भाग 5
पहला स्वर निकला तो कमरे में बैठे लोग शांत हो गए।
दूसरा स्वर आया तो जस्टिस त्रिपाठी की आंखें फैल गईं।
राघव को खुद नहीं पता था कि उसके मुंह से क्या निकल रहा है।
लेकिन हर सुर जैसे पहले से उसके भीतर मौजूद था।
अधूरी बंदिश आगे बढ़ी।
जहां पांडुलिपि खत्म होती थी—
वहीं से राघव ने नई पंक्ति शुरू की।
संगीतकार अपनी सीट से उठ खड़े हुए।
युवराज की मुस्कान गायब हो गई।
अंतिम सुर काफी देर तक कमरे में गूंजता रहा।
फिर पूर्ण सन्नाटा।
उस्ताद की आत्मा राघव के सामने खड़ी थी।
उनकी आंखों में आंसू थे।
“बस… यही था।”
उन्होंने धीमे से कहा।
“यही सुनना था।”
राघव ने मन में पूछा,
“अब?”
उस्ताद मुस्कुराए।
“अब घर।”
उनकी आकृति धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।
“एक बात याद रखना लड़के।”
“क्या?”
“हुनर कभी आदमी का नहीं होता। वह बस कुछ समय उसके पास ठहरता है।”
और वह गायब हो गए।
कमरे में बैठे लोग अभी भी राघव को देख रहे थे।
जस्टिस त्रिपाठी उठे।
राघव के पास आए।
“तुमने ये कहां सीखा?”
राघव ने सोचा।
फिर मुस्कुराकर बोला,
“एक उस्ताद से।”
काव्या दूर खड़ी उसे देख रही थी।
उसकी आंखों में अब मजाक नहीं था।
कुछ और था।
आश्चर्य।
जिज्ञासा।
और शायद थोड़ा डर भी।
पार्टी खत्म होने के बाद दोनों बाहर निकले।
काव्या ने कहा,
“तुमने फिर कुछ छुपाया है।”
“क्या?”
“तुम्हें संगीत नहीं आता।”
“सही।”
“फिर वो क्या था?”
“लंबी कहानी।”
“मेरे पास समय है।”
राघव ने बाइक की तरफ चलते हुए कहा,
“उस्ताद निजामुद्दीन आए थे।”
काव्या रुक गई।
“आज?”
“हां।”
“पार्टी में?”
“हां।”
“और तुम उनसे बात कर रहे थे?”
“हां।”
काव्या ने माथा पकड़ लिया।
“मैं सच में एक ऐसे लड़के को नकली बॉयफ्रेंड बनाकर लाई हूं जो पार्टी में मरे हुए मेहमानों से बात करता है।”
राघव बोला,
“तकनीकी रूप से वो बिना निमंत्रण आए थे।”
काव्या हंस पड़ी।
कुछ सेकंड बाद उसने गंभीर होकर पूछा,
“राघव… ये सब तुम्हारे साथ क्यों हो रहा है?”
राघव की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
“मुझे नहीं पता।”
“डर नहीं लगता?”
राघव ने जवाब देने में समय लिया।
“पहली रात बहुत लगा था।”
“अब?”
“अब भी लगता है।”
उसने काव्या की तरफ देखा।
“लेकिन जब तुम्हारे पिता की इच्छा पूरी हुई… और तुमने उनका पत्र पढ़ा… तब पहली बार लगा कि शायद ये सिर्फ डरावनी चीज नहीं है।”
काव्या कुछ नहीं बोली।
राघव ने बाइक स्टार्ट की।
तभी पीछे से एक परिचित आवाज आई।
“वाह मेरे छोटे भाई!”
राघव ने तुरंत ब्रेक लगाया।
सड़क किनारे हरिशंकर खड़े थे।
लेकिन इस बार उनका रूप बदला हुआ था।
सफेद कुर्ते की जगह गहरे भूरे रंग की वर्दी जैसी पोशाक।
सीने पर छोटी पट्टी।
हाथ में मोटा रजिस्टर।
सिर पर गोल टोपी।
राघव ने पूछा,
“ये क्या पहन रखा है?”
काव्या ने इधर-उधर देखा।
“किससे बात कर रहे हो?”
राघव रुक गया।
हरिशंकर उसे दिखाई दे रहे थे।
काव्या को नहीं।
हरिशंकर बोले,
“मुझे नौकरी मिल गई।”
“कहां?”
“ऊपर।”
“भगवान के यहां?”
“इतनी ऊंची पोस्ट नहीं।”
हरिशंकर गर्व से बोले,
“आत्मा मार्गदर्शक विभाग।”
राघव ने हंसते हुए कहा,
“भूतों का भी सरकारी विभाग होता है?”
