भाग 1
लखनऊ के पुराने हिस्से में, जहां गलियां इतनी संकरी थीं कि दो मोटरसाइकिलें आमने-सामने आ जाएं तो किसी एक को पीछे हटना ही पड़ता था, वहीं एक छोटी-सी दुकान थी।
दुकान के ऊपर लकड़ी का पुराना बोर्ड लटका था—
“मिश्रा हस्तशिल्प एवं पुरावस्तु मरम्मत”
बोर्ड का आधा रंग उतर चुका था।
नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—
“टूटी लकड़ी, धातु, मूर्ति, पुरानी पेटी, चित्र एवं पारिवारिक धरोहर की मरम्मत।”
दुकान देखने में भले ही मामूली थी, लेकिन उसके अंदर कदम रखते ही ऐसा लगता था जैसे कोई पचास-साठ साल पीछे चला गया हो।
दीवारों पर पुराने औजार लटके थे। कहीं छेनियां थीं, कहीं हथौड़े, कहीं महीन आरी, कहीं अलग-अलग आकार की फाइलें। एक कोने में पीतल और तांबे की चीजें रखी थीं, दूसरे में लकड़ी के टूटे खिलौने और पुरानी संदूकचियां।

और दुकान के बिल्कुल बीच में बैठा था—
आरव मिश्रा।
उम्र कोई अट्ठाईस वर्ष।
बाल बेतरतीब।
हल्की दाढ़ी।
कुर्ते की आस्तीन कोहनी तक चढ़ी हुई।
और आंखें ऐसी कि सामने पड़ी चीज को केवल देखती नहीं थीं, जैसे उसका पूरा इतिहास पढ़ लेती हों।
उस समय उसके सामने लगभग चार फुट ऊंचा सागौन का एक पुराना दरवाजा रखा था।
दरवाजे पर बेल-बूटे बने थे, लेकिन उसका दायां हिस्सा बुरी तरह टूटा हुआ था।
दुकान में खड़े करीब साठ वर्ष के आदमी ने चिंता से पूछा,
“बेटा, पक्का हो जाएगा ना?”
आरव ने बिना सिर उठाए कहा,
“हो जाएगा।”
“लेकिन इसका आधा नक्शा तो है ही नहीं। मेरे दादा के घर का दरवाजा था। तस्वीर भी कोई नहीं है।”
आरव ने छेनी उठाई।
“तस्वीर की जरूरत नहीं है।”
आदमी हैरान हुआ।
“तो फिर पता कैसे चलेगा कि दूसरी तरफ क्या बना था?”
आरव ने पहली बार उसकी तरफ देखा।
“जो कारीगर इसे बना गया है, उसने आधा काम यहां छोड़ रखा है।”
“कहां?”
आरव मुस्कुराया।
“यहीं।”
उसने दरवाजे के बचे हुए हिस्से पर उंगली घुमाई।
“ये देखिए। बेल यहां से घूमकर ऊपर गई है। दूसरी तरफ उसका वजन संतुलित करने के लिए यही आकृति उल्टी दिशा में रही होगी। ये जो कटाव है ना… यह कोई टूटने का निशान नहीं, मूल छेनी का निशान है। और नीचे कमल की आधी पंखुड़ी बची है। बाकी आकार उसी अनुपात से बनेगा।”
आदमी कुछ देर आरव का चेहरा देखता रहा।
“तुमने पहले ऐसा दरवाजा देखा है?”
“नहीं।”
“फिर भी?”
आरव ने कंधे उचकाए।
“पुरानी चीजें बोलती हैं, चाचा जी। बस उनकी भाषा सुननी आती होनी चाहिए।”
इतना कहकर वह फिर काम में लग गया।
दुकान के बाहर खड़ी एक महिला काफी देर से यह सब देख रही थी।
उसने शायद जानबूझकर अपनी मौजूदगी का एहसास नहीं होने दिया था।
करीब आधे घंटे बाद जब ग्राहक चला गया, तब वह भीतर आई।
साफ-सुथरी सूती साड़ी, हाथ में चमड़े की पुरानी फाइल, चेहरे पर गंभीरता।
“आरव मिश्रा?”
