भाग 2
करीब तीन फुट ऊंची सुंदर प्रतिमा।
एक टांग आगे उठी हुई।
गर्दन पश्चिम की तरफ थोड़ी झुकी थी।
आरव ने उसकी दरार को देखा।
“कल तुम्हें ठीक करूंगा।”
वह आगे बढ़ गया।
करीब दस मिनट बाद वापस उसी हॉल से गुजरा।
दो कदम चलने के बाद अचानक रुक गया।
कुछ गड़बड़ थी।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
घोड़ा…
अब दूसरी तरफ था।
आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।
“नहीं।”
उसने मोबाइल निकाला।
पहले खींची गई तस्वीर देखी।
तस्वीर में घोड़े का मुंह उत्तर की तरफ था।
अब—
पूरब।
उसके दिमाग में नियम दो कौंधा।
अगर पीतल का घोड़ा पूरब की तरफ मुड़ जाए, जहां हो वहीं रुक जाना।
आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
“किसी ने घुमाया होगा।”
फिर खुद ही बोला,
“कौन?”
हवेली में उसके अलावा कोई नहीं था।
उसने प्रतिमा के आधार को देखा।
धूल जमी थी।
आधार खिसकने का कोई निशान नहीं।
“हो सकता है मैंने दिशा गलत देखी हो।”
उसने एक कदम आगे बढ़ाया।
उसी क्षण—
टक!
पूरे हॉल की घड़ियां बंद हो गईं।
आरव का पैर हवा में ही रुक गया।
और फिर—
टन…
दूर कहीं घंटी बजी।
एक बार।
हवेली में इतनी गहरी चुप्पी छा गई कि उसे अपनी सांस सुनाई देने लगी।
फिर पीछे वाले गलियारे से आवाज आई—
खर्रर्र…
जैसे कोई भारी धातु की चीज पत्थर पर घसीट रहा हो।
आरव ने धीरे से गर्दन घुमानी चाही।
लेकिन नियम याद आया।
“जहां हो वहीं रुक जाना।”
उसने मन में खुद को गाली दी।
“मैं सच में ये बेवकूफी क्यों मान रहा हूं?”
आवाज करीब आती गई।
खर्रर्र… खर्रर्र… खर्रर्र…
अब साफ था।
कोई चीज गलियारे से हॉल में आ चुकी थी।
आरव की पीठ उसकी तरफ थी।
उसके माथे पर पसीना आने लगा।
आवाज उसके पीछे रुक गई।
इतनी करीब…
कि जैसे कोई उसकी गर्दन के पीछे खड़ा हो।
फिर ठंडी हवा उसके कान से गुजरी।
टन…
दूसरी घंटी।
आरव ने मुट्ठियां कस लीं।
अचानक उसे अपने दाहिने कान के पास धीमी सांस सुनाई दी।
एक लंबी…
भारी…
घुरघुराती सांस।
उसके पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
“कोई आदमी है,” उसने मन में कहा, “बस कोई आदमी है।”
फिर नीचे फर्श पर कुछ टपका।
टप।
फिर—
टप।
आरव ने नीचे देखने की कोशिश नहीं की।
कुछ सेकंड बाद तीसरी घंटी बजी।
टन…
अचानक सारी घड़ियां फिर चलने लगीं।
टिक-टिक।
टिक-टिक।
टिक-टिक।
पीछे की सांस गायब।
आरव तेजी से मुड़ा।
कोई नहीं था।
खाली हॉल।
खाली गलियारा।
लेकिन उसके जूते के ठीक पीछे…
फर्श पर एक गीला पदचिह्न था।
इंसानी पैर का नहीं।
किसी बहुत बड़े…
भारी…
धातु के पैर जैसा।
आरव कई सेकंड उसे देखता रहा।
फिर धीरे से बोला,
“यह मजाक बहुत महंगा पड़ने वाला है।”
अब वह पहले जितना बेफिक्र नहीं था।
—
करीब बारह बजकर बीस मिनट पर वह हवेली के पिछले हिस्से में पहुंचा।
वहां एक लंबा आंगन था।
बीच में कपड़े से ढकी कई बड़ी वस्तुएं रखी थीं।
आरव एक-एक कपड़ा हटाकर उनका निरीक्षण करता गया।
फिर उसकी नजर सबसे पीछे खड़ी एक विशाल पीतल की प्रतिमा पर पड़ी।
सात फुट से भी ऊंची।
किसी पुराने सैनिक या द्वारपाल जैसी।
हाथ में भाला था, लेकिन भाले का ऊपर का हिस्सा गायब।
बायां हाथ टूटा।
छाती पर लंबी दरार।
चेहरा गंभीर।
आरव उसके बिल्कुल करीब गया।
वह सारी अजीब घटनाएं कुछ देर के लिए भूल गया।
कारीगर फिर जाग चुका था।
“इतनी सुंदर चीज की ये हालत किसने की?”
