भाग 5
आरव हंसा।
“ऐसा भी कोई विभाग है?”
“कागजों में हम किसी और नाम से हैं।”
“काम?”
“ऐसी ऐतिहासिक वस्तुएं जिनके साथ सामान्य नियम काम नहीं करते।”
“भूत पकड़ते हैं?”
“मैंने भूत शब्द नहीं कहा।”
“तो फिर?”
इरा ने मेज पर कई तस्वीरें रखीं।
एक गांव जहां पुरानी घड़ी मिलने के बाद लोग एक ही समय बार-बार दोहराते थे।
एक चित्र जिसे देखने वाले अलग-अलग यादें बताते थे।
एक तलवार जिसे बिना छुए भी आसपास लोहे की चीजें उसकी तरफ खिंचती थीं।
“हम नहीं जानते यह सब क्या है। लेकिन रुद्रविलास का नाम कई मामलों में सामने आया है।”
आरव का चेहरा गंभीर हो गया।
“आप मीरा को जानती हैं?”
“नाम सुना है।”
“वह क्या छुपा रही है?”
“बहुत कुछ।”
“और मेरे दादा?”
“शंकर मिश्रा के नाम की कुछ फाइलें हैं।”
“मुझे दिखाइए।”
“आप हमारे सदस्य नहीं हैं।”
“फिर मुझे यहां क्यों लाईं?”
इरा ने सारंगी के टुकड़े की तस्वीर उसके सामने रखी।
“क्योंकि जो काम हमारी पूरी टीम नहीं कर पाई, आपने दस मिनट में कर दिया।”
“मैं कारीगर हूं।”
“सिर्फ कारीगर नहीं।”
आरव उठ गया।
“मेरे लिए अभी इतना ही काफी है।”
वह बाहर निकलने लगा।
इरा ने कहा,
“अगर आप सच जानना चाहते हैं तो रुद्रविलास वापस जाइए।”
आरव रुका।
“क्यों?”
“क्योंकि उत्तर हमारे पास नहीं हैं।”
“तो किसके पास हैं?”
“शायद उस महिला के पास, जिससे आप भागकर आए हैं।”
—
रात होने से पहले आरव फिर रुद्रविलास पहुंच गया।
मीरा मुख्य हॉल में खड़ी थी।
उसे देखकर आश्चर्य नहीं हुआ।
“मुझे पता था आप लौटेंगे।”
“घमंड मत कीजिए। मैं नौकरी करने नहीं आया।”
“तो?”
“सच सुनने।”
आरव ने सारंगी वाला हिस्सा मेज पर रखा।
मीरा का चेहरा बदल गया।
“यह कहां मिला?”
“भूमिगत रेल की खुदाई में।”
“आप वहां गए थे?”
“हां।”
“आपने इसे ठीक किया?”
“हां।”
मीरा ने आंखें बंद कर लीं।
जैसे किसी लंबे डर की पुष्टि हो गई हो।
आरव बोला,
“अब बोलिए।”
मीरा कुछ देर चुप रही।
फिर उसे हवेली के एक ऐसे हिस्से में ले गई जहां वह पहले नहीं गया था।
एक लंबा कमरा।
दीवारों पर सात बड़े चित्र।
हर चित्र में अलग कारीगर।
धातुकार।
बढ़ई।
चित्रकार।
बुनकर।
कुम्हार।
संगीतज्ञ।
पत्थर तराशने वाला।
मीरा ने कहा,
“कई दशक पहले कुछ कारीगरों ने इस इलाके में ऐसी घटनाएं देखीं जिन्हें वे समझ नहीं सके।”
“कैसी घटनाएं?”
“पुरानी चीजें अपने मालिकों की बातें दोहराती थीं। कुछ घरों में वर्षों पहले हुई घटनाएं फिर दिखाई देती थीं। कुछ वस्तुएं लोगों की यादें बदल देती थीं।”
“क्यों?”
“उन्होंने इसे नाम दिया था—स्मृति-छाप।”
आरव चुप रहा।
मीरा आगे बोली,
“जब कोई वस्तु वर्षों तक बहुत तीव्र भावनाओं के बीच रहती है—दुख, भय, प्रेम, हिंसा, पछतावा—तो कभी-कभी उसमें उन भावनाओं का निशान रह जाता है।”
“याद?”
“सिर्फ याद नहीं।”
“तो?”
