Supernatural Mystery

रात 1:11 बजे आया ₹51,000 का ऑर्डर, लेकिन खाना मंगवाने वाला 7 साल पहले मर चुका था!

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

राघव एक साधारण डिलीवरी बॉय था, जिसकी जिंदगी पैसों की तंगी, अधूरे सपनों और परिवार से दूरी के बीच गुजर रही थी। लेकिन एक रात ठीक 1:11 बजे उसके मोबाइल पर अचानक एक रहस्यमयी ऐप दिखाई देता है—“अंतिम पड़ाव”।

ऑर्डर बेहद अजीब था—गरम जलेबी, एक कुल्हड़ चाय, मिट्टी का दिया और लाल मौली। सामान की कीमत कुछ सौ रुपये, लेकिन डिलीवरी फीस पूरे ₹51,000!

पैसों के लालच में राघव ऑर्डर स्वीकार कर लेता है, मगर जब वह सुनसान पुराने बंगले में पहुंचता है तो पता चलता है कि खाना मंगवाने वाला आदमी सात साल पहले ही मर चुका है।

यहीं से शुरू होता है राघव का ऐसा सफर, जहां उसे मृत लोगों की अधूरी इच्छाएं पूरी करनी पड़ती हैं। हर आत्मा अपने पीछे कोई राज, कोई अधूरा रिश्ता और कभी-कभी अपना अनोखा हुनर छोड़ जाती है।

एक मृत पिता की बेटी तक आखिरी संदेश पहुंचाने से शुरू हुई यह कहानी धीरे-धीरे करोड़ों की विरासत, एक पुरानी हवेली की साजिश, डेढ़ सौ साल से अधूरी पड़ी संगीत की बंदिश और राघव के अपने परिवार के तीस साल पुराने रहस्य तक पहुंच जाती है।

लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब “अंतिम पड़ाव” पर अगला ग्राहक कोई भूत नहीं बल्कि खुद राघव मिश्रा होता है...

और उसके नाम के सामने लिखा होता है—

“मृत्यु लंबित।”

आखिर राघव मरे हुए लोगों को क्यों देख सकता है?
उसकी मौत पहले ही क्यों लिखी जा चुकी थी?
उसके दादा की बंद पड़ी कार्यशाला का रहस्य क्या है?
और क्या राघव सामान्य जिंदगी चुनेगा या जीवित और मृत लोगों के बीच हमेशा के लिए संदेशवाहक बन जाएगा?

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आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 77 मिनट

भाग 3

करीब एक मिनट बाद उसने अपना बैंक विवरण दिया।

राघव ने नौ लाख रुपये भेज दिए।

भुगतान सफल।

जैसे ही हस्तांतरण पूरा हुआ, ऐप की स्क्रीन पर एक छोटा-सा दीया दिखाई दिया।

उसके नीचे लिखा आया—

इच्छा पूर्ण।

आत्मा प्रस्थान के लिए तैयार।

राघव चुपचाप स्क्रीन देखता रहा।

जाने क्यों उसके मन में राहत भी थी और अजीब-सी उदासी भी।

कल रात जिस आदमी से वह डरकर भागना चाहता था, आज उसे लग रहा था जैसे किसी अपने का काम पूरा हुआ हो।

काव्या ने धीरे से पूछा—

“क्या मैं… उनसे दोबारा मिल सकती हूं?”

राघव ने स्क्रीन देखी।

कोई विकल्प नहीं था।

“मुझे नहीं पता।”

काव्या ने कुछ नहीं कहा।

दोनों स्टेशन से बाहर निकल आए।

काव्या ने जाते-जाते कहा—

“राघव।”

“हां?”

“कल शाम फ्री हो?”

“क्यों?”

“मेरी एक मदद करनी है।”

राघव ने तुरंत हाथ जोड़ दिए।

“अगर किसी और भूत को जलेबी पहुंचानी है तो माफ करना।”

काव्या पहली बार खुलकर हंसी।

“भूत नहीं।”

“फिर?”

“एक इंसान है।”

“उसमें क्या समस्या है?”

“कभी-कभी इंसान भूत से ज्यादा परेशान करते हैं।”

राघव ने हंसते हुए पूछा—

“क्या करना है?”