उसने दरार पर हाथ रखा।
पुरानी पीतल की धातु।
दरार प्राकृतिक नहीं लग रही थी।
मानो किसी ने बाहर से नहीं…
अंदर से इसे फाड़ने की कोशिश की हो।
आरव ने औजार मंगवाने के लिए कार्यकक्ष की तरफ देखा।
फिर नियम छह याद आया।
“पीतल की थाली में प्रतिबिंब देखना।”
वह हंसा।
“चलो, आज नियमों का सम्मान कर ही लेते हैं।”
आसपास थाली नहीं थी।
वह कार्यकक्ष गया, वहां रखी एक पुरानी पीतल की प्लेट उठा लाया।
प्रतिमा के सामने रखी।
प्रतिबिंब देखा।
वही टूटी छाती।
वही गायब हाथ।
सब सामान्य।
“ठीक है भाई साहब, आपको ठीक होने की सरकारी अनुमति मिल गई।”
उसने काम शुरू कर दिया।
करीब दो घंटे तक आरव दुनिया भूल गया।
पहले उसने दरार साफ की।
फिर पुरानी जोड़ाई के निशान देखे।
नई चमकदार धातु लगाने के बजाय उसने उसी मिश्रधातु के करीब का पुराना टुकड़ा चुना।
“निशान छिपाएंगे नहीं,” वह बुदबुदाया, “बस तुम्हें फिर खड़ा करेंगे।”
उसे अपने दादा की आवाज याद आई—
“पुरानी चीज को नया मत बनाओ, आरव। पहले समझो कि वह टूटी क्यों है।”
बचपन में उसे यह बात बड़ी अजीब लगती थी।
लेकिन कारीगरी सीखते-सीखते वह समझ गया था कि पुरानी वस्तु पर लगा हर निशान उसकी उम्र का हिस्सा होता है।
करीब ढाई बजे उसने अंतिम सहारा लगाया।
हथौड़े से हल्की चोट दी।
टक।
उसी क्षण पूरा आंगन कांप गया।
ऊपर कबूतर एक साथ उड़ पड़े।
दीवारों से धूल गिरी।
आरव ने जमीन पकड़ ली।
“भूकंप?”
कंपन केवल तीन सेकंड रहा।
फिर सब शांत।
वह खड़ा हुआ।
प्रतिमा सामने बिल्कुल स्थिर थी।
लेकिन अब उसमें कुछ अलग था।
पहले उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।
अब…
आरव को लगा उसकी ठुड्डी थोड़ा ऊपर है।
“नहीं।”
उसने आंखें मलीं।
“बस थक गया हूं।”
उसे क्या पता था कि ठीक उसी समय रुद्रविलास से लगभग पैंतीस किलोमीटर दूर, बंद पड़े मालगोदाम के पास पुलिस की कई गाड़ियां खड़ी थीं।
वहां अंधेरे में एक दस फुट ऊंची काली आकृति कई घंटों से खड़ी थी।
उसका शरीर पीतल जैसे कवच से ढका था।
जो भी उसके करीब जाता, हवा में उछलकर दूर जा गिरता।
पुलिस को समझ नहीं आ रहा था वह चीज इंसान थी, मशीन थी या कुछ और।
तभी अचानक—
उस आकृति के सीने पर दरार पड़ी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
कुछ ही सेकंड में उसका पूरा शरीर बिखरने लगा।
और देखते ही देखते वह काले चूर्ण में बदलकर जमीन पर गिर गया।
किसी को समझ नहीं आया कि हुआ क्या।
और उसी समय रुद्रविलास में आरव अपनी बनाई जोड़ाई देखकर मुस्कुरा रहा था।
“वाह।”
उसने प्रतिमा की पीठ थपथपाई।
“अब कम से कम इंसानों जैसी हालत में लग रहे हो।”
पीतल की प्रतिमा बिल्कुल स्थिर रही।
लेकिन आरव के पीछे रखी पीतल की थाली में—
उसका प्रतिबिंब मुस्कुरा रहा था।
—
सुबह पांच बजे मीरा आई।
आरव ने गर्व से उसे द्वारपाल दिखाया।
मीरा का चेहरा देखते ही बदल गया।
“तुमने इसे ठीक किया?”
