Crime Story

पति और बहन ने मिलकर राजकुमारी को मार डाला, दोबारा जन्म लेकर उसने खोला खतरनाक राज

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

देवकुंड की राजकुमारी अवनी ने अपनी पूरी जिंदगी एक ऐसे सच को छिपाने में गुजार दी, जिसे दुनिया अपशकुन मानती थी। उसने जिस वीराज से प्रेम किया, उसी ने उसे धोखा दिया, उसके बच्चे की जान ली और उसकी अपनी बहन काव्या के साथ मिलकर उसे बर्फीली खाई में मरने के लिए छोड़ दिया।

लेकिन मौत ने अवनी की कहानी खत्म नहीं की…

जब उसने दोबारा आंखें खोलीं, तो वह सात साल पीछे उसी दिन लौट चुकी थी जहां से उसकी बर्बादी शुरू हुई थी।

इस बार अवनी ने फैसला कर लिया—न वह झूठी पहचान के पीछे छिपेगी, न गलत इंसान को चुनेगी और न किसी को अपना भाग्य तय करने देगी।

लेकिन कालीधार शक्तिपीठ पहुंचने के बाद उसे पता चलता है कि उसके शरीर पर मौजूद रहस्यमयी नीली-काली रेखा कोई अभिशाप नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने “नील-अग्नि वंश” की पहचान है।

इसके बाद खुलता है देवकुंड का ऐसा भयानक राज, जिसमें वर्षों से देवी सेवा के नाम पर युवक और युवतियां गायब किए जा रहे थे। उनकी रहस्यमयी शक्ति चुराकर कोई खुद को महान सूर्ययोद्धा साबित कर रहा था।

और इन सबके बीच अवनी की जिंदगी में आता है एक घायल साधारण वैद्य—शिवांश।

लेकिन क्या शिवांश वास्तव में एक साधारण वैद्य है?

वीराज की चमकती सूर्यरेखा का सच क्या है?

अवनी को सात साल पीछे किस शक्ति ने भेजा?

और क्या जिस निशान को पूरी दुनिया अपशकुन समझती रही, वही पूरे देवकुंड का भविष्य बदलने वाला है?

देखिए अवनी की विश्वासघात, पुनर्जन्म, प्रेम, रहस्य, बदले और न्याय से भरी पूरी कहानी।

यह सिर्फ एक राजकुमारी के सिंहासन पाने की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को बदलने की कहानी है जो जन्म से ही तय कर देती थी कि कौन ऊंचा है और कौन नीचा।

अगर आपको रहस्यमयी, भावनात्मक और पौराणिक फैंटेसी कहानियां पसंद हैं तो वीडियो को अंत तक जरूर देखें।

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 69 मिनट

भाग 1

देवकुंड की पहाड़ियों पर उस रात बर्फ सामान्य से कहीं ज्यादा तेज गिर रही थी।

ऊंचे देवदार के पेड़ सफेद चादर में गायब हो चुके थे। दूर तक न कोई रास्ता दिखाई दे रहा था, न किसी इंसान के पैरों के निशान। बस पहाड़ों के बीच से आती हवा की डरावनी सीटी और उसके साथ घोड़ों की हांफती हुई आवाज सुनाई दे रही थी।

उसी बर्फीले रास्ते पर एक बंद पालकी तेजी से आगे बढ़ रही थी।

पालकी के अंदर बैठी राजकुमारी अवनी के हाथ कांप रहे थे।

लेकिन ठंड से नहीं।

उसकी गोद खाली थी।

कुछ ही घंटे पहले तक जिस गोद में उसका नवजात बच्चा था, अब वहां सिर्फ उसके छोटे से लाल कपड़े का एक टुकड़ा पड़ा था।

अवनी उस कपड़े को अपनी छाती से लगाए बैठी थी।

उसकी आंखों से आंसू बहते-बहते सूख चुके थे।

वह रोना चाहती थी, चीखना चाहती थी, लेकिन उसके अंदर जैसे आवाज ही नहीं बची थी।

सिर्फ एक सवाल उसके दिमाग में बार-बार घूम रहा था—

“मेरे बच्चे का कसूर क्या था?”

पालकी अचानक रुक गई।

अवनी ने सिर उठाया।

बाहर से सैनिक की आवाज आई—

“राजकुमारी जी, हमें यहीं उतरना होगा।”

राजकुमारी।

अवनी के चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान आ गई।

कुछ ही घंटों में उससे यह नाम भी छीन लिया जाने वाला था।

वह धीरे से पालकी से उतरी।

सामने देवकुंड की सबसे खतरनाक जगह थी—नीलकंठ खाई।

उसके नीचे इतनी गहरी बर्फीली घाटी थी कि आज तक वहां गिरने वाला कोई इंसान वापस नहीं लौटा था।

खाई के किनारे दो लोग पहले से खड़े थे।

उन्हें देखकर अवनी के कदम रुक गए।

एक था उसका पति वीराज।

और दूसरी थी उसकी छोटी सौतेली बहन काव्या।

अवनी की मुट्ठी कस गई।

“मुझे यहां क्यों लाया गया है?”

वीराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने बस काव्या की ओर देखा।

काव्या के चेहरे पर वही मुस्कान थी जिसे अवनी बचपन से पहचानती थी।

जब भी अवनी से कुछ छिनता था, काव्या इसी तरह मुस्कुराती थी।

लेकिन इस बार उसने सिर्फ कोई गहना या कपड़ा नहीं छीना था।

उसने अवनी की पूरी जिंदगी छीन ली थी।

काव्या धीरे-धीरे उसके पास आई।

“दीदी, आप अभी तक समझी नहीं?”

अवनी की आंखें लाल हो गईं।

“मेरा बच्चा किसने मारा?”

कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

फिर वीराज ने बिल्कुल शांत स्वर में कहा—

“मैंने।”

अवनी के शरीर से जैसे प्राण निकल गए।

उसने वीराज को देखा।

यह वही आदमी था जिसके लिए उसने अपने पिता से झगड़ा किया था।

जिसके लिए उसने अपने जीवन की हर खुशी त्याग दी थी।

वही आदमी उसके बच्चे को मारने की बात ऐसे कह रहा था जैसे उसने कोई बेकार वस्तु फेंक दी हो।

“क्यों?”

अवनी की आवाज मुश्किल से निकली।

वीराज ने उसकी ओर देखकर कहा—

“क्योंकि वह मेरा योग्य वारिस नहीं था।”

“वह तुम्हारा बेटा था!”

“नहीं।”

वीराज अचानक गरजा।

“वह एक कलंक था।”

उसने अवनी की बांह पकड़कर उसके कंधे से कपड़ा हटा दिया।

वहां सुनहरी रेखा का रंग लगभग मिट चुका था और उसके नीचे नीले-काले रंग का असली निशान दिखाई दे रहा था।

“मुझे बताया गया था कि मैं देवकुंड की सबसे शुद्ध सूर्यरेखा वाली राजकुमारी से विवाह कर रहा हूं।”

वीराज की आंखों में नफरत थी।

“लेकिन तुमने मुझे धोखा दिया।”

अवनी उसे देखती रह गई।

“तो इतने सालों का प्यार?”

वीराज हंस पड़ा।

“प्यार?”

वह काव्या की ओर बढ़ा और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।

“मैंने कभी तुमसे प्यार किया ही नहीं।”

अवनी का दिल जैसे किसी ने चीर दिया।

काव्या मुस्कुराते हुए वीराज से और करीब हो गई।

“दीदी, आपको हमेशा लगता था न कि हर अच्छी चीज सिर्फ आपके लिए बनी है?”

“राजमहल आपका।”

“सिंहासन आपका।”

“राज्य का सबसे बड़ा योद्धा आपका।”

“सब कुछ आपका।”

उसने धीरे से कहा—

“लेकिन अब नहीं।”

अवनी ने पहली बार उनकी आंखों में देखकर सच्चाई समझी।

यह रिश्ता आज का नहीं था।

वे दोनों लंबे समय से एक-दूसरे के साथ थे।

और वह…

वह इन दोनों के बीच सिर्फ एक सीढ़ी थी।

अवनी ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

अचानक उसे अपनी मां की बातें याद आईं।

मां हमेशा कहती थीं—

“बेटी, कभी अपने असली रूप से नफरत मत करना।”

लेकिन अवनी ने वही किया था।

वह वर्षों तक अपने कंधे पर केसर, चंदन और दुर्लभ जड़ी-बूटियों से बना लेप लगाती रही ताकि उसका नीला-काला निशान सुनहरा दिखाई दे।

क्योंकि देवकुंड में सुनहरी सूर्यरेखा को देवताओं का आशीर्वाद माना जाता था।

और नीली-काली रेखा?

उसे अपशकुन।

अवनी ने सच छिपाया।

वीराज ने प्रेम का झूठ बोला।

काव्या ने बहन होने का।

और आज सारे झूठ एक साथ उसके सामने खड़े थे।

दूर से घोड़े दौड़ने की आवाज आई।

कुछ ही क्षण बाद महाराज रणविजय वहां पहुंच गए।

अवनी के दिल में उम्मीद की आखिरी किरण जगी।

“पिताजी!”

वह उनकी तरफ भागी।

“पिताजी, मेरी बात सुनिए। वीराज ने हमारे बच्चे को—”

चटाक!

महाराज का थप्पड़ उसके चेहरे पर पड़ा।

अवनी कुछ कदम पीछे हट गई।

“मुझे पिताजी मत कहो।”

महाराज की आंखों में क्रोध था।

“तुमने सिर्फ मुझे नहीं, पूरे देवकुंड को धोखा दिया है।”

अवनी स्तब्ध थी।

“लेकिन पिताजी—”

“तुम्हारी मां ने वर्षों तक तुम्हारी असली रेखा छिपाई।”

“और तुमने उसकी मृत्यु के बाद भी यह झूठ जारी रखा।”

“तुम्हें पता है तुम्हारे कारण राजवंश की कितनी बदनामी होगी?”

अवनी ने वीराज की तरफ इशारा किया।

“और उसने जो किया?”

“उसने मेरे बच्चे को मार दिया!”

महाराज कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले—

“अगर बच्चा अशुभ पैदा हुआ था, तो शायद यही उचित था।”

बस।

उस एक वाक्य ने अवनी के भीतर बचा हुआ अंतिम रिश्ता भी तोड़ दिया।

उसने अपने पिता को देखा।

वह राजा जो पूरे राज्य को न्याय देने का दावा करता था, अपनी बेटी को न्याय देने को तैयार नहीं था।

अवनी पीछे हटी।

काव्या धीरे-धीरे उसके पास आई।

“दीदी, अब आपके लिए यहां कुछ नहीं बचा।”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

“तुम दोनों कभी सुखी नहीं रहोगे।”

काव्या हंस पड़ी।

“और आप देखने के लिए जिंदा भी नहीं रहेंगी।”

इससे पहले कि अवनी कुछ समझ पाती, काव्या ने उसे जोर से धक्का दे दिया।

अवनी का पैर बर्फ पर फिसला।

उसका शरीर खाई की तरफ गिरने लगा।

कुछ क्षण के लिए सब कुछ जैसे धीमा हो गया।

उसने वीराज को देखा।

वह काव्या को अपनी बाहों में खींच चुका था।

उसने अपने पिता को देखा।

वह खड़े रहे।

किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।

अवनी खाई में गिरती चली गई।

ठंडी हवा उसके चेहरे को काट रही थी।

नीचे सिर्फ अंधेरा था।

उसकी मुट्ठी में अपनी मां की दी हुई चांदी की पायल थी।

अवनी ने उसे मजबूती से पकड़ लिया।

“मां…”

उसकी आंखों से आखिरी आंसू निकला।

“अगर मुझे एक मौका और मिला…”

“तो मैं फिर कभी किसी को अपना भाग्य तय नहीं करने दूंगी।”

अचानक नीचे बर्फ के बीच एक नीली लौ दिखाई दी।

फिर दूसरी।

फिर पूरी खाई जैसे नीली अग्नि से जगमगा उठी।

अवनी की आंखें बंद हो गईं।

और सब कुछ अंधेरा हो गया।

—

“राजकुमारी अवनी!”

“राजकुमारी!”

“आप सुन रही हैं?”

अवनी ने झटके से आंखें खोल दीं।

उसकी सांसें तेज थीं।

वह तुरंत उठकर बैठ गई।

लेकिन अगले ही क्षण उसका पूरा शरीर जम गया।

वह बर्फीली खाई में नहीं थी।

उसके सामने ऊंचे सोने के खंभे थे।

छत से विशाल दीपमालाएं लटक रही थीं।

दीवारों पर देवकुंड राजवंश के पूर्वजों के चित्र बने हुए थे।

और चारों ओर सैकड़ों दरबारी बैठे थे।

यह…

राजदरबार था।

अवनी ने अपने हाथ देखे।

न कोई चोट।

न खून।

न प्रसव के बाद की कमजोरी।

उसने कांपते हुए अपने पेट पर हाथ रखा।

सपाट।

“यह कैसे…?”

उसकी नजर सामने सिंहासन पर पड़ी।

महाराज रणविजय बैठे थे।

उनके बाल अभी काले थे।

पिछली जिंदगी में उनकी कनपटियों पर सफेदी आ चुकी थी।

अवनी के दिल की धड़कन तेज हो गई।

तभी उसके बगल से एक जानी-पहचानी आवाज आई।

“महाराज, मैं अपना निर्णय सबके सामने कहना चाहता हूं।”

अवनी ने धीरे-धीरे सिर घुमाया।

वीराज।

वह पहले से कुछ छोटा दिखाई दे रहा था।

उसके चेहरे पर वह कठोरता भी कम थी जो आने वाले वर्षों में दिखाई देने लगी थी।

लेकिन उसके माथे पर चमकती सुनहरी सूर्यरेखा बिल्कुल वैसी ही थी।

अवनी का पूरा शरीर कांप गया।

उसे यह दिन याद था।

आज से ठीक सात वर्ष पहले…

यही वह दिन था जब राजसभा में उसके विवाह की घोषणा होने वाली थी।

यानी—

“मैं… वापस आ गई?”