काव्या कुछ सेकंड झिझकी।

फिर बोली—

“कल जस्टिस त्रिपाठी का पचहत्तरवां जन्मदिन है। वे मेरे पिता के बहुत पुराने दोस्त थे।”

“अच्छा।”

“वहां एक आदमी आएगा।”

“तो?”

“उसका नाम युवराज मल्होत्रा है।”

काव्या के चेहरे पर नाराजगी साफ दिखाई देने लगी।

“काफी महीनों से मेरे पीछे पड़ा है। उसके परिवार वाले चाहते हैं कि हमारी शादी हो।”

“तुम नहीं चाहती?”

“बिल्कुल नहीं।”

“तो मना कर दो।”

“कर चुकी हूं।”

“फिर?”

“वह सुनता नहीं।”

राघव ने कंधे उचकाए।

“मैं क्या करूं? उसे समझाऊं?”

काव्या ने उसकी आंखों में देखा।

“नहीं।”

“फिर?”

वह थोड़ा पास आई।

“कल शाम कुछ घंटों के लिए मेरे बॉयफ्रेंड बन जाओ।”

राघव का मुंह खुला रह गया।

“क्या?”

“नकली।”

“वो तो समझ गया।”

काव्या ने कहा—

“मेरे कॉलेज के नहीं हो। मेरे दोस्तों में से नहीं हो। इसलिए किसी को पहले से कुछ पता नहीं होगा।”

राघव ने मुस्कुराकर पूछा—

“और मुझे क्या मिलेगा?”

काव्या ने आंखें छोटी कर दीं।

“नौ लाख रुपये तुम्हारे हाथ से मेरे खाते में आए हैं और तुम्हें अभी भी फीस चाहिए?”

“वो आपके पापा के थे।”

“तो क्या चाहिए?”

राघव कुछ सोचने का नाटक करने लगा।

“खाना अच्छा होना चाहिए।”

काव्या हंस पड़ी।

“ठीक है।”

“और कोई मुझे पीटेगा तो?”

“उसकी चिंता मत करो।”

“क्यों?”

“मैं कानून पढ़ती हूं।”

“वाह। मतलब पहले पिटवाओगी, बाद में केस लड़ोगी।”

काव्या फिर हंस पड़ी।

“कल छह बजे।”

“ठीक है।”

दोनों अलग होने ही वाले थे कि राघव का मोबाइल फिर बजा।

टिन…

इस बार आवाज सुनते ही उसकी मुस्कान गायब हो गई।

वही काली स्क्रीन।

अंतिम पड़ाव।

नया ऑर्डर उपलब्ध।

राघव ने धीरे-धीरे ऐप खोला।

सामान:

एक बोतल पुरानी देसी गुलाब शरबत।

दो चांदी के गिलास।

एक सफेद गुलाब।

डिलीवरी पारिश्रमिक:

₹5,00,000

अतिरिक्त पुरस्कार:

एक विरासत।

राघव की भौंहें सिकुड़ गईं।

“एक विरासत?”

नीचे ग्राहक का नाम दिखाई दिया—

देवेंद्र सिंह राठौड़।

काव्या ने स्क्रीन पर नाम देखा तो तुरंत राघव की तरफ मुड़ी।

“ये नाम तुम्हारे मोबाइल पर क्यों है?”

“तुम जानती हो?”

“पूरा लखनऊ जानता है।”

“कौन थे?”

काव्या ने धीरे से कहा—

“राठौड़ हेरिटेज समूह के मालिक।”

“थे?”

काव्या ने सिर हिलाया।

“तीन हफ्ते पहले उनकी मौत हुई है।”

राघव कुछ क्षण स्क्रीन देखता रहा।

फिर आसमान की तरफ देखकर बोला—

“वाह भगवान… एक भूत का काम पूरा भी नहीं हुआ और आपने दूसरा करोड़पति भेज दिया।”

काव्या उसे देखती रही।

स्क्रीन पर लाल अक्षर चमके—

ऑर्डर स्वीकार करने के लिए 30 सेकंड शेष।

29…

28…

27…

राघव ने लंबी सांस ली।

उसने स्वीकार करने वाले बटन की तरफ उंगली बढ़ाई।

फिर अचानक उसे पिछली रात की वह आवाज याद आई—

“राघव बेटा… पीछे तो देख।”

उसकी उंगली रुक गई।

लेकिन अगले ही पल स्क्रीन पर अतिरिक्त सूचना खुली—

ग्राहक की इच्छा अधूरी रहने पर एक जीवित व्यक्ति की जान खतरे में पड़ सकती है।

राघव के चेहरे की सारी हंसी गायब हो गई।

काव्या ने पूछा—

“क्या लिखा है?”