“हां।”
“किसने कहा था?”
“किसने मना किया था?”
मीरा प्रतिमा के पास गई।
उसने कांपते हाथ से दरार का नया जोड़ छुआ।
फिर आरव की तरफ देखा।
“तुमने पूरा सीना बंद कर दिया?”
“पूरी तरह नहीं। सांस लेने के लिए जोड़ खुला रखा है।”
मीरा ठिठक गई।
“क्या?”
आरव ने समझाया,
“पुरानी धातु है। अगर बिल्कुल कड़ा जोड़ दूंगा तो तापमान बदलने पर फिर टूट सकती है। इसलिए अंदर सूक्ष्म जगह छोड़ी है।”
मीरा कुछ सेकंड उसे देखती रही।
जैसे उसने कोई बहुत महत्वपूर्ण बात कह दी हो।
फिर पूछा,
“तुम्हें ये तरीका किसने सिखाया?”
“मेरे दादा ने।”
“नाम?”
आरव ने हंसते हुए कहा,
“अब आप परिवार का इतिहास भी लिखेंगी?”
“तुम्हारे दादा का नाम क्या था?”
“शंकर मिश्रा।”
मीरा के चेहरे से जैसे खून उतर गया।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“आप उन्हें जानती थीं?”
“नहीं।”
जवाब बहुत जल्दी आया।
आरव समझ गया—
वह झूठ बोल रही है।
—
घर पहुंचते-पहुंचते सुबह हो गई।
आरव को आश्चर्य हुआ कि पूरी रात जागने के बाद भी उसे नींद नहीं आ रही थी।
बल्कि शरीर अजीब तरह से हल्का लग रहा था।
दुकान पहुंचते ही कबीर मौजूद था।
हाथ में चाय।
पेट थोड़ा निकला हुआ।
बाल ऐसे जैसे सुबह उठकर कंघी से उसका कोई समझौता ही न हो।
“आ गए भूतनाथ!”
आरव ने चाय छीनी।
“सुबह-सुबह शक्ल मत दिखाया कर।”
“रात कैसी रही?”
आरव कुछ पल चुप रहा।
“सामान अच्छा है।”
“बस?”
“हां।”
“भूत?”
“नहीं।”
“चुड़ैल?”
“नहीं।”
“खूनी महारानी?”
“नहीं।”
“तो इतनी मोटी तनख्वाह किस बात की?”
आरव ने जवाब नहीं दिया।
कबीर अचानक उत्साहित हुआ।
“अरे हां!”
उसने मोबाइल निकाला।
“ये देख।”
एक धुंधला वीडियो चल रहा था।
रात का मालगोदाम।
पुलिस।
दूर एक विशाल काली आकृति।
आरव की आंखें सिकुड़ गईं।
“कहां का है?”
“यहीं का। रात का मामला। आधा शहर नहीं, लेकिन आसपास का पूरा इलाका बंद था। और सुन—वीडियो हटाया जा रहा है।”
“नकली है।”
“क्यों?”
“ऐसी चीज सच होती तो सुबह तक हर जगह खबर होती।”
कबीर बोला,
“तू मेरी खबरों की बेइज्जती कर सकता है, मेरे सूत्रों की नहीं।”
“तेरे सूत्र पान की दुकान पर बैठते हैं।”
“लेकिन खबर सही देते हैं।”
वीडियो में आकृति कुछ सेकंड साफ दिखाई दी।
आरव का चेहरा बदल गया।
उस कवच के सीने पर…
वही डिजाइन था।
बिल्कुल वही।
जो उसने रात में पीतल के द्वारपाल पर देखा था।
कबीर ने पूछा,
“क्या हुआ?”
आरव ने मोबाइल उससे वापस कर दिया।
“कुछ नहीं।”
“तू पहचानता है?”