अवनी ने अपनी सांस रोक ली।

तभी वीराज ने कहा—

“मैं राजकुमारी अवनी से विवाह नहीं करना चाहता।”

दरबार में हलचल मच गई।

महाराज के चेहरे पर गुस्सा आ गया।

“वीराज!”

लेकिन वीराज रुका नहीं।

उसने सभा के दूसरी तरफ बैठी काव्या की ओर देखा।

“मैं राजकुमारी काव्या को अपनी पत्नी बनाना चाहता हूं।”

पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।

काव्या ने आश्चर्य का अभिनय किया, लेकिन अवनी ने उसकी आंखों में छिपी खुशी साफ देख ली।

और तभी अवनी समझ गई।

“तो तुम भी…”

उसे एहसास हुआ कि शायद वीराज को भी पिछले जीवन की कुछ घटनाएं याद थीं।

क्योंकि पिछली जिंदगी में उसने इसी दिन अवनी को चुना था।

अब वह काव्या को चुन रहा था।

क्यों?

शायद उसे याद था कि अवनी ने एक अशुभ समझे जाने वाले बच्चे को जन्म दिया था।

और शायद उसे लगता था कि काव्या उसके लिए बेहतर विकल्प है।

अवनी के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

बहुत अच्छा।

पहली जिंदगी में उसने इस आदमी को पाने के लिए सब कुछ खोया था।

इस बार उसे पाने के लिए लड़ने की कोई जरूरत ही नहीं थी।

वह स्वयं उसके रास्ते से हट रहा था।

महाराज खड़े हो गए।

“यह विवाह वर्षों पहले तय किया गया था!”

“तुम्हारी सूर्यरेखा और अवनी की सूर्यरेखा के मेल से देवकुंड को सबसे शक्तिशाली वारिस मिल सकता है।”

वीराज ने सिर झुकाया।

“क्षमा चाहता हूं महाराज।”

“लेकिन विवाह केवल शक्ति का समझौता नहीं होना चाहिए।”

फिर उसने अवनी को देखा।

उसकी आंखों में तिरस्कार था।

“और कुछ लोग वैसे भी उतने पवित्र नहीं होते जितने दिखाई देते हैं।”

अवनी समझ गई।

वह अभी सबके सामने उसका भेद खोलने वाला है।

पहली जिंदगी में शायद वह घबरा जाती।

लेकिन अब नहीं।

वीराज ने कहा—

“महाराज, राजकुमारी अवनी की सूर्यरेखा असली नहीं है।”

दरबार में शोर मच गया।

“क्या?”

“यह कैसे संभव है?”

“राजकुमारी तो बचपन से सूर्यकन्या मानी जाती हैं!”

महाराज गरजे—

“वीराज! अपनी सीमा में रहो।”

वीराज ने जवाब दिया—

“मैं जो कह रहा हूं, उसका प्रमाण स्वयं राजकुमारी दे सकती हैं।”

सैकड़ों आंखें अवनी पर टिक गईं।

काव्या के चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

उसे शायद उम्मीद थी कि अवनी रोएगी, बहाने बनाएगी या सच छिपाने की कोशिश करेगी।

लेकिन अवनी शांत खड़ी हो गई।

“पानी लाओ।”

सब हैरान रह गए।

महाराज ने पूछा—

“किसलिए?”

अवनी ने फिर कहा—

“एक पात्र साफ पानी।”

दासी तुरंत पानी लेकर आई।

अवनी ने कटोरा हाथ में लिया।

उसके हाथ हल्के से कांपे।

वर्षों तक यही सत्य उसका सबसे बड़ा डर था।

उसकी मां ने उसे बचाने के लिए इसे छिपाया था।

फिर उसने स्वयं इसे अपनी पहचान बना लिया।

लेकिन आज…

नहीं।

अवनी ने पानी अपने कंधे पर डाल दिया।

केसर और जड़ी-बूटी का सुनहरा लेप धीरे-धीरे बहने लगा।

दरबार में सन्नाटा छा गया।

सुनहरे रंग के नीचे से एक गहरी नीली-काली रेखा दिखाई देने लगी।

वह उसके कंधे से गर्दन तक किसी बिजली की तरह फैली हुई थी।

एक वृद्ध मंत्री के मुंह से निकला—

“धूम्र रेखा!”

“अपशकुन!”

“यह तो सूर्यरेखा है ही नहीं!”

महाराज रणविजय का चेहरा सफेद पड़ गया।

“अवनी…”

“यह क्या है?”

अवनी ने पहली बार बिना सिर झुकाए अपने पिता की आंखों में देखा।

“सच।”

बस एक शब्द।

“मैं सूर्यरेखा के साथ पैदा नहीं हुई थी।”

दरबार में फिर शोर उठ गया।

अवनी ने आगे कहा—

“मेरी मां ने मुझे बचाने के लिए यह सच छिपाया था।”

“उनकी मृत्यु के बाद मैंने भी इसे जारी रखा।”

“उसके लिए मैं दोषी हूं।”

वीराज के चेहरे पर विजयी मुस्कान आ गई।

लेकिन अगले ही क्षण अवनी उसकी तरफ मुड़ी।

“और जहां तक विवाह की बात है…”

“मैं भी वीराज से विवाह नहीं करना चाहती।”

वीराज की मुस्कान गायब हो गई।

काव्या चौंक गई।

अवनी बोली—

“अगर वह काव्या को चुनता है, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”

“मैं दोनों को शुभकामनाएं देती हूं।”

काव्या के चेहरे का रंग बदल गया।

उसे विजय का आनंद तभी मिलता जब अवनी टूटती।

लेकिन अवनी के शांत चेहरे ने उसकी पूरी खुशी फीकी कर दी।

महाराज का गुस्सा अब फूट पड़ा।

“चुप!”

“तुमने राजपरिवार को धोखा दिया है!”

“तुम्हें अंदाजा भी है कि तुम्हारे इस झूठ से क्या होगा?”

अवनी ने सिर झुका लिया।

“जो सजा उचित हो, स्वीकार है।”

दरबार के मुख्य पुरोहित आचार्य सोमदेव आगे आए।

आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 69 मिनट

भाग 2

“महाराज, प्राचीन नियमों के अनुसार राजवंश का कोई सदस्य अपनी जन्मरेखा छिपाए तो उससे उत्तराधिकार का अधिकार छीना जा सकता है।”

महाराज ने तुरंत कहा—

“आज से अवनी का नाम उत्तराधिकारियों की सूची से हटाया जाता है।”

सभा में कानाफूसी शुरू हो गई।

काव्या की आंखें चमक उठीं।

अवनी को कोई दुख नहीं हुआ।

उस सिंहासन के लिए वह पिछली जिंदगी में बहुत कुछ खो चुकी थी।

अब उसे सिंहासन से ज्यादा अपनी जिंदगी प्यारी थी।

महाराज अभी शांत नहीं हुए थे।

“और प्रायश्चित के लिए…”

उन्होंने कुछ सोचा।

“इसे छह महीने के लिए कालीधार शक्तिपीठ भेजा जाएगा।”

दरबार में अचानक सन्नाटा छा गया।

किसी ने धीरे से कहा—

“कालीधार?”

“वह तो वर्षों से वीरान है।”

“सर्दियों में वहां कोई जीवित नहीं रह सकता।”

अवनी का दिल जोर से धड़का।

कालीधार।

उसने यह नाम मां के मुंह से सुना था।

मृत्यु से कुछ दिन पहले मां ने उसका हाथ पकड़कर कहा था—

“अगर कभी तुम्हारी नीली रेखा जलने लगे… तो कालीधार जाना।”

तब अवनी समझी नहीं थी।

पिछली जिंदगी में उसे वहां जाने का अवसर भी नहीं मिला।

अब स्वयं भाग्य उसे उसी जगह भेज रहा था।

उसने सिर झुकाकर कहा—

“मुझे आदेश स्वीकार है।”

—

अगले तीन दिनों में राजमहल का व्यवहार पूरी तरह बदल गया।

जो दासियां कल तक उसके सामने सिर झुकाती थीं, अब उसे देखकर फुसफुसातीं।

जो मंत्री उसे भावी महारानी कहते थे, वे रास्ता बदल लेते।

काव्या तो जैसे वर्षों का बदला एक साथ लेना चाहती थी।

वह हर दिन नए वस्त्र और गहने पहनकर अवनी के सामने आती।

तीसरे दिन उसने कहा—

“दीदी, मेरा और वीराज का विवाह अगले महीने तय हो गया है।”

अवनी अपने सामान में सूखे फल रख रही थी।

“बहुत अच्छी बात है।”

काव्या ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“आपको दुख नहीं हो रहा?”

अवनी ने उसकी ओर देखा।

“क्यों?”

“क्योंकि जो आदमी मेरा होना ही नहीं चाहता, उसके जाने पर मैं क्यों रोऊं?”

काव्या के पास जवाब नहीं था।

अवनी फिर अपना सामान बांधने लगी।

काव्या ने धीरे से कहा—

“आपको पता है न, कालीधार से लोग जिंदा वापस नहीं आते?”

अवनी रुक गई।

फिर मुस्कुराई।

“तो अगर मैं लौट आई…”

“तुम्हें सबसे ज्यादा निराशा होगी।”

काव्या का चेहरा कठोर हो गया।

वह बिना कुछ बोले चली गई।

अवनी ने दरवाजा बंद किया और अपनी मुट्ठी खोली।

उसके अंदर वही चांदी की पायल थी।

वही पायल जिसे पकड़े हुए वह पिछली जिंदगी में खाई से गिरी थी।

यानी यह सपना नहीं था।

वह सच में वापस आई थी।

—

तीन दिन बाद अवनी ने देवकुंड छोड़ दिया।

न शाही पालकी।

न सौ सैनिक।

न सेविकाओं की भीड़।

बस एक छोटी घोड़ागाड़ी, कुछ राशन और दो पहाड़ी सैनिक।

जैसे-जैसे वे उत्तर की तरफ बढ़ते गए, मौसम खराब होता गया।

पांचवें दिन बर्फ इतनी तेज थी कि घोड़े आगे बढ़ने से इनकार करने लगे।

एक सैनिक बोला—

“राजकुमारी जी, आगे जाना खतरे से खाली नहीं।”

अवनी ने आसमान देखा।

“शक्तिपीठ कितनी दूर है?”

“लगभग आधे दिन का रास्ता।”

“तो चलेंगे।”

सैनिकों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।

उनके चेहरे बता रहे थे कि वे खुश नहीं थे।

शाम होने से कुछ समय पहले उन्हें रास्ते के किनारे कोई आकृति दिखाई दी।

एक आदमी बर्फ में पड़ा था।

अवनी ने गाड़ी रुकवाई।

सैनिक तुरंत बोला—

“नहीं राजकुमारी जी।”

“यह जाल भी हो सकता है।”

अवनी नीचे उतर गई।

“अगर जाल हुआ तो देख लेंगे।”

वह उस आदमी के पास पहुंची।

वह लगभग उसकी ही उम्र का युवक था।

उसके लंबे बाल बर्फ से ढके थे।

कपड़े फटे हुए थे।

बाएं पैर पर गहरी चोट थी।

लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि इतनी ठंड के बावजूद उसका शरीर पूरी तरह जमा नहीं था।

अवनी ने उसके चेहरे से बर्फ हटाई।

युवक की आंखें खुल गईं।

गहरी भूरी आंखें।

कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर युवक ने धीमे स्वर में कहा—

“अगर लूटने आई हैं तो पहले बता दूं… मेरे पास कुछ नहीं है।”

अवनी हैरान रह गई।

“मरने वाले हो और मजाक सूझ रहा है?”

युवक ने हल्की मुस्कान दी।

“मरने वालों के पास यही आखिरी आजादी होती है।”

अवनी के होंठों पर अनजाने में मुस्कान आ गई।

“नाम?”

“शिवांश।”

“क्या करते हो?”

“जड़ी-बूटियों से इलाज करता हूं।”

पीछे से सैनिक हंसा।

“अपना पैर तो ठीक कर नहीं पाया।”

शिवांश ने उसकी तरफ देखा।

“कुछ घाव जड़ी-बूटियों से नहीं, समय से ठीक होते हैं।”

अवनी एक पल के लिए चुप हो गई।

उसे लगा जैसे उसने बात पैर की नहीं, उसके जीवन की कही हो।

उसने सैनिकों को आदेश दिया—

“इसे गाड़ी में बैठाओ।”

“लेकिन राजकुमारी—”

“आदेश है।”

शिवांश ने उसे देखा।

“आपको बाद में पछताना पड़ सकता है।”

अवनी ने कहा—

“पछतावे का अनुभव मुझे तुमसे ज्यादा है।”

शिवांश कुछ समझा नहीं।

और शायद यही अच्छा था।

—

सूरज डूबने के कुछ समय बाद वे कालीधार शक्तिपीठ पहुंचे।

मंदिर देखकर सैनिक तक चुप हो गए।

वह किसी सामान्य मंदिर जैसा नहीं था।

काले पत्थर से बना विशाल भवन पहाड़ के बीच आधा दबा हुआ था।

दरवाजे पर दो विशाल शेरों की मूर्तियां थीं।

चारों तरफ बर्फ थी।

लेकिन मंदिर की सीढ़ियों पर एक भी बर्फ का टुकड़ा नहीं टिक रहा था।

जैसे पत्थर के नीचे कोई गर्मी बह रही हो।

शिवांश ने मंदिर को देखा।

उसके चेहरे पर कुछ क्षण के लिए अजीब सा भाव आया।

अवनी ने पकड़ लिया।

“तुम यहां पहले आए हो?”

