भाग 2
“प्रधान जी का लड़का लौट आया,” किसी ने फुसफुसाकर कहा।
“किसके साथ है?” दूसरी आवाज आई।
“नई मास्टरनी लगती है।”
निहारिका ने इन फुसफुसाहटों को सुना, लेकिन अनदेखा किया। तुषार सिर झुकाए चल रहा था। उसका घर गांव के बीचोंबीच था। बड़ा आंगन, लकड़ी का दरवाजा और बरामदे में रखी पुरानी कुर्सी। दरवाजे पर एक सख्त चेहरे वाले बुजुर्ग खड़े थे। सफेद बाल, मोटा चश्मा और हाथ में लाठी। यही थे जगदीश रावत, गांव के प्रधान और तुषार के दादा।
उन्होंने तुषार को देखा तो आंखों में राहत की एक चमक आई, लेकिन तुरंत चेहरा कठोर हो गया। “कहां था तू?” उन्होंने तेज आवाज में कहा।
तुषार चुप रहा।
निहारिका ने आगे बढ़कर कहा, “ये बस में अकेला मिला था। रात रास्ता बंद था, इसलिए हम ढाबे पर रुके। सुबह इसे साथ ले आई।”
प्रधान जी ने निहारिका को ऊपर से नीचे तक देखा। “आप नई अध्यापिका हैं?”
“जी। निहारिका सक्सेना।”
“स्कूल देखने आई हैं?”
“जी। और शुरू करने भी।”
प्रधान जी का चेहरा बदल गया। “वह स्कूल अब नहीं खुलेगा।”
निहारिका ने शांत स्वर में पूछा, “लेकिन मेरी नियुक्ति उसी स्कूल के लिए हुई है।”
“सरकारी कागज़ों में बहुत कुछ लिखा होता है। गांव की हालत कागज़ नहीं समझते।”
“बच्चों को पढ़ाई चाहिए,” निहारिका ने कहा।
प्रधान जी की आंखों में गुस्सा तैर गया। “बच्चों को जान भी चाहिए। उस स्कूल ने मेरी बहू को छीन लिया। मेरे पोते की आवाज छीन ली। अब वहां कोई नहीं जाएगा।”
निहारिका कुछ कहना चाहती थी, लेकिन तुषार ने अचानक उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में विनती थी— अभी मत बोलिए।
निहारिका चुप हो गई। प्रधान जी ने तुषार का हाथ पकड़ा और अंदर ले गए। दरवाजा बंद हो गया।
गांव में निहारिका के रहने की व्यवस्था पंचायत के पुराने अतिथि-कक्ष में थी। कमरा छोटा था। छत पर सीलन के निशान थे, खिड़की की कुंडी अटकती थी, और बिस्तर पर धूल जमा थी। उसने बैग रखा, खिड़की खोली और बाहर देखा। दूर पहाड़ी के नीचे एक टूटी-सी इमारत दिख रही थी। उसके ऊपर जंग लगा बोर्ड टेढ़ा लटका था—
“राजकीय प्राथमिक विद्यालय, धौलागढ़।”
निहारिका बहुत देर तक उसे देखती रही।
दोपहर में वह स्कूल तक गई। रास्ता संकरा था। घास उगी हुई थी। स्कूल के मैदान में कंटीली झाड़ियां फैल गई थीं। झंडे का खंभा जंग खा चुका था। दरवाजे पर ताला था, लेकिन लकड़ी इतनी कमजोर थी कि हल्के धक्के से खुल सकती थी। दीवारों पर बच्चों की पुरानी चित्रकारी धुंधली पड़ी थी— सूरज, पहाड़, नदी, घर, और एक बड़ा सा पेड़।
निहारिका ने ताला छुआ। उसे लगा जैसे किसी ने इस जगह को बंद नहीं किया, बल्कि किसी याद को कैद कर दिया हो।
पीछे से आवाज आई, “आपको मना किया गया था।”
वह मुड़ी। प्रधान जी खड़े थे।
“मैं सिर्फ देख रही थी,” निहारिका ने कहा।
“देखने से क्या होगा?”
