भाग 6
फिर पिता ने कहा,
“रास्ता याद आ गया?”
राघव ने सिर झुका लिया।
“जी।”
“शहर में काम बंद हो गया?”
“नहीं।”
“फिर?”
राघव ने उनकी आंखों में देखकर कहा,
“घर आने का मन हुआ।”
पिता ने नजर फेर ली।
“अंदर आ जाओ।”
बस इतना।
लेकिन राघव के लिए वही काफी था।
घर के भीतर छोटी बहन मीरा उसे देखकर दौड़ती हुई आई।
“भैया!”
राघव हंस पड़ा।
“अरे आराम से!”
मीरा ने उसे गले लगाया।
“मेरे लिए क्या लाए?”
“प्यार।”
“वापस ले जाओ।”
काव्या हंस पड़ी।
राघव बोला,
“देखा? परिवार में मेरी इज्जत।”
दोपहर तक घर का माहौल थोड़ा सामान्य हो गया।
लेकिन राघव जानता था कि वह केवल परिवार से मिलने नहीं आया था।
रात 1:11 बजे कोई ऑर्डर सक्रिय होना था।
और उससे पहले उसे पता लगाना था कि “जन्म की अधूरी कहानी” का मतलब क्या है।
खाना खाते समय मां ने अचानक कहा,
“अच्छा हुआ आज ही आ गया।”
“क्यों?”
“तेरी बड़ी बुआ का परिवार भी आ रहा है।”
राघव ने सिर पकड़ लिया।
“भगवान मुझे भूतों से बचा सकते हैं, बुआ से नहीं।”
मां ने उसकी बांह पर हल्की चपत लगाई।
“बदतमीज।”
करीब चार बजे बाहर गाड़ी की आवाज आई।
राघव की बड़ी बुआ, उनके पति और बेटा समीर घर आए।
समीर राघव से लगभग दो साल बड़ा था।
साफ-सुथरे महंगे कपड़े।
हाथ में चमकती घड़ी।
आते ही उसने राघव को देखा।
“ओहो!”
“महानगर वाले भैया!”
राघव मुस्कुराया।
“कैसे हो?”
“हम तो बढ़िया हैं।”
समीर ने काव्या की तरफ देखा।
“और परिचय?”
राघव कुछ बोलता उससे पहले मां ने गर्व से कहा,
“राघव की दोस्त है।”
“दोस्त?”
बुआ ने ऐसा “दोस्त” कहा जैसे उन्हें बाकी कहानी पहले ही समझ आ गई हो।
काव्या ने नमस्ते की।
खाने के दौरान वही बातें शुरू हो गईं जिनसे राघव बचना चाहता था।
“तो अब भी डिलीवरी ही कर रहे हो?”
“जी।”
बुआ बोलीं,
“इस उम्र में थोड़ा भविष्य भी सोचना चाहिए।”
समीर ने कहा,
“मेरी कंपनी में अगर कोई साधारण काम निकला तो बता दूंगा।”
राघव ने पूछा,
“कौन-सी कंपनी?”
समीर गर्व से बोला,
“श्रीवास्तव अर्बन डेवलपर्स।”
राघव का हाथ रुक गया।
यह नाम उसने पहले सुना था।
कहां?
वह याद करने की कोशिश करने लगा।
समीर आगे बोला,
“पूरे इलाके में बड़ा औद्योगिक और आवासीय प्रोजेक्ट आने वाला है।”
“कहां?”
“यहीं आसपास।”
पिता का चेहरा थोड़ा कस गया।
उन्होंने कहा,
“हमारी पुरानी कार्यशाला वाली जमीन भी उसी इलाके में है।”
राघव ने तुरंत पिता की तरफ देखा।
“वही दादाजी वाली?”
“हां।”
मीरा बोली,
“वो जो हमेशा बंद रहती है?”
पिता ने सिर हिलाया।
“तीस साल से।”
राघव ने पूछा,
“क्यों?”
बुआ बीच में बोल पड़ीं,
“अब उस खंडहर का क्या करना? बेच देना चाहिए। अच्छी कीमत मिल रही है।”
पिता ने कहा,
“वो मेरे पिता की निशानी है।”
समीर हंसा।
“मामा जी, भावनाओं से पैसा नहीं बनता।”
राघव चुप रहा।
तभी उसकी मां उठीं।
“राघव, जरा मेरे साथ आ।”
वह उसे अंदर पुराने कमरे में ले गईं।
लोहे का एक संदूक खोला।
कपड़ों के नीचे से लाल कपड़े में लिपटी कोई चीज निकाली।
राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
क्योंकि ऐप के भविष्य वाले ऑर्डर में सामान लिखा था—
मां के पुराने संदूक में रखा लाल कपड़ा।
मां ने वही लाल कपड़ा उसके हाथ में रख दिया।
“इसे पहचानता है?”