“नहीं।”

जवाब बहुत जल्दी आया था।

अवनी ने कुछ नहीं कहा।

रात के लिए सबने मंदिर के बाहरी कक्ष में ठहरने का फैसला किया।

दोनों सैनिक खाना खाते ही गहरी नींद में चले गए।

लेकिन अवनी को नींद नहीं आई।

उसके कंधे की नीली-काली रेखा में जलन होने लगी।

धीरे-धीरे जलन इतनी बढ़ गई कि वह उठ खड़ी हुई।

उसे लगा जैसे मंदिर के अंदर से कोई उसे बुला रहा है।

अवनी ने दीपक उठाया और अकेली अंदर चली गई।

मंदिर के मुख्य गर्भगृह का दरवाजा वर्षों से बंद था।

लेकिन जैसे ही अवनी उसके पास पहुंची—

घर्रर्र…

पत्थर का भारी दरवाजा स्वयं खुलने लगा।

अवनी की सांस रुक गई।

अंदर एक विशाल देवी प्रतिमा थी।

लेकिन उसके सामने रखा अखंड दीप बुझा हुआ था।

दीवारों पर सैकड़ों दीपक थे।

सभी बुझ चुके थे।

अवनी धीरे-धीरे आगे गई।

“मां ने मुझे यहां क्यों भेजा था?”

कोई उत्तर नहीं।

वह देवी के सामने घुटनों के बल बैठ गई।

अचानक उसके हाथ की चांदी की पायल गर्म होने लगी।

अवनी ने घबराकर उसे नीचे गिरा दिया।

पायल मंदिर के पत्थर से टकराई।

उसी क्षण जमीन पर बने प्राचीन चिन्ह चमक उठे।

अवनी पीछे हटने लगी।

उसकी उंगली दीपक के टूटे किनारे से कट गई।

खून की एक बूंद अखंड दीप में गिरी।

और—

धड़ाम!

पूरा मंदिर कांप उठा।

अवनी ने डरकर चारों तरफ देखा।

अगले ही क्षण बुझा हुआ अखंड दीप नीली आग से जल उठा।

फिर उसके बगल का दीप।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

कुछ ही सांसों में गर्भगृह के सैकड़ों दीपक नीली ज्वाला से जगमगा उठे।

अवनी का कंधा जैसे आग में जलने लगा।

उसने अपनी बांह देखी।

वह नीली-काली रेखा जिसे पूरा राज्य अपशकुन कहता था…

अब चमक रही थी।

पहले नीली।

फिर उसके अंदर चांदी जैसी रोशनी दौड़ी।

अवनी घबराकर पीछे हटी।

तभी मंदिर की सबसे पुरानी दीवार से धूल गिरने लगी।

उसके नीचे पत्थर में उकेरे गए अक्षर दिखाई दिए।

एक-एक करके वे भी नीली रोशनी से चमकने लगे।

अवनी उनके करीब गई।

और पढ़ा—

“जब सूर्य का प्रकाश चोरी कर लिया जाएगा…”

उसकी सांस रुक गई।

अगली पंक्ति चमकी—

“जब झूठ को देवत्व और सत्य को अपशकुन कहा जाएगा…”

अवनी की आंखें फैल गईं।

फिर अंतिम पंक्ति प्रकट हुई—

“तब नील-अग्नि की पुत्री लौटेगी।”

अवनी स्तब्ध खड़ी रह गई।

“नील-अग्नि…”

“की पुत्री?”

उसी क्षण उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी महसूस हुई।

अवनी पलटी।

मंदिर के दरवाजे पर शिवांश खड़ा था।

उसकी लाठी उसके हाथ में थी।

लेकिन उसके चेहरे पर न आश्चर्य था, न डर।

वह मंदिर की नीली आग को ऐसे देख रहा था…

जैसे उसने इसे पहले भी देखा हो।

अवनी ने धीरे से पूछा—

“तुम जानते हो यह सब क्या है?”

शिवांश ने उसकी ओर देखा।

कुछ क्षण वह चुप रहा।

फिर बोला—

“मैं सिर्फ इतना जानता हूं…”

उसने चमकती हुई रेखा की ओर देखा।

“जिस निशान को तुमने पूरी जिंदगी अभिशाप समझा…”

“देवकुंड के कुछ लोग उसी निशान के दोबारा दिखाई देने से सदियों से डरते आए हैं।”

अवनी के चेहरे का रंग बदल गया।

“कौन लोग?”

शिवांश ने उत्तर देने के बजाय बाहर अंधेरी पहाड़ियों की तरफ देखा।

दूर कहीं बर्फ के बीच मशालें जलती दिखाई दे रही थीं।

एक नहीं।

दस नहीं।

दर्जनों।

कोई बड़ी टोली मंदिर की ओर बढ़ रही थी।

शिवांश की आंखें अचानक गंभीर हो गईं।

“लगता है तुम्हारे जागने की खबर…”

“तुमसे पहले किसी और तक पहुंच गई है।”

अवनी ने चमकती हुई अपनी रेखा को देखा।

फिर दूर आती मशालों को।

सात वर्ष पहले उसे लगा था कि उसकी सबसे बड़ी गलती अपने असली रूप को छिपाना थी।

लेकिन अब पहली बार उसे एहसास हुआ—

शायद उसकी असली पहचान सिर्फ एक पारिवारिक राज नहीं थी।

शायद उस एक निशान के पीछे देवकुंड के पूरे इतिहास का कोई ऐसा सच दबा था…

जिसे छिपाए रखने के लिए कोई भी उसकी जान ले सकता था।

और इस बार…

अवनी मरने वाली नहीं थी।

इस बार कहानी उसकी शर्तों पर लिखी जाने वाली थी।

कालीधार शक्तिपीठ के बाहर दूर पहाड़ियों पर दर्जनों मशालें धीरे-धीरे पास आती जा रही थीं।

अवनी मंदिर के दरवाजे पर खड़ी उन्हें देख रही थी।

उसके कंधे की नीली-काली रेखा अब भी हल्की नीली रोशनी छोड़ रही थी। गर्भगृह में जल उठे सैकड़ों दीपक बिना तेल के जल रहे थे और उनकी नीली लौ हवा के बिना भी लगातार कांप रही थी।

शिवांश उसके बगल में खड़ा था।

कुछ देर पहले तक खुद को एक साधारण वैद्य बताने वाले इस युवक के चेहरे पर अब वह बेफिक्री नहीं थी जो रास्ते में दिखाई दी थी।

अवनी ने उसकी तरफ देखा।

“तुमने कहा था कि कुछ लोग इस निशान के वापस आने से डरते हैं।”

शिवांश चुप रहा।

“कौन लोग?”

उसने फिर भी जवाब नहीं दिया।

अवनी की आवाज कठोर हो गई।

“मुझे आधी बातें पसंद नहीं हैं।”

“खासकर तब, जब बाहर पचास लोग मशालें लेकर मेरी तरफ बढ़ रहे हों।”

शिवांश ने धीमे से कहा—

“वे पचास नहीं हैं।”

“लगभग तीस होंगे।”

अवनी ने उसे घूरा।

“इस समय तुम्हें यही सुधार करना था?”

शिवांश के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।

लेकिन अगले ही पल वह गंभीर हो गया।

“उनमें से ज्यादातर राजसैनिक हैं।”

अवनी चौंक गई।

“राजसैनिक?”

“पिताजी ने मुझे यहां भेजा और अब मेरे पीछे सैनिक भेज दिए?”

शिवांश ने सिर हिलाया।

“जरूरी नहीं कि महाराज ने भेजे हों।”

यह बात अवनी के दिल में चुभ गई।

देवकुंड में राजमुद्रा के बिना इतनी बड़ी सैनिक टुकड़ी कहीं नहीं जा सकती थी।

फिर अगर महाराज ने नहीं भेजा…

तो कौन?

उसी समय मंदिर के बाहर सो रहे दोनों सैनिक भागते हुए अंदर आए।

“राजकुमारी जी!”

“बाहर लोग आ रहे हैं।”

दूसरे सैनिक ने घबराकर कहा—

“उनके पास देवकुंड की ध्वजा है।”

अवनी बाहर निकली।

कुछ ही देर में मशालें मंदिर के नीचे बने खुले मैदान तक पहुंच गईं।

सबसे आगे घोड़े पर एक लंबा आदमी बैठा था।

अवनी ने उसे तुरंत पहचान लिया।

सेनानायक भैरव सिंह।

वह वीराज के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों में से एक था।

पिछले जन्म में भी उसे कई बार वीराज के साथ देखा था।

भैरव घोड़े से उतरा और सिर झुकाया।

“राजकुमारी अवनी।”

अवनी ने ठंडे स्वर में कहा—

“मुझे अब राजकुमारी कहने की जरूरत नहीं है।”

भैरव मुस्कुराया।

“आदत पुरानी है।”

“इतनी रात को यहां क्यों आए हो?”

भैरव की नजर मंदिर के अंदर जल रही नीली अग्नि पर गई।

उसके चेहरे का रंग एक पल के लिए बदल गया।

लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल लिया।

“हमें सूचना मिली कि यहां कुछ असामान्य हुआ है।”

अवनी की आंखें सिकुड़ गईं।

“असामान्य घटना को हुए आधा घंटा भी नहीं हुआ।”

“तुम्हें इतनी जल्दी सूचना कैसे मिल गई?”

भैरव चुप रहा।

अवनी एक कदम आगे बढ़ी।

“या तुम पहले से आसपास थे?”

दोस्तों, यहीं पहली बार अवनी के मन में यह बात मजबूती से बैठ गई कि कालीधार शक्तिपीठ केवल एक छोड़ा हुआ मंदिर नहीं था।

कोई इस पर वर्षों से नजर रख रहा था।

भैरव ने बात बदल दी।

“महाराज की तरफ से आदेश है कि आप वापस राजधानी लौटें।”

“छह महीने पूरे हुए बिना?”

“परिस्थितियां बदल गई हैं।”

अवनी ने दूर शिवांश को देखा।

वह बिल्कुल शांत खड़ा था, लेकिन उसकी उंगलियां लाठी पर कस चुकी थीं।

अवनी ने पूछा—

“कौन-सी परिस्थितियां?”

भैरव ने जवाब दिया—

“कालीधार की सूखी नदी में पानी लौट आया है।”

आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 69 मिनट

भाग 3

“पिछले तीन दिनों में आसपास के गांवों में सूखे पेड़ों पर फूल खिले हैं।”

“और आज रात पहाड़ के ऊपर नीली रोशनी दिखाई दी।”

यह सुनकर अवनी खुद भी चौंक गई।

क्या यह सब उसके कारण हुआ था?

भैरव आगे बोला—

“राजपुरोहित इसे बहुत बड़ा संकेत मान रहे हैं।”

“महाराज चाहते हैं कि आप तुरंत लौटें।”

अवनी ने मंदिर की तरफ देखा।

फिर अपने कंधे पर चमकती रेखा की तरफ।

उसे महसूस हुआ कि उसकी जिंदगी एक बार फिर देवकुंड की ओर खिंच रही है।

लेकिन इस बार वह वही भोली लड़की नहीं थी जो सात वर्ष पहले महल से निकली थी।

उसने कहा—

“हम सुबह निकलेंगे।”

भैरव ने तुरंत कहा—

“हमें अभी निकलना होगा।”

अवनी की आवाज बदल गई।

“मैंने कहा सुबह।”

भैरव कुछ पल उसे देखता रहा।

फिर झुक गया।

“जैसी आपकी इच्छा।”

वह पीछे हट गया।

लेकिन जाते-जाते उसकी नजर फिर नीली अग्नि पर पड़ी।

और अवनी ने साफ देखा—

उसकी आंखों में श्रद्धा नहीं थी।

डर था।

—

उस रात अवनी सो नहीं सकी।

वह मंदिर की पिछली सीढ़ियों पर बैठी थी।

सामने दूर तक फैली बर्फ चांदनी में चमक रही थी।

कुछ देर बाद लकड़ी की लाठी की आवाज सुनाई दी।

शिवांश आकर थोड़ी दूरी पर बैठ गया।

अवनी ने उसकी तरफ देखे बिना कहा—

“तुम वापस जा सकते हो।”

“कहां?”

“जहां से आए थे।”

“वह कहां है, मुझे खुद नहीं पता।”

अवनी ने इस बार उसकी तरफ देखा।

“शिवांश, मैं मजाक के मूड में नहीं हूं।”

“मैं भी नहीं।”

अवनी ने गहरी सांस ली।

“तुम मेरे बारे में मुझसे ज्यादा जानते हो।”

“तुम इस मंदिर के बारे में जानते हो।”

“भैरव को देखकर तुम्हारे चेहरे का भाव बदल गया।”

“और तुम्हें पहले से पता था कि मेरी रेखा कोई अभिशाप नहीं है।”

“तो या तो तुम सच बताओ…”

“या कल से हमारे रास्ते अलग।”

शिवांश कुछ देर चुप रहा।

फिर उसने अपनी लाठी बगल में रख दी।

“मेरे गुरु कहा करते थे कि कुछ सच सही समय से पहले बता दिए जाएं, तो वे लोगों को बचाने के बजाय उन्हें मरवा देते हैं।”

अवनी हंस पड़ी।

लेकिन उस हंसी में खुशी नहीं थी।

“मुझे बचाने के नाम पर मेरी मां ने भी मुझे आधा सच बताया था।”

“परिणाम?”

“मैंने अपनी आधी जिंदगी झूठ में जी।”

वह शिवांश की आंखों में देखने लगी।

“मुझे संरक्षण नहीं चाहिए।”

“मुझे सच चाहिए।”

शिवांश ने धीरे से कहा—

“फिर राजधानी लौटकर सावधान रहना।”

“बस?”