“कभी-कभी देखने से पता चलता है कि चीजें बचाई जा सकती हैं।”
प्रधान जी ने कड़वाहट से कहा, “कुछ चीजें बचती नहीं, बस उनकी याद बचती है।”
“और कुछ यादें काम अधूरा छोड़कर नहीं जातीं,” निहारिका ने धीरे से कहा।
प्रधान जी ने उसे घूरा। “आप शहर से आई हैं। दो दिन में समझ जाएंगी कि पहाड़ सिर्फ सुंदर नहीं होते। ये आदमी को परखते हैं।”
“मुझे परखा जाना मंजूर है,” निहारिका ने कहा।
प्रधान जी बिना जवाब दिए चले गए।
अगले दिन से निहारिका ने स्कूल साफ करना शुरू किया। कोई उसके साथ नहीं आया। गांव की औरतें दूर से देखतीं और आपस में बातें करतीं। बच्चे झाड़ियों के पीछे छिपकर देखते, फिर भाग जाते। कुछ लड़के हंसते हुए कहते, “मास्टरनी जी भूतों वाले स्कूल में पढ़ाएंगी।”
निहारिका सुबह से शाम तक झाड़ू लगाती, टूटी कुर्सियां बाहर निकालती, खिड़कियां खोलती, दीवारों से काई साफ करती। उसके हाथ छिल गए, कपड़े धूल से भर गए, लेकिन वह रुकी नहीं। शाम को वह पंचायत-कक्ष लौटती तो शरीर टूट रहा होता। लेकिन रात को उसे नींद ठीक से नहीं आती। उसे बार-बार मीरा की चिट्ठी याद आती।
तीसरे दिन दोपहर को वीर आया। उसके हाथ में औजारों का छोटा बैग था।
“दरवाजे की कुंडी कौन ठीक करेगा?” उसने पूछा।
निहारिका ने धूल से भरे चेहरे के साथ मुस्कुराकर कहा, “मैं सोच रही थी कि इसे भी पढ़ाकर समझा लूं।”
वीर हंसा। “लकड़ी पढ़ाई से नहीं, हथौड़े से समझती है।”
उस दिन से वीर रोज शाम कुछ देर स्कूल आने लगा। उसने टूटे बेंच ठीक किए, खिड़कियों में कांच लगाया, बरामदे की ढीली पट्टियां जमाईं। निहारिका ने पूछा, “आप इतना समय क्यों दे रहे हैं?”
वीर ने दीवार पर धुंधले सूरज की तरफ देखते हुए कहा, “मीरा दीदी ने मुझे भी पढ़ाया था। जब मेरे पिता बीमार थे और मैं स्कूल छोड़ना चाहता था, उन्होंने ही मेरी फीस भरी। सेना में भर्ती होने का फॉर्म भी उन्होंने भरवाया। अगर वह नहीं होतीं, तो शायद मैं भी कहीं मजदूरी कर रहा होता।”
“फिर गांव स्कूल से इतना डरता क्यों है?” निहारिका ने पूछा।
वीर कुछ देर चुप रहा। “डर हमेशा हादसे से नहीं होता। कभी-कभी सच से भी होता है।”
“कौन सा सच?”
वीर ने सीधे जवाब नहीं दिया। “जिस दिन पानी आया था, स्कूल के पीछे की नाली महीनों से बंद थी। मीरा दीदी बार-बार पंचायत को लिख रही थीं कि बरसात से पहले मरम्मत करवा दीजिए। फाइल घूमती रही। पैसा मंजूर भी हुआ था, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ।”
निहारिका ने स्तब्ध होकर पूछा, “तो हादसा टल सकता था?”
“हाँ,” वीर ने भारी आवाज में कहा। “लेकिन किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली। सबने कहा— पहाड़ का कहर था।”
निहारिका के भीतर गुस्सा उठा। “और प्रधान जी?”
वीर ने उसकी तरफ देखा। “वह उस समय भी प्रधान थे।”
यह सुनकर निहारिका के मन में प्रधान जी के लिए एक नया सवाल जन्मा। क्या वह सिर्फ अपनी बहू के दुख से स्कूल बंद रखना चाहते थे, या अपने अपराध-बोध से भाग रहे थे?
उसी शाम तुषार स्कूल के बाहर आया। वह चुपचाप गेट पर खड़ा रहा। निहारिका ने उसे देखा, पर आवाज नहीं दी। वह समझ गई थी कि कुछ बच्चों को बुलाया नहीं जाता, उन्हें आने के लिए जगह दी जाती है।
तुषार ने मैदान में पड़े टूटे ग्लोब को उठाया। धूल साफ की। फिर एक कोने में बैठकर उसे घुमाने लगा। उसकी उंगली नक्शे पर कहीं रुकती, फिर आगे बढ़ जाती।
निहारिका उसके पास बैठी। “तुम्हारी मां भूगोल पढ़ाती थीं?”
तुषार ने हल्का सिर हिलाया।
“तुम्हें सबसे अच्छी जगह कौन सी लगती है?”