“नहीं।”
उसने कपड़ा खोला।
अंदर लोहे की पुरानी चाबी थी।
काली पड़ चुकी।
मां ने कहा,
“तेरे दादा की कार्यशाला की।”
राघव ने उन्हें देखा।
“आज ही क्यों दे रही हो?”
“पता नहीं।”
मां कुछ पल चुप रहीं।
“कल रात सपना आया था।”
राघव का चेहरा बदल गया।
“कैसा सपना?”
“तेरे दादा खड़े थे।”
“आपने उन्हें देखा?”
“बस सपना था।”
“उन्होंने क्या कहा?”
मां ने राघव की आंखों में देखा।
“कहा—चाबी लड़के को दे देना। देर हो गई है।”
राघव के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
काव्या को उसने इशारे से बुलाया।
कुछ देर बाद दोनों पुराने रास्ते से गांव के बाहर निकल गए।
करीब आधा किलोमीटर दूर पेड़ों के बीच ईंटों की पुरानी इमारत थी।
बड़ा लकड़ी का दरवाजा।
ऊपर फीके अक्षरों में लिखा था—
“विश्वनाथ शिल्प कार्यशाला।”
राघव ने कहा,
“मेरे दादा का नाम विश्वनाथ था।”
चाबी ताले में लगी।
थोड़ा जोर लगाने पर ताला खुल गया।
दरवाजा चरमराकर खुला।
धूल का गुबार उठा।
अंदर दशकों पुरानी लकड़ी।
औजार।
अधूरी कुर्सियां।
नक्काशीदार खिड़कियां।
टूटे संदूक।
दीवारों पर काले धुएं के निशान।
काव्या ने कहा,
“यहां आग लगी थी?”
राघव ने सिर हिलाया।
“मुझे बस इतना पता है कि दादा की मौत के कुछ समय पहले आग लगी थी।”
वह अंदर बढ़ा।
तभी उसकी नजर आधी जली लकड़ी की चौखट पर पड़ी।
अनजाने में उसने उस पर हाथ रखा।
अचानक उसकी उंगलियां अपने आप चलने लगीं।
देवेंद्र सिंह राठौड़ से मिली विरासत जाग गई थी।
राघव ने लकड़ी की सतह छुई।
एक हिस्सा खुरचा।
फिर नीचे झुककर फर्श देखा।
“ये आग अंदर से शुरू नहीं हुई थी।”
काव्या चौंकी।
“क्या?”
“लकड़ी यहां से बाहर की तरफ जली है।”
वह दूसरे खंभे तक गया।
“और यहां…”
उसने सूंघा।
“किसी ज्वलनशील तेल का इस्तेमाल हुआ था।”
काव्या ने कहा,
“मतलब आग लगाई गई थी?”
राघव धीरे से बोला,
“शायद।”
उसी समय उसके हाथ ने दीवार की एक पुरानी लकड़ी की पट्टी पर दबाव डाला।
टक!
छोटा खांचा खुल गया।
अंदर एक पुरानी डायरी थी।
राघव और काव्या ने एक-दूसरे को देखा।
डायरी विश्वनाथ मिश्रा की थी।
अंतिम कुछ पन्नों में जमीन को लेकर विवाद का जिक्र था।
एक स्थानीय कारोबारी ने कार्यशाला खरीदने का दबाव बनाया था।
विश्वनाथ ने मना कर दिया।
फिर एक नाम आया—
“गोवर्धन श्रीवास्तव।”
काव्या ने तुरंत कहा,
“श्रीवास्तव?”
राघव को समीर की कंपनी याद आई।
श्रीवास्तव अर्बन डेवलपर्स।
डायरी में लिखा था कि गोवर्धन कार्यशाला और आसपास की जमीन बहुत कम कीमत पर लेना चाहता था।
विश्वनाथ तैयार नहीं थे।
आखिरी पन्ने में अधूरी लाइन थी—
“अगर मुझे कुछ हो जाए तो पुराने नीम के नीचे…”
इसके बाद पन्ना जला हुआ था।
राघव बोला,
“नीम?”