राघव ने जवाब नहीं दिया।

गिनती चल रही थी।

10…

9…

8…

राघव ने बटन दबा दिया।

ऑर्डर स्वीकार।

स्क्रीन काली हुई।

फिर केवल एक लाइन दिखाई दी—

“आज रात पहली बार किसी मृत व्यक्ति को तुम्हारे शरीर की आवश्यकता पड़ेगी।”

राघव स्क्रीन देखता रह गया।

“मेरे… शरीर की?”

और उसी समय कहीं बहुत दूर मंदिर की घंटी बजने लगी।

टन…

टन…

टन…

राघव को बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि पिछली रात जिस दरवाजे पर उसने तीन बार घंटी बजाई थी…

उसने केवल एक भूत का ऑर्डर स्वीकार नहीं किया था।

उसने जीवित और मृत लोगों की दुनिया के बीच एक ऐसा रास्ता खोल दिया था…

जिसे अब आसानी से बंद नहीं किया जा सकता था।

“आज रात पहली बार किसी मृत व्यक्ति को तुम्हारे शरीर की आवश्यकता पड़ेगी।”

राघव की नजर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी हुई थी।

कुछ ही सेकंड पहले तक वह काव्या के साथ हंस रहा था, लेकिन अब उसके चेहरे से सारी मुस्कान गायब हो चुकी थी।

काव्या ने दोबारा पूछा,

“राघव… क्या लिखा है?”

राघव ने मोबाइल उसकी तरफ कर दिया।

काव्या ने संदेश पढ़ा।

फिर उसकी नजर धीरे-धीरे राघव के चेहरे पर आकर रुक गई।

“तुम्हारे शरीर की आवश्यकता पड़ेगी… इसका क्या मतलब है?”

“अगर मुझे पता होता तो मैं यहां खड़ा होकर तुम्हारे साथ अनुमान नहीं लगा रहा होता।”

राघव ने फोन जेब में रखा।

“एक बात पक्की है।”

“क्या?”

“आज रात कुछ ऐसा होने वाला है, जिसके बाद शायद मुझे डिलीवरी का काम छोड़कर पुजारी बन जाना चाहिए।”

काव्या हंसना चाहती थी, लेकिन इस बार हंसी नहीं आई।

उसने गंभीर होकर पूछा,

“तुम ये ऑर्डर कैंसल नहीं कर सकते?”

“नहीं।”

“ऐप हटा दो।”

“वो भी नहीं।”

“फोन बंद कर दो।”

राघव ने उसकी तरफ देखा।

“तुम्हें सच में लगता है कि जो चीज मरे हुए लोगों से ऑर्डर भेज रही है, वह फोन बंद करने से रुक जाएगी?”

काव्या चुप हो गई।

राघव ने बाइक स्टार्ट की।

“कल छह बजे पार्टी याद है।”

काव्या ने आश्चर्य से कहा,

“तुम अभी भी आओगे?”

“अगर रात बच गया तो बिल्कुल।”

“मजाक मत करो।”

राघव ने हेलमेट पहनते हुए कहा,

“मजाक ही तो कर रहा हूं। नहीं करूंगा तो डर लगने लगेगा।”

काव्या ने बाइक के हैंडल पर हाथ रख दिया।

“अगर कुछ गलत लगे तो वापस आ जाना।”

राघव मुस्कुराया।

“कल तक तुम्हें भूतों पर विश्वास नहीं था।”

काव्या ने कहा,

“कल तक मेरे पिता ने तुम्हारे मोबाइल से मुझे नौ लाख रुपये भी नहीं भेजे थे।”