“नहीं।”
“पक्का?”
“कबीर, वीडियो बनाने वाले ने कहीं की मूर्ति उठाकर जोड़ दी होगी।”
“अच्छा?”
“आजकल कुछ भी बनाया जा सकता है।”
लेकिन आरव की अपनी आवाज उसे भरोसेमंद नहीं लगी।
—
दोपहर में वह अपनी मोटरसाइकिल ठीक कर रहा था।
कुछ दिन से इंजन में कंपन था।
मिस्त्री ने कहा था कि आधा इंजन खोलना पड़ेगा।
आरव ने मोटरसाइकिल चालू की।
कुछ सेकंड इंजन की आवाज सुनी।
फिर अचानक उसके दिमाग में जैसे पूरा ढांचा खुल गया।
कौन-सा पुर्जा ढीला है।
कहां कंपन हो रहा है।
किस धातु का हिस्सा घिस रहा है।
सब…
उसे महसूस हो रहा था।
वह झुककर एक छोटा बोल्ट खोलता है।
अंदर की प्लेट सीधी करता है।
मोटरसाइकिल चालू करता है।
कंपन गायब।
आरव स्थिर खड़ा रह गया।
“मुझे ये कैसे पता चला?”
उसने अपने हाथ देखे।
कल हथौड़ा चलाते समय अंगूठे के पास हल्की चोट लगी थी।
घाव…
गायब था।
—
उस रात वह रुद्रविलास थोड़ा जल्दी पहुंचा।
अब उसकी जिज्ञासा डर से बड़ी हो चुकी थी।
मीरा नहीं मिली।
मुख्य दरवाजा खुला था।
कार्यकक्ष में पहुंचते ही आरव की नजर रजिस्टर पर गई।
उसने उसे खोला।
नियम वही थे।
एक।
दो।
तीन।
चार।
पांच।
छह।
सातवां खाली।
“मैं ही बेवकूफ बन रहा हूं।”
वह रजिस्टर बंद करने वाला था कि अचानक उसकी नजर पन्ने के किनारे गई।
वहां कुछ लिखा था।
कल नहीं था।
स्याही गहरी लाल-भूरी थी।
टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में—
“तुमने द्वारपाल को पूरा क्यों किया?”
आरव का हाथ वहीं रुक गया।
उसने पन्ना छुआ।
स्याही सूख चुकी थी।
“मीरा।”
उसने तुरंत समझा।
“मुझे डराने का नाटक।”
अब उसका मूड खराब हो गया।
“ठीक है। आज मैं भी देखता हूं कितना बड़ा खेल है।”
उसने मरम्मत के लिए चांदी का पुराना पानदान चुना।
ढक्कन टूटा था।
हाथ बढ़ाया…
फिर रुक गया।
नियम छह।
“पहले प्रतिबिंब।”
वह पीतल की थाली लाया।
पानदान सामने रखा।
थाली में देखा।
उसकी सांस अटक गई।
असल पानदान टूटा था।
लेकिन प्रतिबिंब में—
वह बिल्कुल सही था।
पूरा।
चमकदार।
जैसे कभी टूटा ही न हो।
आरव पीछे हटा।
“नहीं…”
फिर उसकी नजर प्रतिबिंब के पीछे गई।
थाली में उसके पीछे…
एक और आदमी बैठा था।
सफेद कुर्ता।
झुका सिर।
काले हाथ।
आरव ने तुरंत पीछे देखा।
कोई नहीं।
फिर थाली में देखा।
वह आदमी अब भी था।
और इस बार—
उसने सिर उठा दिया।
आरव ने थाली छोड़ दी।
टननन!
थाली जमीन पर घूमती हुई दूर चली गई।
उसने पानदान को हाथ नहीं लगाया।
पहली बार—
आरव ने किसी नियम को मजाक समझकर नहीं, डर के कारण माना।
—
रात के करीब डेढ़ बजे उसे कार्यकक्ष की पिछली दीवार में एक पतला दरवाजा दिखाई दिया।
कल वह नहीं खुला था।
आज थोड़ा खुला था।
अंदर बहुत छोटा कमरा।
धूल।
पुराने औजार।
टूटी मेज।
लकड़ी का संदूक।
आरव ने टॉर्च जलाई।
मेज पर बहुत पुराने निशान थे।
छेनी चलने के।