भाग 1
रात के करीब एक बज रहे थे।
लखनऊ की सड़कों पर इतनी तेज बारिश हो रही थी कि सामने दस कदम दूर क्या है, ठीक से दिखाई तक नहीं दे रहा था। सड़क किनारे लगी पीली बत्तियां पानी की बूंदों के बीच धुंधली पड़ चुकी थीं। कभी-कभी कोई गाड़ी तेजी से गुजरती तो सड़क पर जमा पानी की पूरी लहर फुटपाथ तक आ जाती।
राघव मिश्रा अपनी पुरानी मोटरसाइकिल पर बैठा एक बंद दुकान के छज्जे के नीचे बारिश कम होने का इंतजार कर रहा था।

उसकी पीठ पर खाने की डिलीवरी वाला बड़ा बैग था और हेलमेट के शीशे पर इतनी नमी जम चुकी थी कि उसे बार-बार हाथ से साफ करना पड़ रहा था।
उसने मोबाइल निकाला।
बैटरी केवल अठारह प्रतिशत बची थी।
आज का हिसाब देखा तो उसके चेहरे पर निराशा आ गई।
पूरा दिन शहर में घूमने के बाद भी कमाई उम्मीद से बहुत कम हुई थी।
“बस… आज के लिए बहुत हो गया।”
उसने खुद से कहा।
सुबह सात बजे घर से निकला था। दिन भर गोमती नगर से हजरतगंज, हजरतगंज से चौक, चौक से अलीगंज और फिर वापस गोमती नगर।
कभी ग्राहक फोन नहीं उठाता, कभी पता गलत होता, कभी पांचवीं मंजिल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़तीं और ऊपर पहुंचकर सुनने को मिलता—
“भैया, दो मिनट लेट हो गए।”
मानो दो मिनट में दुनिया खत्म हो जाने वाली हो।
राघव ने मोबाइल जेब में डाला और मोटरसाइकिल स्टार्ट करने ही वाला था कि अचानक फोन बजा।
टिन…
उसने सोचा शायद कोई नया ऑर्डर आया है।
स्क्रीन देखी।
और अगले ही पल उसकी उंगली स्टार्ट बटन पर रुक गई।
मोबाइल पर काले रंग की एक स्क्रीन खुली थी।
बीच में सफेद अक्षरों में लिखा था—
“अंतिम पड़ाव”
राघव ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“ये कौन सा ऐप है?”
उसने स्क्रीन बंद कर दी।
फिर अपने मोबाइल में सभी ऐप देखने लगा।
वही काले रंग का चिन्ह वहां मौजूद था।
एक गोल घेरे के बीच सफेद रंग का छोटा-सा दरवाजा।
नीचे लिखा था—
अंतिम पड़ाव।
“मैंने ये कब डाला?”
राघव को कुछ समझ नहीं आया।
उसने ऐप पर उंगली रखकर उसे हटाने की कोशिश की।
लेकिन हटाने का विकल्प ही नहीं आया।
तभी दोबारा आवाज हुई।
टिन…
नया ऑर्डर उपलब्ध है।
राघव ने जाने क्यों ऐप खोल लिया।
ऑर्डर स्क्रीन पर चार चीजें लिखी थीं—
आधा किलो गरम जलेबी।
एक कुल्हड़ अदरक वाली चाय।
एक मिट्टी का दिया।
एक लाल मौली का धागा।
राघव कुछ सेकंड स्क्रीन देखता रहा।
फिर हंस पड़ा।
“आधी रात को किसको जलेबी और मौली चाहिए?”
नीचे कीमत लिखी थी—
सामान का कुल मूल्य: ₹386
और उसके नीचे…
डिलीवरी पारिश्रमिक:
₹51,000
राघव की हंसी अचानक बंद हो गई।
“इक्यावन… हजार?”
