भाग 4
“तू तो हर जगह गड़बड़ बोलता है।”
“लेकिन इस बार सही हूं।”
आरव ने कॉपी उसके सामने रख दी।
कबीर पन्ने पलटने लगा।
“ये किसकी है?”
“मेरे दादा की।”
“हवेली में मिली?”
“हां।”
कबीर की मुस्कान गायब हो गई।
“मतलब तेरे दादा वहां काम करते थे?”
“लगता तो यही है।”
“घर वालों को पता है?”
“शायद नहीं।”
कबीर ने तारीख देखी।
“1986… भाई, ये मामला बहुत पुराना है।”
फिर उसकी पत्रकार वाली आदत जाग गई।
“रुक।”
“क्या?”
“पुराने अखबार।”
“कौन से?”
“मेरे एक जानने वाले के पास शहर के पुराने स्थानीय अखबारों का डिजिटल संग्रह है। आग, चोरी, हत्या, हवेली, किसी न किसी वजह से रुद्रविलास का नाम कहीं आया होगा।”
आरव ने पहली बार उम्मीद से उसे देखा।
“ढूंढ सकता है?”
कबीर ने सीना फुलाया।
“मुझे कम मत आंका कर।”
“तू पहले चाय के पैसे देना सीख।”
“मुद्दे से मत भटका।”
दोनों बातें कर ही रहे थे कि दुकान के बाहर हवा तेज हो गई।
पुराने लकड़ी के दरवाजे अपने आप हिलने लगे।
आरव ने घड़ी देखी।
रात के आठ बजे थे।
अभी काफी समय था।
वह खुद को समझाता रहा कि अब वह रुद्रविलास से दूर है।
यह उसकी दुकान है।
उसका इलाका।
उसकी दुनिया।
यहां कोई नियम नहीं था।
रात दस बजे कबीर चला गया।
आरव ने दुकान बंद की।
दादा की कॉपी मेज पर रखी और पन्ने पढ़ने लगा।
ज्यादातर हिस्से अधूरे थे।
एक जगह लिखा था—
“पहली परत स्थिर है।”
दूसरी जगह—
“धातु को पूरा मत बंद करना।”
फिर—
“स्मृति बाहर नहीं जाती, केवल रूप बदलती है।”
कई शब्द समझ में नहीं आ रहे थे।
रात ग्यारह बजकर तीस मिनट हुए।
आरव ने कॉपी बंद कर दी।
“बस। आज बहुत हो गया।”
उसने दुकान की लाइट बुझाई।
ऊपर बने छोटे कमरे में जाने ही वाला था कि अचानक—
ठक।
दुकान के शटर पर दस्तक हुई।
आरव रुक गया।
बाहर से किसी पुरुष की आवाज आई।
“कोई है?”
शायद ग्राहक।
उसने फोन पर समय देखा।
11:43।
“दुकान बंद है!” आरव ने अंदर से जवाब दिया।
बाहर वाला बोला,
“जरूरी काम है।”
“सुबह आइए।”
कोई जवाब नहीं आया।
आरव ने राहत की सांस ली।
फिर 11:47 हुआ।
ठीक उसी सेकंड—
ठक।
ठक।
ठक।
फिर आवाज आई।
“आरव मिश्रा?”
आरव का पूरा शरीर अकड़ गया।
मीरा की बात याद आई।
अगर कोई नाम लेकर बुलाए, जवाब मत देना।
वह चुप रहा।
“आरव मिश्रा?”
आवाज इस बार अधिक स्पष्ट थी।
“दरवाजा खोलिए।”
आरव पीछे हट गया।
शटर के नीचे केवल एक इंच जगह थी।
बाहर किसी के पैर दिखाई नहीं दे रहे थे।
फिर भी आवाज बिल्कुल सामने से आ रही थी।
“आपकी चीज हमारे पास है।”
आरव ने मुंह पर हाथ रख लिया।
“आरव मिश्रा?”
तीसरी बार।
फिर अचानक—
धड़ाम!
पूरा शटर अंदर की तरफ कांपा।
आरव ने छेनी उठा ली।
दूसरी टक्कर।
धड़ाम!
तीसरी—
धड़ाम!