“ऐसी याद… जो खुद को जीवित समझने लगे।”
आरव को सुरंग वाला संगीतकार याद आया।
“वो आदमी मुझे देख नहीं रहा था।”
“क्योंकि वह आदमी वहां था ही नहीं।”
“तो मैंने क्या देखा?”
“उसकी आखिरी स्मृति।”
मीरा ने दीवार पर बने सात कारीगरों की तरफ देखा।
“इन लोगों ने पाया कि स्मृति-छाप को नष्ट नहीं किया जा सकता। लेकिन इसे किसी वस्तु में बांधा जा सकता है।”
“रुद्रविलास वही जगह है?”
“हां।”
आरव ने पूछा,
“और जो मैं चीज ठीक करता हूं उसके बाद मेरे साथ क्या होता है?”
मीरा उसकी तरफ मुड़ी।
“आपने कुछ महसूस किया?”
“धातु छूते ही उसकी कमजोरी समझ में आती है। आज सारंगी ठीक करने के बाद मैं दीवारों के पीछे कंपन सुन पा रहा था।”
मीरा के चेहरे पर वही भाव आया जो पहले द्वारपाल ठीक होने पर आया था।
“तो यह सच है।”
“क्या?”
“आपमें वही क्षमता है।”
“किसकी?”
मीरा ने धीरे से कहा,
“शंकर जी की।”
आरव का धैर्य टूट गया।
“बस!”
उसकी आवाज पूरे कमरे में गूंजी।
“हर बात मेरे दादा पर आकर क्यों रुकती है?”
मीरा चुप।
“आपने मुझे यहां संयोग से नहीं बुलाया था।”
कोई जवाब नहीं।
आरव समझ गया।
“आप मुझे पहले से ढूंढ रही थीं।”
मीरा ने आंखें नीचे कर लीं।
“हां।”
आरव हंस पड़ा, लेकिन उस हंसी में गुस्सा था।
“वाह।”
“मेरी बात—”
“आपने मुझे नौकरी नहीं दी थी।”
“आरव—”
“आपने मुझे चारे की तरह यहां बुलाया था।”
“ऐसा नहीं है।”
“तो कैसा है?”
मीरा कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“आपके दादा जीवित जोड़ जानते थे।”
“जीवित जोड़?”
“ऐसी मरम्मत जिसमें वस्तु को मजबूत किया जाता है, लेकिन उसकी पुरानी टूटन पूरी तरह मिटाई नहीं जाती।”
आरव को दादा की बात याद आई।
पुरानी चीज को नया मत बनाओ।
“मैंने वही तकनीक आपसे सीखी हुई देखी। इसलिए मुझे यकीन हुआ कि शंकर जी ने अपना हुनर आपको दिया है।”
“और आपको मेरी जरूरत है।”
“हां।”
“क्यों?”
मीरा की नजर सात चित्रों पर गई।
“क्योंकि कोई रुद्रविलास की चीजें जानबूझकर तोड़ रहा है।”
कमरे में खामोशी छा गई।
“कौन?”
“हमें नहीं पता।”
“और बाहर निकलने पर वे चीजें इतनी खतरनाक क्यों हो जाती हैं?”
“क्योंकि हवेली उन्हें दबाकर रखती है।”
“कैसे?”
“वह जवाब अभी मेरे पास नहीं।”
आरव गुस्से से बोला,
“फिर से वही बात।”
“मैं जितना जानती हूं उतना बता रही हूं।”
“मेरे दादा का क्या हुआ?”
इस सवाल पर मीरा चुप हो गई।
आरव ने समझ लिया कि यही सबसे बड़ी बात है।
“वह 1986 की आग में थे।”
मीरा की आंखें भर आईं।
“हां।”
“मर गए?”
“मुझे नहीं पता।”
“झूठ।”
“सच में नहीं पता।”
“तो गायब कैसे हुए?”
“उस रात सात लोग लापता हुए थे।”
“फोटो में आठ हैं।”
मीरा ने तेजी से उसकी तरफ देखा।
“आपको वह तस्वीर कहां मिली?”
“इससे फर्क नहीं पड़ता।”
“आठवां चेहरा देखा आपने?”
“हां।”
मीरा के चेहरे पर डर साफ था।
“अगर उस आदमी के बारे में कोई जानकारी मिले तो अकेले उसके पीछे मत जाइएगा।”
“कौन है वह?”
