Supernatural Mystery

जिस हवेली का सातवां नियम खाली था, वहां पहली रात ही दादा की आवाज सुनाई दी!

WATCH THE STORY

वीडियो में पूरी कहानी देखें

कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

भाग 8 वह छठे ताले की तरफ मुड़ा। “आज सब बाहर आएगा।” आरव चिल्लाया, “विराज!” धड़ाम! छठा ताला टूट गया। पूरा कक्ष अंधेरे में डूब गया। बीच की पत्थर संरचना में लंबी दरार आई। और वहां से कोई धुआं नहीं निकला। कोई राक्षस नहीं निकला। आवाजें निकलीं। हजारों। लाखों। हंसी। रोना। प्रार्थना। चीखें। लोरियां। झगड़े। ... Read more

पढ़ना शुरू करें ↓
आप भाग 8 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 84 मिनट

भाग 8

वह छठे ताले की तरफ मुड़ा।

“आज सब बाहर आएगा।”

आरव चिल्लाया,

“विराज!”

धड़ाम!

छठा ताला टूट गया।

पूरा कक्ष अंधेरे में डूब गया।

बीच की पत्थर संरचना में लंबी दरार आई।

और वहां से कोई धुआं नहीं निकला।

कोई राक्षस नहीं निकला।

आवाजें निकलीं।

हजारों।

लाखों।

हंसी।

रोना।

प्रार्थना।

चीखें।

लोरियां।

झगड़े।

प्रेम के वादे।

बच्चों की आवाजें।

बूढ़ों की आवाजें।

आरव ने कान बंद कर लिए।

लेकिन आवाजें कान से नहीं आ रही थीं।

वे उसके दिमाग के अंदर थीं।

फिर केंद्रीय कक्ष गायब हो गया।

आरव खुद को एक पुराने घर में खड़ा पाया।

उसकी मां सामने थी।

युवा।

वह खाना बना रही थी।

पिता हंस रहे थे।

दादा बाहर बैठे औजार साफ कर रहे थे।

आरव बच्चा था।

“छोटे उस्ताद, इधर आ।”

उसका दिल टूट गया।

यह स्मृति असली थी।

उसकी अपनी।

वह कुछ पल वहीं खड़ा रह गया।

कितना आसान था यहीं रह जाना।

वह समय जब सब ठीक था।

दादा थे।

दुकान पर कर्ज नहीं।

कोई रुद्रविलास नहीं।

कोई कालराग नहीं।

फिर दादा ने उसके हाथ में टूटी छेनी दी।

“इसे ठीक करेगा?”

बच्चा आरव बोला,

“नई ले लेंगे।”

दादा हंसे।

“हर टूटी चीज फेंक देते हैं क्या?”

वर्तमान वाला आरव धीरे से बोला,

“नहीं।”

दृश्य में दादा ने जैसे उसकी आवाज सुन ली।

“तो?”

आरव की आंखों से आंसू गिरने लगे।

“समझते हैं कि टूटी क्यों।”

पूरा दृश्य चटक गया।

जैसे कांच टूटता है।

आरव वापस केंद्रीय कक्ष में था।

बाकी सब अलग-अलग स्मृतियों में फंसे थे।

मीरा अपने बचपन में।

इरा किसी पुराने हादसे में।

कबीर अपनी मां के साथ।

विराज अपने पिता के सामने घुटनों पर बैठा था।

विवेक सूरी की स्मृति उससे कह रही थी—

“मैंने तुम्हें ये करने के लिए नहीं कहा था।”

विराज रो रहा था।

“उन्होंने आपका नाम मिटा दिया।”

“तो तुम पूरी दुनिया की यादें खोल दोगे?”

“मैं आपको न्याय दिलाना चाहता था।”

“न्याय और बदला एक चीज नहीं होते।”

विराज का चेहरा टूट गया।

“मैंने गलत समझा?”

विवेक ने कहा,

“तुमने मेरा गुस्सा सुना। मेरी बात नहीं।”

दृश्य गायब।

विराज जमीन पर गिर पड़ा।

सातवां ताला अभी भी बंद था।

लेकिन उसमें दरारें पड़ चुकी थीं।

आरव ने चारों तरफ देखा।

रुद्रविलास की वस्तुएं जैसे उसके सामने दिखाई देने लगीं।

हर वस्तु से एक धागा केंद्रीय कक्ष तक जुड़ा था।

द्वारपाल।

सारंगी।

पानदान।

घोड़ा।

चित्र।

पुरानी लकड़ी।

मिट्टी के पात्र।

हजारों चीजें।

उसे समझ आ गया।

“मुझे ऊपर जाना होगा।”

मीरा बोली,

“सातवां ताला कभी भी टूट सकता है।”

“इसलिए।”

“क्या करोगे?”