फिर सब शांत।
आरव लगभग दो मिनट तक वहीं खड़ा रहा।
बाहर कोई आवाज नहीं।
आखिर उसने नीचे झुककर शटर की दरार से बाहर देखने की कोशिश की।
सड़क खाली थी।
वह पीछे हटने लगा।
तभी उसकी नजर शटर पर पड़ी।
अंदर की तरफ…
पांच काले हाथों के निशान बने थे।
आरव जम गया।
“ये… अंदर कैसे?”
वह तो पूरे समय दुकान के अंदर था।
जिस चीज ने दस्तक दी थी—
क्या वह बाहर थी ही नहीं?
—
अगली सुबह कबीर भागता हुआ दुकान में आया।
उसके हाथ में कागजों का एक पुलिंदा था।
“मिल गया।”
आरव पूरी रात नहीं सोया था।
“क्या?”
कबीर ने एक पुरानी अखबार की प्रति सामने रखी।
तारीख—
सितंबर 1986।
शीर्षक था—
“रुद्रविलास में भीषण आग, सात कारीगर लापता।”
आरव की आंखें फैल गईं।
खबर में लिखा था कि निजी संरक्षण कार्य के दौरान अचानक आग लगी।
सात लोग लापता हुए।
कोई शव नहीं मिला।
भवन कई वर्षों के लिए बंद कर दिया गया।
“नीचे देख।”
एक धुंधली तस्वीर थी।
आठ लोग खड़े थे।
उनमें से एक—
शंकर मिश्रा।
आरव का हाथ कांप गया।
“दादा…”
कबीर बोला,
“पीछे बोर्ड पढ़।”
तस्वीर के पीछे एक लकड़ी के बोर्ड पर लिखा था—
“सप्त शिल्प संरक्षण समिति।”
आरव एक-एक चेहरा देखने लगा।
उसके दादा।
एक बुजुर्ग धातुकार।
एक महिला चित्रकार।
एक संगीतज्ञ।
और फोटो के अंतिम कोने में एक आदमी खड़ा था।
लेकिन उसके चेहरे पर किसी ने बाद में धारदार चीज से कई खरोंचें मार दी थीं।
पूरा चेहरा मिटा दिया गया था।
आरव ने पूछा,
“ये कौन है?”
“नाम नहीं मिला।”
“बाकी?”
“कई नाम रिकॉर्ड से गायब हैं।”
“और आग के बाद?”
“बस यही तो अजीब है।”
कबीर कुर्सी खींचकर बैठ गया।
“अगले दिन की खबरों में रुद्रविलास का नाम लगभग गायब है। फिर कोई जांच नहीं, कोई परिवार का बयान नहीं, कुछ नहीं।”
“किसी ने दबाया?”
“लगता है।”
आरव कॉपी और अखबार की तस्वीर साथ रखकर देख रहा था।
उसी समय कबीर का मोबाइल बजा।
उसने फोन उठाया।
पहले सामान्य तरीके से बात की।
फिर चेहरा गंभीर हो गया।
“कहां?”
कुछ सेकंड चुप।
“कितने लोग?”
उसने फोन काट दिया।
आरव ने पूछा,
“क्या हुआ?”
“पुराने शहर की तरफ जो नई भूमिगत रेल लाइन का काम चल रहा है ना?”
“हां।”
“वहां कुछ हुआ है।”
“क्या?”
“मजदूरों ने खुदाई में एक पुराना कमरा निकाला था। वहां से लकड़ी का एक बक्सा मिला। उसके बाद से काम बंद।”
“क्यों?”
“लोग आवाज सुन रहे हैं।”
“किसकी?”
कबीर ने धीरे से कहा,
“सारंगी।”
आरव की रीढ़ में ठंड दौड़ गई।
—
एक घंटे बाद दोनों निर्माण स्थल के पास थे।
इलाका बंद किया जा चुका था।
पुलिस।
अग्निशमन दल।
चिकित्सा वाहन।
बाहर दर्जनों मजदूर बैठे थे।
कई लोग कानों पर हाथ रखे हुए थे।
एक आदमी बार-बार बस यही कह रहा था—
“वो गाना बंद करो… वो गाना बंद करो…”
आरव आगे बढ़ा तो एक महिला अधिकारी ने रोक लिया।
करीब चालीस वर्ष।
सादा कपड़े।
गले में पहचान पत्र।
“आगे जाना मना है।”
कबीर ने पत्रकार वाला अंदाज अपनाया।
“हम स्थानीय मीडिया से—”
“इसीलिए और ज्यादा मना है।”
कबीर चुप हो गया।
महिला की नजर आरव के थैले पर गई।
उसमें पुराने संरक्षण औजार थे।
“आप कौन?”
