्ध सूर्यरेखा वाली राजकुमारी से विवाह कर रहा हूं।”
वीराज की आंखों में नफरत थी।
“लेकिन तुमने मुझे धोखा दिया।”
अवनी उसे देखती रह गई।
“तो इतने सालों का प्यार?”
वीराज हंस पड़ा।
“प्यार?”
वह काव्या की ओर बढ़ा और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
“मैंने कभी तुमसे प्यार किया ही नहीं।”
अवनी का दिल जैसे किसी ने चीर दिया।
काव्या मुस्कुराते हुए वीराज से और करीब हो गई।
“दीदी, आपको हमेशा लगता था न कि हर अच्छी चीज सिर्फ आपके लिए बनी है?”
“राजमहल आपका।”
“सिंहासन आपका।”
“राज्य का सबसे बड़ा योद्धा आपका।”
“सब कुछ आपका।”
उसने धीरे से कहा—
“लेकिन अब नहीं।”
अवनी ने पहली बार उनकी आंखों में देखकर सच्चाई समझी।
यह रिश्ता आज का नहीं था।
वे दोनों लंबे समय से एक-दूसरे के साथ थे।
और वह…
वह इन दोनों के बीच सिर्फ एक सीढ़ी थी।
अवनी ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
अचानक उसे अपनी मां की बातें याद आईं।
मां हमेशा कहती थीं—
“बेटी, कभी अपने असली रूप से नफरत मत करना।”
लेकिन अवनी ने वही किया था।
वह वर्षों तक अपने कंधे पर केसर, चंदन और दुर्लभ जड़ी-बूटियों से बना लेप लगाती रही ताकि उसका नीला-काला निशान सुनहरा दिखाई दे।
क्योंकि देवकुंड में सुनहरी सूर्यरेखा को देवताओं का आशीर्वाद माना जाता था।
और नीली-काली रेखा?
उसे अपशकुन।
अवनी ने सच छिपाया।
वीराज ने प्रेम का झूठ बोला।
काव्या ने बहन होने का।
और आज सारे झूठ एक साथ उसके सामने खड़े थे।
दूर से घोड़े दौड़ने की आवाज आई।
कुछ ही क्षण बाद महाराज रणविजय वहां पहुंच गए।
अवनी के दिल में उम्मीद की आखिरी किरण जगी।
“पिताजी!”
वह उनकी तरफ भागी।
“पिताजी, मेरी बात सुनिए। वीराज ने हमारे बच्चे को—”
चटाक!
महाराज का थप्पड़ उसके चेहरे पर पड़ा।
अवनी कुछ कदम पीछे हट गई।
“मुझे पिताजी मत कहो।”
महाराज की आंखों में क्रोध था।
“तुमने सिर्फ मुझे नहीं, पूरे देवकुंड को धोखा दिया है।”
अवनी स्तब्ध थी।
“लेकिन पिताजी—”
“तुम्हारी मां ने वर्षों तक तुम्हारी असली रेखा छिपाई।”
“और तुमने उसकी मृत्यु के बाद भी यह झूठ जारी रखा।”
“तुम्हें पता है तुम्हारे कारण राजवंश की कितनी बदनामी होगी?”
अवनी ने वीराज की तरफ इशारा किया।
“और उसने जो किया?”
“उसने मेरे बच्चे को मार दिया!”
महाराज कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले—
“अगर बच्चा अशुभ पैदा हुआ था, तो शायद यही उचित था।”
बस।
उस एक वाक्य ने अवनी के भीतर बचा हुआ अंतिम रिश्ता भी तोड़ दिया।
उसने अपने पिता को देखा।
वह राजा जो पूरे राज्य को न्याय देने का दावा करता था, अपनी बेटी को न्याय देने को तैयार नहीं था।
अवनी पीछे हटी।
काव्या धीरे-धीरे उसके पास आई।
“दीदी, अब आपके लिए यहां कुछ नहीं बचा।”
अवनी ने उसकी ओर देखा।
“तुम दोनों कभी सुखी नहीं रहोगे।”
काव्या हंस पड़ी।
“और आप देखने के लिए जिंदा भी नहीं रहेंगी।”
इससे पहले कि अवनी कुछ समझ पाती, काव्या ने उसे जोर से धक्का दे दिया।
अवनी का पैर बर्फ पर फिसला।
उसका शरीर खाई की तरफ गिरने लगा।
कुछ क्षण के लिए सब कुछ जैसे धीमा हो गया।
उसने वीराज को देखा।
वह काव्या को अपनी बाहों में खींच चुका था।
उसने अपने पिता को देखा।
वह खड़े रहे।
किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।
अवनी खाई में गिरती चली गई।

ठंडी हवा उसके चेहरे को काट रही थी।
नीचे सिर्फ अंधेरा था।
उसकी मुट्ठी में अपनी मां की दी हुई चांदी की पायल थी।
अवनी ने उसे मजबूती से पकड़ लिया।
“मां…”
उसकी आंखों से आखिरी आंसू निकला।
“अगर मुझे एक मौका और मिला…”
“तो मैं फिर कभी किसी को अपना भाग्य तय नहीं करने दूंगी।”
अचानक नीचे बर्फ के बीच एक नीली लौ दिखाई दी।
फिर दूसरी।
फिर पूरी खाई जैसे नीली अग्नि से जगमगा उठी।
अवनी की आंखें बंद हो गईं।
और सब कुछ अंधेरा हो गया।
—
“राजकुमारी अवनी!”