“अभी इतना ही कह सकता हूं।”

अवनी खड़ी हो गई।

“तो हमारे रास्ते यहीं अलग।”

वह जाने लगी।

पीछे से शिवांश ने कहा—

“वीराज की सूर्यरेखा असली नहीं है।”

अवनी के कदम वहीं रुक गए।

उसने धीरे से पलटकर देखा।

शिवांश की आंखें अब पूरी तरह गंभीर थीं।

“क्या कहा?”

“उसकी शक्ति स्वाभाविक नहीं है।”

अवनी के दिमाग में पिछली जिंदगी की कई बातें घूम गईं।

वीराज हमेशा अत्यधिक शक्तिशाली दिखाई देता था।

लेकिन विवाह के बाद अवनी तेजी से कमजोर होने लगी थी।

जबकि वीराज की शक्ति लगातार बढ़ती रही।

उस समय उसने इसे संयोग समझा था।

अब नहीं।

“तुम्हें कैसे पता?”

शिवांश ने जवाब दिया—

“क्योंकि मैं ऐसी शक्ति पहले देख चुका हूं।”

“कहां?”

“देवकुंड में।”

अवनी उसके करीब गई।

“किसके अंदर?”

शिवांश ने सिर्फ इतना कहा—

“उन लोगों में जिनकी शक्ति उनकी अपनी नहीं थी।”

—

अगली सुबह यात्रा शुरू हुई।

कालीधार से लौटते समय अवनी को रास्ता वैसा नहीं लगा जैसा जाते समय था।

जिस घाटी में सूखी झाड़ियां थीं, वहां छोटी-छोटी नीली कलियां खिली थीं।

एक सूखे झरने से पानी बह रहा था।

गांव वाले रास्ते के दोनों तरफ खड़े होकर हाथ जोड़ रहे थे।

“देवी ने कालीधार को जगा दिया।”

“राजकुमारी लौट आईं।”

अवनी को यह सब असहज कर रहा था।

उसने कोई चमत्कार करने की कोशिश नहीं की थी।

फिर भी लोग हर घटना उससे जोड़ रहे थे।

शिवांश धीरे से बोला—

“लोगों को उम्मीद की जरूरत होती है।”

अवनी ने कहा—

“और यही उम्मीद बाद में अंधविश्वास बन जाती है।”

शिवांश ने उसकी तरफ देखा।

“तुम बाकी राजपरिवार जैसी नहीं हो।”

अवनी के चेहरे पर हल्की कड़वाहट आई।

“पिछली बार होती तो शायद आज जिंदा नहीं होती।”

शिवांश उसकी बात समझा नहीं।

लेकिन उसने पूछा भी नहीं।

—

देवकुंड राजधानी के द्वार पर हजारों लोग इकट्ठे थे।

अवनी ने ऐसा स्वागत अपने जीवन में कभी नहीं देखा था।

महाराज ने उसे दंड देकर भेजा था।

लेकिन वह लौट रही थी तो लोग उस पर फूल बरसा रहे थे।

महल में प्रवेश करते ही काव्या सामने आ गई।

उसने भारी रेशमी वस्त्र और गहने पहन रखे थे।

उसके माथे पर विवाहिता स्त्री का सिंदूर चमक रहा था।

उसके बगल में वीराज खड़ा था।

अवनी ने दोनों को देखा।

पहले जीवन की यादें एक पल के लिए उसके भीतर जहर की तरह उठीं।

यही पुरुष उसका पति था।

यही स्त्री उसकी बहन।

इन्हीं दोनों ने मिलकर उसके बच्चे और उसकी जिंदगी को खत्म किया था।

लेकिन इस बार अवनी की आंखों में डर नहीं था।

वीराज ने शिवांश को देखा।

“यह कौन है?”

अवनी ने जवाब दिया—

“मेरे साथ आया वैद्य।”

काव्या ने शिवांश को ऊपर से नीचे तक देखा।

उसके पुराने कपड़े, लाठी और घायल पैर देखकर उसके चेहरे पर हंसी फैल गई।

“दीदी, आपको पहाड़ों पर इससे बेहतर संगत नहीं मिली?”

अवनी मुस्कुराई।

“कम से कम यह अपने चेहरे पर नकली चमक लगाकर नहीं घूमता।”

वीराज का चेहरा तन गया।

काव्या कुछ समझी नहीं।

लेकिन अवनी आगे बढ़ गई।

—

अगले कुछ सप्ताह में हालात तेजी से बदले।

लोग कालीधार की घटना को शुभ संकेत मानने लगे।

महाराज को मजबूर होकर अवनी को राजपरिवार का दर्जा वापस देना पड़ा, हालांकि उत्तराधिकार अब भी काव्या के पास था।

लेकिन अवनी को इसकी परवाह नहीं थी।

वह महल के बजाय राजधानी के पुराने हिस्से में स्थित रानी बावड़ी हवेली में रहने लगी।

यह हवेली वर्षों से खाली थी।

उसके बीचोंबीच एक विशाल बावड़ी थी जिसकी सीढ़ियां जमीन के कई स्तर नीचे उतरती थीं।

शिवांश ने वहां पहुंचकर चारों तरफ देखा।

“जगह बुरी नहीं है।”

अवनी ने टूटी हुई छत की तरफ देखा।

“तुम्हारे लिए शायद।”

“राजकुमारी के लिए?”

“मैं अब राजकुमारी नहीं बनना चाहती।”

शिवांश मुस्कुराया।

“तो?”

अवनी ने कुछ देर सोचा।

“बस अवनी।”

शिवांश ने पहली बार बिना किसी उपाधि के कहा—

“ठीक है, अवनी।”

न जाने क्यों उसके मुंह से अपना नाम सुनकर अवनी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

—

समय बीतता गया।

शिवांश आसपास के गरीब लोगों का इलाज करने लगा।

वह कभी पैसे नहीं मांगता।

कोई अनाज दे देता।

कोई सब्जी।

कोई कुछ नहीं दे पाता तो वह हंसकर कहता—

“अगली बार बीमार मत पड़ना, वही फीस है।”

अवनी उसे देखती रहती।

वह वीराज से बिल्कुल अलग था।

वीराज हर काम के बदले सम्मान चाहता था।

शिवांश को शायद सम्मान की जरूरत ही नहीं थी।

लेकिन एक बात अब भी अवनी को परेशान करती थी।

वह रात को अक्सर गायब हो जाता।

कभी दो घंटे।

कभी पूरी रात।

और लौटने पर उसके कपड़ों पर मिट्टी, राख या कभी-कभी खून लगा होता।

जब अवनी पूछती—

“कहां थे?”

जवाब मिलता—

“जड़ी-बूटी ढूंढने।”

अवनी एक रात बोली—

“जड़ी-बूटियां तलवार से काटकर लाते हो क्या?”

शिवांश ने अपने फटे कपड़े की तरफ देखा।

“कांटेदार पौधा था।”

“और खून?”

“बहुत कांटेदार था।”

अवनी ने आंखें घुमा लीं।

“झूठ बोलना तुम्हें बिल्कुल नहीं आता।”

शिवांश बोला—

“तो समझ लो आधा सच है।”

अवनी ने तुरंत कहा—

“मुझे आधे सच से नफरत है।”

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर शिवांश की मुस्कान गायब हो गई।

“एक दिन पूरा सच बताऊंगा।”

“कब?”

“जब उससे तुम्हारी जान को खतरा कम हो जाएगा।”

अवनी ने कहा—

“मेरी जान को खतरा तो पैदा होते ही हो गया था।”

शिवांश उसके इस जवाब पर कुछ नहीं बोल सका।

—

उनकी दोस्ती कब प्रेम में बदल गई, शायद दोनों को खुद पता नहीं चला।

एक दिन गांव की एक बूढ़ी महिला इलाज करवाने आई।

उसने दोनों को लड़ते देखा और जाते-जाते अवनी से कहा—

“बेटी, पति से इतना भी मत लड़ो।”

अवनी ने कहा—

“यह मेरे पति नहीं हैं।”

बूढ़ी महिला हैरान होकर शिवांश को देखने लगी।

“तो अभी तक शादी क्यों नहीं की?”

शिवांश खांसने लगा।

अवनी का चेहरा लाल हो गया।

महिला चली गई तो दोनों कुछ देर चुप रहे।

फिर शिवांश ने कहा—

“बूढ़ी अम्मा की याददाश्त कमजोर है, लेकिन सलाह देने में तेज हैं।”

अवनी हंस पड़ी।

बहुत समय बाद वह इस तरह हंसी थी।

कुछ दिनों बाद शिवांश उसे रानी बावड़ी के पास बने छोटे से शिव मंदिर में ले गया।

वहां न कोई शाही मंडप था।

न सैकड़ों मेहमान।

न नगाड़े।

सिर्फ कुछ गांव वाले, बूढ़ा पुजारी और पहाड़ों से आती ठंडी हवा।

शिवांश ने पूछा—

“तुम्हें महल जैसा विवाह नहीं चाहिए?”

अवनी ने कहा—

“एक बार बहुत बड़ा विवाह कर चुकी हूं।”

“उसका नतीजा अच्छा नहीं था।”

शिवांश समझा कि वह वीराज की बात कर रही है।

उसे यह नहीं पता था कि अवनी सचमुच दूसरे जीवन की बात कर रही थी।

अवनी ने आगे कहा—

“इस बार मुझे मंडप से ज्यादा इंसान पर भरोसा करना है।”

और उसी छोटे से मंदिर में दोनों ने विवाह कर लिया।

—

शादी के कुछ सप्ताह बाद अवनी ने राजधानी में एक और अजीब बात महसूस की।

लड़कियां गायब हो रही थीं।

पहली बार उसे जानकारी तब मिली जब हवेली में काम करने वाली मीरा रोते हुए आई।

“मालकिन… मेरी छोटी बहन तीन दिन से घर नहीं लौटी।”

अवनी ने पूछा—

“कहां गई थी?”

“राजमहल से लोग आए थे।”

“कहा देवी सेवा के लिए उसका चयन हुआ है।”

अवनी के भीतर कुछ हिल गया।

“कौन-सी देवी सेवा?”

“कहते हैं कुछ लड़कियों को दूर के मंदिरों में भेजते हैं।”

मीरा ने सिर झुका लिया।

“गरीब घर की बेटी को महल से बुलावा आए तो कौन मना करे?”

अवनी को अचानक पिछली जिंदगी की एक धुंधली याद आई।

वीराज कभी-कभी कहता था—

“देवी सेवा के लिए चुनी गई लड़कियों का नाम पूछना राजघराने के लिए ठीक नहीं।”

उसने उस समय सवाल नहीं किया था।

अब करेगी।

अवनी ने पुराने अभिलेख मंगवाए।

पिछले दस वर्षों में लगभग तीन सौ लोगों को अलग-अलग मंदिरों में सेवा के लिए भेजा गया था।

लेकिन कई नामों के सामने वापसी की कोई तारीख नहीं थी।

अवनी ने पूछा—

“इनके परिवारों ने शिकायत नहीं की?”

अभिलेख अधिकारी बोला—

“कुछ ने की थी।”

“फिर?”

“कहा गया कि वे देवी की सेवा में जीवन समर्पित कर चुके हैं।”

अवनी ने सूची पर नजर दौड़ाई।

लगभग हर आदेश पर एक ही सेनाधिकारी की मुहर थी।

भैरव सिंह।

और उसके ऊपर—

वीराज की स्वीकृति।

अवनी की उंगलियां ठंडी हो गईं।

—

उस रात उसने शिवांश से कुछ नहीं कहा।

वह खुद सच्चाई देखना चाहती थी।

अगले कई दिनों तक उसने वीराज की गतिविधियों पर नजर रखी।

हर तीसरे दिन दोपहर के बाद वीराज महल के पिछले बगीचे की तरफ जाता।

वहां से आगे एक पुराना रास्ता शहर के बाहर बंद पड़ी नील की फैक्ट्री की ओर जाता था।

एक शाम अवनी साधारण महिला के कपड़े पहनकर उसके पीछे निकल गई।

वीराज फैक्ट्री के अंदर गया।

कुछ देर बाद भैरव भी पहुंचा।

अवनी टूटी दीवार के पीछे छिप गई।

भीतर से आवाज आई—

“इस बार संख्या कम क्यों है?”

भैरव बोला—

“गांवों में लोग सवाल पूछने लगे हैं।”

वीराज की आवाज कठोर हो गई।

“तो दूसरे गांव जाओ।”

“मुझे शक्ति चाहिए।”

अवनी का दिल जोर से धड़कने लगा।

शक्ति?

किसकी शक्ति?

कुछ देर बाद दोनों बाहर चले गए।

अवनी ने इंतजार किया।

फिर फैक्ट्री के अंदर गई।

वहां कुछ खास नहीं था।

टूटी मशीनें।

पुराने कपड़े।

खाली बर्तन।

लेकिन उसे हल्की सी आवाज सुनाई दी।

जैसे जमीन के नीचे कोई रो रहा हो।

अवनी ने कान लगाया।

हां।

यह किसी महिला की आवाज थी।

वह आवाज का पीछा करते हुए पुराने रंग वाले विशाल पात्र तक पहुंची।

पात्र हटाने पर नीचे लोहे का दरवाजा दिखाई दिया।

अवनी ने सांस रोक ली।

दरवाजा खुला।

नीचे सीढ़ियां थीं।

अंधेरा।

बहुत गहरा अंधेरा।

अवनी ने मशाल जलाई और नीचे उतरने लगी।

पहली दस सीढ़ियां।

फिर बीस।

फिर पचास।

जैसे-जैसे वह नीचे जाती गई, हवा ठंडी होती गई।

फिर सामने सुरंग खुल गई।

अवनी कुछ कदम आगे बढ़ी।

और जो उसने देखा…

उसके पैर वहीं जम गए।

यह तहखाना नहीं था।

जमीन के नीचे पूरा विशाल परिसर बना हुआ था।

पत्थर के कमरों की लंबी कतार।

लोहे के दरवाजे।

दीवारों पर रहस्यमयी यंत्र।

और उन यंत्रों के बीच—

इंसान।

दर्जनों इंसान।

कुछ महिलाएं।

कुछ युवक।

कुछ तो मुश्किल से पंद्रह-सोलह वर्ष के होंगे।

उनके हाथ-पैर लोहे की जंजीरों से बंधे थे।

शरीर पर पतली चमकती नलिकाएं लगी थीं जिनसे सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे एक बड़े कांच के पात्र में जमा हो रही थी।

अवनी का गला सूख गया।

“हे भगवान…”

आप भाग 4 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 69 मिनट

भाग 4

एक लड़की ने उसे देखा।

“कौन…?”

