Supernatural Mystery

जिस हवेली का सातवां नियम खाली था, वहां पहली रात ही दादा की आवाज सुनाई दी!

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

भाग 7 एक सैनिक आरव के शरीर के आर-पार निकल गया। कबीर पीछे हट गया। “ये क्या—” मीरा चिल्लाई, “किसी को छूना मत!” सामने एक घायल आदमी भागते हुए चिल्लाया— “दरवाजा बंद करो!” फिर एक गोली की आवाज। वह गिरा। अगले ही पल पूरा दृश्य गायब। हॉल फिर वर्तमान में। कबीर का चेहरा पीला पड़ ... Read more

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आप भाग 7 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 84 मिनट

भाग 7

एक सैनिक आरव के शरीर के आर-पार निकल गया।

कबीर पीछे हट गया।

“ये क्या—”

मीरा चिल्लाई,

“किसी को छूना मत!”

सामने एक घायल आदमी भागते हुए चिल्लाया—

“दरवाजा बंद करो!”

फिर एक गोली की आवाज।

वह गिरा।

अगले ही पल पूरा दृश्य गायब।

हॉल फिर वर्तमान में।

कबीर का चेहरा पीला पड़ चुका था।

“अब मुझे कैमरा न लाने का दुख नहीं है।”

इरा बोलीं,

“यह तेजी से बढ़ रहा है।”

मीरा ने कहा,

“हमें नीचे जाना होगा।”

आरव ने पूछा,

“नीचे जाने का रास्ता कहां है?”

मीरा कुछ पल चुप रही।

फिर सात कारीगरों वाले कमरे में वापस गई।

उसने तीसरे चित्र को दीवार से हटाया।

पीछे लोहे की छोटी कुंडी।

खींचते ही दीवार का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुल गया।

पीछे नीचे उतरती पत्थर की सीढ़ियां थीं।

कबीर ने लंबी सांस छोड़ी।

“भाई, पुरानी हवेली में गुप्त सीढ़ी न हो तो हवेली की इज्जत ही क्या।”

इरा ने उसे देखा।

“डर नहीं लग रहा?”

“बहुत लग रहा है। इसलिए बोल रहा हूं।”

नीचे उतरते समय हवा ठंडी होती गई।

करीब सौ सीढ़ियों के बाद वे एक लंबे पत्थर के रास्ते में पहुंचे।

दीवारों पर सात प्रकार के चिह्न बने थे।

धातु का हथौड़ा।

लकड़ी की छेनी।

तूलिका।

करघा।

मिट्टी का चक्र।

संगीत का चिह्न।

पत्थर काटने का औजार।

आरव ने दीवार छुई।

उसे हजारों हल्की कंपन महसूस हुईं।

जैसे पत्थरों के भीतर कोई फुसफुसा रहा हो।

इरा ने पूछा,

“क्या सुन रहे हो?”

आरव ने आंखें बंद कीं।

“बहुत लोग।”

“क्या कह रहे हैं?”

“कुछ साफ नहीं।”

फिर एक आवाज बाकी सब से अलग हुई।

“छोटे उस्ताद…”

आरव ने आंखें खोल दीं।

“दादा।”

मीरा चौंकी।

“क्या?”

“उन्होंने मुझे बुलाया।”

कबीर ने पूछा,

“किधर से?”

आरव ने सामने अंधेरे की तरफ इशारा किया।

“वहां।”

वे आगे बढ़े।

गलियारा सात दिशाओं में बंटा।

हर तरफ अलग कमरा।

मीरा बोली,

“हमें केंद्रीय कक्ष तक पहुंचना है।”

लेकिन आरव रुक गया।

“नहीं।”

“क्या?”

“दादा दूसरी तरफ बुला रहे हैं।”

“आरव, हमारे पास समय नहीं है।”

“इसीलिए।”

वह बाईं तरफ बढ़ गया।

बाकी लोग उसके पीछे।

पहला कमरा धातु का था।

दीवारों पर हथौड़े लटके थे।

अंदर प्रवेश करते ही सैकड़ों हथौड़ों की आवाज सुनाई देने लगी।

ठक।

ठक।

ठक।

एक ही लय।

आरव की आंखों के सामने दृश्य बदला।

एक पुराना लोहार धधकती भट्टी के सामने काम कर रहा था।

उसके हाथ विशाल थे।

हर चोट नापी हुई।

आरव अचानक अपने हाथों में गर्मी महसूस करने लगा।

उसे समझ आया कि किस धातु पर कितनी चोट पड़ेगी।

कहां दरार है।

कहां जोड़ कमजोर है।

फिर सामने लोहे का दरवाजा दिखाई दिया।

बंद।

इरा बोलीं,

“हमारे पास काटने का उपकरण है।”

आरव ने सिर हिलाया।

“जरूरत नहीं।”

उसने हथौड़ा उठाया।

दरवाजे पर केवल तीन जगह चोट की।

पहली।

दूसरी।

तीसरी।

पूरा ताला खुल गया।

कबीर बोला,

“ये तूने कब सीखा?”

