Supernatural Mystery

जिस हवेली का सातवां नियम खाली था, वहां पहली रात ही दादा की आवाज सुनाई दी!

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

भाग 3 हथौड़े के। धातु घिसने के। “यह किसी पुराने कारीगर की जगह थी।” संदूक खोला। अंदर कपड़े, जंग खाए औजार और नीचे एक पुरानी कॉपी मिली। पहले पन्ने पर तारीख— अगस्त 1986 नीचे लिखा था— “रुद्रविलास कार्य अभिलेख” कई पन्ने फटे हुए थे। कुछ जगह केवल बेतरतीब टिप्पणियां। फिर आरव की नजर लिखावट पर ... Read more

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आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 84 मिनट

भाग 3

हथौड़े के।

धातु घिसने के।

“यह किसी पुराने कारीगर की जगह थी।”

संदूक खोला।

अंदर कपड़े, जंग खाए औजार और नीचे एक पुरानी कॉपी मिली।

पहले पन्ने पर तारीख—

अगस्त 1986

नीचे लिखा था—

“रुद्रविलास कार्य अभिलेख”

कई पन्ने फटे हुए थे।

कुछ जगह केवल बेतरतीब टिप्पणियां।

फिर आरव की नजर लिखावट पर टिक गई।

उसका दिल जोर से धड़का।

ये अक्षर…

उसने हजार बार देखे थे।

घर की पुरानी किताबों पर।

औजारों के डिब्बों पर।

अपने बचपन की कॉपियों पर लिखे निर्देशों में।

उसके दादा की लिखावट।

“नहीं…”

वह तेजी से पन्ने पलटने लगा।

नीचे कई जगह केवल शुरुआती अक्षर लिखे थे—

शं. मि.

शंकर मिश्रा।

आरव कुर्सी पर बैठ गया।

“दादा यहां कैसे…?”

उसके पिता हमेशा कहते थे कि दादा ने जिंदगी का बड़ा हिस्सा बनारस और आसपास काम करते हुए बिताया था।

रुद्रविलास का नाम कभी नहीं सुना।

और अब…

उसके सामने सबूत था कि लगभग चालीस साल पहले उसके दादा इसी हवेली के अंदर काम कर चुके थे।

अचानक बाहर से बहुत धीमी आवाज आई।

साँऽऽऽ…

जैसे धनुष किसी तार पर खिंचा हो।

आरव स्थिर हो गया।

फिर दूसरी आवाज।

एक सुर।

फिर दूसरा।

उसके दिमाग में नियम चार कौंधा।

अगर बिना तार की सारंगी बजने लगे…

आरव उठ खड़ा हुआ।

“नहीं।”

बाहर संगीत शुरू हो चुका था।

सारंगी।

वही सारंगी जिसमें एक भी तार नहीं था।

और फिर—

किसी औरत की धीमी गुनगुनाहट।

आरव कमरे से बाहर निकला।

नियम के मुताबिक उसे उस हिस्से से तुरंत बाहर जाना था।

वह मुख्य हॉल की तरफ बढ़ा।

पीछे से संगीत तेज होने लगा।

फिर गुनगुनाहट अचानक शब्दों में बदल गई।

एक महिला की आवाज।

बहुत दूर से आती हुई।

“शंकर…”

आरव के कदम रुक गए।

“शंकर… दरवाजा मत खोलना…”

उसके पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई।

उसने पीछे देखा।

“दादा?”

सारंगी वाले कमरे का दरवाजा धीरे-धीरे खुल रहा था।

नियम कहता था—

धुन पूरी होने से पहले कमरे से निकल जाना।

लेकिन अब आरव के लिए वह केवल नियम नहीं था।

उसके दादा का नाम लिया गया था।

वह वापस मुड़ा।

“कौन है?”

जैसे ही यह शब्द उसके मुंह से निकले, सारी गुनगुनाहट बंद हो गई।

सारंगी भी।

भयानक चुप्पी।

आरव को तभी ध्यान आया—

समय क्या हुआ है?

