Supernatural Mystery

जिस हवेली का सातवां नियम खाली था, वहां पहली रात ही दादा की आवाज सुनाई दी!

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

भाग 6 कुछ लोगों ने कहा उसने सपना देखा होगा। पर उसी समय दूसरी तरफ एक बूढ़ी महिला अपने घर की छत पर खड़ी रो रही थी। वह बार-बार कह रही थी— “मेरी मां अभी नीचे से मुझे बुलाकर गई है।” उसकी मां को मरे हुए चालीस साल हो चुके थे। शहर के एक दूसरे ... Read more

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आप भाग 6 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 84 मिनट

भाग 6

कुछ लोगों ने कहा उसने सपना देखा होगा।

पर उसी समय दूसरी तरफ एक बूढ़ी महिला अपने घर की छत पर खड़ी रो रही थी।

वह बार-बार कह रही थी—

“मेरी मां अभी नीचे से मुझे बुलाकर गई है।”

उसकी मां को मरे हुए चालीस साल हो चुके थे।

शहर के एक दूसरे हिस्से में एक बंद सिनेमाघर के सामने भीड़ जमा हो गई।

लोगों को अंदर से पुराने फिल्मी गीत सुनाई दे रहे थे।

सिनेमाघर पंद्रह साल से बंद था।

रेलवे स्टेशन पर तीन यात्रियों ने दावा किया कि उनके बगल में कुछ मिनटों तक ऐसे रिश्तेदार बैठे रहे जो वर्षों पहले मर चुके थे।

किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ।

लेकिन हर जगह एक चीज समान थी।

लोग केवल भूत नहीं देख रहे थे।

वे किसी और समय की याद में कुछ देर के लिए खड़े हो रहे थे।

जैसे शहर की पुरानी परतें वर्तमान के ऊपर आने लगी हों।

आरव को यह सब कबीर ने सुबह-सुबह बताया।

वह पूरी रात दादा की रिकॉर्डिंग बार-बार सुनता रहा था।

उसकी आंखें लाल थीं।

मेज पर अखबार, पुरानी कॉपी, रुद्रविलास का नक्शा और मीरा द्वारा दिए गए कागज फैले थे।

कबीर ने मोबाइल उसके सामने रख दिया।

“ये देख।”

एक छोटा वीडियो था।

किसी पुराने बाजार का।

रिकॉर्ड करने वाला व्यक्ति वर्तमान की भीड़ दिखा रहा था।

फिर अचानक वीडियो में कुछ सेकंड के लिए दुकानें बदल गईं।

पुराने बोर्ड।

अलग कपड़े।

एक घोड़ा गाड़ी।

और फिर सब वापस सामान्य।

आरव ने वीडियो रोक दिया।

“कब का है?”

“आज सुबह।”

“कहां?”

“अमीनाबाद के पास।”

कबीर ने दूसरा वीडियो खोला।

इस बार एक बुजुर्ग आदमी खाली कुर्सी से बात कर रहा था।

वह रोते हुए कह रहा था—

“तू लौट आया बेटा?”

लेकिन कुर्सी पर कोई नहीं था।

आरव ने मोबाइल नीचे रख दिया।

“पहला ताला खुलने के बाद शुरू हुआ है।”

“तुझे कैसे पता कि ताला खुला?”

आरव ने लंबी सांस ली।

“पता नहीं।”

“मतलब?”

“रात करीब तीन बजे मुझे महसूस हुआ।”

कबीर ने घूरा।

“क्या महसूस हुआ?”

आरव अपने सीने पर हाथ रखकर बोला,

“जैसे किसी बहुत दूर की जगह पर कोई भारी चीज टूट गई हो।”

कबीर कुछ पल चुप रहा।

“भाई, मुझे ये बात पसंद नहीं आ रही कि अब तू हवेली के ताले दूर बैठकर महसूस करने लगा है।”

आरव ने दादा की कॉपी उठाई।

“मुझे भी नहीं।”

कबीर बोला,

“अब क्या करेगा?”

आरव ने रिकॉर्डिंग की आखिरी पंक्ति फिर सुनाई—

“अगर सारे ताले खुल गए… सातवीं दीवार खुल जाएगी।”

फिर बोला,

“आज मीरा से पूरा सच निकलवाऊंगा।”

“और अगर उसने फिर आधा जवाब दिया?”