अवनी तुरंत उसके पास गई।

“डरो मत।”

“तुम यहां कैसे आईं?”

लड़की रोने लगी।

“हमें देवी सेवा के लिए लाया गया था।”

“लेकिन यहां बंद कर दिया।”

“वे हमारी शक्ति निकालते हैं।”

“कौन?”

लड़की की आंखों में आतंक था।

“वीराज।”

अवनी का पूरा शरीर सिहर गया।

एक बूढ़ी महिला बगल की कोठरी से बोली—

“वह देवता का योद्धा नहीं है।”

“उसकी सूर्यरेखा नकली है।”

अवनी धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ी।

वृद्धा ने कांपते हाथ से कांच के बड़े पात्र की ओर इशारा किया।

“वह हमसे निकाला हुआ तेज अपने शरीर में भरता है।”

“इसी से उसकी रेखा चमकती है।”

अवनी की सांस रुक गई।

उसे शिवांश की बात याद आई—

“वीराज की सूर्यरेखा असली नहीं है।”

अब सब समझ आने लगा।

लेकिन तभी उसकी नजर दूर बने दूसरे कक्ष पर गई।

वहां कुछ महिलाएं अलग रखी गई थीं।

उनमें से कई गर्भवती थीं।

अवनी का खून जम गया।

वह उनके पास पहुंची।

“तुम सब…?”

एक महिला ने रोते हुए कहा—

“हमारी शक्ति ज्यादा थी।”

“इसलिए हमें मरने नहीं दिया।”

“वे कहते हैं हमारे बच्चों में ज्यादा तेज होगा।”

अवनी ने दीवार पकड़ ली।

उसके दिमाग में पहली जिंदगी की अपनी गर्भावस्था घूम गई।

उसकी कमजोरी।

वीराज का अचानक शक्तिशाली होना।

उसका बच्चा।

उसकी मृत्यु।

क्या वीराज केवल उसका पति नहीं था?

क्या वह उसके शरीर की शक्ति का इस्तेमाल कर रहा था?

एक और महिला धीरे से बोली—

“जो बच्चे यहां पैदा होते हैं…”

वह बोलते-बोलते रो पड़ी।

अवनी का दिल बैठ गया।

“उनका क्या होता है?”

महिला ने जवाब नहीं दिया।

लेकिन कमरे के एक कोने की तरफ देख लिया।

अवनी वहां गई।

पत्थर की दीवार के पीछे राख से भरे कई बड़े पात्र रखे थे।

उनके पास बच्चों के छोटे-छोटे कंगन पड़े थे।

अवनी के हाथ से मशाल गिरते-गिरते बची।

उसकी आंखों के सामने पहली जिंदगी का अपना बच्चा घूम गया।

इस बार उसका दुख गुस्से में बदल गया।

“वीराज…”

उसके मुंह से निकला।

“तुम इंसान नहीं हो।”

कोठरियों से आवाजें आने लगीं।

“हमें बचा लीजिए।”

“कृपया।”

“हमें यहां से निकाल दीजिए।”

अवनी तुरंत ताले की तरफ बढ़ी।

लेकिन फिर रुक गई।

अगर वह अभी उन्हें बाहर निकालती…

वीराज को तुरंत पता चल जाता।

उसके सैनिक रास्ते बंद कर देते।

इतने कमजोर लोगों को एक साथ निकाल पाना संभव नहीं था।

और सबसे जरूरी—

अभी उसके पास केवल कैदियों की बात थी।

राजसभा में वीराज इसे झूठ बता सकता था।

अवनी ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

दिल कह रहा था अभी ताला तोड़ दो।

दिमाग कह रहा था—

इस बार जल्दबाजी मत करना।

पिछली जिंदगी में उसने हर फैसला भावनाओं में किया था।

इस जीवन में नहीं।

उसने कैदियों से कहा—

“मैं वापस आऊंगी।”

एक लड़की रोते हुए बोली—

“सब यही कहते हैं।”

अवनी उसके सामने घुटनों पर बैठ गई।

“मेरी तरफ देखो।”

लड़की ने देखा।

“मैं वापस आऊंगी।”

“लेकिन अगर आज मैं तुम्हें निकालने की कोशिश करूंगी, तो शायद तुम बाहर पहुंचने से पहले मार दी जाओगी।”

“मुझे रास्ते, सैनिकों की संख्या और सबूत चाहिए।”

“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रही।”

“मैं तुम्हें जिंदा निकालने की तैयारी करने जा रही हूं।”

अवनी ने वहां रखी कुछ मुहरें, आदेशों की प्रतियां और तेज निकालने वाले यंत्र का छोटा हिस्सा अपने कपड़ों में छिपा लिया।

फिर ऊपर लौट आई।

—

लेकिन कहानी में असली झटका अभी बाकी था।

जब अवनी हवेली लौटी, शिवांश वहां नहीं था।

रात आधी बीत गई।

वह नहीं आया।

अवनी पहले ही तनाव में थी।

इस बार उसने फैसला किया—

बस बहुत हुआ।

वह खुद उसका पीछा करेगी।

अगली रात शिवांश फिर चुपचाप निकला।

अवनी कुछ दूरी पर उसके पीछे चलती रही।

वह शहर से बाहर जंगल की तरफ गया।

फिर एक पुराने खंडहर तक पहुंचा।

अवनी पेड़ के पीछे छिप गई।

शिवांश ने आसपास देखा।

फिर…

उसने अपनी लाठी जमीन पर रख दी।

अवनी की आंखें फैल गईं।

वह सीधा खड़ा हो गया।

बिना किसी सहारे के।

फिर उसने अपने दोनों हाथ आगे किए।

उसके चारों ओर नीली और लाल आग घूमने लगी।

उसकी घायल टांग के आसपास चमकदार रेखाएं दिखाई दीं।

अवनी का दिल जोर से धड़कने लगा।

“तो यह भी झूठ था?”

उसी समय पीछे से किसी ने अवनी के मुंह पर हाथ रख दिया।

वह पलटी।

काले कपड़ों में एक आदमी तलवार लेकर खड़ा था।

“किसका पीछा कर रही थी?”

अवनी ने उसके हाथ पर काट लिया।

वह पीछे हटा।

अवनी भागी।

लेकिन सामने से दो और लोग आ गए।

पहला आदमी तलवार उठाकर उसकी तरफ बढ़ा।

तभी—

नीली आग की तेज लहर हवा को चीरती हुई आई।

धड़ाम!

तीनों आदमी जमीन पर जा गिरे।

अवनी ने पलटकर देखा।

शिवांश कुछ ही कदम दूर खड़ा था।

अब उसके हाथ में लाठी नहीं थी।

उसकी आंखों में हल्की लाल चमक थी।

अवनी स्तब्ध रह गई।

“तुम…”

शिवांश उसकी तरफ आया।

“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”

अवनी का गुस्सा फूट पड़ा।

“और तुम्हें मुझसे झूठ नहीं बोलना चाहिए था!”

“मैंने—”

“तुम चल सकते हो!”

शिवांश ने अपनी टांग की तरफ देखा।

“पूरी तरह नहीं।”

“लेकिन अभी तो—”

“कुछ समय के लिए।”

अवनी ने उसकी आंखों में देखा।

“तुम हो कौन?”

शिवांश चुप।

अवनी की आंखों में पानी आ गया।

लेकिन इस बार वह दुख नहीं, गुस्सा था।

“पहली जिंदगी…”

वह बोलते-बोलते रुक गई।

उसने खुद को संभाला।

“मेरी पूरी जिंदगी लोगों के झूठ ने बर्बाद की है।”

“मां ने सच छिपाया।”

“पिता ने अपना चेहरा छिपाया।”

“वीराज ने प्रेम का झूठ बोला।”

“अब तुम।”

शिवांश ने धीरे से कहा—

“मैंने तुमसे प्रेम के बारे में कभी झूठ नहीं बोला।”

अवनी का चेहरा बदल गया।

दोनों कुछ पल चुप रहे।

शिवांश आगे बोला—

“मेरी शक्ति सच है।”

“मेरी चोट भी सच है।”

“मेरे अतीत के बारे में जो नहीं बताया… वह भी किसी कारण से।”

अवनी ने कहा—

“कारण चाहे जो हो।”

“विश्वास आधे सच पर नहीं टिकता।”

वह वापस जाने लगी।

शिवांश ने पीछे से कहा—

“अवनी।”

वह नहीं रुकी।

इस बार शिवांश ने उसे जाने दिया।

—

कुछ दिन दोनों के बीच बातचीत लगभग बंद रही।

इसी दौरान अवनी की तबीयत खराब रहने लगी।

पहले उसे लगा कि तहखाने की घटना और तनाव का असर है।

लेकिन एक सुबह वह बेहोश हो गई।

जब आंख खुली तो बूढ़ी वैद्य उसके पास बैठी मुस्कुरा रही थी।

“बधाई हो।”

अवनी समझी नहीं।

“किस बात की?”

“तुम मां बनने वाली हो।”

अवनी की सांस रुक गई।

उसका हाथ अपने पेट पर चला गया।

और उसी क्षण पहली जिंदगी का दृश्य लौट आया।

उसका नवजात बच्चा।

उसका छोटा शरीर।

वीराज का निर्दयी चेहरा।

अवनी के हाथ कांपने लगे।

वैद्य चली गई तो कमरे के बाहर खड़ा शिवांश धीरे-धीरे अंदर आया।

दोनों की आंखें मिलीं।

शिवांश के चेहरे पर खुशी भी थी और डर भी।

वह अवनी के पास बैठा।

“मैं जानता हूं तुम मुझसे नाराज हो।”

अवनी चुप रही।

“लेकिन एक बात का वचन देता हूं।”

“तुम और यह बच्चा…”

उसने अपना हाथ अवनी के हाथ पर रखा।

“मेरी सांस रहते किसी के सामने अकेले नहीं पड़ोगे।”

अवनी ने उसकी आंखों में देखा।

पहली बार उसे लगा कि शिवांश अपनी पहचान चाहे छिपा रहा हो…

लेकिन यह वचन झूठा नहीं था।

उसने उसका हाथ हटाया नहीं।

—

उधर वीराज तक भी खबर पहुंच गई।

भैरव ने उसके कान में कहा—

“अवनी गर्भवती है।”

वीराज कुछ पल शांत रहा।

फिर उसके हाथ में पकड़ा प्याला टूट गया।

“पक्का?”

“राजवैद्य की सहायिका ने पुष्टि की है।”

वीराज की आंखें कठोर हो गईं।

“और कालीधार का क्या?”

“वहां नीली अग्नि अभी तक जल रही है।”

वीराज उठ खड़ा हुआ।

“नहीं।”

“यह बच्चा पैदा नहीं होना चाहिए।”

भैरव ने पूछा—

“क्यों?”

वीराज उसकी तरफ मुड़ा।

“तुम नहीं समझोगे।”

“अगर नील-अग्नि की रक्तधारा सच में वापस आ गई…”

“तो जिन शक्तियों को हमने वर्षों से अपना बताया है, उनकी सच्चाई भी सामने आ सकती है।”

भैरव के चेहरे पर डर आया।

“तो क्या करें?”

वीराज ने कहा—

“कालीधार को जला दो।”

“और जो भी पुराना शिलालेख, मूर्ति या अभिलेख मिले…”

“सब खत्म कर दो।”

—

उसी रात कालीधार शक्तिपीठ पर हमला हुआ।

लेकिन वीराज के सैनिकों को पता नहीं था कि शिवांश पहले ही वहां पहुंच चुका था।

अवनी से दूर होने के बाद भी वह लगातार खतरे पर नजर रख रहा था।

जब सैनिक मंदिर के पुराने अभिलेख जलाने लगे, शिवांश छाया की तरह उनके बीच उतरा।

लड़ाई शुरू हुई।

तलवारें चमकीं।

नीली आग बर्फ के ऊपर दौड़ी।

लेकिन इस दौरान एक सैनिक गर्भगृह के पीछे छिपी दीवार तोड़ने में सफल हो गया।

दीवार के पीछे एक विशाल चित्र था।

हजारों वर्ष पुराना।

उस चित्र में एक स्त्री खड़ी थी।

उसके कंधे से नीली अग्नि की रेखाएं निकल रही थीं।

बिल्कुल अवनी जैसी।

लेकिन सैनिक की नजर स्त्री पर नहीं रुकी।

उसके बगल में खड़े पुरुष पर टिक गई।

लंबे बाल।

हाथ में अग्नि-चिह्न वाली तलवार।

और चेहरा…

सैनिक का मुंह खुला रह गया।

“यह…”

पीछे खड़े भैरव ने मशाल उठाकर चित्र देखा।

उसका शरीर सिहर गया।

चित्र में बना आदमी बिल्कुल शिवांश जैसा दिखाई दे रहा था।

नीचे पत्थर में कुछ शब्द लिखे थे—

“अग्निरक्षक।”

“नीलवंश का प्रहरी।”

और उसके नीचे—

“जब रक्तधारा लौटेगी, रक्षक भी लौटेगा।”

भैरव ने धीरे से शिवांश की तरफ देखा।

जो कुछ दूरी पर खड़ा था।

पहली बार उसके चेहरे पर भय साफ दिखाई दिया।

“तुम…”

“तुम आखिर हो कौन?”