उसने आंखें मसलकर दोबारा देखा।
₹51,000 ही लिखा था।
उसने सोचा शायद कोई तकनीकी गड़बड़ी है।
फिर नीचे एक लाल रंग का संदेश चमका—
ऑर्डर स्वीकार करने के बाद रद्द नहीं किया जा सकता।
डिलीवरी समय: रात 2:00 बजे से पहले।
स्थान: पुराना बैरक डाक-बंगला, गोमती नदी का उत्तरी किनारा।
राघव कुछ देर सोचता रहा।
उसने नक्शा खोला।
जगह शहर से करीब बारह किलोमीटर दूर थी।
वहां जाने वाला रास्ता सुनसान इलाके से होकर गुजरता था।
“हो सकता है कोई शूटिंग चल रही हो… या कोई शादी-विवाह वालों का फार्महाउस हो।”
उसने खुद को समझाया।
इक्यावन हजार रुपये।
उसके दिमाग में अपने आप हिसाब चलने लगा।
कमरे का तीन महीने का किराया।
मोटरसाइकिल की किश्त।
घर पर मां को कुछ पैसे।
और बाकी बच जाएं तो शायद वह कई दिनों तक आराम से काम कर सके।
राघव ने ऑर्डर स्वीकार करने वाले बटन पर उंगली रखी।
कुछ सेकंड तक दबाया नहीं।
फिर बोला—
“चल राघव… जिंदगी में पहली बार कोई अमीर पागल मिला है। उसे नाराज क्यों करना?”
उसने बटन दबा दिया।
तुरंत स्क्रीन बदल गई।
ऑर्डर स्वीकार किया गया।
और उसके नीचे चार नए निर्देश दिखाई दिए।
राघव ने पढ़ना शुरू किया।
पहला—
मुख्य लोहे के गेट के सामने मोटरसाइकिल का हॉर्न न बजाएं।
दूसरा—
मुख्य दरवाजे पर ठीक तीन बार घंटी बजाएं। कम या ज्यादा नहीं।
तीसरा—
यदि कोई पीछे से आपका नाम पुकारे तो पीछे न देखें।
चौथा—
मिट्टी का दिया बुझने से पहले परिसर से बाहर निकल जाएं।
राघव का चेहरा धीरे-धीरे गंभीर हो गया।
“ये ऑर्डर है या भूत की परीक्षा?”
उसने स्क्रीन का चित्र लेना चाहा।
लेकिन जैसे ही उसने कोशिश की, मोबाइल पर लिखा आया—
इस पृष्ठ का चित्र नहीं लिया जा सकता।
अब पहली बार उसके मन में थोड़ा डर आया।
वह ऑर्डर रद्द करना चाहता था।
लेकिन रद्द करने का कोई बटन नहीं था।
तभी ऊपर समय चमका—
1:14 रात्रि।
डिलीवरी के लिए 46 मिनट शेष।
राघव ने गहरी सांस ली।
“पहले सामान लेते हैं। उसके बाद देखते हैं।”
पास ही चौक की तरफ एक हलवाई की दुकान देर रात तक खुली रहती थी।
वह वहां पहुंचा।
हलवाई बड़े कड़ाहे में जलेबी तल रहा था।
“भैया आधा किलो जलेबी।”
“इतनी रात में?”
“ग्राहक भगवान होता है।”
हलवाई हंस पड़ा।
“ऐसा ग्राहक हमें भी मिलवा देना।”
राघव मन ही मन बोला—
“पहले खुद बचकर वापस आ जाऊं।”
चाय सामने की दुकान से मिल गई।
दिया और मौली एक छोटे मंदिर के बाहर बैठे दुकानदार से मिल गई।
रात के 1:27 हो चुके थे।
बारिश अब थोड़ी धीमी हो गई थी।
राघव ने मोबाइल का नक्शा चालू किया और शहर से बाहर निकल गया।
जितना वह मुख्य सड़क से दूर जाता गया, आसपास की रोशनी कम होती गई।
कुछ ही देर बाद दोनों तरफ ऊंचे पेड़ शुरू हो गए।
सड़क संकरी हो गई।
कभी-कभार किसी खेत के बीच ट्यूबवेल की रोशनी दिखती।
बाकी चारों तरफ अंधेरा।
राघव ने खुद से बातें शुरू कर दीं।
“कुछ नहीं है।”
“पुराना बंगला होगा।”
“कोई अमीर परिवार पार्टी कर रहा होगा।”
“इक्यावन हजार मिल रहे हैं भाई… इक्यावन हजार।”
फिर अचानक उसे याद आया—
“हॉर्न मत बजाना।”
वह हंस दिया।
“हां भाई, नहीं बजाऊंगा।”
करीब दस मिनट बाद नक्शे ने कहा—
आप अपने गंतव्य पर पहुंच गए हैं।