आरव ने बिना ऊपर देखे कहा,
“अगर उधार लेने आई हैं तो दुकान वाले आरव आज मौजूद नहीं हैं।”
महिला चौंकी।
आरव ने सिर उठाया और मुस्कुराकर कहा,
“मजाक कर रहा हूं। जी, मैं ही आरव हूं।”
“मेरा नाम मीरा वशिष्ठ है।”
“जी।”
“मुझे आपकी कारीगरी के बारे में बताया गया था।”
“तो फिर जिसने बताया है उसने आधा सच बताया होगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि लोग मेरी कारीगरी की तारीफ तो करते हैं, पैसे देते वक्त भूल जाते हैं।”
मीरा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई, लेकिन तुरंत गायब भी हो गई।
उसने दुकान में चारों तरफ नजर दौड़ाई।
“आप पुरानी वस्तुओं की मरम्मत करते हैं?”
“वही तो बोर्ड पर लिखा है।”
“बहुत पुरानी?”
“जितनी पुरानी चीज, उतना अच्छा।”
“ऐसी चीज जो सौ… डेढ़ सौ साल पुरानी हो?”
आरव ने हथौड़ा नीचे रख दिया।
अब उसकी रुचि जाग चुकी थी।
“क्या चीज है?”
“एक नहीं। बहुत सारी।”
मीरा ने फाइल उसकी तरफ बढ़ाई।
ऊपर एक तस्वीर लगी थी।
एक विशाल हवेली।
ऊंची मेहराबें।
जालीदार खिड़कियां।
दोनों तरफ पत्थर के हाथी।
मुख्य दरवाजे के ऊपर धुंधले अक्षरों में नाम लिखा था—
रुद्रविलास।
“यह रुद्रविलास विरासत भवन है,” मीरा बोली।
आरव ने तस्वीर को ध्यान से देखा।
“नाम सुना नहीं।”
“ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना।”
“कहां है?”
“लखनऊ से करीब चालीस किलोमीटर बाहर।”
“और आपको क्या मरम्मत करवानी है?”
“अभी केवल सर्वेक्षण। कुछ छोटी वस्तुएं ठीक करनी होंगी। बड़ी वस्तुओं की हालत दर्ज करनी होगी।”
आरव पन्ने पलटता गया।
पुरानी तलवारें।
पीतल की मूर्तियां।
लकड़ी की पालकी।
संगीत वाद्य।
चित्र।
पानदान।
घड़ियां।
संदूक।
कपड़े।
पत्थर की नक्काशी।
उसकी आंखों की चमक बढ़ती गई।
फिर वह अचानक रुका।
“ये सब एक ही जगह रखा है?”
“हां।”
“और ये जनता के लिए खुला नहीं?”
“नहीं।”
“सरकारी संरक्षण?”
“नहीं।”
“निजी संग्रह?”
“कह सकते हैं।”
आरव ने फाइल बंद कर दी।
“काम दिलचस्प है। लेकिन पहले पैसे की बात।”
मीरा ने जो रकम बताई, उसे सुनकर आरव कुछ सेकंड तक चुप रहा।
फिर बोला,
“माफ कीजिए… आपने इक्कीस दिन की रकम बताई है या इक्कीस महीने की?”
“इक्कीस रातों की।”
“रातों की?”
“काम केवल रात में होगा।”
आरव ने उसे ऐसे देखा जैसे सामने बैठी महिला ने कहा हो कि काम पानी के अंदर होगा।
“रात में पुरानी चीजों की मरम्मत?”
“हां।”
“क्यों?”
“भवन के नियम हैं।”
“नमी नियंत्रित करने का मामला है?”
“नहीं।”
“तापमान?”
“नहीं।”
“तो?”
मीरा ने सीधा जवाब नहीं दिया।
“अगर रकम पर्याप्त नहीं है तो बढ़ाई जा सकती है।”
आरव तुरंत बोला,
“नहीं-नहीं, रकम तो इतनी पर्याप्त है कि मेरे पुरखे भी कब्र से उठकर काम करने आ जाएं।”
मीरा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“ऐसी बातें वहां मत कहिएगा।”
आरव कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर हंस पड़ा।
“अच्छा! तो हवेली के अपने अंधविश्वास भी हैं?”
“उन्हें अंधविश्वास समझना आपके ऊपर है।”
“और समय?”