राघव कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

फिर बाइक आगे बढ़ा दी।

उस रात करीब साढ़े दस बजे वह शहर के पुराने हिस्से में पहुंचा।

अंतिम पड़ाव ऐप ने जिन चीजों का ऑर्डर दिया था, उनमें सबसे मुश्किल चीज थी चांदी के दो गिलास।

गुलाब का शरबत आसानी से मिल गया।

सफेद गुलाब भी मिल गया।

लेकिन चांदी के गिलास खरीदने में उसके अपने पैसे लग गए।

दुकानदार ने कीमत बताई तो राघव ने कहा,

“भैया, चांदी पीनी है क्या इसमें?”

दुकानदार ने उसे घूरकर देखा।

“लेना है तो लो।”

राघव ने मन ही मन देवेंद्र सिंह राठौड़ को गाली दी।

“मरने के बाद भी अमीर लोगों के शौक कम नहीं होते।”

सामान लेकर वह बाइक पर बैठा।

ऐप खोला।

लोकेशन इस बार शहर के बाहर नहीं थी।

पता था—

राठौड़ हवेली, कैसरबाग के पीछे पुराना इलाका।

राघव ने राहत की सांस ली।

“चलो, कम से कम इस बार जंगल में तो नहीं जाना।”

लेकिन जैसे ही उसने ऑर्डर के नीचे दिए निर्देश खोले, उसकी राहत फिर गायब हो गई।

आज के नियम:

पहला—

मुख्य दरवाजे से प्रवेश मत करना।

दूसरा—

हवेली में लगी किसी तस्वीर को बिना अनुमति मत छूना।

तीसरा—

यदि ग्राहक तुम्हारे शरीर में प्रवेश करने की मांग करे तो अनुमति देने से पहले समय निश्चित करना।

चौथा—

मंदिर की घंटी सुनते ही आत्मा का अधिकार समाप्त हो जाएगा।

पांचवां—

किसी जीवित व्यक्ति के सामने ग्राहक का असली नाम तब तक मत लेना जब तक वह स्वयं अपना परिचय न दे।

राघव ने माथा पकड़ लिया।

“कल चार नियम थे। आज पांच हो गए।”

उसने बाइक आगे बढ़ाई।

करीब ग्यारह बजे वह राठौड़ हवेली के पास पहुंच गया।

ऊंची दीवारों से घिरी विशाल हवेली किसी पुराने राजमहल जैसी लग रही थी।

मुख्य गेट पर दो सुरक्षाकर्मी खड़े थे।

अंदर महंगी गाड़ियां दिखाई दे रही थीं।

राघव ने सोचा,

“यहां कोई भूत नहीं, सुरक्षा वाले ही मुझे मार देंगे।”

ऐप पर लोकेशन हवेली के पीछे जा रही थी।

वह गलियों से घूमता हुआ पीछे पहुंचा।

वहां टूटी हुई दीवार के पास एक बहुत पुराना लकड़ी का दरवाजा था।

दरवाजा बंद नहीं था।

राघव अंदर चला गया।

अंदर एक बड़ा बगीचा था, लेकिन उसका आधा हिस्सा सूखा पड़ा था।

दूर एक पुराने फव्वारे के पास कोई आदमी बैठा था।

सफेद कुर्ता-पायजामा।

कंधों पर कश्मीरी शॉल।

उम्र करीब साठ साल।

घनी मूंछें।

राघव पास पहुंचा।

“देवेंद्र सिंह राठौड़?”

आदमी ने तुरंत उंगली होंठों पर रखी।

“नियम पढ़े नहीं?”

राघव रुक गया।

“ओह… माफ कीजिए।”

आदमी हंसा।

“पहली बार हो?”

राघव ने कहा,

“दूसरी।”

“इतनी जल्दी दूसरी?”

आदमी ने आश्चर्य से उसे देखा।

“तो तुम्हारे बारे में ऊपर कुछ चर्चा जरूर होगी।”

“ऊपर?”