आरव ने अपना औजारों का थैला उठाया।

“उन्हें तोड़ूंगा।”

सब उसकी तरफ देखने लगे।

कबीर बोला,

“भाई, शायद मैं गलत सुन रहा हूं।”

“नहीं।”

“पूरी कहानी इन्हें जोड़ने में लगी और अब तू तोड़ेगा?”

आरव पहली बार मुस्कुराया।

“पूरा नहीं।”

“तो?”

“बस इतना कि इन्हें सांस मिल सके।”

अगले कुछ घंटे रुद्रविलास ने शायद अपने सौ वर्षों में कभी नहीं देखे थे।

आरव एक कमरे से दूसरे कमरे दौड़ रहा था।

पीतल के द्वारपाल के सीने पर उसने अपने पुराने जोड़ का एक छोटा हिस्सा खोला।

ठक।

धातु के भीतर से काली हवा निकली।

लेकिन बाहर फैलने के बजाय पतली धारा बनकर दीवार के चिह्नों में समा गई।

सारंगी के स्वर-पट्ट में उसने एक सूक्ष्म खाली जगह छोड़ी।

उससे एक पुरानी धुन निकली।

इस बार दर्द नहीं था।

केवल संगीत।

एक चित्र के कोने में उसने पुरानी दरार का हिस्सा खुला रखा।

चित्र के भीतर खड़ी महिला पहली बार मुड़ी…

और मुस्कुराकर गायब हो गई।

कबीर उसके पीछे-पीछे औजार उठाकर ला रहा था।

“अगला?”

“करघा कक्ष!”

मीरा दूसरी तरफ वस्तुओं की सूची लेकर दौड़ रही थी।

इरा की टीम भारी सामान खिसका रही थी।

आरव के हाथ सामान्य इंसान से कहीं तेज काम कर रहे थे।

कभी उसे लोहार की स्मृति मिलती।

कभी बढ़ई की।

कभी चित्रकार की।

कभी कुम्हार की।

एक मिट्टी का पात्र उठाते ही उसे महसूस होता कि मिट्टी कितनी नम थी जब इसे बनाया गया।

लकड़ी को छूते ही उसे पता चलता कि पेड़ का रेशा किस दिशा में गया था।

कपड़े को छूते ही वह धागों की गिनती समझ जाता।

पत्थर पर हाथ रखते ही भीतर की दरारें महसूस होतीं।

जैसे सदियों से काम करने वाले हजारों हाथ उसके दो हाथों के भीतर उतर आए हों।

लेकिन हर नई स्मृति के साथ खतरा भी बढ़ रहा था।

एक समय उसने कबीर को देखकर पूछा,

“तुम कौन?”

कबीर का चेहरा उतर गया।

“भाई?”

आरव कुछ सेकंड उसे घूरता रहा।

फिर सिर पकड़ लिया।

“कबीर।”

“हां।”

“माफ कर।”

“तू अपनी यादें खो रहा है?”

आरव ने जवाब नहीं दिया।

वह जानता था—

हां।

नीचे सातवां ताला टूटने वाला था।

हर जोड़ खोलते ही उसकी दरार थोड़ी स्थिर हो रही थी।

लेकिन काम बहुत था।

मीरा चिल्लाई,

“आरव! समय नहीं है!”

“कितनी चीजें बाकी?”

“सत्ताईस!”

कबीर बोला,

“सत्ताईस?”

आरव ने हथौड़ा उठाया।

“तो बात कम करो।”

एक।

दो।

तीन।

चार।

उसके हाथ लगातार चलते रहे।

उंगलियों से खून निकलने लगा।

वह रुका नहीं।

आखिरी पांच वस्तुएं मुख्य हॉल में थीं।

पीतल का घोड़ा उनमें शामिल था।

आरव उसके सामने पहुंचा।

वह पूरब की तरफ घूम गया।

नियम दो।

जहां हो वहीं रुक जाना।

घंटी के तीन बार बजने तक कदम मत उठाना।

आरव रुक गया।

कबीर चिल्लाया,

“समय नहीं है!”

आरव ने कहा,

“नियम अभी भी नियम है।”

पहली घंटी।

टन…

फर्श कांपा।

दूसरी घंटी।

टन…

नीचे से पत्थर टूटने की आवाज।

तीसरी घंटी नहीं आई।

कबीर घबराया।

“अब?”

आरव घोड़े की आंखों में देखने लगा।

फिर उसे समझ आया।

घोड़ा उसे रोक नहीं रहा था।

उसका चेहरा पूरब की तरफ था।

जहां सुबह होती है।

आरव ने धीमे से कहा,

“तू रास्ता दिखा रहा है?”