“रात ग्यारह बजे से सुबह पांच बजे तक।”
“इक्कीस रातें?”
“हां।”
आरव ने सामने रखे बिजली के बिल, दुकान का किराया और बैंक का नोटिस देखा।
फिर फाइल पर हाथ रख दिया।
“कब से?”
“आज रात।”
—
दोस्तों, अब तक आरव को लग रहा था कि उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि दुकान का कर्ज कैसे उतरेगा।
उसे क्या पता था कि उसी रात के बाद उसके सामने सवाल बदलने वाले थे।
और उनमें से कुछ सवालों का जवाब पैसे से नहीं, शायद जान देकर मिलता।
—
रात करीब दस बजकर पंद्रह मिनट पर आरव अपनी पुरानी मोटरसाइकिल से शहर से बाहर निकल चुका था।
आसमान बादलों से ढका हुआ था।
हल्की ठंडी हवा चल रही थी।
शहर की रोशनी पीछे छूटते ही सड़क सुनसान होने लगी।
मीरा ने जो रास्ता भेजा था, वह मुख्य सड़क छोड़कर एक पुराने गांव की तरफ मुड़ता था।
करीब बीस मिनट बाद आरव को पहली बार हवेली की बाहरी दीवार दिखाई दी।
इतनी विशाल कि अंधेरे में उसका सिरा दिखाई नहीं देता था।
मुख्य लोहे का फाटक खुला हुआ था।
आरव मोटरसाइकिल अंदर ले गया।
दोनों तरफ सूखे पेड़।
बीच में लंबा पत्थर का रास्ता।
सामने वही हवेली थी जो तस्वीर में दिखाई गई थी।
लेकिन तस्वीर और हकीकत में बहुत अंतर था।
तस्वीर में रुद्रविलास पुराना लग रहा था।
हकीकत में वह…
जागता हुआ लगता था।
उसकी ऊंची खिड़कियां अंधेरे में ऐसे दिखाई दे रही थीं जैसे कोई भीतर से बाहर झांक रहा हो।
सीढ़ियों के सामने मीरा पहले से खड़ी थी।
“समय पर आ गए।”
आरव ने घड़ी देखी।
“दस मिनट पहले।”
“अच्छी आदत है।”
“मिस्त्री समय पर न पहुंचे तो ग्राहक आधे पैसे पहले ही काट देता है।”
मीरा ने उसे भीतर आने का इशारा किया।
हवेली का मुख्य दरवाजा खुलते ही ठंडी हवा का झोंका आरव के चेहरे से टकराया।
उसने अंदर कदम रखा।
और वहीं रुक गया।
मुख्य हॉल इतना बड़ा था कि उसकी दुकान उसमें शायद दस बार समा जाती।
ऊंची छत।
पत्थर के स्तंभ।
दीवारों पर पुराने चित्र।
चारों ओर कांच के भीतर रखी वस्तुएं।
लेकिन एक बात आरव को तुरंत खटक गई।
“ये क्या किया है आपने?”
मीरा ने पूछा,
“क्या?”
“इतनी महंगी चीजें… और आधी टूटी हुई!”
एक पीतल का घोड़ा था जिसकी एक टांग में दरार थी।
एक लकड़ी की पालकी, जिसका पर्दा फटा हुआ था।
एक बिना तार की सारंगी।
कई जगह टूटी मूर्तियां।
एक चांदी के पानदान का ढक्कन टेढ़ा था।
आरव लगभग दुखी हो गया।
“भई, कोई इनकी देखभाल नहीं करता क्या?”
“इसीलिए तो आपको बुलाया है।”
“अगर मुझे छह महीने यहां छोड़ दें तो पूरी जगह चमका दूं।”
मीरा ने बहुत धीमे स्वर में कहा,
“हर चीज को चमकाना जरूरी नहीं होता।”
आरव ने ध्यान नहीं दिया।
मीरा उसे एक छोटे कमरे में ले गई।
यह उसका कार्यकक्ष था।
मेज।
कुर्सी।
औजार रखने की जगह।
पुराना टेलीफोन।
दीवार पर हवेली का नक्शा।
और मेज के बीचोंबीच एक मोटा-सा रजिस्टर रखा था।
मीरा ने उस पर हाथ रखा।
“इसे पढ़ लीजिए।”
“सूची है?”