आरव ने कॉपी बंद की।

“तो इस बार मैं वहां से वापस नहीं आऊंगा जब तक जवाब नहीं मिलता।”

कबीर ने कुछ सोचकर कहा,

“मैं भी चलूंगा।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि पिछली बार तू सुरंग के बाहर खड़ा होकर मरने से पहले संदेश करने को कह रहा था।”

“मजाक था।”

“आज मजाक नहीं होगा।”

कबीर ने पहली बार बिना हंसे कहा,

“इसीलिए तो चलना चाहता हूं।”

आरव ने उसकी आंखों में देखा।

फिर बोला,

“ठीक है। लेकिन जो कहूं वही करना।”

“हां।”

“हीरो बनने की कोशिश मत करना।”

कबीर मुस्कुराया।

“वो काम तेरे लिए छोड़ दिया।”

दोपहर तक डॉक्टर इरा सेन भी दुकान पर पहुंच गईं।

उनके चेहरे पर सामान्य दिनों से ज्यादा तनाव था।

“आज सुबह से नौ घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं।”

आरव ने पूछा,

“किस तरह की?”

“समय की दोहराव वाली घटनाएं। लोगों को पुरानी जगहें दिखाई देना। मृत लोगों की आवाजें सुनाई देना। ऐसी चीजें जो कुछ मिनट बाद खुद गायब हो जाती हैं।”

कबीर बोला,

“तो शहर भूतिया नहीं हो रहा?”

इरा ने उसकी तरफ देखा।

“अगर भूत शब्द से तुम्हें समझने में आसानी होती है तो इस्तेमाल कर लो। लेकिन हमें जो मिल रहा है वह किसी जीवित इकाई जैसा व्यवहार नहीं कर रहा।”

आरव बोला,

“यादें।”

इरा ने उसकी तरफ देखा।

“क्या?”

“ये सब यादें हैं।”

“तुम्हें कैसे पता?”

आरव ने मीरा की बताई बातें दोहराईं।

स्मृति-छाप।

वस्तुओं में भावनाओं का जमा होना।

यादों का अपने आप को जीवित समझने लगना।

इरा कुछ देर सुनती रहीं।

फिर बोलीं,

“अगर यह सही है तो हमारे सामने समस्या किसी एक वस्तु की नहीं है।”

“पूरे रुद्रविलास की है।”

“और शायद पूरे शहर की।”

आरव ने हवेली का नक्शा उठाया।

“पहला ताला खुल चुका है।”

इरा चौंकी।

“कौन-सा ताला?”

आरव ने दादा की रिकॉर्डिंग सुनाई।

इरा का चेहरा गंभीर हो गया।

“हमें अभी वहां जाना चाहिए।”

“दिन में?”

आरव ने मीरा की पहली बात याद की—

दिन में वहां मरम्मत नहीं होती।

फिर बोला,

“नहीं। आज रात।”

इरा ने पूछा,

“क्यों?”

“क्योंकि जो कुछ भी असली है, वह रात में ही जागता है।”

शाम होते-होते रुद्रविलास के सामने तीन गाड़ियां खड़ी थीं।

इरा की इकाई के छह सदस्य बाहर रहे।

कबीर ने अपना कैमरा निकालना चाहा।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“कुछ भी रिकॉर्ड मत करना।”

“इतिहास बन रहा है।”

“और अगर इतिहास ने तुझे रिकॉर्ड कर लिया तो?”

कबीर ने कैमरा वापस रख लिया।

“ठीक है। आज तेरी बात मान लेता हूं।”

मुख्य फाटक खुला था।

मीरा सीढ़ियों पर उनका इंतजार कर रही थी।

आरव को देखते ही बोली,

“तुम्हें नहीं आना चाहिए था।”

“अब ये वाक्य सुन-सुनकर थक गया हूं।”

“शहर में जो हो रहा है उसके बाद यहां रहना सुरक्षित नहीं है।”

“और यहां से भाग जाना सुरक्षित है?”

मीरा चुप रही।

आरव आगे बढ़ा।

“पहला ताला खुल चुका है।”

मीरा का चेहरा बदल गया।

“तुम्हें किसने बताया?”

“मेरे दादा ने।”

“क्या?”

आरव ने कैसेट उसकी तरफ बढ़ाई।

“उनकी रिकॉर्डिंग।”

मीरा ने कैसेट देखी।

उसके हाथ कांपने लगे।

“ये तुम्हें कहां मिली?”