राघव ने मोटरसाइकिल धीमी की।
सामने सड़क के किनारे जंग लगा एक विशाल लोहे का गेट खड़ा था।
उसके ऊपर पत्थर की पुरानी पट्टी पर धुंधले अक्षरों में लिखा था—
बैरक विश्राम गृह
निर्माण वर्ष 1898
राघव ने बाइक रोक दी।
गेट के भीतर काफी दूर एक पुरानी दो मंजिला इमारत दिखाई दे रही थी।
पीली दीवारें काली पड़ चुकी थीं।
कई खिड़कियां टूटी हुई थीं।
छत से बेलें नीचे लटक रही थीं।
सबसे अजीब बात यह थी कि पूरे भवन में केवल एक खिड़की से पीली रोशनी आ रही थी।
राघव ने मोबाइल देखा।
ग्राहक तक दूरी: 164 मीटर।
“कमाल है।”
उसने बैग उतारा।
तभी उसका ध्यान गेट के पास लगे एक सरकारी बोर्ड पर गया।
उसने मोबाइल की रोशनी उस पर डाली।
“खतरनाक भवन। प्रवेश निषिद्ध।”
नीचे तारीख लिखी थी।
करीब दस साल पुरानी।
राघव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“अबे यार…”
उसने ग्राहक को फोन करने की कोशिश की।
फोन नंबर की जगह सिर्फ लिखा था—
संपर्क उपलब्ध नहीं।
राघव ने गेट के बाहर खड़े होकर जोर से आवाज लगानी चाही।
फिर उसे पहला नियम याद आया।
हॉर्न नहीं बजाना।
आवाज लगाने से मना नहीं किया था।
फिर भी जाने क्यों उसका मन नहीं माना।
उसने गेट धकेला।
चर्रररर…
आवाज पूरे सुनसान इलाके में गूंज गई।
राघव अंदर चला गया।
जगह देखकर लगता था जैसे वर्षों से कोई नहीं आया।
जंगली घास कमर तक उगी थी।
टूटी हुई पत्थर की पगडंडी सीधे बंगले तक जाती थी।
राघव अपने कदम तेज कर रहा था।
तभी कहीं दूर से कुत्ते के रोने जैसी आवाज आई।
उसने ध्यान नहीं दिया।
मुख्य दरवाजे तक पहुंचा।
घंटी के पास हाथ रखा।
फिर निर्देश याद किया।
ठीक तीन बार।
टन…
टन…
टन…
राघव इंतजार करने लगा।
कुछ नहीं हुआ।
उसने लगभग बीस सेकंड इंतजार किया।
फिर धीरे से बोला—
“हैलो?”
कोई जवाब नहीं।
उसने दोबारा घंटी बजाने के लिए हाथ उठाया ही था कि भीतर से कुंडी खुलने की आवाज आई।
दरवाजा अपने आप थोड़ा-सा खुल गया।
राघव ठिठक गया।
अंदर लंबा अंधेरा गलियारा था।
सबसे आखिर में एक कमरे से पीली रोशनी आ रही थी।
उसका मोबाइल फिर बजा।
ग्राहक आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
राघव ने मन ही मन भगवान को याद किया और अंदर कदम रख दिया।
कमरे तक पहुंचकर उसने देखा कि बीच में पुरानी लकड़ी की मेज रखी थी।
और उसके पीछे एक आदमी बैठा था।
करीब पचपन-साठ वर्ष की उम्र।
सफेद कुर्ता।
धोती।
हल्की मूंछें।
बालों में सफेदी।
चेहरे पर ऐसी मुस्कान जैसे किसी पुराने परिचित का इंतजार कर रहा हो।
“आ गए बेटा?”
राघव ने राहत की सांस ली।
“हां अंकल जी। आपकी डिलीवरी।”
“बहुत देर लगा दी।”
“बारिश देख रहे हैं आप?”
“बारिश?”
आदमी ने खिड़की की तरफ देखा।
“हां… बारिश।”
उसकी आवाज में कुछ अजीब था।
राघव ने बैग खोला।
“जलेबी, चाय, दिया और मौली। सब कुछ है।”
आदमी की आंखें चमक उठीं।
“जलेबी गरम है?”
“अभी आधे घंटे पहले बनवाई है।”
“बस फिर तो मजा आ गया।”
वह जलेबी खाने लगा।
इतनी खुशी से खा रहा था मानो वर्षों से कुछ मीठा न खाया हो।
राघव खड़ा रहा।
आदमी ने कहा—
“बैठो।”
“नहीं अंकल जी, मुझे वापस जाना है।”
“इक्यावन हजार लेने की जल्दी नहीं है?”
राघव चौंका।
“आपको पता है?”