“भूत मत बोलो।”
“आज दूसरा आदमी ये बोल रहा है।”
हरिशंकर ने रजिस्टर खोला।
“तुम्हारी वजह से मेरी फाइल जल्दी पास हो गई।”
“मेरी वजह से?”
“तुमने उस्ताद निजामुद्दीन की इच्छा पूरी कर दी।”
राघव चौंका।
“आपको पता है?”
“ऊपर रिकॉर्ड होता है।”
काव्या अब परेशान होकर बोली,
“राघव, मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा।”
राघव ने कहा,
“तुम्हारे पापा हैं।”
काव्या का चेहरा बदल गया।
“पापा?”
वह सामने देखने लगी।
“यहीं?”
हरिशंकर भी अपनी बेटी को देखकर शांत हो गए।
कुछ क्षण उनकी आंखों में भावनाएं उमड़ती रहीं।
फिर बोले,
“अभी नहीं।”
राघव ने पूछा,
“क्या?”
“उसे अभी मैं दिखाई नहीं दे सकता।”
“क्यों?”
“नियम।”
राघव ने कहा,
“आप लोगों के नियम खत्म क्यों नहीं होते?”
हरिशंकर ने बात बदल दी।
“सुनो। तुम्हें कुछ जानना जरूरी है।”
उनका चेहरा अब गंभीर था।
“सभी आत्माएं एक जैसी नहीं होतीं।”
“मतलब?”
“अधूरी इच्छाएं तीन तरह की होती हैं।”
उन्होंने एक उंगली उठाई।
“पहली—हल्की। जिन आत्माओं को बस किसी को माफ करना, कोई संदेश देना या कोई छोटा काम पूरा करना होता है।”
दूसरी उंगली।
“दूसरी—बंधी हुई। उनकी इच्छा इतनी मजबूत होती है कि बिना किसी विशेष माध्यम के वे आगे नहीं बढ़ सकतीं।”
तीसरी उंगली।
“और तीसरी… जिद्दी।”
हरिशंकर का स्वर बदल गया।
“ऐसी आत्माएं दशकों… कभी-कभी सदियों तक नहीं जातीं।”
राघव को निजामुद्दीन याद आए।
“जैसे उस्ताद?”
“वो सीमा पर थे।”
“और भी पुराने होते हैं?”
“बहुत।”
“तो मुझे क्या करना होगा?”
हरिशंकर ने धीरे से कहा,
“शायद अब यही तुम्हारा काम बनने वाला है।”
राघव हंस पड़ा।
“नहीं धन्यवाद।”
“मेरी बात पूरी सुनो।”
“मैं फूड डिलीवरी करता हूं। भूत डिलीवरी नहीं।”
“तुम्हारा चयन हो चुका है।”
राघव की हंसी बंद हो गई।
“किसने किया?”
हरिशंकर ने ऊपर देखा।
“ये अभी बताने की अनुमति नहीं।”
राघव ने चिढ़कर कहा,
“आप लोग हर जरूरी बात पर यही क्यों कहते हो?”
हरिशंकर आगे झुके।
“क्योंकि तुम्हारी फाइल सामान्य नहीं है।”
राघव की आंखें सिकुड़ गईं।
“कौन सी फाइल?”
हरिशंकर कुछ बोलने ही वाले थे कि उनके हाथ का रजिस्टर अपने आप चमकने लगा।
उन्होंने उसे खोला।
चेहरा अचानक बदल गया।
“ये कैसे…?”
राघव ने पूछा,
“क्या हुआ?”
हरिशंकर ने रजिस्टर बंद कर दिया।
“कुछ नहीं।”
“झूठ मत बोलिए।”
“अभी तुम्हें जानना जरूरी नहीं।”
“अब तो जरूर जानूंगा।”
हरिशंकर पीछे हटने लगे।
“अगला ऑर्डर आने वाला है।”
“रुकिए!”
“उस ऑर्डर को बहुत ध्यान से पढ़ना।”
“क्यों?”
हरिशंकर की आकृति धीरे-धीरे धुंधली होने लगी।
उन्होंने आखिरी बार कहा,
“क्योंकि इस बार ग्राहक कोई और नहीं है।”
राघव का मोबाइल बजा।
टिन…
हरिशंकर गायब।
राघव ने तुरंत फोन निकाला।
अंतिम पड़ाव।
विशेष ऑर्डर।
कोई सामान सूची नहीं।
कोई डिलीवरी फीस नहीं।
सिर्फ एक पता।
राघव ने पहली लाइन पढ़ी।
उसके हाथ कांपने लगे।
स्थान:
ग्राम माधोपुर, जिला सीतापुर।
राघव फुसफुसाया,
“ये…”
काव्या ने पूछा,
“क्या?”