“छोड़ो। अभी तुम नए हो।”

राघव ने सामान निकाला।

“आपका शरबत।”

देवेंद्र सिंह ने सफेद गुलाब हाथ में लिया।

कुछ देर उसे देखते रहे।

“पैंतीस साल पहले इसी तरह का गुलाब लेकर मैं पहली बार अपनी पत्नी से मिलने गया था।”

राघव बोला,

“अच्छा।”

“और उसने मेरे सिर पर वही फूल फेंक दिया था।”

राघव हंस पड़ा।

“क्यों?”

“क्योंकि मैं उसके घर की दीवार फांदकर गया था।”

देवेंद्र भी हंसने लगे।

फिर अचानक उनका चेहरा गंभीर हो गया।

“आज मुझे फिर उसी के पास जाना है।”

राघव समझ गया।

“इसलिए मेरे शरीर की जरूरत है?”

देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

“सीधे काम की बात करते हो। मुझे पसंद आया।”

“कल एक भूत ने मुझे लगभग दिल का दौरा दिला दिया था। आज अनुभव हो गया है।”

देवेंद्र ने कहा,

“मैं तुम्हारे शरीर में केवल सत्ताईस मिनट रहूंगा।”

राघव ने तुरंत पूछा,

“सत्ताईस ही क्यों?”

“उससे ज्यादा रहा तो मेरी यादें तुम्हारी चेतना पर असर डाल सकती हैं।”

“और अगर आप बाहर नहीं निकले?”

देवेंद्र मुस्कुराए।

“मंदिर की घंटी बजा देना।”

“इतना आसान?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि कब्जे के दौरान तुम्हारा शरीर मेरा होगा। घंटी तुम नहीं बजा पाओगे।”

राघव कुछ सेकंड चुप रहा।

“तो फिर भरोसा किस पर करूं?”

देवेंद्र ने कहा,

“अपने फैसले पर।”

राघव ने सिर हिलाया।

“पहले काम बताइए।”

देवेंद्र ने हवेली की तरफ देखा।

“मेरी मौत तीन हफ्ते पहले हुई।”

“मुझे पता है।”

“लोगों को बताया गया कि दिल का दौरा पड़ा।”

“क्या यह सच नहीं?”

“सच है। लेकिन मेरी मौत के बाद जो होने वाला था, उसका डर मुझे जीते जी था।”

उन्होंने धीरे से कहा,

“मेरे भाई का बेटा रणवीर मेरी कंपनी और इस हवेली पर कब्जा करना चाहता है।”

“वसीयत?”

“वही खेल है।”

देवेंद्र की आंखें कठोर हो गईं।

“उसने नकली वसीयत तैयार करवाई है।”

“असली?”

“मेरे पास है।”

“कहां?”

देवेंद्र ने हवेली के पुराने हिस्से की तरफ इशारा किया।

“अंदर।”

“आपकी पत्नी को क्यों नहीं पता?”

“क्योंकि मैंने उसे जानबूझकर नहीं बताया।”

राघव ने हंसते हुए कहा,

“कल वाले अंकल ने भी यही किया था।”

“क्या?”

“कुछ नहीं। आप लोग मरने से पहले परिवार को जरूरी बातें क्यों नहीं बताते?”

देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

“शायद आदमी को हमेशा लगता है कि उसके पास समय बचा है।”

यह सुनते ही राघव चुप हो गया।

देवेंद्र ने आगे कहा,

“असली वसीयत पुराने पारिवारिक मंदिर की लकड़ी की चौखट में छिपी है।”

“तो निकाल लेते हैं।”

“उसे खोलने का तरीका केवल मुझे आता है।”

“आप मुझे बता दीजिए।”

“तुम नहीं कर पाओगे।”

“क्यों?”

देवेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,

“क्योंकि वह चौखट मैंने खुद बनाई थी।”

“आप बढ़ई थे?”

“बढ़ई नहीं।”

उनके चेहरे पर गर्व आ गया।

“लकड़ी का कारीगर था।”

राघव ने हवेली की तरफ देखा।

“इतनी बड़ी कंपनी के मालिक?”

“कंपनी बाद में आई। शुरुआत लकड़ी के दरवाजे ठीक करने से की थी।”

कुछ पल की चुप्पी के बाद देवेंद्र बोले,

“तैयार हो?”

राघव ने पूछा,

“कब्जे के बाद क्या होगा?”

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