उसने घड़ी देखी।

रात 1:52

ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट गुजर चुके थे।

कम से कम उसने अपना पूरा नाम नहीं बोला था।

वह धीरे-धीरे सारंगी वाले कमरे की तरफ बढ़ा।

दरवाजे के पास पहुंचा।

अंदर अंधेरा।

बीच में वही बिना तार की सारंगी रखी थी।

“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

फिर उसके बिल्कुल पीछे किसी ने फुसफुसाया—

“तुम उसके पोते हो ना?”

आरव पलटा।

कोई नहीं।

उसी क्षण पूरी हवेली में एक साथ आवाजें उठीं।

धड़ाम!

एक दरवाजा बंद।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

ऊपर कहीं कुछ दौड़ा।

कमरा बारह की पालकी जोर-जोर से हिलने लगी।

पीतल के घोड़े की धातु पत्थर पर घिसी।

दूर से घंटी।

एक।

फिर बिना क्रम के दूसरी।

सारे चित्रों के कांच कांपने लगे।

आरव दौड़ा।

मुख्य हॉल।

फिर गलियारा।

पीछे किसी के भारी कदम।

ठक!

ठक!

ठक!

वह पुराने कार्यकक्ष में घुसा और दरवाजा बंद कर लिया।

सांसें तेज।

बाहर कदम आकर रुक गए।

आरव धीरे-धीरे पीछे हटा।

उसकी नजर दादा की कॉपी पर पड़ी।

वह मेज पर खुली थी।

उसने उसे तो बंद करके रखा था।

पन्ना खाली था।

फिर—

कागज पर एक छोटा-सा काला धब्बा उभरा।

आरव की आंखें फैल गईं।

धब्बा फैलने लगा।

जैसे अदृश्य कलम लिख रही हो।

पहला अक्षर बना।

फिर दूसरा।

फिर पूरा वाक्य।

आरव कांपते हाथों से कॉपी उठाता है।

उस पर लिखा था—

“आरव, अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो समझो उन्होंने तुम्हें भी ढूंढ लिया है।”

आरव की सांस रुक गई।

“दादा…?”

स्याही फिर चलने लगी।

दूसरी पंक्ति उभरी—

“यहां किसी पर भरोसा मत करना।”

आरव ने दरवाजे की तरफ देखा।

बाहर कोई नाखून से लकड़ी कुरेद रहा था।

खर्र…

खर्र…

फिर तीसरी पंक्ति बनने लगी।

इस बार अक्षर पहले से ज्यादा टेढ़े थे।

जैसे लिखने वाले के पास बहुत कम समय हो।

“और याद रखना…”

आरव की उंगलियां कॉपी पर कस गईं।

आखिरी शब्द धीरे-धीरे उभरे—

“सातवां नियम किसी किताब में नहीं लिखा जाएगा।”

ठीक उसी क्षण कार्यकक्ष के बाहर से…

तीन बार दस्तक हुई।

ठक।

आरव जम गया।

ठक।

उसने सांस रोक ली।

तीसरी दस्तक से पहले बाहर से उसके दादा की आवाज आई—

“आरव…”

उसकी आंखों में पानी भर आया।

“दादा?”

बाहर से आवाज आई—

“दरवाजा खोल।”

आरव ने हाथ कुंडी पर रख दिया।

और तभी उसे एक बात याद आई।

उसके दादा उसे बचपन से कभी आरव कहकर नहीं बुलाते थे।

वे हमेशा कहते थे—

“छोटे उस्ताद।”

आरव का हाथ कुंडी से हट गया।

बाहर कुछ सेकंड तक बिल्कुल चुप्पी रही।

फिर—

तीसरी दस्तक हुई।

ठक।

और दरवाजे के दूसरी तरफ से वही आवाज अब हंस रही थी।

लेकिन वह हंसी…

उसके दादा की नहीं थी।

बिल्कुल भी नहीं।

कार्यकक्ष के बाहर वही आवाज फिर सुनाई दी।

“आरव… दरवाजा खोल।”

आरव ने कुंडी से अपना हाथ पीछे खींच लिया।

उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे लग रहा था बाहर खड़ी चीज भी उसकी धड़कन सुन सकती है।

लेकिन एक बात अब साफ थी।

दरवाजे के दूसरी तरफ जो भी था, वह उसके दादा नहीं थे।

क्योंकि शंकर मिश्रा ने उसे जिंदगी में कभी आरव कहकर नहीं बुलाया था।

उनके लिए वह हमेशा—

“छोटे उस्ताद।”

ही था।

बाहर कुछ पल खामोशी रही।

फिर वही आवाज आई।

“दरवाजा क्यों नहीं खोल रहा?”