घोड़े की गर्दन हल्की नीचे हुई।

तीसरी घंटी बजी।

टन…

आरव आगे बढ़ा।

उसने घोड़े की दरार को पूरी तरह बंद करने के बजाय पुराने निशान के साथ स्थिर किया।

पूरे हॉल में हवा घूमी।

बाकी चार वस्तुएं।

तीन।

दो।

एक।

आखिरी वस्तु वही थी जिसे उसने पहली रात देखा भी नहीं था।

एक साधारण लकड़ी का छोटा बक्सा।

उस पर कोई नाम नहीं।

मीरा बोली,

“यह सूची में नहीं है।”

आरव ने उसे छुआ।

एक जोरदार स्मृति उसके भीतर आई।

दादा।

मीरा के पूर्वज।

विवेक सूरी।

सातों कारीगर।

1986।

आग।

झगड़ा।

फिर शंकर मिश्रा अकेले इसी बक्से के सामने बैठे थे।

वह अपने हाथ से लकड़ी में लिख रहे थे—

“सातवीं दीवार।”

आरव ने बक्सा खोल दिया।

अंदर कुछ नहीं था।

सिर्फ एक छोटा शीशा।

आरव ने खुद को उसमें देखा।

फिर दादा का चेहरा।

फिर किसी दूसरे आदमी का।

फिर सैकड़ों चेहरे।

वह समझ गया।

“ये सातवां पात्र है।”

मीरा बोली,

“क्या?”

“इंसान नहीं।”

आरव ने बक्सा उठाया।

“इंसान की पहचान।”

“मतलब?”

“सातवीं दीवार हमेशा किसी एक इंसान की यादों को बांधती थी।”

आरव ने शीशा बाहर निकाला।

“हम इसे बंद नहीं करेंगे।”

उसने शीशे के किनारे पर अपनी छेनी रखी।

मीरा चिल्लाई,

“आरव, मत—”

टक!

शीशे में एक पतली दरार पड़ गई।

पूरा रुद्रविलास कांप उठा।

नीचे सातवें ताले में तेज रोशनी फैली।

वह टूटा नहीं।

बल्कि धीरे-धीरे…

घुल गया।

कालराग की सारी आवाजें एक साथ उठीं।

फिर अलग होने लगीं।

एक विशाल शोर लाखों छोटी आवाजों में टूट गया।

वे हवेली की दीवारों, वस्तुओं, चित्रों, लकड़ी, पत्थर, कपड़ों और धातुओं में फैलने लगीं।

लेकिन इस बार कोई एक चेतना नहीं बनी।

कोई विशाल रूप नहीं।

कोई कालराग नहीं।

सिर्फ यादें।

अपनी-अपनी जगह।

अपनी-अपनी वस्तुओं में।

आरव जमीन पर गिर पड़ा।

इरा ने उसे संभाला।

“आरव!”

उसने आंखें खोलीं।

कुछ सेकंड वह किसी को पहचान नहीं पाया।

फिर मीरा।

फिर इरा।

फिर कबीर।

“कब्बू…”

कबीर की आंखों में पानी आ गया।

“अरे वाह, नाम याद है।”

आरव कमजोर हंसी हंसा।

“दुर्भाग्य से।”

सुबह हुई।

रुद्रविलास की खिड़कियों पर वर्षों से लगे भारी पर्दे पहली बार हटाए गए।

सूरज की रोशनी मुख्य हॉल में आई।

वस्तुएं शांत थीं।

पीतल का घोड़ा फिर उत्तर की तरफ था।

सारंगी चुप।

पालकी स्थिर।

आरव धीरे-धीरे कार्यकक्ष तक गया।

मेज पर वही नियमों वाला रजिस्टर पड़ा था।

उसने खोला।

पहला नियम…

गायब।

दूसरा…

गायब।

तीसरा।

चौथा।

पांचवां।

छठा।

सब सफेद।

आरव ने आखिरी जगह देखी।

नियम सात के आगे अब भी खाली था।

फिर स्याही का एक छोटा बिंदु उभरा।

आरव स्थिर हो गया।

धीरे-धीरे अक्षर बनने लगे।

एक-एक करके।

नियम सात—

“जो टूटा है, उसे समझे बिना कभी पूरा मत करना।”

आरव बहुत देर तक उस वाक्य को देखता रहा।

फिर मुस्कुराया।

“दादा…”

हवा का हल्का झोंका कमरे में आया।

दादा की पुरानी कॉपी का एक पन्ना अपने आप पलटा।

लेकिन इस बार उस पर कुछ नया नहीं लिखा।

आरव समझ गया।

अब लिखने की जरूरत नहीं थी।

छह महीने बाद।

रुद्रविलास पहले जैसा नहीं रहा।

लेकिन उसे पर्यटन स्थल भी नहीं बनाया गया।

सरकारी कागजों में उसका नया नाम था—

“रुद्रविलास विरासत संरक्षण केंद्र।”

मीरा अब पूरे अभिलेख की देखरेख करती थी।

डॉक्टर इरा की इकाई देशभर से मिलने वाली विचित्र ऐतिहासिक वस्तुओं को जांच के लिए यहां भेजती थी।

कबीर को अंदर कैमरा लाने की आज भी अनुमति नहीं थी।

जिस बात से वह सबसे ज्यादा परेशान रहता था।

और आरव?