“कारीगर।”
“यहां क्यों?”
आरव जवाब देने ही वाला था कि जमीन के नीचे से एक बहुत धीमी धुन सुनाई दी।
सारंगी।
आरव का चेहरा बदल गया।
महिला अधिकारी ने यह देख लिया।
“आपने यह आवाज पहले सुनी है?”
आरव चुप।
“मेरा नाम डॉक्टर इरा सेन है।”
“पुरातत्व विभाग?”
“आज के लिए इतना समझ लीजिए।”
“नीचे क्या है?”
“यह सवाल मैं आपसे पूछने वाली थी।”
इरा ने एक पारदर्शी थैली दिखाई।
उसमें लकड़ी का टूटा हुआ छोटा हिस्सा था।
एक पुराने वाद्य का हिस्सा।
आरव ने उसे देखते ही पहचान लिया।
“ये…”
“क्या?”
“रुद्रविलास की सारंगी।”
इरा की आंखें सिकुड़ गईं।
“आप रुद्रविलास को जानते हैं?”
आरव को तुरंत लगा उसने जरूरत से ज्यादा बोल दिया।
“थोड़ा।”
“कितना थोड़ा?”
तभी भूमिगत सुरंग से चीख सुनाई दी।
एक कर्मचारी भागता हुआ बाहर आया।
“मैडम! लोग फिर चलने लगे!”
“कौन लोग?”
“जो अंदर फंसे हैं। सब एक साथ सुरंग के अंदर जा रहे हैं। जैसे किसी के पीछे चल रहे हों।”
इरा ने तुरंत दल को आदेश दिया।
आरव ने पूछा,
“गाना कब शुरू हुआ?”
“यह हिस्सा बक्से से निकालने के बाद।”
“और बक्सा?”
“नीचे।”
आरव समझ गया।
“इसे वापस जोड़ना पड़ेगा।”
इरा ने उसकी तरफ देखा।
“आपको कैसे पता?”
“पता नहीं।”
“तो दावा क्यों कर रहे हैं?”
आरव ने लकड़ी के टुकड़े को ध्यान से देखा।
अचानक उसके हाथों में हल्की कंपन हुई।
कुछ सेकंड के लिए उसे लगा जैसे कहीं दूर कोई तार बज रहा हो।
नहीं…
केवल एक नहीं।
सैकड़ों कंपन।
सुरंग की दीवारें।
लोहे की पाइपें।
चलते पंखे।
पानी।
और बहुत नीचे…
एक टूटे हुए वाद्य की खाली जगह।
आरव ने आंखें बंद कीं।
“बक्सा करीब ढाई सौ मीटर अंदर है।”
इरा चौंकी।
“आपको किसने बताया?”
“कोई नहीं।”
“नक्शा देखा?”
“नहीं।”
वह खुद भी परेशान था।
लेकिन अंदर कुछ उसे रास्ता बता रहा था।
“अगर उस हिस्से को वहीं नहीं जोड़ा गया तो गाना बंद नहीं होगा।”
इरा ने कुछ पल सोचा।
फिर बोली,
“मेरे साथ आइए।”
कबीर ने तुरंत कहा,
“मैं भी—”
“आप यहीं रहेंगे।”
“लेकिन—”
“यहीं।”
कबीर ने आरव का हाथ पकड़ा।
“भाई, मरने लगे तो पहले संदेश कर देना।”
आरव ने उसे घूरा।
“बड़ा अच्छा दोस्त है।”
—
सुरंग में उतरते ही माहौल बदल गया।
जितना नीचे जाते, सारंगी की आवाज उतनी तेज होती।
लेकिन कोई दिशा तय नहीं थी।
कभी सामने।
कभी पीछे।
कभी कान के बिल्कुल पास।
इरा के साथ चार सदस्य थे।
सबके कानों में ध्वनि रोकने वाले उपकरण लगे थे।
आरव ने साधारण कपड़ा बांध रखा था।
कुछ दूरी बाद दीवारों पर पुराने पत्थर दिखाई देने लगे।
नई सुरंग एक पुराने भूमिगत ढांचे को काटकर निकल रही थी।
अचानक आरव रुक गया।
सामने एक आदमी चल रहा था।
पुराने कपड़े।
हाथ में लालटेन।
“रुकिए!”