इस बार आवाज में बेचैनी थी।

आरव चुप रहा।

“मैं हूं… तेरे दादा।”

आरव ने धीरे से मेज पर पड़ी पीतल की छोटी छेनी उठा ली।

उसे खुद भी पता था कि अगर बाहर सच में कोई ऐसी चीज खड़ी है जो पूरी हवेली को हिला सकती है तो इस छेनी का कोई फायदा नहीं होगा।

फिर भी खाली हाथ रहने से अच्छा था।

बाहर से नाखूनों के लकड़ी पर रगड़ने की आवाज आने लगी।

खर्र…

खर्र…

खर्र…

और फिर अचानक सब बंद हो गया।

इतनी गहरी शांति छा गई कि आरव को अपनी सांस की आवाज तक बहुत तेज सुनाई देने लगी।

वह लगभग पांच मिनट तक उसी जगह खड़ा रहा।

कोई आवाज नहीं।

दस मिनट।

फिर भी कुछ नहीं।

धीरे-धीरे उसने दरवाजे के नीचे बनी पतली दरार की तरफ देखा।

बाहर अंधेरा था।

कोई पैर दिखाई नहीं दे रहा था।

उसने दरवाजा नहीं खोला।

दादा की कॉपी उसके सामने पड़ी थी।

उस पर आखिरी पंक्ति अब भी साफ लिखी थी—

“सातवां नियम किसी किताब में नहीं लिखा जाएगा।”

आरव ने धीरे से पन्ने पर हाथ रखा।

“दादा… आखिर आप यहां क्या कर रहे थे?”

कोई जवाब नहीं आया।

रात के बाकी घंटे उसने उसी कमरे में बिताए।

कभी बाहर कुछ चलता सुनाई देता।

कभी ऊपर से किसी भारी चीज के गिरने की आवाज आती।

एक बार तो उसे साफ लगा जैसे कोई बच्चा दरवाजे के बाहर बैठकर रो रहा हो।

लेकिन उसने दरवाजा नहीं खोला।

और दोस्तों, अब आरव के भीतर पहली रात वाला घमंड बिल्कुल नहीं बचा था।

कल तक उसे लगता था कि रुद्रविलास किसी अमीर परिवार का अजीब शौक है।

अब उसे समझ आने लगा था कि यह हवेली कुछ छुपा रही है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल था—

उसके दादा का इससे क्या संबंध था?

सुबह के पांच बजते ही हवेली में अजीब बदलाव आया।

जो घड़ियां रात भर कभी तेज, कभी धीमी चल रही थीं, सब एक साथ सामान्य हो गईं।

हवा में फैली ठंडक कम होने लगी।

और बाहर पक्षियों की आवाज सुनाई देने लगी।

आरव ने करीब दस मिनट और इंतजार किया।

फिर धीरे से दरवाजा खोला।

गलियारा खाली था।

लेकिन लकड़ी के दरवाजे पर बाहर की तरफ पांच लंबे काले निशान बने थे।

जैसे किसी ने नाखून गड़ा दिए हों।

आरव उन्हें देख ही रहा था कि मुख्य हॉल की तरफ से कदमों की आवाज आई।

मीरा थी।

वह हमेशा की तरह शांत दिखाई दे रही थी।

“रात कैसी रही?”

आरव ने उसे घूरा।

“आपको सच में पूछने की जरूरत है?”

मीरा उसकी हालत देखकर रुक गई।

“क्या हुआ?”

आरव ने दादा की कॉपी उसके सामने कर दी।

“ये क्या है?”