वही उसका गांव था।
वही गांव जहां उसके माता-पिता रहते थे।
वही घर जिसे वह छह महीने पहले गुस्से में छोड़कर आया था।
राघव ने दूसरी लाइन पढ़ी।
ग्राहक का नाम:
राघव मिश्रा।
उसकी सांस जैसे रुक गई।
काव्या ने मोबाइल उसके हाथ से लिया।
फिर स्क्रीन पढ़ी।
“ये तुम्हारा नाम है।”
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
नीचे एक और लाइन धीरे-धीरे उभरी—
स्थिति:
मृत्यु लंबित।
और उसके नीचे—
“जिस व्यक्ति तक यह डिलीवरी पहुंचानी है, उसकी मृत्यु पहले ही दर्ज की जा चुकी है।”
काव्या ने घबराकर राघव की तरफ देखा।
“इसका मतलब क्या है?”
राघव की आंखें स्क्रीन पर जमी थीं।
अंतिम संदेश उभरा—
ऑर्डर कल रात 1:11 बजे सक्रिय होगा।
ग्राहक को जीवित रखना अनिवार्य नहीं है।
राघव के हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया।
दूर सड़क पर किसी मंदिर की घंटी बजने लगी।
टन…
टन…
टन…
काव्या ने धीमे से पूछा,
“राघव… अगर ग्राहक तुम हो…”
वह रुक गई।
राघव ने उसकी तरफ देखा।
काव्या की आवाज कांप रही थी।
“तो डिलीवरी देने वाला कौन होगा?”
राघव के पास कोई जवाब नहीं था।
लेकिन उससे भी बड़ा सवाल उसके सामने था—
अगर “अंतिम पड़ाव” ऐप मरे हुए लोगों के ऑर्डर भेजता है…
तो उसके अपने नाम से ऑर्डर क्यों आया था?
और उसकी स्थिति के सामने—
“मृत्यु लंबित”
क्यों लिखा था?
उसी क्षण मोबाइल स्क्रीन एक बार फिर जली।
इस बार केवल एक वाक्य था—
“अपने घर लौट जाओ, राघव मिश्रा।”
“तुम्हारे जन्म की कहानी अधूरी है।”
“अपने घर लौट जाओ, राघव मिश्रा।”
“तुम्हारे जन्म की कहानी अधूरी है।”
मोबाइल की काली स्क्रीन पर लिखे ये दो वाक्य राघव बार-बार पढ़ रहा था।
सड़क किनारे खड़ी उसकी बाइक का इंजन बंद था। रात काफी हो चुकी थी। सामने की दुकानों के शटर गिर चुके थे और सड़क पर कभी-कभार कोई गाड़ी गुजर रही थी।
काव्या उसके बिल्कुल पास खड़ी थी।
कुछ देर पहले तक दोनों जस्टिस त्रिपाठी के जन्मदिन की पार्टी से निकले थे। वहां राघव ने डेढ़ सौ साल पुरानी अधूरी बंदिश पूरी की थी, उस्ताद निजामुद्दीन की आत्मा को मुक्ति मिली थी और पहली बार उसे लगा था कि शायद वह इस अजीब शक्ति को समझने लगा है।
लेकिन अब सब कुछ फिर बदल गया था।
मोबाइल पर ग्राहक का नाम उसका अपना था।
राघव मिश्रा।
स्थिति—
मृत्यु लंबित।
और पता उसके अपने गांव का।
काव्या ने धीरे से पूछा,
“तुम कब से घर नहीं गए?”
“करीब छह महीने।”
“क्यों?”
राघव ने फोन बंद कर दिया।
“लंबी कहानी है।”
“कल रात तुम्हारी मौत का ऑर्डर सक्रिय होने वाला है। मुझे लगता है अब लंबी कहानी सुनाने का समय है।”
राघव कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बाइक के हैंडल पर दोनों हाथ रखकर बोला,
“पिताजी चाहते थे कि मैं इंजीनियरिंग पूरी करूं।”
“और तुमने छोड़ दी?”
“दूसरे साल।”
“क्यों?”
राघव ने हल्की हंसी के साथ कहा,
“क्योंकि पढ़ाई में बहुत होशियार था।”
काव्या ने उसे देखा।
“सच?”