उसने शहर वाली अपनी छोटी दुकान बंद नहीं की।

बोर्ड अब भी वहीं था।

“मिश्रा हस्तशिल्प एवं पुरावस्तु मरम्मत।”

लेकिन नीचे उसने एक नई पंक्ति जुड़वा दी थी—

“हर टूटी चीज को ठीक करना जरूरी नहीं।”

लोग पढ़कर हंसते।

उन्हें क्या पता था कि यह मजाक नहीं था।

एक शाम करीब छह बजे एक पुरानी गाड़ी दुकान के बाहर रुकी।

चालक ने बिना कुछ कहे एक लकड़ी का बक्सा नीचे रखा।

“किसने भेजा?”

“पता नहीं साहब। गोदाम से उठाया है।”

“कहां का?”

“राजस्थान की तरफ से आया है।”

बक्से पर कोई भेजने वाले का नाम नहीं था।

कबीर दुकान में बैठा समोसा खा रहा था।

“खोलें?”

आरव ने उसे देखा।

“तुझे हर बंद चीज खोलने की बीमारी है?”

“इसी से कहानी आगे बढ़ती है।”

आरव ने हंसते हुए बक्सा खोला।

अंदर पुराने कपड़े में लिपटी एक कठपुतली थी।

चेहरा आधा टूटा।

एक आंख गायब।

लकड़ी बहुत पुरानी।

आरव ने उसे बाहर निकाला।

नीचे एक छोटा सूची-पत्र पड़ा था।

खाली।

उसने उसे मेज पर रखा।

“कोई जानकारी नहीं।”

कबीर बोला,

“कितनी पुरानी होगी?”

“डेढ़ सौ साल के आसपास।”

“ठीक करेगा?”

आरव ने कठपुतली को देखा।

फिर पास रखी पीतल की थाली उठाई।

प्रतिबिंब देखा।

कठपुतली वास्तविकता में टूटी थी।

प्रतिबिंब में भी टूटी।

“शायद।”

वह जैसे ही औजार लेने के लिए मुड़ा, कबीर की आवाज आई—

“आरव…”

“क्या?”

“ये कागज अभी खाली था ना?”

आरव पलटा।

सूची-पत्र पर धीरे-धीरे शब्द उभर रहे थे।

दोनों उसे देखने लगे।

पहली पंक्ति—

“वस्तु संख्या: 01”

दूसरी—

“स्थिति: अधूरी”

आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

फिर तीसरी पंक्ति बनी—

“कारीगर: आरव मिश्रा”

कबीर ने उसकी तरफ देखा।

“ये मजाक तू कर रहा है?”

“नहीं।”

फिर आखिरी पंक्ति उभरी।

“निर्माण वर्ष: 1891”

दुकान में पूरी तरह खामोशी छा गई।

कबीर ने धीरे से कहा,

“भाई…”

आरव की नजर उस तारीख पर जमी थी।

“हां।”

“तू पैदा कब हुआ था?”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“1891 में तो बिल्कुल नहीं।”

उसी समय कठपुतली का बचा हुआ लकड़ी का हाथ धीरे-धीरे उठा।

और उसने मेज पर तीन बार दस्तक दी।

ठक।

ठक।

ठक।

आरव और कबीर दोनों बिल्कुल स्थिर।

फिर कठपुतली का सिर उनकी तरफ घूम गया।

उसके टूटे हुए मुंह से बहुत धीमी आवाज निकली—

“छोटे उस्ताद…”

आरव की आंखें फैल गईं।

आवाज उसके दादा की नहीं थी।

लेकिन वह नाम…

उसे केवल बहुत कम लोग जानते थे।

दुकान की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं।

और अंधेरे में वही आवाज फिर आई—

“इस बार… मुझे पूरा मत करना।”

SHARE THE STORY

यह कहानी किसी अपने के साथ साझा करें

0 बार पढ़ी गई
Whatsapp Telegram
DILFEVER YOUTUBE

ऐसी ही नई कहानियाँ वीडियो में सुनें

@DilFever

Subscribe करें
आपकी राय

अगर आप मुख्य किरदार की जगह होते, तो क्या फैसला लेते?

अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर लिखें।

Leave a Comment