“नियम।”
आरव ने रजिस्टर खोला।
पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था—
रुद्रविलास रात्रिकालीन नियमावली
नीचे सात क्रमांक बने थे।
आरव पढ़ने लगा।
नियम एक
रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट के बाद इस भवन के अंदर अपना पूरा नाम मत बोलना।
आरव ने भौंह उठाई।
“क्यों? हवेली आधार कार्ड बनवाएगी?”
मीरा चुप रही।
आरव अगली पंक्ति पर गया।
नियम दो
अगर मुख्य हॉल का पीतल का घोड़ा पूरब की तरफ मुड़ जाए, जहां हो वहीं रुक जाना। जब तक तीन बार घंटी न बजे, कदम मत उठाना।
आरव ने घोड़े की तरफ देखा।
वह उत्तर दिशा में था।
नियम तीन
कमरा बारह में रखी बंद पालकी चाहे जितना हिले, उसका पर्दा मत उठाना।
नियम चार
अगर बिना तार की सारंगी बजने लगे और कोई औरत साथ में गुनगुनाए, धुन पूरी होने से पहले कमरे से निकल जाना।
अब आरव हंस पड़ा।
“तार ही नहीं हैं तो बजेगी कैसे?”
मीरा बोली,
“अगर नहीं बजे तो सबसे अच्छा है।”
नियम पांच
जिस वस्तु की छाया उसके साथ न हो, उसे हाथ मत लगाना।
नियम छह
किसी टूटी वस्तु को जोड़ने से पहले पीतल की थाली में उसका प्रतिबिंब देखना। अगर प्रतिबिंब में वह पहले से पूरी दिखाई दे—उसे टूटा ही रहने देना।
आरव ने अगली पंक्ति देखी।
नियम सात
आगे कुछ नहीं लिखा था।
बस खाली स्थान।
आरव ने पन्ना पलटा।
“सातवां नियम?”
“यही है।”
“क्या?”
“खाली।”
“तो फिर इसे सातवां नियम क्यों कहा?”
“मुझे नहीं पता।”
आरव मुस्कुराया।
“आपको पता नहीं या बताना नहीं चाहतीं?”
मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह दरवाजे की तरफ बढ़ी।
“सुबह पांच बजे मैं वापस आऊंगी।”
आरव ने चौंककर पूछा,
“आप जा रही हैं?”
“हां।”
“मतलब मैं पूरी हवेली में अकेला रहूंगा?”
“हां।”
“और यहां कोई चौकीदार?”
“आज से आप ही हैं।”
“मैं चौकीदार कब बना?”
“रात में यहां मौजूद व्यक्ति को जो नाम देना चाहें दे सकते हैं।”
आरव ने लंबी सांस ली।
“ठीक है। एक बात बताइए।”
मीरा रुक गई।
“ये नियम किसने बनाए?”
कुछ क्षण चुप्पी रही।
फिर मीरा बोली,
“जिन लोगों ने नहीं माने थे।”
और वह चली गई।
मुख्य दरवाजा बंद होने की भारी आवाज पूरी हवेली में गूंज गई।
आरव अकेला रह गया।
“वाह आरव बेटा,” उसने खुद से कहा, “पैसे के चक्कर में आज तू ऐसी जगह आ गया है जहां मालिक खुद रात बिताने को तैयार नहीं।”
उसने मोबाइल निकाला और अपने दोस्त कबीर को संदेश भेजा—
“आज एक हवेली में रात काट रहा हूं। अगर सुबह फोन न करूं तो दुकान के औजार बेचकर मेरा कर्ज चुका देना।”
तुरंत जवाब आया—
“औजार मुझे दे जाना। कर्ज बाद में देखेंगे।”
आरव हंस पड़ा।
“कमीना।”
—
रात के करीब ग्यारह बजकर तीस मिनट हुए।
आरव मुख्य हॉल का चक्कर लगा रहा था।
शुरुआती आधा घंटा बिल्कुल सामान्य रहा।
उसे खुद पर हंसी आने लगी।
पुराने भवन।
अजीब नियम।
रात का समय।
बस इतना ही काफी था दिमाग को डराने के लिए।
वह पीतल के घोड़े के सामने रुका।