“नहीं।”
उसने गहरी सांस ली।
“फीस का इंतजाम नहीं हो रहा था। घर की पुरानी जमीन को लेकर मुकदमा चल रहा था। पिताजी कर्ज में थे। छोटी बहन की पढ़ाई थी। मुझे लगा मैं पढ़ाई छोड़कर काम करूंगा तो मदद हो जाएगी।”
“फिर झगड़ा कैसे हुआ?”
“पिताजी को लगा मैं जिम्मेदारी से भाग रहा हूं।”
राघव की आवाज धीमी हो गई।
“उन्होंने गुस्से में कहा था—जिसे अपने भविष्य की परवाह नहीं, उसे इस घर की भी जरूरत नहीं।”
“और तुम चले गए?”
“मैं भी कम जिद्दी नहीं था।”
कुछ क्षण दोनों के बीच सन्नाटा रहा।
काव्या ने कहा,
“तो अब वापस जाओ।”
राघव ने उसकी तरफ देखा।
“मेरे साथ चलोगी?”
काव्या चौंकी।
“मैं?”
“अभी नकली बॉयफ्रेंड वाली ड्यूटी खत्म नहीं हुई?”
“हो चुकी है।”
“तो दोस्त बनकर चलो।”
काव्या मुस्कुराई।
“ये तरक्की है या गिरावट?”
“कल तक मैं जिंदा रहा तो तय कर लेना।”
काव्या की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।
“ऐसा मत कहा करो।”
राघव ने बाइक स्टार्ट की।
“सुबह निकलते हैं।”
अगली सुबह लखनऊ से सीतापुर की तरफ जाते हुए राघव असामान्य रूप से शांत था।
काव्या उसके पीछे बैठी थी।
शहर पीछे छूटता गया।
ऊंची इमारतों की जगह खेत आने लगे।
सरसों और गन्ने के खेतों के बीच से सड़क निकल रही थी।
छोटे कस्बे।
चाय की दुकानें।
साइकिल पर स्कूल जाते बच्चे।
सड़क किनारे मंदिर।
कहीं-कहीं धान के खाली खेत।
करीब ढाई घंटे बाद राघव ने बाइक धीमी कर दी।
सामने एक पुराना बोर्ड था—
“ग्राम माधोपुर में आपका स्वागत है।”
काव्या ने कहा,
“यही है?”
राघव ने सिर हिलाया।
गांव में घुसते ही कई लोग उसे पहचानने लगे।
“अरे… राघव?”
“मिश्रा जी का लड़का?”
“शहर से आया है?”
राघव बस हल्का-सा सिर हिलाता रहा।
कुछ मिनट बाद बाइक एक पुराने लेकिन साफ-सुथरे घर के सामने रुकी।
नीले रंग का लकड़ी का दरवाजा।
बाहर तुलसी का चौरा।
दीवार के पास पुरानी साइकिल।
राघव बाइक से उतरा।
उसने दरवाजा खटखटाया।
अंदर से महिला की आवाज आई,
“कौन?”
राघव का गला सूख गया।
“मां… मैं हूं।”
अंदर अचानक सन्नाटा छा गया।
फिर तेज कदमों की आवाज आई।
दरवाजा खुला।
करीब पचास वर्ष की महिला सामने खड़ी थीं।
कुछ क्षण वह राघव को देखती रहीं।
फिर बिना कुछ कहे उसे गले लगा लिया।
“नालायक!”
उनकी आंखों से आंसू निकल आए।
“छह महीने में एक बार भी याद नहीं आई?”
राघव कुछ बोल नहीं पाया।
“फोन कर देता… एक बार बोल देता कि जिंदा है।”
“मां…”
“चुप।”
उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“दुबला हो गया है।”
राघव हंस पड़ा।
“आपको हर बार यही लगता है।”
तभी उनकी नजर काव्या पर गई।
उनके आंसू जैसे अचानक रुक गए।
“और ये?”
राघव ने जवाब देने के लिए मुंह खोला।
काव्या ने तुरंत कहा,
“नमस्ते आंटी। मैं काव्या।”
मां ने राघव की तरफ देखा।
फिर काव्या को।
फिर वापस राघव को।
चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
“अच्छा…”
राघव समझ गया कि मामला बिगड़ने वाला है।
“मां, जैसा आप सोच रही हैं वैसा कुछ नहीं है।”
“मैंने कुछ कहा?”
“चेहरा बता रहा है।”
अंदर से भारी आवाज आई।
“कौन आया है?”
राघव का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।
उसके पिता दरवाजे तक आए।
करीब साठ वर्ष।
पतला शरीर।
सफेद कुर्ता।
चेहरे पर कठोरता।
उन्होंने राघव को देखा।
कुछ सेकंड तक दोनों कुछ नहीं बोले।