मीरा ने कॉपी देखते ही नजरें फेर लीं।

आरव ने उसका हाथ पकड़कर पन्ना सामने कर दिया।

“इसे देखिए।”

“मुझे देर हो रही है।”

“मीरा जी।”

इस बार आरव की आवाज कठोर थी।

“मेरे दादा यहां काम करते थे।”

मीरा चुप रही।

“आप उन्हें जानती थीं।”

“मैंने ऐसा नहीं कहा।”

“आपने कहा था कि नहीं जानतीं। लेकिन जब मैंने उनका नाम बताया था, आपका चेहरा बदल गया था।”

“आप बहुत कुछ सोच रहे हैं।”

“और आप बहुत कुछ छुपा रही हैं।”

आरव ने मेज पर हाथ मारा।

“कल रात कोई मेरे दादा की आवाज में मुझे दरवाजा खोलने के लिए कह रहा था। बिना तार की सारंगी बज रही थी। एक पीतल का घोड़ा खुद घूम गया। एक टूटा पानदान आईने में पूरा दिखाई दे रहा था। और इस कॉपी में अपने आप शब्द लिखे गए।”

मीरा ने पहली बार उसकी आंखों में सीधा देखा।

“आपने पानदान को छुआ?”

“नहीं।”

उसने राहत की सांस ली।

“अच्छा किया।”

“बस? यही कहेंगी?”

मीरा चुप रही।

आरव ने अपना थैला उठाया।

“मैं जा रहा हूं।”

“ठीक है।”

आरव रुक गया।

उसे उम्मीद थी कि मीरा उसे रोकने की कोशिश करेगी।

“क्या?”

“आप जाना चाहते हैं तो जा सकते हैं।”

“कोई जुर्माना नहीं?”

“नहीं।”

“अनुबंध?”

“आपने जितनी रातें काम की हैं उनका भुगतान कर दिया जाएगा।”

आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

“इतनी आसानी से?”

“किसी को मजबूर करके यहां नहीं रखा जा सकता।”

“तो मुझे बुलाया क्यों?”

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

आरव हंस पड़ा।

“आपकी यही समस्या है। हर सवाल पर चुप्पी।”

वह जाने लगा।

पीछे से मीरा ने कहा,

“आरव।”

वह रुका।

“उस कॉपी को यहीं छोड़ जाइए।”

आरव ने पलटकर देखा।

“क्यों?”

“वह रुद्रविलास की संपत्ति है।”

“इसमें मेरे दादा की लिखावट है।”

“फिर भी।”

आरव ने कॉपी अपने थैले में रख ली।

“अब यह मेरे परिवार की संपत्ति है।”

मीरा के चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

“इसे बाहर ले जाना ठीक नहीं होगा।”

“आपने अभी कहा कि मैं जा सकता हूं।”

“आप जा सकते हैं। कॉपी नहीं।”

“तो रोक लीजिए।”

कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

मीरा ने रास्ता नहीं रोका।

लेकिन जाते समय उसने केवल इतना कहा—

“अगर आज रात ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट के बाद कोई आपका नाम लेकर बुलाए… जवाब मत देना।”

आरव के कदम रुक गए।

“मैं तो हवेली में नहीं रहूंगा।”

मीरा की आंखें गंभीर हो गईं।

“मैंने यह नहीं कहा कि नियम केवल हवेली के अंदर काम करते हैं।”

आरव के चेहरे की रंगत बदल गई।

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

मोटरसाइकिल चालू की और वहां से निकल गया।

दोपहर तक वह अपने पुराने काम में लगने की कोशिश करता रहा।

लेकिन ध्यान बार-बार उसी कॉपी पर जा रहा था।

उसने दादा के पुराने औजार निकाले।

एक लकड़ी का बक्सा।

उस पर वही लिखावट—

“शंकर मिश्रा।”

दोनों लिखावटों में कोई अंतर नहीं था।

आरव ने पिता को फोन करने का सोचा।

फिर रुक गया।

अगर वह पूछता कि दादा 1986 में रुद्रविलास क्यों गए थे तो सबसे पहला सवाल यही आता—

रुद्रविलास क्या है?

और आरव के पास उसका जवाब ही नहीं था।

शाम को कबीर दुकान पर पहुंचा।

“आज हवेली नहीं जाना?”

“नहीं।”

“नौकरी चली गई?”

“मैंने छोड़ी है।”

कबीर ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

“इतने पैसे?”

“जान ज्यादा महंगी है।”

कबीर का चेहरा अचानक चमक उठा।

“तो सच में कुछ हुआ!”

“तुझे इसमें खुशी क्यों हो रही है?”

“क्योंकि मैं कल से बोल रहा हूं कि उस जगह में कुछ गड़बड़ है।”

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