शिवांश ने कोई जवाब नहीं दिया।

लेकिन तभी उसके हाथ के आसपास लाल और नीली आग एक साथ जल उठी।

और उसी क्षण…

देवकुंड की रानी बावड़ी हवेली में सो रही अवनी की आंख अचानक खुल गई।

उसके पेट के अंदर जैसे गर्म रोशनी की एक लहर दौड़ी।

वह घबराकर उठ बैठी।

उसकी कलाई पर पहली बार एक बेहद छोटी लाल रेखा चमकी।

अवनी ने उसे देखा।

“यह क्या है?”

खिड़की के बाहर आसमान सामान्य नहीं था।

दूर कालीधार की दिशा में काले बादलों के बीच लाल रोशनी फैल रही थी।

कुछ ही पल में पूरी राजधानी के लोग घरों से बाहर निकल आए।

राजपुरोहित सोमदेव ने आसमान देखा तो उनके हाथ कांप गए।

“यह संकेत…”

महाराज ने पूछा—

“क्या हुआ?”

सोमदेव का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

उन्होंने आसमान से नजर हटाए बिना कहा—

“अगर पुराने ग्रंथ सच हैं…”

“तो देवकुंड में कोई ऐसा बच्चा जन्म लेने वाला है जिसके रक्त में नील-अग्नि और प्राचीन अग्निरक्षक… दोनों की शक्ति होगी।”

पास खड़ा वीराज यह सुनते ही जम गया।

उसके माथे की सुनहरी सूर्यरेखा एक पल के लिए बुझ गई।

और उसके नीचे…

पहली बार एक धूसर काला निशान दिखाई दिया।

वीराज ने तुरंत अपना माथा ढक लिया।

लेकिन देर हो चुकी थी।

भैरव ने वह निशान देख लिया था।

वीराज ने उसकी तरफ देखा।

दोनों की आंखें मिलीं।

और उसी पल भैरव समझ गया—

जिस आदमी की सेवा वह वर्षों से महान सूर्ययोद्धा समझकर करता आया था…

उसकी चमक वास्तव में किसी और की थी।

उधर रानी बावड़ी हवेली में अवनी अपने पेट पर हाथ रखे खिड़की के सामने खड़ी थी।

उसके मन में अब सिर्फ वीराज का रहस्य नहीं था।

एक नया सवाल उससे भी बड़ा हो चुका था।

अगर शिवांश केवल साधारण वैद्य नहीं…

और उसका चेहरा हजारों वर्ष पुराने मंदिर के रक्षक से मिलता है…

तो आखिर उसने अवनी को पहली मुलाकात से ही क्यों पहचान लिया था?

उसकी मां कालीधार का नाम कैसे जानती थी?

नील-अग्नि क्या थी?

और सबसे बड़ी बात—

क्या अवनी का इस जीवन में वापस लौटना सच में संयोग था?

या सात वर्ष पीछे भेजने वाली वह नीली आग किसी ने जानबूझकर उसके लिए जलाई थी?

अवनी ने अपनी मुट्ठी कस ली।

अब उसे समझ आ चुका था।

उसका असली युद्ध वीराज से बदला लेने भर का नहीं था।

देवकुंड में सदियों से एक ऐसा झूठ जिंदा था…

जिसकी जड़ें राजमहल, मंदिर और शायद उसके अपने परिवार तक फैली हुई थीं।

और उस झूठ का सच जानने के लिए उसे सबसे पहले उस आदमी की असली पहचान खोलनी थी…

जिससे वह प्रेम करने लगी थी।

शिवांश।

देवकुंड की उस रात आसमान सामान्य नहीं था।

काले बादलों के बीच लाल और नीली रोशनी ऐसे दौड़ रही थी जैसे आकाश के भीतर दो विशाल अग्नियां एक-दूसरे से टकरा रही हों।

रानी बावड़ी हवेली की सबसे ऊंची खिड़की के सामने खड़ी अवनी दूर कालीधार की दिशा में देख रही थी।

एक हाथ उसके पेट पर था।

दूसरे हाथ की कलाई पर कुछ देर पहले उभरी छोटी लाल रेखा अब धीरे-धीरे गायब हो रही थी।

लेकिन उसके मन में उठ रहे सवाल बढ़ते जा रहे थे।

शिवांश कौन था?

उसका चेहरा हजारों वर्ष पुराने चित्र में क्यों था?

उसकी मां कालीधार के रहस्य के बारे में कैसे जानती थी?

और सबसे बड़ा सवाल—

नीली आग ने उसे सात वर्ष पीछे क्यों भेजा?

आप भाग 5 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 69 मिनट

भाग 5

तभी हवेली के मुख्य द्वार पर जोर-जोर से दस्तक हुई।

धड़ाम!

धड़ाम!

“अवनी!”

“दरवाजा खोलो!”

आवाज पहचानते ही अवनी चौंक गई।

“काव्या?”

वह नीचे पहुंची।

दरवाजा खुलते ही काव्या अंदर आ गई।

उसकी हालत देखकर अवनी कुछ पल उसे पहचान ही नहीं पाई।

उसके बाल बिखरे हुए थे।

चेहरे पर कोई श्रृंगार नहीं।

हाथों की नसें काली पड़ चुकी थीं और उसकी आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे।

कुछ महीने पहले तक गर्व से चमकने वाली काव्या इतनी कमजोर हो गई थी जैसे कई वर्षों से बीमार हो।

अवनी ने पूछा—

“तुम्हें क्या हुआ?”

काव्या ने दरवाजा बंद किया।

“वीराज मुझे मार डालेगा।”

अवनी शांत हो गई।

कुछ क्षण दोनों बहनें एक-दूसरे को देखती रहीं।

काव्या की आंखों में पहली बार वह घमंड नहीं था जिसे अवनी बचपन से देखती आई थी।

सिर्फ डर था।

“बैठो।”

काव्या ने सिर हिलाया।

“समय नहीं है।”

उसने अपने कपड़ों के अंदर से एक छोटी लोहे की चाबी निकाली।

“यह लो।”

अवनी ने चाबी नहीं ली।

“किस चीज की है?”

काव्या की आवाज कांप रही थी।

“वीराज के निजी कक्ष की।”

अवनी की आंखें सिकुड़ गईं।

काव्या बोली—

“मुझे पता है तुम उसके पीछे कुछ खोज रही हो।”

“और अब मुझे भी पता है कि वह क्या कर रहा है।”

अवनी ने पूछा—

“तुम्हें कैसे पता?”

काव्या ने अपनी बांह आगे कर दी।

जहां कभी हल्की सुनहरी चमकती रेखा थी, वह लगभग गायब हो चुकी थी।

“वह मेरी शक्ति खींच रहा है।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

काव्या की आंखों से आंसू निकल आए।

“शुरुआत में मुझे लगा मैं बीमार हूं।”

“लेकिन हर रात वह मेरे पास आता और अगले दिन मैं पहले से ज्यादा कमजोर होती।”

“जब मैंने सवाल किया तो उसने कहा कि राजवंश के बच्चे के लिए यह सामान्य है।”

अवनी का चेहरा बदल गया।

“तुम गर्भवती हो?”

काव्या ने धीरे से सिर हिलाया।

अवनी को पिछला जीवन याद आ गया।

वह खुद।

उसकी कमजोरी।

उसका बच्चा।

वीराज।

सब कुछ जैसे फिर दोहराया जा रहा था।

बस इस बार शिकार काव्या थी।

काव्या रोते हुए बोली—

“मैंने सोचा था तुम्हें हराकर मैंने सब कुछ जीत लिया।”

“राजमहल।”

“वीराज।”

“उत्तराधिकार।”

उसने कड़वी हंसी हंसी।

“लेकिन अब समझ आया है कि मैंने तुमसे तुम्हारी खुशी नहीं छीनी थी।”

“मैंने तुम्हारी जगह खुद अपने लिए मौत चुन ली।”

अवनी कुछ देर चुप रही।

पहले जीवन में यही स्त्री उसे खाई में धकेल चुकी थी।

उसका मन कह सकता था—

भुगतो।

लेकिन उसके सामने अब दुश्मन नहीं, भयभीत स्त्री बैठी थी।

और अवनी नहीं चाहती थी कि उसका नया जीवन पुराने बदले की आग में फिर बर्बाद हो।

उसने चाबी ले ली।

“उस कक्ष में क्या है?”

काव्या ने कहा—

“बही-खाते।”

“नाम।”

“गांव।”

“किससे कितनी शक्ति ली गई।”

“किसे देवी सेवा के नाम पर भेजा गया।”

“और…”

वह रुक गई।

“महाराज की राजमुद्रा वाले आदेश।”

अवनी का दिल धक से रह गया।

“पिताजी?”

“मुझे नहीं पता उन्हें पूरी सच्चाई पता थी या नहीं।”

“लेकिन आदेश उनकी मुहर से निकले हैं।”

काव्या जाने लगी।

अवनी ने पूछा—

“तुम कहां जाओगी?”

काव्या ने जवाब दिया—

“जहां वीराज मुझे न ढूंढ सके।”

अवनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुम कहीं नहीं जाओगी।”

काव्या चौंक गई।

“मैं तुम्हारे साथ जो कर चुकी हूं उसके बाद भी?”

अवनी की आंखों में दर्द आया।

“मैं तुम्हें माफ नहीं कर रही।”

“लेकिन तुम्हारे बच्चे ने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा।”

काव्या की आंखों से आंसू बह निकले।

पहली बार उसने अवनी के सामने सिर झुका दिया।

—

उधर कालीधार में युद्ध समाप्त हो चुका था।

बर्फ पर जली हुई मशालें और टूटी तलवारें बिखरी थीं।

भैरव सिंह मंदिर की दीवार के सामने खड़ा उस हजारों वर्ष पुराने चित्र को घूर रहा था।

चित्र में बना अग्निरक्षक बिल्कुल शिवांश जैसा था।

“तुम कौन हो?”

भैरव ने फिर पूछा।

शिवांश ने अपनी तलवार नीचे कर दी।

“जिसे तुम समझ रहे हो, वह नहीं।”

भैरव ने कहा—

“चित्र हजारों साल पुराना है।”

“और चेहरा तुम्हारा है।”

शिवांश दीवार के पास गया।

उसने चित्र पर हाथ रखा।

“यह मेरे पूर्वज रुद्रांश थे।”

भैरव चौंका।

शिवांश ने आगे कहा—

“अग्निरक्षक वंश में कई पीढ़ियों से एक जैसे चेहरे जन्म लेते रहे हैं।”

“यही कारण है कि मुझे बचपन से छिपाकर रखा गया।”

भैरव ने पूछा—

“अग्निरक्षक कौन थे?”

शिवांश ने उसकी तरफ देखा।

“वे लोग जिन्हें तुम्हारे राजवंश के इतिहास से जानबूझकर मिटा दिया गया।”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्होंने उस व्यवस्था का विरोध किया था जिसमें शरीर की रेखा देखकर इंसान की कीमत तय होती थी।”

भैरव की सांस अटक गई।

शिवांश ने दीवार के नीचे जमी धूल हटाई।

पत्थर पर पुरानी लिखावट दिखाई दी।

“देवकुंड में कभी सुनहरी रेखा श्रेष्ठ नहीं मानी जाती थी।”

“हर रेखा किसी न किसी तरह की शक्ति का संकेत होती थी।”

“फिर कई शताब्दियों पहले राजसत्ता ने लोगों को वर्गों में बांटना शुरू किया।”

“जिसके पास शक्ति थी, उसे देवता का प्रिय कहा गया।”

“जिसके पास अलग शक्ति थी, उसे अशुभ।”

भैरव धीमे स्वर में बोला—

“तो नील-अग्नि?”

शिवांश ने कहा—

“वह सबसे दुर्लभ रेखाओं में से एक है।”

“उसका काम शक्ति जमा करना नहीं…”

“झूठी और चुराई हुई शक्ति को पहचानना है।”

भैरव के चेहरे का रंग उड़ गया।

उसे वीराज का माथा याद आया।

एक पल के लिए बुझी हुई सुनहरी रेखा।

और उसके नीचे छिपा धूसर निशान।

अब सब कुछ जुड़ रहा था।

शिवांश ने कहा—

“अगर तुम्हें अभी भी वीराज की सेवा करनी है तो तलवार उठा लो।”

भैरव ने लंबे समय तक उसकी तरफ देखा।

फिर धीरे-धीरे अपनी तलवार जमीन पर रख दी।

“मैंने बहुत देर तक गलत आदमी की सेवा की है।”

—

दो दिन बाद देवकुंड में नवरात्रि शुरू हुई।

पूरी राजधानी को दीपों, गेंदे के फूलों और लाल पताकाओं से सजाया गया।

लेकिन इस बार उत्सव के पीछे कुछ और चल रहा था।

वीराज ने घोषणा की कि नवमी की रात सूर्याभिषेक होगा।

राजपुरोहित सोमदेव के अनुसार वीराज अपनी दिव्य सूर्यरेखा से पूरे देवकुंड को आने वाले अकाल से बचाएगा।

लोगों में उत्साह था।

उन्हें क्या पता था कि उसी रात राजधानी के नीचे 108 लोगों को एक साथ मौत के मुंह में धकेलने की तैयारी हो रही है।

वीराज की असली योजना बहुत बड़ी थी।

अब तक वह एक-एक इंसान से तेज चुराता था।

लेकिन इस बार उसने पुराने भूमिगत यंत्रों को जोड़कर ऐसा मंडल बनवाया था जिससे 108 लोगों की शक्ति एक साथ उसके शरीर में आ सके।

अगर वह सफल हो जाता…

तो उसकी नकली सूर्यरेखा स्थायी हो जाती।

फिर शायद किसी नील-अग्नि का स्पर्श भी उसका सच नहीं खोल सकता था।

—

उधर अवनी, काव्या, शिवांश और भैरव पहली बार एक ही कमरे में बैठे थे।

टेबल पर देवकुंड का नक्शा खुला था।

भैरव ने एक स्थान पर उंगली रखी।

“मुख्य तहखाना यहां है।”

अवनी बोली—

“मैं वहां जा चुकी हूं।”

भैरव ने सिर हिलाया।

“लेकिन तुम केवल पहली मंजिल तक पहुंची थीं।”

अवनी चौंक गई।

“उसके नीचे भी कुछ है?”