“उनकी कॉपी में।”

“उन्होंने क्या कहा?”

“कि कुछ वस्तुएं जानबूझकर अधूरी छोड़ी गई थीं।”

मीरा ने आंखें बंद कर लीं।

आरव की आवाज कठोर हो गई।

“और हर चीज ठीक करने से एक ताला खुलता है।”

मीरा ने धीरे से कहा,

“उन्होंने ऐसा कहा?”

“हां।”

“तो उन्होंने तुम्हें आधी बात बताई।”

आरव हंस पड़ा।

“कमाल है। यहां हर किसी के पास केवल आधी बात क्यों है?”

इरा आगे आईं।

“आज पूरी बात बताइए।”

मीरा ने उन्हें देखा।

“आप कौन?”

“डॉक्टर इरा सेन। राष्ट्रीय विरासत प्रतिक्रिया इकाई।”

मीरा ने कुछ क्षण उन्हें देखा।

फिर बोली,

“तो आखिर वे लोग भी पहुंच ही गए।”

इरा ने कहा,

“हमें पहले से पहुंच जाना चाहिए था।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि आपके उपकरण यहां किसी काम नहीं आएंगे।”

इरा ने शांत स्वर में कहा,

“फिर भी अब हम बाहर नहीं जाएंगे।”

मीरा ने आरव की तरफ देखा।

“तुमने इन्हें बुलाया?”

“हां।”

“और कबीर को?”

कबीर ने हाथ उठा दिया।

“मैं खुद चला आया।”

मीरा ने सिर पकड़ लिया।

“बहुत अच्छा। जिस जगह से लोगों को दूर रखना था, आज सब यहीं इकट्ठा हो गए।”

आरव बोला,

“अब आप सच बताइए।”

मीरा ने मुख्य दरवाजा बंद कर दिया।

फिर धीमे स्वर में कहा,

“ठीक है।”

“सब?”

“सब।”

वह उन्हें मुख्य हॉल से गुजरते हुए सात कारीगरों के चित्र वाले कमरे में ले गई।

आज उस कमरे का वातावरण अलग था।

चित्रों के नीचे बने छोटे दीपक अपने आप जल रहे थे।

मीरा पहले चित्र के सामने रुकी।

“बहुत पहले इस जगह के नीचे कुछ खोजा गया था।”

कबीर ने पूछा,

“कब्र?”

“नहीं।”

“खजाना?”

“नहीं।”

मीरा ने कहा,

“यादों का एक ऐसा संग्रह जिसे किसी इंसान ने बनाया नहीं था।”

आरव चुप रहा।

“सैकड़ों साल तक इस इलाके में युद्ध हुए, परिवार उजड़े, हवेलियां बनीं, राजघराने बदले, लोग मरे, प्रेम हुआ, विश्वासघात हुआ। उन सबके निशान चीजों में जमा होते गए।”

इरा ने पूछा,

“लेकिन इससे एक जगह पर इतनी ऊर्जा कैसे बनी?”

मीरा ने जमीन की तरफ इशारा किया।

“इस हवेली के नीचे बहुत पुराना जलमार्ग है। शहर के कई पुराने हिस्सों का पानी कभी यहां से होकर गुजरता था। लोगों ने मान लिया था कि पानी केवल मिट्टी और गंदगी लाता है।”

वह रुकी।

“लेकिन शायद वह यादें भी लाता था।”

कबीर ने धीरे से कहा,

“मतलब पूरे शहर की?”

“पीढ़ियों की।”

मीरा ने आगे कहा,

“धीरे-धीरे उन स्मृतियों का एक ऐसा घना समूह बना जिसे सात कारीगरों ने नाम दिया—कालराग।”

आरव ने पूछा,

“वो कोई जीव है?”

“नहीं।”

“तो?”

“शायद किसी जीव जैसा बन चुकी स्मृति।”

इरा बोलीं,

“सामूहिक चेतना?”

“आप जो नाम देना चाहें दे सकती हैं।”

मीरा ने दीवार के चित्रों की तरफ देखा।

“कालराग स्वयं कुछ नया नहीं बना सकता। वह केवल जो पहले हो चुका है, उसे दोहरा सकता है। लेकिन जितनी अधिक यादें उसमें जुड़ती हैं, उतना ही वह वास्तविकता पर असर डाल सकता है।”

आरव को सुबह के वीडियो याद आए।

“इसलिए लोग पुराना शहर देख रहे हैं।”

“हां।”

“मरे हुए रिश्तेदार?”