मीरा ने केवल एक नाम कहा—
“विराज सूरी।”
—
दो दिन बाद कबीर ने एक और सुराग निकाला।
शहर से बाहर एक पुरानी बावड़ी के नीचे खुदाई हुई थी।
वहां से कई ऐसी वस्तुएं मिली थीं जिनकी तस्वीरें रुद्रविलास की सूची में थीं।
आरव ने इरा को खबर दी।
इस बार सरकारी टीम साथ थी।
रात में वे बावड़ी के भीतर उतरे।
नीचे पत्थर का लंबा गलियारा मिला।
फिर एक विशाल कक्ष।
दीवारों के बीच दर्जनों टूटे हिस्से रखे थे।
पीतल।
लकड़ी।
चित्रों के टुकड़े।
पुरानी घड़ियों के पुर्जे।
और सबसे अजीब—
वे बेतरतीब नहीं रखे थे।
सब किसी खास क्रम में सजे थे।
आरव धीरे-धीरे उनके बीच चलता गया।
“यह चोरी नहीं है।”
इरा ने पूछा,
“तो?”
“किसी ने इन्हें जानबूझकर इस तरह रखा है।”
“क्यों?”
आरव ने जमीन पर बने घेरे देखे।
“मुझे नहीं पता।”
तभी पीछे से आवाज आई।
“क्योंकि तुम केवल चीजें जोड़ना जानते हो।”
सब पलटे।
गलियारे के दूसरे छोर पर एक आदमी खड़ा था।
करीब पचास वर्ष।
लंबा कोट।
सफेद होते बाल।
शांत चेहरा।
इरा के लोग तुरंत आगे बढ़े।
उस आदमी ने हाथ ऊपर कर दिए।
“हथियार नहीं है।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
कुछ जाना-पहचाना।
फिर उसे तस्वीर याद आई।
वही कद।
वही आंखें।
1986 की तस्वीर में जिस आदमी का चेहरा खरोंच दिया गया था…
यह उससे मिलता-जुलता था।
“विराज सूरी?”
आदमी मुस्कुराया।
“तो मीरा ने मेरा नाम बता ही दिया।”
इरा ने पूछा,
“ये चीजें आपने चुराईं?”
“चुराईं?”
विराज ने आसपास देखा।
“जिसे किसी ने कैद कर लिया हो, उसे बाहर निकालना चोरी नहीं कहलाता।”
आरव बोला,
“ये चीजें लोगों को मार रही हैं।”
“क्या सच में?”
“मैंने खुद देखा है।”
“तुमने जो देखा वह उनका गुस्सा है।”
“गुस्सा किस बात का?”
विराज धीरे-धीरे उसके करीब आया।
“भूल दिए जाने का।”
इरा ने बीच में रोक दिया।
“वहीं रहिए।”
विराज मुस्कुराया।
“तुम लोग रुद्रविलास को संग्रहालय समझते हो।”
उसने आरव की आंखों में देखा।
“मीरा उसे संरक्षण कहती है।”
“और तुम?”
“कैद।”
आरव चुप रहा।
विराज ने एक टूटी लकड़ी उठाई।
“जिसे वे श्राप कहते हैं, वह किसी की याद है। किसी की आखिरी पुकार। किसी का दर्द। किसी का सच।”
“और इसलिए उसे शहर में खुला छोड़ देंगे?”
“नहीं।”
“तो क्या चाहते हो?”
“इतिहास को बंद कमरों में कैद रखना बंद हो।”
इरा बोली,
“आपके कारण लोग मर रहे हैं।”
विराज की मुस्कान गायब हुई।
“लोग पहले भी मरे थे।”
उसने आरव की तरफ देखा।
“अपने दादा से पूछना।”
आरव का चेहरा बदल गया।
“तुम उन्हें जानते थे?”
“बहुत अच्छी तरह।”
“वो कहां हैं?”