“तीन मंजिलें।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

भैरव ने कहा—

“सबसे नीचे शक्ति-संग्रह मंडल है।”

“नवमी की रात जिन लोगों को देवी सेवा के नाम पर बुलाया गया है, उन्हें वहीं ले जाया जाएगा।”

अवनी ने पूछा—

“कितने लोग?”

“108।”

काव्या ने मुंह पर हाथ रख लिया।

शिवांश ने पूछा—

“रक्षा?”

“लगभग दो सौ सैनिक।”

“और आधे सैनिकों को भी नहीं पता कि वे किसकी रक्षा कर रहे हैं।”

अवनी कुछ देर नक्शा देखती रही।

“तो हमें सैनिकों से लड़ना नहीं है।”

भैरव बोला—

“और क्या करेंगे?”

“उन्हें सच दिखाएंगे।”

अवनी ने कहा—

“वीराज इसीलिए इतना शक्तिशाली है क्योंकि हर कोई उसका झूठ मानता है।”

“अगर हम सिर्फ उसे मार देंगे तो कल कोई दूसरा वीराज पैदा हो जाएगा।”

“मुझे उसका चेहरा नहीं…”

“उसकी बनाई व्यवस्था तोड़नी है।”

शिवांश ने अवनी को देखा।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

“यही वजह है कि नील-अग्नि ने तुम्हें चुना।”

अवनी ने उसकी तरफ देखा।

“और अब तुम मुझे पूरा सच बताओगे।”

शिवांश कुछ क्षण शांत रहा।

फिर उसने अपनी आस्तीन ऊपर की।

उसकी बांह पर लाल और नीली रेखाएं थीं।

“मेरे पूर्वज अग्निरक्षक थे।”

“हम देवकुंड के शासक नहीं, प्रहरी थे।”

“जब राजाओं ने जन्मरेखाओं के नाम पर लोगों को बांटना शुरू किया, मेरे वंश ने विरोध किया।”

“अधिकतर लोग मार दिए गए।”

“कुछ पहाड़ों में छिप गए।”

“मेरे पिता उन्हीं में से एक थे।”

अवनी ने पूछा—

“तुम कालीधार पर क्या कर रहे थे?”

शिवांश ने कहा—

“वीराज के लोग वर्षों से वहां पुरानी निशानियां मिटा रहे थे।”

“मैं उन्हें रोकते हुए घायल हुआ।”

“जब तुमने मुझे रास्ते में पाया, मैं सच में मरने की हालत में था।”

अवनी की आंखें नरम हुईं।

“और तुमने मुझे पहली बार देखते ही पहचान लिया था?”

शिवांश ने सिर हिलाया।

“तुम्हारी रेखा देखकर।”

“मुझे पता था नील-अग्नि वापस आ चुकी है।”

“लेकिन मुझे नहीं पता था तुम कौन हो।”

अवनी ने अपनी मां के बारे में पूछा।

शिवांश बोला—

“तुम्हारी मां भी नीलवंश की थीं।”

अवनी की सांस रुक गई।

“क्या?”

“उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर महाराज से विवाह किया।”

“उन्हें डर था कि अगर राजमहल को उनकी असली रक्तधारा पता चली तो तुम्हें जन्म लेते ही मार दिया जाएगा।”

अवनी की आंखें भर आईं।

अब मां की हर बात समझ आ रही थी।

वह उसकी रेखा छिपाकर उसे शर्मिंदा नहीं कर रही थीं।

वह उसे बचा रही थीं।

लेकिन उनके पास पूरा सच बताने का समय नहीं था।

अवनी ने पूछा—

“और मेरा वापस आना?”

इस सवाल पर शिवांश भी चुप हो गया।

“उसका जवाब मेरे पास नहीं।”

“नील-अग्नि समय को पीछे मोड़ सकती है, ऐसा मैंने किसी ग्रंथ में नहीं पढ़ा।”

“शायद तुम्हारे साथ जो हुआ…”

उसने अवनी की चांदी की पायल देखी।

“उसका संबंध इससे है।”

अवनी ने पायल निकालकर हथेली पर रखी।

शिवांश का चेहरा बदल गया।

“यह तुम्हें किसने दी?”

“मां ने।”

शिवांश ने पायल के अंदर बने छोटे चिन्ह को देखा।

“यह अग्निरक्षक और नीलवंश का संयुक्त चिह्न है।”

अवनी स्तब्ध रह गई।

यानि उसकी मां और शिवांश का वंश पहले से एक-दूसरे से जुड़े थे।

लेकिन अभी उनके पास इतिहास समझने का समय नहीं था।

नवमी आने वाली थी।

—

नवमी की रात।

देवकुंड का विशाल राजचौक हजारों लोगों से भरा था।

बीच में ऊंचा मंच बनाया गया था।

महाराज रणविजय सिंहासन पर बैठे थे।

राजपुरोहित सोमदेव मंत्र पढ़ रहे थे।

वीराज सफेद और सुनहरे वस्त्रों में मंच पर आया।

उसके माथे की सूर्यरेखा इतनी चमक रही थी कि दूर बैठे लोगों तक दिखाई दे रही थी।

भीड़ से आवाज उठी—

“सूर्यवीर वीराज की जय!”

वीराज ने दोनों हाथ उठाए।

“आज देवकुंड की रक्षा के लिए मैं अपनी शक्ति समर्पित करूंगा।”

लेकिन उसी समय मंच के पीछे गुप्त तहखाने में 108 लोगों को लोहे के मंडल से बांधा जा रहा था।

बच्चे रो रहे थे।

महिलाएं प्रार्थना कर रही थीं।

सैनिकों को बताया गया था कि यह विशेष पूजा है।

तभी पीछे के रास्ते से भैरव सिंह आया।

एक सैनिक ने पूछा—

“सेनानायक?”

भैरव ने कहा—

“सब लोग अपने हथियार नीचे रखो।”

सैनिक चौंक गए।

“लेकिन आदेश—”

“जिसकी रक्षा कर रहे हो पहले उसे देख लो।”

भैरव ने एक कैदी की जंजीर खोल दी।

“ये अपराधी नहीं हैं।”

“ये देवकुंड के नागरिक हैं।”

कुछ सैनिक हिचकिचाए।

तभी दूसरी ओर से अवनी सामने आई।

उसके साथ मीरा और कई गांव वाले थे जिनके परिवार वर्षों से गायब थे।

मीरा ने चीखकर कहा—

“यह मेरी बहन है!”

वह कैद लड़की की तरफ भागी।

दोनों बहनें एक-दूसरे से लिपटकर रोने लगीं।

सैनिकों की आंखें खुल गईं।

अवनी बोली—

“जिसे तुम देवी सेवा समझकर पहरा दे रहे थे, वह इंसानों की बलि है।”

एक सैनिक ने तलवार नीचे कर दी।

फिर दूसरे ने।

फिर तीसरे ने।

अवनी ने कहा—

“आज किसी देवता के नाम पर कोई निर्दोष नहीं मरेगा।”

—

ऊपर मंच पर वीराज मंत्र के बीच अचानक कांपने लगा।

उसके माथे की सुनहरी रेखा कमजोर पड़ने लगी।

वह समझ गया।

“नीचे कुछ हुआ है।”

उसने भैरव को बुलाने का आदेश दिया।

लेकिन भैरव नहीं आया।

तभी भीड़ के पीछे से आवाज आई—

“क्योंकि आज तुम्हारे आदेश मानने वाला कोई नहीं आएगा।”

सबकी नजर उधर गई।

अवनी राजचौक में प्रवेश कर रही थी।

उसके पीछे वे लोग थे जिन्हें वर्षों से मृत माना जा चुका था।

भीड़ में कोहराम मच गया।

“वह मेरी बेटी है!”

“मेरा बेटा!”

“यह तो पांच साल पहले गायब हुआ था!”

लोग अपने परिवारों की ओर दौड़ने लगे।

महाराज खड़े हो गए।

“यह क्या हो रहा है?”

अवनी ने उनके सामने मोटी बही फेंक दी।

“आपके राज्य का सच।”

वीराज गरजा—

“इसे गिरफ्तार करो!”

कोई आगे नहीं आया।

भैरव मंच के सामने आकर खड़ा हो गया।

“आज नहीं।”

वीराज की आंखें फैल गईं।

“भैरव?”

भैरव ने कहा—

“मैंने तुम्हारी रक्षा के लिए तलवार उठाई थी।”

“तुम्हारे पाप छिपाने के लिए नहीं।”

काव्या भी आगे आई।

आप भाग 6 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 69 मिनट

भाग 6

भीड़ में कानाफूसी शुरू हो गई।

वीराज का चेहरा बदल गया।

“तुम?”

काव्या ने अपनी कमजोर बांह दिखाई।

“सबको देखो।”

“यह आदमी दूसरों की शक्ति चुराता है।”

“उसकी सूर्यरेखा नकली है।”

वीराज हंसा।

“एक ईर्ष्यालु पत्नी की बात पर विश्वास करोगे?”

तभी अवनी ने कहा—

“तो प्रमाण दे देते हैं।”

वह धीरे-धीरे वीराज के करीब गई।

उसकी नीली रेखा चमकने लगी।

वीराज पीछे हट गया।

“दूर रहो।”

यह देखकर भीड़ में हलचल हुई।

अवनी मुस्कुराई।

“क्यों?”

“अगर तुम्हारी शक्ति सच में तुम्हारी है तो नील-अग्नि से डर कैसा?”

वीराज ने तलवार निकाल ली।

“मैंने कहा पीछे हटो!”

उसी पल उसकी सुनहरी रेखा झिलमिलाने लगी।

सुनहरा रंग टूटने लगा।

और उसके नीचे धूसर काली रेखा दिखाई दी।

पूरा राजचौक शांत हो गया।

किसी ने धीरे से कहा—

“नकली…”

राजपुरोहित सोमदेव पीछे हट गए।

“यह सूर्यरेखा नहीं है।”

वीराज का चेहरा विकृत हो गया।

“चुप!”

अवनी बोली—

“जिस आदमी को तुम वर्षों से सूर्यदेव का प्रिय मानते रहे…”

“वह तुम्हारी बेटियों, बेटों और बच्चों की शक्ति चुराकर चमकता रहा।”

भीड़ से गुस्से की आवाजें उठने लगीं।

वीराज ने चारों ओर देखा।

उसका साम्राज्य कुछ ही क्षणों में टूट रहा था।

तभी वह हंसने लगा।

“तुम लोगों को क्या लगता है?”

“शक्ति सच और झूठ से चलती है?”

उसने अपने गले से काला ताबीज निकाला।

“शक्ति सिर्फ ताकत से चलती है।”

उसने ताबीज जमीन पर फेंक दिया।

नीचे तहखाने में बना विशाल मंडल अचानक सक्रिय हो गया।

जिन यंत्रों को अवनी के लोग तोड़ रहे थे, उनमें जमा पुरानी ऊर्जा एक साथ ऊपर की ओर दौड़ी।

सुनहरी, काली और लाल रोशनी वीराज के शरीर में समाने लगी।

उसकी चीख पूरे चौक में गूंज उठी।

उसका शरीर बदलने लगा।

नसें काली हो गईं।

आंखें लाल।

उसकी त्वचा पर सैकड़ों अलग-अलग रंग की रेखाएं उभर आईं।

हर रेखा किसी न किसी इंसान से चुराई हुई शक्ति थी।

वीराज अब इंसान जैसा नहीं लग रहा था।

वह गरजा—

“जो मुझे नहीं मिल सकता…”

“वह किसी को नहीं मिलेगा!”

उसने आग की विशाल लहर भीड़ की तरफ फेंकी।

तभी बीच में शिवांश आ गया।

उसके दोनों हाथों से नीली और लाल अग्नि का कवच उठा।

दोनों शक्तियां टकराईं।

धमाका इतना तेज था कि राजचौक की खिड़कियां टूट गईं।

लोग भागने लगे।

वीराज हंस पड़ा।

“एक लंगड़ा वैद्य मुझे रोकेगा?”

शिवांश ने धीरे से अपनी लाठी जमीन पर रख दी।

“आज इसकी जरूरत नहीं।”

वह सीधा खड़ा हो गया।

उसकी बांहों पर लाल-नीली रेखाएं चमक उठीं।

राजपुरोहित सोमदेव का चेहरा बदल गया।

“अग्निरक्षक…”

शिवांश ने कहा—

“मेरे पूर्वजों को तुमने इतिहास से मिटा दिया।”

“लेकिन सत्य को मिटाने से वह मरता नहीं।”

वीराज ने उस पर हमला किया।

दोनों की शक्तियां टकराईं।

एक तरफ सैकड़ों लोगों से चुराई हुई शक्ति।

दूसरी तरफ अग्निरक्षक की प्राकृतिक अग्नि।

लेकिन वीराज बहुत शक्तिशाली हो चुका था।

उसने शिवांश को जोरदार वार से दूर फेंक दिया।

अवनी चीखी—

“शिवांश!”