आरव अपने हाथ देख रहा था।

“मैंने नहीं सीखा।”

आवाज भीतर से आई थी।

किसी और की स्मृति उसके हाथों में कुछ पल के लिए उतर आई थी।

अगला कमरा संगीत का था।

अंधेरा।

बीच में वही सारंगी।

इस बार उसमें तार थे।

एक महिला बैठी थी।

पीठ उनकी तरफ।

वह बजाने लगी।

मीरा बोली,

“मत सुनो।”

लेकिन आरव आगे बढ़ा।

धुन में उसे अपनी मां की आवाज सुनाई दी।

फिर पिता की।

फिर दादा की।

“छोटे उस्ताद…”

वह रुक गया।

सामने दादा बैठे दिखाई दिए।

जैसे बचपन में।

“आ जा।”

आरव की आंखें भर गईं।

कबीर ने उसका कंधा पकड़ा।

“भाई।”

आरव ने हाथ हटाया।

“बस एक मिनट।”

दादा मुस्कुराए।

“इतने साल बाद भी पहचान नहीं पाया?”

आरव आगे बढ़ा।

फिर अचानक उसे पहली रात याद आई।

बाहर खड़ी चीज ने उसे आरव कहा था।

अब सामने बैठा व्यक्ति बोला—

“छोटे उस्ताद।”

सही नाम।

सही आवाज।

लेकिन फिर भी आरव रुका।

उसने पूछा,

“दादा, मेरी पहली छेनी किसने तोड़ी थी?”

सामने बैठे व्यक्ति का चेहरा बदल गया।

“क्या?”

“जब मैं दस साल का था। मेरी पहली छेनी टूट गई थी। आपने मुझे किस पर डांटा था?”

कुछ सेकंड चुप्पी।

फिर चेहरे पर मुस्कान फैल गई।

लेकिन मुस्कान गलत थी।

बहुत लंबी।

आरव ने आंखें बंद कर लीं।

“तुम दादा नहीं हो।”

सारंगी की धुन अचानक चीख में बदल गई।

कमरा हिलने लगा।

आरव ने अपने कान बंद नहीं किए।

वह धुन के भीतर एक छोटी असमान ध्वनि सुन रहा था।

सारंगी की लकड़ी में एक कंपन।

उसने जाकर नीचे का छोटा जोड़ दबाया।

धुन टूट गई।

पूरा दृश्य गायब।

अंधेरा।

फिर दीवार पर एक नया रास्ता खुल गया।

इरा ने धीमे स्वर में कहा,

“तुम्हारे अंदर इन वस्तुओं की स्मृतियां आती जा रही हैं।”

आरव बोला,

“और हर बार थोड़ी देर के लिए मुझे लगता है मैं खुद नहीं हूं।”

तीसरा कमरा चित्रों का था।

दीवार पर रुद्रविलास की विशाल पेंटिंग।

जैसे ही वे आगे बढ़े, फर्श गायब।

वे उसी चित्र के भीतर खड़े थे।

हवेली सामने थी।

लेकिन बाहर तारीख जैसे बदलती जा रही थी।

एक पल 1940।

दूसरा पल 1962।

फिर 1986।

आरव चिल्लाया,

“रुको!”

दृश्य स्थिर हो गया।

1986।

हवेली के बाहर आठ लोग खड़े थे।

वही तस्वीर।

लेकिन इस बार चेहरा खरोंचा हुआ नहीं था।

आठवां आदमी साफ दिखाई दे रहा था।

युवा।

गंभीर।

आंखों में बेचैनी।

आरव बोला,

“विराज सूरी?”

मीरा ने कहा,

“नहीं।”

आरव ने उसकी तरफ देखा।

“तो कौन?”

“उसका पिता।”

“नाम?”

“विवेक सूरी।”

दृश्य आगे बढ़ा।

सात कारीगर भीतर काम कर रहे थे।

विवेक सूरी बहस कर रहा था।

“हम गलत कर रहे हैं!”