“उनकी यादों के अंश।”

कबीर ने पूछा,

“तो अगर सारे ताले खुल गए?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

“तब यह शहर एक समय में नहीं रहेगा।”

कमरे में खामोशी छा गई।

“हर गली कई समयों में टूट जाएगी। हर व्यक्ति अपनी यादों और दूसरों की यादों में फंस सकता है। कोई यह नहीं बता पाएगा कि वर्तमान क्या है।”

आरव ने पूछा,

“और इसे रोका कैसे गया?”

मीरा ने सात चित्रों की तरफ इशारा किया।

“इन लोगों ने कालराग को सात हिस्सों में बांटने की कोशिश की।”

“वस्तुओं में?”

“हां। धातु, लकड़ी, कपड़ा, मिट्टी, संगीत, चित्र और पत्थर। हर कारीगर ने अपनी कला के जरिए स्मृतियों को अलग-अलग पात्रों में बांधा।”

इरा बोलीं,

“रुद्रविलास इसलिए बनाया गया?”

“रुद्रविलास बाद में बना। पहले यह एक कार्यशाला थी।”

“और सात ताले?”

“सात परतें।”

आरव ने पूछा,

“दादा ने कहा था हर पूरा हुआ जोड़ एक ताला खोलता है।”

मीरा ने सिर हिलाया।

“क्योंकि वह सच का केवल एक हिस्सा है।”

“तो पूरा हिस्सा क्या है?”

“टूटी वस्तु से स्मृति बाहर निकलती है। उसे ठीक करने पर स्मृति फिर बंधती है। लेकिन अगर मरम्मत गलत तरीके से की जाए…”

“तो?”

“तो वस्तु बंद नहीं होती।”

मीरा ने उसके पास आकर कहा,

“वह दबाव बनाती है।”

आरव को तुरंत दादा की बात याद आई।

धातु को पूरा मत बंद करना।

“इसलिए दादा जीवित जोड़ करते थे।”

“हां।”

“वस्तु मजबूत भी रहे और पुराना घाव थोड़ा खुला भी।”

“हां।”

आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

“तो आपने मुझे सब कुछ ठीक करने को क्यों कहा?”

मीरा की आंखों में दर्द आया।

“क्योंकि मेरे पास समय नहीं था।”

“ये जवाब नहीं है।”

“पिछले दस वर्षों में बाहर निकली वस्तुओं की संख्या लगातार बढ़ रही थी। रुद्रविलास का घेरा कमजोर हो चुका था। अगर उन्हें वापस नहीं बांधा जाता तो कालराग बहुत पहले बाहर आ जाता।”

“लेकिन उन्हें पूरी तरह ठीक करने से भी ताले खुल रहे हैं।”

“क्योंकि तुम हर मरम्मत सही तरीके से नहीं कर रहे थे।”

आरव का चेहरा उतर गया।

द्वारपाल।

सारंगी।

बाकी वस्तुएं।

“तो गलती मेरी है?”

“नहीं।”

मीरा ने तुरंत कहा।

“तुम्हें सच बताया ही नहीं गया।”

“किसने नहीं बताया?”

मीरा ने उत्तर देने से पहले लंबी सांस ली।

“मेरे परिवार ने।”

आरव कुछ बोलता, उससे पहले हवेली जोर से कांपी।

दीवार पर लगा एक चित्र गिरते-गिरते बचा।

कहीं नीचे से भारी आवाज आई।

धड़ाम!

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“दूसरा।”

इरा ने पूछा,

“दूसरा क्या?”

“दूसरा ताला।”

आरव ने जमीन की तरफ देखा।

उसके पैरों में हल्का कंपन हो रहा था।

फिर अचानक मुख्य हॉल की तरफ से घोड़ों के दौड़ने की आवाज आई।

कबीर बोला,

“यहां घोड़े कहां से आ गए?”

कोई जवाब देने से पहले दरवाजा अपने आप खुल गया।

सामने वही मुख्य हॉल था—

लेकिन कुछ बदल चुका था।

कांच के प्रदर्शन गायब।

बिजली की रोशनी गायब।

उनकी जगह मशालें।

दीवारें नई।

फर्श पर दर्जनों लोग भाग रहे थे।

सैनिक।

नौकर।

औरतें।

बच्चे।

जैसे वे किसी पुराने समय की घटना के बीच खड़े हों।

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