इरा ने पूछा,
“क्या?”
“वह आदमी।”
“कौन आदमी?”
आरव ने सामने देखा।
अब वहां कोई नहीं था।
फिर बाईं दीवार से संगीत आया।
दीवार…
धीरे-धीरे बदलने लगी।
सीमेंट गायब।
उसकी जगह पुराने समय का कमरा।
तेल के दीये।
सफेद कपड़े पहने लोग।
बीच में एक युवक सारंगी बजा रहा था।
आग फैल रही थी।
कोई चिल्लाया—
“धुन मत रोकना!”
दृश्य एक पल में गायब हो गया।
आरव ने सिर पकड़ा।
इरा ने उसे संभाला।
“क्या देखा?”
“कुछ पुराना।”
“कैसा?”
“याद…”
शब्द उसके मुंह से खुद निकला।
आगे बढ़ने पर उन्हें तीन कर्मचारी मिले।
वे बिल्कुल शांत खड़े थे।
आंखें बंद।
और संगीत की दिशा में चल रहे थे।
इरा के दल ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की।
वे बुरी तरह छटपटाने लगे।
एक चिल्लाया—
“धुन पूरी होने दो!”
आरव के दिमाग में नियम चार आया।
धुन पूरी होने से पहले कमरे से निकल जाना।
“उन्हें गाना पूरा नहीं सुनने देना!”
इरा ने पूछा,
“क्यों?”
“बस कीजिए!”
दल ने कर्मचारियों के कान बंद किए।
कुछ सेकंड में वे बेहोश होकर गिर पड़े।
आखिर वे पुराने कमरे तक पहुंचे।
बीच में लकड़ी का बक्सा खुला था।
उसके अंदर वही बिना तार की सारंगी रखी थी।
आरव का गला सूख गया।
रुद्रविलास वाली सारंगी?
नहीं।
ध्यान से देखने पर समझ आया—
यह उसका दूसरा हिस्सा था।
मुख्य ढांचा हवेली में था।
यह शायद उसका मूल स्वर-पट्ट था।
आरव ने पीतल की छोटी प्लेट निकाल ली।
इरा ने पूछा,
“यह क्यों?”
“लंबी कहानी है।”
उसने प्रतिबिंब देखा।
वास्तविकता में सारंगी टूटी थी।
प्रतिबिंब में भी टूटी।
“ठीक है।”
वह बैठ गया।
लकड़ी का हिस्सा लगाया।
लेकिन जैसे ही काम शुरू किया—
कमरा बदल गया।
वह अब सुरंग में नहीं था।
चारों तरफ आग।
सामने वही युवा संगीतकार बैठा था।
उसकी उंगलियां खून से भरी थीं।
वह लगातार बजा रहा था।
आरव ने कहा,
“तुम कौन हो?”
युवक ने उसे नहीं देखा।
वह किसी पुरानी घटना का हिस्सा था।
सिर्फ स्मृति।
फिर पीछे से एक आवाज आई—
“जो सुना गया है, उसे मिटाया नहीं जा सकता।”
आरव ने पलटकर देखा।
कोई नहीं।
उसने काम जारी रखा।
जोड़ पूरा किया।
अंतिम लकड़ी का लॉक अपनी जगह बैठा।
सारंगी की आवाज एकदम बंद।
चारों तरफ आग गायब।
कमरा फिर सुरंग बन गया।
लेकिन आरव ने अचानक हजारों आवाजें सुनीं।
पानी।
लोहे की कंपन।
लोगों की सांसें।
दूर कहीं मदद की आवाज।
उसने आंखें बंद कीं।
“इरा जी।”
“क्या?”
“दीवार के पीछे कोई है।”
“कहां?”
“करीब तीस कदम आगे। बाईं तरफ।”
दल ने वहां जांच की।
नई सुरंग का एक हिस्सा धंस गया था।
पीछे तीन मजदूर जीवित फंसे थे।
इरा ने आरव की तरफ देखा।
अब उसकी आंखों में केवल संदेह नहीं था।
डर और जिज्ञासा दोनों थे।
—
उस शाम आरव को सीधे एक सरकारी इमारत में ले जाया गया।
बाहर कोई नाम नहीं।
अंदर इरा ने बताया—
“राष्ट्रीय विरासत प्रतिक्रिया इकाई।”