एक व्यक्ति बोला,

“अगर इसे खुला छोड़ा तो शहर नष्ट हो जाएगा।”

विवेक चिल्लाया,

“मैं इसे खुला छोड़ने की बात नहीं कर रहा। मैं कह रहा हूं इसे पूरी तरह दबाना भी गलत है।”

दूसरी आवाज—

“हमारे पास दूसरा तरीका नहीं।”

विवेक ने मेज पर हाथ मारा।

“हर स्मृति को कैद करोगे तो दबाव बढ़ेगा। एक दिन यह सब फटेगा।”

आरव स्थिर खड़ा था।

यही तो उसके दादा ने भी कहा था।

दृश्य फिर बदल गया।

शंकर मिश्रा विवेक के साथ अकेले बैठे थे।

विवेक बोला,

“तुम समझते हो मैं क्या कह रहा हूं।”

शंकर ने कहा,

“समझता हूं।”

“तो मेरे साथ चलो।”

“नहीं।”

“क्यों?”

शंकर ने शांत स्वर में कहा,

“तुम्हारा सवाल सही है। तरीका गलत।”

विवेक बोला,

“और तुम्हारा तरीका?”

शंकर ने एक टूटी धातु उठाई।

“घाव रहने दो।”

“क्या?”

“चीज को इतना जोड़ो कि टूटे नहीं। लेकिन इतना मत जोड़ो कि उसका अतीत मिट जाए।”

विवेक कुछ पल उसे देखता रहा।

“तुम इसे बदल सकते हो।”

शंकर बोले,

“शायद।”

दृश्य अचानक टूट गया।

वे फिर वर्तमान में थे।

आरव ने मीरा की तरफ देखा।

“तो विराज आधा सही है।”

“हां।”

“उसका परिवार खलनायक नहीं था।”

मीरा बोली,

“कभी नहीं।”

“फिर उसका चेहरा तस्वीर से क्यों मिटाया?”

मीरा ने नजरें झुका लीं।

“क्योंकि मेरे परिवार ने सच छुपाया।”

“क्यों?”

“उन्हें डर था कि अगर विवेक की बात बाहर गई तो बाकी संरक्षक भी पुराने तरीके पर सवाल उठाएंगे।”

कबीर बोला,

“और अब उसका बेटा पूरे सिस्टम को तोड़ना चाहता है।”

“हां।”

आरव ने कहा,

“क्योंकि उसे कहानी का केवल दूसरा आधा हिस्सा मिला।”

हवेली फिर कांपी।

इस बार पहले से ज्यादा जोर से।

तीसरा ताला।

फिर कुछ सेकंड बाद चौथा।

दो आवाजें लगातार।

मीरा घबरा गई।

“वह अंदर पहुंच गया है।”

आरव ने पूछा,

“कौन?”

“विराज।”

“कैसे?”

“जिसने वस्तुएं चुराईं, उसे रास्ते भी पता होंगे।”

वे दौड़ पड़े।

आगे पत्थर का विशाल कमरा था।

बीच में एक आदमी बैठा था।

आरव के कदम अपने आप धीमे हो गए।

सफेद बाल।

पतला शरीर।

पुराना कुर्ता।

चेहरा परिचित।

लेकिन बहुत बूढ़ा।

“दादा…?”

आदमी ने आंखें खोलीं।

“आ गया छोटे उस्ताद?”

इस बार आरव के पास कोई परीक्षा नहीं थी।

उस आवाज में वह हल्की खांसी थी जो शंकर मिश्रा को सर्दियों में होती थी।

वही तरीके से शब्द खींचना।

वही आंखें।

आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

“आप… जिंदा हैं?”

शंकर मुस्कुराए।

“ये सवाल मुश्किल है।”

आरव उनके सामने बैठ गया।

हाथ बढ़ाया।

उसकी उंगलियां दादा के कंधे के आर-पार निकल गईं।

वह जम गया।

“तो आप…”

“मैं वह हिस्सा हूं जो यहां रह गया।”

आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

“आप हमें छोड़कर क्यों गए?”

शंकर के चेहरे पर दर्द आया।

“मैं नहीं चाहता था।”

“सबने कहा आप मर गए।”

“मेरी देह बाहर गई थी। लेकिन मैं पूरा बाहर नहीं गया।”

“मतलब?”

शंकर ने दीवार की तरफ देखा।

“सातवीं दीवार किसी पत्थर की नहीं थी।”

आरव चुप रहा।

“पहली छह परतें वस्तुओं की थीं।”

“और सातवीं?”

शंकर ने अपनी छाती पर हाथ रखा।

“इंसान।”

आरव की आंखें फैल गईं।

“हर पीढ़ी में एक व्यक्ति अपनी स्मृतियों का हिस्सा इस जगह को देता था।”

मीरा धीरे से बोली,

“जीवित आधार।”

आरव उसकी तरफ पलटा।

“आपको पता था?”