विराज कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला,
“यह सवाल मुझसे नहीं… उस जगह से पूछो जिसे तुम रात-रात भर ठीक कर रहे हो।”
अचानक कक्ष की सारी पुरानी घड़ियां एक साथ बज उठीं।
एक भयानक कंपन।
लाइटें बंद।
कुछ सेकंड अंधेरा।
जब रोशनी वापस आई—
विराज गायब था।
—
उस रात आरव सीधे घर नहीं गया।
वह दादा की कॉपी लेकर घंटों बैठा रहा।
पन्नों के बीच उसे पीछे के कवर में हल्की मोटाई महसूस हुई।
छुरी से किनारा खोला।
अंदर एक छोटी पुरानी कैसेट छिपी थी।
उस पर दादा की लिखावट—
“अगर जोड़ फिर शुरू हों।”
कबीर किसी तरह पुराना कैसेट चलाने वाला यंत्र ले आया।
आवाज टूटी हुई थी।
पहले शोर।
फिर—
शंकर मिश्रा की आवाज।
आरव की आंखें भर आईं।
“अगर कोई यह रिकॉर्ड सुन रहा है तो इसका मतलब रुद्रविलास में मरम्मत फिर शुरू हो चुकी है।”
आरव और कबीर एक-दूसरे को देखने लगे।
आवाज जारी रही।
“जिसे हम बचाने की कोशिश कर रहे थे, वह केवल हवेली नहीं है।”
काफी शोर आया।
फिर शब्द साफ हुए।
“हर वस्तु का टूटना खराब होना नहीं होता।”
आरव आगे झुक गया।
“कुछ चीजें जानबूझकर अधूरी छोड़ी गई थीं।”
उसके दिमाग में मीरा की बात घूम गई—
वस्तुओं को ठीक करना जरूरी है।
रिकॉर्डिंग में दादा बोले—
“अगर कोई सभी वस्तुओं को फिर से पूरा करने लगे, तो उसे रोकना।”
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
कबीर ने धीरे से पूछा,
“भाई… तू कितनी चीजें ठीक कर चुका है?”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
रिकॉर्डिंग चलती रही।
“क्योंकि हर पूरा हुआ जोड़ एक ताला खोलता है।”
शोर।
“और अगर सारे ताले खुल गए…”
आवाज कुछ सेकंड गायब रही।
फिर बहुत धीमे शब्द आए—
“सातवीं दीवार खुल जाएगी।”
रिकॉर्डिंग बंद।
कमरे में सन्नाटा।
आरव के हाथ ठंडे पड़ चुके थे।
“मीरा कह रही है चीजें ठीक करो।”
कबीर बोला,
“और तेरे दादा कह रहे हैं मत करो।”
आरव ने कॉपी उठाई।
“तो इनमें से कोई एक झूठ बोल रहा है।”
उसी समय…
रुद्रविलास में मीरा अकेली मुख्य हॉल में खड़ी थी।
हवेली के नीचे…
जमीन से बहुत गहराई में…
पत्थरों से बना एक विशाल गोल कक्ष था।
उसमें सात भारी पत्थर के ताले लगे थे।
सैकड़ों वर्षों से स्थिर।
पहला ताला—
धीरे-धीरे कांपा।
उस पर बनी दरारों से काली धूल गिरने लगी।
फिर—
धड़ाम!
वह खुल गया।
मीरा ने ऊपर खड़े-खड़े कंपन महसूस किया।
उसने आंखें बंद कर लीं।
“नहीं… अभी नहीं।”
लेकिन नीचे अंधेरे कक्ष में अब केवल छह ताले बाकी थे।
और सबसे अंदर…
जिस चीज को उन सात तालों के पीछे बंद रखा गया था…
उसने पहली बार बहुत लंबे समय बाद सांस ली।
रुद्रविलास के नीचे पहला ताला खुल चुका था।
उस रात किसी ने कोई चीख नहीं सुनी।
कोई दीवार नहीं टूटी।
कोई दरवाजा अपने आप नहीं खुला।
लेकिन पूरे लखनऊ में कुछ ऐसा शुरू हुआ जिसे अगले दिन कोई ठीक से समझ नहीं पाया।
सुबह करीब साढ़े छह बजे चौक की एक पुरानी गली में दूध लेने निकला एक आदमी अचानक सड़क के बीच रुक गया।
उसने सामने देखा।
दुकानें गायब थीं।
बिजली के खंभे गायब।
मोटरसाइकिलें गायब।
सड़क पर रिक्शों की जगह बैलगाड़ी खड़ी थी।
सामने चाय की दुकान पर बैठे लोग पुराने कपड़ों में थे।
एक आदमी पैसे के बदले सिक्का दे रहा था।
वह घबराकर पीछे हटा।
लेकिन अगले ही पल सब सामान्य हो गया।