कार्यशाला के पीछे एक विशाल पुराना नीम का पेड़ था।
दोनों वहां पहुंचे।
जड़ के पास मिट्टी थोड़ी अलग दिखाई दे रही थी।
करीब आधे घंटे की खुदाई के बाद लोहे का छोटा डिब्बा निकला।
उसमें पुराने जमीन के मूल दस्तावेज, कुछ रसीदें और एक तस्वीर थी।
तस्वीर में विश्वनाथ के साथ एक युवा आदमी खड़ा था।
तस्वीर के पीछे लिखा था—
“रामनारायण, मेरे बेटे जैसा।”
राघव ने कहा,
“ये कौन है?”
पीछे से आवाज आई—
“तुम्हारा बाप।”
राघव पलटा।
उसके पिता खड़े थे।
पता नहीं कब वहां आ गए थे।
उन्होंने तस्वीर हाथ में ली।
उनकी आंखें नम हो गईं।
“मैं सत्रह साल का था।”
राघव चौंका।
“आप?”
“तेरे दादा मेरे असली पिता नहीं थे।”
राघव कुछ समझ नहीं पाया।
पिता ने धीरे-धीरे बताया—
जब वह आठ साल के थे, उनके माता-पिता एक दुर्घटना में मर गए थे।
विश्वनाथ मिश्रा ने उन्हें अपने साथ रख लिया।
पढ़ाया।
पाल-पोसकर बड़ा किया।
फिर अपना नाम दिया।
“उन्होंने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि मैं उनका खून नहीं हूं।”
राघव ने कहा,
“फिर ये जमीन?”
“मेरे नाम करने वाले थे।”
“लेकिन?”
“आग लग गई।”
पिता ने जली दीवारों की तरफ देखा।
“उस रात तेरे दादा अंदर फंस गए थे।”
राघव की मुट्ठियां कस गईं।
“आपने जांच नहीं करवाई?”
“करवाई थी। पुलिस ने शॉर्ट सर्किट बताया।”
काव्या ने डायरी उन्हें दी।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया।
चेहरा बदलता गया।
उसी समय बाहर गाड़ियों की आवाज आई।
समीर कुछ लोगों के साथ आया।
उनके साथ सूट पहने दो व्यक्ति थे।
“मामा जी!”
समीर ने आवाज लगाई।
“अच्छा हुआ आप सब यहीं हो।”
पिता ने पूछा,
“क्या है?”
समीर बोला,
“कंपनी वालों को जमीन देखनी थी।”
राघव ने कहा,
“आज?”
“हां। कल समझौता करवाना है।”
राघव ने पूछा,
“तुम्हें किसने कहा कि जमीन बिक रही है?”
समीर हंस पड़ा।
“भैया, तुम्हें व्यापार की समझ नहीं है।”
उसके साथ खड़े आदमी ने कहा,
“हम श्रीवास्तव अर्बन डेवलपर्स से हैं।”
राघव ने पूछा,
“मालिक कौन है?”
“अभिषेक श्रीवास्तव।”
राघव ने काव्या की तरफ देखा।
गोवर्धन श्रीवास्तव का बेटा।
मामला केवल पुरानी आग का नहीं था।
वही परिवार तीन दशक बाद जमीन लेने वापस आया था।
राघव ने शांत स्वर में कहा,
“यह जमीन नहीं बिकेगी।”
समीर हंसा।
“तुम कौन होते हो फैसला करने वाले?”
राघव के पिता पहली बार बोले,
“वो मेरा बेटा है।”
समीर चुप हो गया।
पिता ने दस्तावेज सीने से लगा लिए।
“और जमीन नहीं बिकेगी।”
कंपनी के लोग नाराज होकर चले गए।
जाते-जाते उनमें से एक ने फोन पर किसी को कहा,
“सर, मामला बिगड़ गया है।”
शाम ढल चुकी थी।
राघव को महसूस हुआ कि ये मामला अभी खत्म नहीं हुआ।
रात करीब दस बजे घर के बाहर एक काली गाड़ी आकर रुकी।
उसमें से लगभग पैंतालीस वर्ष का एक व्यक्ति उतरा।
महंगा सूट।
दो आदमी पीछे।
समीर उसे देखकर तुरंत खड़ा हो गया।
“अभिषेक सर!”
अभिषेक श्रीवास्तव।
वह सीधे राघव के पिता के सामने आया।
“मिश्रा जी, सुना कुछ पुराने कागज मिल गए हैं।”
पिता ने कहा,
“आपको बहुत जल्दी खबर मिल जाती है।”
अभिषेक मुस्कुराया।
“व्यापार में खबर ही पैसा होती है।”
उसकी नजर राघव पर गई।
“और ये?”