“राजकुमारी!”
“आप सुन रही हैं?”
अवनी ने झटके से आंखें खोल दीं।
उसकी सांसें तेज थीं।
वह तुरंत उठकर बैठ गई।
लेकिन अगले ही क्षण उसका पूरा शरीर जम गया।
वह बर्फीली खाई में नहीं थी।
उसके सामने ऊंचे सोने के खंभे थे।
छत से विशाल दीपमालाएं लटक रही थीं।
दीवारों पर देवकुंड राजवंश के पूर्वजों के चित्र बने हुए थे।
और चारों ओर सैकड़ों दरबारी बैठे थे।
यह…
राजदरबार था।
अवनी ने अपने हाथ देखे।
न कोई चोट।
न खून।
न प्रसव के बाद की कमजोरी।
उसने कांपते हुए अपने पेट पर हाथ रखा।
सपाट।
“यह कैसे…?”
उसकी नजर सामने सिंहासन पर पड़ी।
महाराज रणविजय बैठे थे।
उनके बाल अभी काले थे।
पिछली जिंदगी में उनकी कनपटियों पर सफेदी आ चुकी थी।
अवनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।
तभी उसके बगल से एक जानी-पहचानी आवाज आई।
“महाराज, मैं अपना निर्णय सबके सामने कहना चाहता हूं।”
अवनी ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।
वीराज।
वह पहले से कुछ छोटा दिखाई दे रहा था।
उसके चेहरे पर वह कठोरता भी कम थी जो आने वाले वर्षों में दिखाई देने लगी थी।
लेकिन उसके माथे पर चमकती सुनहरी सूर्यरेखा बिल्कुल वैसी ही थी।
अवनी का पूरा शरीर कांप गया।
उसे यह दिन याद था।
आज से ठीक सात वर्ष पहले…
यही वह दिन था जब राजसभा में उसके विवाह की घोषणा होने वाली थी।
यानी—
“मैं… वापस आ गई?”
अवनी ने अपनी सांस रोक ली।
तभी वीराज ने कहा—
“मैं राजकुमारी अवनी से विवाह नहीं करना चाहता।”
दरबार में हलचल मच गई।
महाराज के चेहरे पर गुस्सा आ गया।
“वीराज!”
लेकिन वीराज रुका नहीं।
उसने सभा के दूसरी तरफ बैठी काव्या की ओर देखा।
“मैं राजकुमारी काव्या को अपनी पत्नी बनाना चाहता हूं।”
पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
काव्या ने आश्चर्य का अभिनय किया, लेकिन अवनी ने उसकी आंखों में छिपी खुशी साफ देख ली।
और तभी अवनी समझ गई।
“तो तुम भी…”
उसे एहसास हुआ कि शायद वीराज को भी पिछले जीवन की कुछ घटनाएं याद थीं।
क्योंकि पिछली जिंदगी में उसने इसी दिन अवनी को चुना था।
अब वह काव्या को चुन रहा था।
क्यों?
शायद उसे याद था कि अवनी ने एक अशुभ समझे जाने वाले बच्चे को जन्म दिया था।
और शायद उसे लगता था कि काव्या उसके लिए बेहतर विकल्प है।
अवनी के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
बहुत अच्छा।
पहली जिंदगी में उसने इस आदमी को पाने के लिए सब कुछ खोया था।
इस बार उसे पाने के लिए लड़ने की कोई जरूरत ही नहीं थी।
वह स्वयं उसके रास्ते से हट रहा था।
महाराज खड़े हो गए।
“यह विवाह वर्षों पहले तय किया गया था!”