वह पत्थर से टकराया।

उसके मुंह से खून निकला।

वीराज उसकी तरफ बढ़ा।

“तुम्हारे पूर्वज भी हारे थे।”

“तुम भी हारोगे।”

तभी उसके पीछे अवनी खड़ी हो गई।

उसकी नीली रेखा पहले से कहीं ज्यादा तेज चमक रही थी।

“लेकिन इस बार वह अकेला नहीं है।”

वीराज ने हमला किया।

अवनी ने हाथ आगे कर दिया।

नीली आग उठी।

लेकिन वह वीराज को जलाने नहीं लगी।

बल्कि उसके शरीर पर बनी हर चुराई हुई रेखा को छूने लगी।

अचानक अलग-अलग रंग की रोशनियां उसके शरीर से बाहर निकलने लगीं।

वीराज चीख उठा।

“क्या कर रही हो?”

अवनी समझ गई।

नील-अग्नि की शक्ति नष्ट करना नहीं थी।

वापस करना था।

जिसकी शक्ति जहां से चुराई गई थी, वह उसी के पास लौट रही थी।

राजचौक में खड़े कमजोर लोग एक-एक करके सीधा खड़े होने लगे।

काव्या के हाथ की काली नसें गायब होने लगीं।

बंदी स्त्रियों के चेहरे पर रंग वापस आया।

उधर वीराज सिकुड़ता जा रहा था।

उसकी नकली चमक उतर रही थी।

कुछ ही मिनटों में वह जमीन पर पड़ा एक सामान्य कमजोर आदमी था।

वह अवनी को घूर रहा था।

“तुम्हें लगता है तुम जीत गई?”

अवनी उसके सामने गई।

पिछली जिंदगी में यही आदमी उसके बच्चे की मौत का कारण बना था।

एक पल के लिए उसके भीतर पुरानी आग जागी।

वह चाहती तो एक ही वार में उसे खत्म कर सकती थी।

लेकिन उसने तलवार नीचे कर दी।

“नहीं।”

वीराज हंसा।

“डर गई?”

अवनी ने कहा—

“मौत तुम्हारे लिए बहुत आसान सजा होगी।”

उसने पीछे उन सैकड़ों लोगों की तरफ देखा जिनकी जिंदगी वीराज ने तबाह की थी।

“तुम्हारा फैसला मैं अकेली नहीं करूंगी।”

“जिनसे तुमने सब कुछ छीना…”

“अब तुम्हारी सजा वही तय करेंगे।”

पहली बार वीराज की आंखों में असली डर दिखाई दिया।

—

अगली सुबह राजसभा बुलाई गई।

इतनी बड़ी सभा देवकुंड के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई थी।

गांवों के प्रतिनिधि।

सैनिक।

व्यापारी।

पुरोहित।

पीड़ित परिवार।

सब मौजूद थे।

बीच में जंजीरों में वीराज खड़ा था।

लेकिन आज कटघरे में अकेला वीराज नहीं था।

महाराज रणविजय भी सिंहासन से नीचे खड़े थे।

अवनी ने उनके सामने राजमुद्रा वाले आदेश रखे।

“इन पर आपकी मुहर है।”

महाराज का सिर झुक गया।

“हां।”

“क्या आपको पता था कि लोग मारे जा रहे हैं?”

“नहीं।”

अवनी ने पूछा—

“क्या आपने कभी पूछा कि देवी सेवा में भेजे गए लोग वापस क्यों नहीं आए?”

महाराज चुप।

“क्या आपने परिवारों की शिकायतें सुनीं?”

चुप्पी।

“क्या आपने वीराज पर सवाल उठाया?”

फिर कोई उत्तर नहीं।

अवनी की आंखें भर आईं।

“यही आपकी गलती है।”

“हो सकता है आपने किसी को अपने हाथ से न मारा हो।”

“लेकिन राजा का आंखें बंद करना भी अपराध होता है।”

महाराज की आंखों से आंसू निकल आए।

“अवनी…”

“मैंने तुम्हारे साथ भी अन्याय किया।”

“उस दिन दरबार में मुझे तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी।”

“मैं राजा बनने के चक्कर में पिता होना भूल गया।”

उन्होंने हाथ जोड़ दिए।

“अगर संभव हो तो मुझे क्षमा कर दो।”

अवनी कुछ क्षण अपने पिता को देखती रही।

पिछली जिंदगी में नीलकंठ खाई के किनारे खड़ा वही चेहरा उसे दिखाई दिया।

जिसने हाथ नहीं बढ़ाया था।

उसने शांत स्वर में कहा—

“एक बेटी शायद एक दिन अपने पिता को क्षमा कर दे।”

“लेकिन राजा ने जो गलती की है…”

“उसका फैसला बेटी नहीं करेगी।”

“प्रजा करेगी।”

सभा में पूर्ण सन्नाटा था।

महाराज ने धीरे से सिर झुका दिया।

“मुझे स्वीकार है।”

—

वीराज को आजीवन कारावास दिया गया।

लेकिन किसी अंधेरे आरामदायक कक्ष में नहीं।

उसे उन्हीं भूमिगत सुरंगों को अपने हाथों से तोड़ने और पीड़ित परिवारों के सामने किए गए अपराधों का हिसाब लिखने की सजा मिली।

उसके सारे पद, संपत्ति और अधिकार छीन लिए गए।

भैरव ने सेना से पद छोड़ने की पेशकश की।

लेकिन उन सैनिकों ने कहा—

“गलत आदमी की सेवा की, लेकिन अंत में सच के साथ खड़े हुए।”

अवनी ने उसे सेना में रहने दिया, मगर शर्त रखी कि अब किसी एक व्यक्ति के प्रति नहीं, देवकुंड के कानून के प्रति निष्ठा की शपथ ली जाएगी।

काव्या कई महीने तक स्वस्थ होती रही।

उसका बच्चा सुरक्षित था।

उसने एक दिन अवनी से पूछा—

“क्या तुम मुझे कभी माफ कर पाओगी?”

अवनी ने कहा—

“आज नहीं।”

काव्या की आंखें झुक गईं।

अवनी ने आगे कहा—

“लेकिन शायद एक दिन।”

“माफी का मतलब भूल जाना नहीं होता।”

काव्या ने पहली बार बिना बहस किए सिर हिला दिया।

—

सबको लगा अब अवनी महारानी बनेगी।

राजपुरोहित सोमदेव ने सभा में घोषणा की—

“नील-अग्नि की वारिस से योग्य शासक देवकुंड को नहीं मिल सकता।”

लोगों ने जयकार करनी शुरू कर दी।

लेकिन अवनी ने हाथ उठाकर सबको शांत कर दिया।

“अगर इतने लोगों की मौत के बाद भी हम सिर्फ एक राजा हटाकर दूसरा राजा बैठा दें…”

“तो हमने क्या बदला?”

सब शांत हो गए।

अवनी ने कहा—

“देवकुंड का भविष्य किसी एक परिवार की कोख से तय नहीं होगा।”

और यहीं से देवकुंड में सबसे बड़ा परिवर्तन शुरू हुआ।

राजदरबार को बदलकर जन-राजसभा बनाई गई।

गांवों, नगरों, व्यापारियों, सैनिकों, वैद्यों, शिक्षकों और कारीगरों के प्रतिनिधियों को उसमें स्थान मिला।

राजपरिवार केवल उसका एक हिस्सा रहा।

सबसे पहला कानून—

किसी बच्चे की जन्मरेखा देखकर उसका दर्जा तय नहीं होगा।

न सुनहरी रेखा श्रेष्ठ।

न धूसर रेखा नीच।

न नीली रेखा अपशकुन।

हर व्यक्ति की जिम्मेदारी उसकी योग्यता और कर्म से तय होगी।

कालीधार शक्तिपीठ के द्वार सभी के लिए खोल दिए गए।

वहीं पुरानी सुरंगों और प्रयोगशालाओं को तोड़कर विद्यालय बनाया गया।

अवनी ने कहा—

“जहां कभी बच्चों और युवाओं से शक्ति छीनी जाती थी…”

“अब वहीं उन्हें ज्ञान दिया जाएगा।”

कुछ वर्षों में देवकुंड बदलने लगा।

—

इसी बीच अवनी के जीवन में वह दिन आया जिसका उसे सबसे ज्यादा डर भी था और इंतजार भी।

उसके बच्चे के जन्म का दिन।

रानी बावड़ी हवेली में तेज बारिश हो रही थी।

शिवांश बाहर बेचैनी से चक्कर लगा रहा था।

भैरव ने कहा—

“आप युद्ध में भी इतने परेशान नहीं हुए थे।”

शिवांश ने उसे घूरा।

“युद्ध में तलवार मेरे हाथ में होती है।”

कुछ देर बाद अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आई।

शिवांश वहीं रुक गया।

दरवाजा खुला।

बूढ़ी वैद्य मुस्कुराई।

“बेटी हुई है।”

शिवांश लगभग दौड़ता हुआ अंदर गया।

अवनी थकी हुई थी।

लेकिन मुस्कुरा रही थी।

उसकी गोद में छोटी सी बच्ची थी।

शिवांश उसके पास बैठ गया।

कुछ देर दोनों केवल बच्ची को देखते रहे।

फिर बाहर खड़े राजपुरोहित और कुछ बुजुर्गों में फुसफुसाहट शुरू हुई।

“रेखा?”

“कौन-सी रेखा है?”

“नील-अग्नि?”

“अग्निरक्षक?”

“शायद दोनों?”

अवनी ने बच्ची की बांह देखी।

फिर माथा।

फिर कंधा।

कुछ नहीं।

कोई रेखा नहीं।

राजपुरोहित सोमदेव हैरान हो गए।

“यह कैसे संभव है?”

एक बुजुर्ग बोला—

“इतनी शक्तिशाली रक्तधारा की संतान और कोई जन्मचिह्न ही नहीं?”

कमरे में निराशा जैसी भावना फैलने लगी।

अवनी ने सबकी तरफ देखा।

फिर अपनी बच्ची को सीने से लगा लिया।

और मुस्कुराई।

“बहुत अच्छा हुआ।”

सबने उसकी तरफ देखा।

अवनी बोली—

“कम से कम इसे पैदा होते ही कोई यह नहीं बताएगा कि इसे क्या बनना है।”

शिवांश हंस पड़ा।

“नाम?”

अवनी ने कुछ देर बच्ची की आंखों में देखा।

“आशा।”

“क्योंकि यह किसी वंश की आखिरी वारिस नहीं…”

“एक नए देवकुंड की पहली संतान है।”

—

साल बीतते गए।

नीलकंठ खाई, जहां एक जिंदगी में अवनी की कहानी समाप्त हुई थी, अब यात्रियों के लिए सुरक्षित रास्ते में बदल दी गई।

वहां एक छोटा पत्थर लगाया गया।

उस पर किसी राजकुमारी या महारानी का नाम नहीं था।

सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—

“अपनी पहचान छिपाकर जीवित रहने से अच्छा है, सच के साथ दुनिया बदल देना।”

एक शाम अवनी और शिवांश उसी जगह खड़े सूर्यास्त देख रहे थे।

अवनी ने अपनी चांदी की पायल हाथ में ली।

“एक बात अब भी समझ नहीं आई।”

शिवांश ने पूछा—

“क्या?”

“मैं वापस कैसे आई?”

शिवांश मुस्कुराया।

“हर रहस्य का उत्तर मिलना जरूरी है?”

अवनी ने उसे देखा।

“तुम फिर आधी बात कर रहे हो?”

शिवांश हंस पड़ा।

“इस बार सच में नहीं पता।”

अवनी ने भी हल्की हंसी हंसी।

फिर उसने पायल खाई के किनारे बने छोटे मंदिर के सामने रख दी।

“जिसने भी मुझे दूसरा मौका दिया…”

“उसे धन्यवाद।”

हवा चली।

पायल की छोटी घंटियां बज उठीं।

एक पल के लिए दूर नीचे बर्फ के बीच नीली लौ दिखाई दी।

अवनी की आंखें फैल गईं।

“शिवांश…”

“तुमने देखा?”

“क्या?”

अवनी ने फिर नीचे देखा।

वहां कुछ नहीं था।

सिर्फ बर्फ।

वह मुस्कुरा दी।

“कुछ नहीं।”

शिवांश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

दोनों वापस जाने लगे।

कुछ दूरी पर उनकी छोटी बेटी आशा दौड़ती हुई उनका इंतजार कर रही थी।

“मां!”

“जल्दी आइए!”

अवनी उसके पास पहुंची।

आशा ने पूछा—

“मां, लोग कहते हैं आप नील-अग्नि की महान वारिस थीं।”

अवनी ने कहा—

“लोग बहुत कुछ कहते हैं।”

“तो मैं किसकी वारिस हूं?”

अवनी कुछ पल उसे देखती रही।

फिर उसके सामने घुटनों पर बैठ गई।

“किसी की नहीं।”

बच्ची चौंकी।

अवनी मुस्कुराई।

“तुम अपने भविष्य की शुरुआत हो।”

आशा शायद पूरी बात नहीं समझी।

लेकिन उसने मां का हाथ पकड़ लिया।

तीनों पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ गए।

पीछे सूर्य अस्त हो रहा था।

नीचे देवकुंड के घरों में एक-एक करके दीपक जल रहे थे।

कभी इन्हीं दीपों की रोशनी के पीछे झूठ छिपा था।

अब उसी रोशनी में बच्चे साथ पढ़ते थे।

जिन्हें कभी उनकी रेखाओं के कारण अलग-अलग खड़ा किया जाता था, वे एक ही विद्यालय में बैठते थे।

किसी को सुनहरी रेखा के कारण राजा नहीं बनाया जाता था।

किसी को धूसर रेखा के कारण दासी नहीं।

किसी मां को अपने बच्चे की पहचान छिपाने के लिए रंग नहीं लगाना पड़ता था।

और शायद यही अवनी की असली जीत थी।

वीराज को हराना नहीं।

सिंहासन पाना भी नहीं।

बल्कि ऐसी दुनिया बनाना…

जहां अगली अवनी को अपने असली रूप से बचने के लिए दूसरी जिंदगी की जरूरत ही न पड़े।

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