“इतना नहीं।”

शंकर बोले,

“1986 में घेरा टूट रहा था। किसी को सातवीं परत बनना था।”

आरव का गला भर आया।

“आप बन गए?”

“हां।”

“क्यों?”

“क्योंकि उस वक्त दूसरा रास्ता नहीं मिला।”

“तो घर?”

शंकर की आवाज कमजोर हो गई।

“मैंने सोचा था कुछ साल बाद लौट जाऊंगा। लेकिन जितना हिस्सा यहां छोड़ा, उतना बाहर वाला मैं भूलता गया।”

आरव चुप।

“एक समय ऐसा आया जब बाहर वाला शंकर अपनी पत्नी का चेहरा तक याद नहीं रख पाया।”

आरव ने आंखें बंद कर लीं।

शंकर ने कहा,

“तुम मुझसे नाराज हो सकते हो।”

“हूं।”

“होना भी चाहिए।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

फिर आरव ने पूछा,

“मुझे क्या करना है?”

शंकर की आंखें गंभीर हो गईं।

“मेरी गलती दोहराना मत।”

“क्या?”

“इस जगह को बचाने के लिए खुद को मत देना।”

“तो फिर कालराग को कैसे रोकूं?”

“तरीका बदल।”

आरव ने दादा की ओर देखा।

“कैसे?”

शंकर ने वही पुरानी बात दोहराई—

“पुरानी चीज को नया मत बनाओ।”

आरव की सांस अटक गई।

“पहले समझो कि वह टूटी क्यों है।”

“तो वस्तुओं की दरारें…”

“रास्ते हैं।”

“किसके?”

“स्मृतियों की सांस के।”

अब सारी बातें एक साथ जुड़ने लगीं।

जीवित जोड़।

दरार को पूरी तरह बंद न करना।

स्मृति को दबाने के बजाय नियंत्रित जगह देना।

“अगर मैं सारी वस्तुओं में नियंत्रित दरार छोड़ दूं…”

शंकर मुस्कुराए।

“तो दबाव एक जगह जमा नहीं होगा।”

“कालराग?”

“एक शरीर नहीं बना पाएगा।”

“और सातवीं दीवार?”

“जरूरत नहीं रहेगी।”

आरव की आंखें चमक उठीं।

“यही रास्ता है।”

शंकर ने सिर हिलाया।

“लेकिन देर हो चुकी है।”

अचानक पत्थर का कमरा कांपा।

पांचवां ताला।

शंकर की आकृति धुंधली होने लगी।

“दादा!”

“जाओ।”

“आप?”

“मैं यहीं हूं।”

“फिर मिलेंगे?”

शंकर कुछ सेकंड उसे देखते रहे।

“अगर सब ठीक किया तो शायद नहीं।”

आरव की आंखों से आंसू गिर गए।

शंकर मुस्कुराए।

“और यही सबसे अच्छी बात होगी।”

उनकी आकृति गायब हो गई।

केंद्रीय कक्ष का दरवाजा खुला।

सामने विराज खड़ा था।

उसके पीछे विशाल गोलाकार पत्थर की संरचना।

सात ताले।

पांच खुले।

छठा टूट रहा था।

विराज ने आरव को देखा।

“आखिर आ गए।”

आरव ने कहा,

“रुक जाओ।”

विराज हंसा।

“अब?”

“तुम्हारे पिता इसे नष्ट नहीं करना चाहते थे।”

विराज का चेहरा कठोर हो गया।

“उनका नाम मत लो।”

“मैंने उन्हें देखा है।”

“झूठ।”

“1986 की स्मृति में।”

विराज की आंखें बदलीं।

आरव ने कहा,

“वह सही थे कि सब कुछ कैद करना गलत है। लेकिन उन्होंने कभी कालराग को खुला छोड़ने की बात नहीं की।”

“तुम क्या जानते हो?”

“उन्होंने दादा से कहा था कि यादों को सांस लेने की जगह चाहिए।”

विराज चिल्लाया,

“मेरे पिता को इन लोगों ने मिटा दिया! उनका नाम रिकॉर्ड से निकाल दिया! उनकी तस्वीर खराब की! उन्हें गद्दार बनाया!”

“हां।”

मीरा आगे आई।

“हमारे परिवार ने गलत किया।”

विराज ने उसे देखा।

“अब माफी मांगने आई हो?”

“नहीं।”

“तो?”

“सच मानने।”

विराज की आंखें भर आईं लेकिन गुस्सा कम नहीं हुआ।

“बहुत देर हो चुकी।”

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