समीर बोला,
“मेरा कजिन है। डिलीवरी करता है।”
अभिषेक ने बिना दिलचस्पी के सिर हिलाया।
“देखिए, पुरानी बातों को खोदने से फायदा नहीं।”
काव्या आगे आई।
“अगर पुरानी बात में हत्या और संपत्ति हड़पने की साजिश हो तो फायदा बहुत होता है।”
अभिषेक ने उसे देखा।
“आप?”
“कानून की छात्रा।”
वह मुस्कुराया।
“अभी छात्रा ही हैं।”
काव्या ने कहा,
“इसलिए अभी केवल सवाल पूछ रही हूं। वकील बनने के बाद नोटिस भेजूंगी।”
राघव हंसी रोक नहीं पाया।
अभिषेक का चेहरा कठोर हो गया।
वह जाने लगा।
तभी बाहर दूसरी गाड़ी रुकी।
एक परिचित महिला उतरीं।
मालती राठौड़।
उनके साथ कंपनी का वरिष्ठ अधिकारी था।
राघव चौंका।
“आप?”
मालती मुस्कुराईं।
“तुम्हें लगा था बीस प्रतिशत हिस्सेदारी के कागज पर साइन करवाकर हम भूल जाएंगे?”
राघव स्तब्ध रह गया।
“बीस?”
“देवेंद्र ने दस प्रतिशत कहा था। बाकी दस मेरी तरफ से।”
राघव बोला,
“लेकिन—”
“चुप।”
उन्होंने अभिषेक की तरफ देखा।
“और श्रीवास्तव जी, जिस विकास परियोजना के लिए आप ये जमीन खरीदना चाहते हैं, उसमें राठौड़ समूह भी निवेशक है।”
अभिषेक का चेहरा उतर गया।
“मालती जी…”
“जब तक इस जमीन का पुराना विवाद साफ नहीं होता, हमारी तरफ से एक रुपया नहीं मिलेगा।”
समीर हक्का-बक्का राघव को देख रहा था।
“तुम… राठौड़ समूह के हिस्सेदार हो?”
राघव ने कंधे उचकाए।
“शायद।”
“तुम डिलीवरी करते हो!”
“वो भी करता हूं।”
मां दूर खड़ी सब सुन रही थीं।
पिता ने पहली बार राघव की तरफ ऐसे देखा जैसे वह उसे नए सिरे से पहचानने की कोशिश कर रहे हों।
लेकिन राघव के लिए उस समय पैसा मायने नहीं रखता था।
उसकी नजर घड़ी पर थी।
रात 12:43।
ऑर्डर सक्रिय होने में अट्ठाईस मिनट।
उसने लाल कपड़े में चाबी लपेटी।
काव्या ने पूछा,
“अब?”
राघव ने ऐप खोला।
नई लोकेशन दिखाई दी।
गांव का पुराना श्मशान घाट।
राघव ने कहा,
“मुझे जाना होगा।”
पिता बोले,
“इस समय?”
राघव उनकी तरफ मुड़ा।
बहुत कुछ बताना था।
लेकिन समय नहीं था।
“बाबूजी… अगर वापस आकर समझाने का मौका मिला तो सब बताऊंगा।”
पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“ये कैसी बात कर रहा है?”
राघव ने हल्के से मुस्कुराकर कहा,
“इस बार भाग नहीं रहा।”
कुछ देर बाद राघव और काव्या श्मशान के पास पहुंचे।
रात 1:09।
हवा बिल्कुल शांत थी।
चांद बादलों के पीछे था।
दूर पीपल का पेड़।
कुछ बुझी चिताओं की राख।
नदी का धीमा पानी।
1:10।
राघव का मोबाइल चमका।
10…
9…
8…
काव्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जो भी हो, अकेले मत करना।”
3…
2…
1…
रात 1:11।
टिन…
विशेष ऑर्डर सक्रिय।
सामान:
लाल कपड़े में लिपटी पुरानी चाबी।
ग्राहक:
राघव मिश्रा।
डिलीवरी स्थान:
यहीं।
राघव ने चारों तरफ देखा।
“ग्राहक कहां है?”
पीछे से आवाज आई—
“तुम्हारे सामने।”
हरिशंकर खड़े थे।
आज उनकी वर्दी नहीं थी।
साधारण सफेद कुर्ता।
चेहरा गंभीर।
राघव ने कहा,
“आप?”
“मैं केवल मार्गदर्शक हूं।”
“मेरा ऑर्डर क्या है?”
हरिशंकर ने हाथ आगे किया।
“चाबी मुझे दो।”
राघव ने नहीं दी।
“पहले सच।”
हरिशंकर कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,