“तुम्हारी सूर्यरेखा और अवनी की सूर्यरेखा के मेल से देवकुंड को सबसे शक्तिशाली वारिस मिल सकता है।”
वीराज ने सिर झुकाया।
“क्षमा चाहता हूं महाराज।”
“लेकिन विवाह केवल शक्ति का समझौता नहीं होना चाहिए।”
फिर उसने अवनी को देखा।
उसकी आंखों में तिरस्कार था।
“और कुछ लोग वैसे भी उतने पवित्र नहीं होते जितने दिखाई देते हैं।”
अवनी समझ गई।
वह अभी सबके सामने उसका भेद खोलने वाला है।
पहली जिंदगी में शायद वह घबरा जाती।
लेकिन अब नहीं।
वीराज ने कहा—
“महाराज, राजकुमारी अवनी की सूर्यरेखा असली नहीं है।”
दरबार में शोर मच गया।
“क्या?”
“यह कैसे संभव है?”
“राजकुमारी तो बचपन से सूर्यकन्या मानी जाती हैं!”
महाराज गरजे—
“वीराज! अपनी सीमा में रहो।”
वीराज ने जवाब दिया—
“मैं जो कह रहा हूं, उसका प्रमाण स्वयं राजकुमारी दे सकती हैं।”
सैकड़ों आंखें अवनी पर टिक गईं।
काव्या के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
उसे शायद उम्मीद थी कि अवनी रोएगी, बहाने बनाएगी या सच छिपाने की कोशिश करेगी।
लेकिन अवनी शांत खड़ी हो गई।
“पानी लाओ।”
सब हैरान रह गए।
महाराज ने पूछा—
“किसलिए?”
अवनी ने फिर कहा—
“एक पात्र साफ पानी।”
दासी तुरंत पानी लेकर आई।
अवनी ने कटोरा हाथ में लिया।
उसके हाथ हल्के से कांपे।
वर्षों तक यही सत्य उसका सबसे बड़ा डर था।
उसकी मां ने उसे बचाने के लिए इसे छिपाया था।
फिर उसने स्वयं इसे अपनी पहचान बना लिया।
लेकिन आज…
नहीं।
अवनी ने पानी अपने कंधे पर डाल दिया।
केसर और जड़ी-बूटी का सुनहरा लेप धीरे-धीरे बहने लगा।
दरबार में सन्नाटा छा गया।
सुनहरे रंग के नीचे से एक गहरी नीली-काली रेखा दिखाई देने लगी।
वह उसके कंधे से गर्दन तक किसी बिजली की तरह फैली हुई थी।
एक वृद्ध मंत्री के मुंह से निकला—
“धूम्र रेखा!”
“अपशकुन!”
“यह तो सूर्यरेखा है ही नहीं!”
महाराज रणविजय का चेहरा सफेद पड़ गया।
“अवनी…”
“यह क्या है?”
अवनी ने पहली बार बिना सिर झुकाए अपने पिता की आंखों में देखा।
“सच।”
बस एक शब्द।
“मैं सूर्यरेखा के साथ पैदा नहीं हुई थी।”
दरबार में फिर शोर उठ गया।
अवनी ने आगे कहा—
“मेरी मां ने मुझे बचाने के लिए यह सच छिपाया था।”
“उनकी मृत्यु के बाद मैंने भी इसे जारी रखा।”
“उसके लिए मैं दोषी हूं।”
वीराज के चेहरे पर विजयी मुस्कान आ गई।
लेकिन अगले ही क्षण अवनी उसकी तरफ मुड़ी।
“और जहां तक विवाह की बात है…”
“मैं भी वीराज से विवाह नहीं करना चाहती।”
वीराज की मुस्कान गायब हो गई।
काव्या चौंक गई।
अवनी बोली—
“अगर वह काव्या को चुनता है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”
“मैं दोनों को शुभकामनाएं देती हूं।”
काव्या के चेहरे का रंग बदल गया।
उसे विजय का आनंद तभी मिलता जब अवनी टूटती।
लेकिन अवनी के शांत चेहरे ने उसकी पूरी खुशी फीकी कर दी।
महाराज का गुस्सा अब फूट पड़ा।
“चुप!”
“तुमने राजपरिवार को धोखा दिया है!”
“तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम्हारे इस झूठ से क्या होगा?”
अवनी ने सिर झुका लिया।
“जो सजा उचित हो, स्वीकार है।”
दरबार के मुख्य पुरोहित आचार्य सोमदेव आगे आए।