“ऑर्डर मैंने ही तो दिया है।”
राघव तुरंत बैठ गया।
“अंकल जी, बुरा मत मानना… इतना पैसा सिर्फ जलेबी पहुंचाने के लिए?”
आदमी हंस पड़ा।
“जलेबी पहुंचाने के लिए नहीं।”
“फिर?”
“एक काम करने के लिए।”
राघव के मन में तुरंत शक हुआ।
“देखिए, कोई गैरकानूनी काम हुआ तो मैं नहीं करूंगा।”
आदमी ने कुल्हड़ उठाया।
“तुम्हें मैं गुंडा दिखता हूं?”
“नहीं… पर रात के दो बजे बंद बंगले में बैठा आदमी सामान्य भी तो नहीं लगता।”
आदमी कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
फिर जोर से हंस पड़ा।
“सही कहा।”
उसने हाथ आगे बढ़ाया।
“नाम है हरिशंकर तिवारी।”
“राघव।”
“मिश्रा?”
राघव चौंका।
“आपको कैसे पता?”
हरिशंकर ने जवाब नहीं दिया।
जलेबी का आखिरी टुकड़ा खाया।
फिर धीरे से बोला—
“तुम्हें यहां आए कितना समय हुआ?”
“पांच-सात मिनट।”
“अच्छा है। हमारे पास समय है।”
“किस चीज का समय?”
हरिशंकर खिड़की से बाहर देखने लगा।
“मेरी एक बेटी है।”
राघव चुप रहा।
“नाम काव्या।”
“अच्छा।”
“लखनऊ विश्वविद्यालय में कानून पढ़ती है।”
हरिशंकर की आवाज बदल गई।
“बहुत जिद्दी है। बिल्कुल अपनी मां जैसी।”
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“लेकिन पिछले कुछ सालों में बहुत परेशान हुई है।”
राघव ने पूछा—
“क्यों?”
“मेरी वजह से।”
“आपकी वजह से?”
हरिशंकर ने सिर हिलाया।
“मैंने जिंदगी में बहुत समझदारी दिखाई… बस एक जगह मूर्खता कर बैठा।”
अब उसकी आंखों में पछतावा था।
“मेरे ऊपर व्यापार का कुछ कर्ज था। असली रकम बहुत कम थी। लेकिन जिसने पैसे दिए थे उसने मेरे मरने के बाद नकली कागज बनाकर रकम कई गुना बढ़ा दी।”
“तो पुलिस में शिकायत कीजिए।”
हरिशंकर मुस्कुराया।
“मैं नहीं कर सकता।”
“क्यों?”
उसने राघव की आंखों में देखा।
“क्योंकि मैं सात साल पहले मर चुका हूं।”
कमरे में अचानक बिल्कुल सन्नाटा हो गया।
बाहर बारिश की आवाज भी जैसे गायब हो गई।
राघव कुछ सेकंड हरिशंकर को देखता रहा।
फिर जोर से हंसा।
“अच्छा मजाक है।”
हरिशंकर चुप रहा।
“सच में… अच्छा था।”
कोई जवाब नहीं।
राघव की हंसी धीरे-धीरे बंद हो गई।
“आप… मजाक कर रहे हैं ना?”
हरिशंकर ने मेज पर रखे पुराने अखबार की तरफ इशारा किया।
राघव ने उसे उठाया।
तारीख सात साल पुरानी थी।
एक छोटी-सी खबर पर उसकी नजर पड़ी।
“व्यापारी हरिशंकर तिवारी की सड़क दुर्घटना में मृत्यु।”
साथ में तस्वीर थी।
वही चेहरा।
राघव के हाथ कांपने लगे।
उसने तुरंत पीछे हटकर दरवाजे की तरफ दौड़ना चाहा।
हरिशंकर बोला—
“राघव!”
राघव वहीं जम गया।
उसे तीसरा नियम याद आया।
अगर कोई पीछे से नाम लेकर बुलाए तो पीछे मत देखना।
लेकिन आवाज सामने से आई थी।
वह धीरे-धीरे पलटा।
“डरो मत।”
“आप… आप…”
“भूत?”
राघव ने सिर हिलाया।
हरिशंकर बोला—
“हां।”
“हे भगवान।”
“भगवान को इसमें क्यों घसीट रहे हो?”
राघव ने कांपती आवाज में कहा—
“मुझे पैसे नहीं चाहिए।”
उसने बैग उठाया।
“जलेबी मेरी तरफ से। चाय भी मुफ्त। दिया भी रख लो। मैं चलता हूं।”