तुषार ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने ग्लोब पर उंगली से पहाड़ों वाले हिस्से को छुआ, फिर अपनी चिट्ठी निकालकर निहारिका को दी। उस पर मीरा की दूसरी लिखावट थी—
“तुषार को नक्शे पसंद हैं। वह कहता है एक दिन पहाड़ों के पार जाएगा और देखेगा कि दुनिया सच में गोल है या नहीं।”
निहारिका मुस्कुराई। “तो हम पहले धौलागढ़ को नक्शे पर वापस लाएंगे।”
अगले हफ्ते निहारिका ने पहला खुला पाठ रखा। उसने गांव में घर-घर जाकर कहा कि स्कूल में सिर्फ एक घंटे की कहानी होगी। कोई फीस नहीं, कोई दबाव नहीं। बस बच्चे आकर कहानी सुनें।
पहले दिन सिर्फ तीन बच्चे आए। एक पांच साल की बच्ची पायल, एक शरारती लड़का बिट्टू, और तुषार जो दरवाजे के पास बैठा रहा। निहारिका ने किताब खोली और कहानी शुरू की— एक बीज की कहानी जो पत्थर के नीचे दबा था, लेकिन उसने हार नहीं मानी।
दूसरे दिन सात बच्चे आए। तीसरे दिन बारह। चौथे दिन कुछ मांएं भी बरामदे से सुनने लगीं। स्कूल की सूनी दीवारों में धीरे-धीरे आवाज लौटने लगी।
लेकिन हर आवाज सबको अच्छी नहीं लगती।
एक शाम जब निहारिका स्कूल बंद कर रही थी, प्रधान जी आए। उनके साथ दो गांव वाले थे।
“ये तमाशा बंद कीजिए,” उन्होंने कहा।
“कहानी सुनाना तमाशा नहीं है,” निहारिका ने शांत स्वर में कहा।
“बच्चों को वहां बुलाना बंद कीजिए। अगर कुछ हो गया तो जिम्मेदार आप होंगी।”
“अगर हम हर डर से भागते रहे तो ये बच्चे जिंदगी भर कुछ नहीं सीखेंगे।”
प्रधान जी ने तेज आवाज में कहा, “आपको क्या पता हमने क्या खोया है?”
निहारिका पहली बार कठोर हुई। “मुझे यह नहीं पता कि आपने क्या खोया है। लेकिन इतना दिख रहा है कि आपने मीरा जी की आखिरी इच्छा भी खो दी है।”
प्रधान जी का चेहरा सफेद पड़ गया। “आप मीरा का नाम मत लीजिए।”
“क्यों? क्योंकि वह आपको याद दिलाती हैं कि स्कूल बंद नहीं होना चाहिए था? या इसलिए कि उन्होंने आपको मरम्मत के लिए चिट्ठियां लिखी थीं?”
यह सुनते ही माहौल जम गया। दोनों गांव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। प्रधान जी ने लाठी जमीन पर पटकी। “वीर ने बताया होगा। वह हमेशा से आग लगाता है।”
“सच आग नहीं लगाता,” निहारिका बोली। “सच बस धुआं हटाता है।”
प्रधान जी बिना कुछ कहे चले गए, लेकिन उस रात गांव में बात फैल गई कि नई मास्टरनी पुरानी फाइलें खोल रही है।
अगले दिन स्कूल के दरवाजे पर कोयले से लिखा मिला— “यहां पढ़ाई नहीं, मौत रहती है।”
निहारिका ने वह शब्द देखे। कुछ पल के लिए उसकी आंखें भर आईं। उसने सोचा था कि वह मजबूत है, पर इस तरह का विरोध उसे भीतर तक चोट पहुंचा गया। वह दीवार साफ करने लगी। तभी पीछे से छोटे-छोटे हाथों ने कपड़ा पकड़ लिया।
पायल, बिट्टू और बाकी बच्चे आ गए थे। वे चुपचाप दीवार साफ करने लगे। थोड़ी देर बाद तुषार भी आया। उसने पानी की बाल्टी उठाई और दीवार पर डाला। कोयले के शब्द धीरे-धीरे मिटने लगे।
निहारिका की आंखों में नमी आ गई। उसने बच्चों से कहा, “आज हम वर्णमाला नहीं पढ़ेंगे। आज हम दीवार साफ करेंगे और फिर उस पर कुछ नया लिखेंगे।”
बच्चों ने मिलकर दीवार पर रंगों से लिखा—
“हमारा स्कूल फिर खुलेगा।”
उस शाम गांव में पहली बार कुछ लोगों ने खुलकर निहारिका का साथ दिया। दो मांओं ने कहा कि उनके बच्चे पढ़ेंगे। एक बुजुर्ग ने पुरानी घंटी ला दी। किसी ने चटाई दी, किसी ने पानी का घड़ा। वीर ने बरामदे में लकड़ी की छोटी अलमारी बना दी।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव अभी बाकी था।
एक सप्ताह बाद निहारिका को पंचायत-कक्ष के बाहर एक पुराना डिब्बा मिला। उसमें मीरा की कई चिट्ठियां थीं। शायद किसी ने चुपके से रखी थीं। उनमें से एक चिट्ठी प्रधान जी के नाम थी। उसमें लिखा था—
“बाबूजी, अगर मुझे कुछ हो जाए तो स्कूल को दोष मत दीजिएगा। दोष उस चुप्पी को दीजिएगा जो खतरा देखकर भी बोलती नहीं। तुषार को पढ़ाई से दूर मत कीजिएगा। उसकी आवाज किताबों के बीच ही लौटेगी।”
निहारिका ने चिट्ठी पढ़ी और देर तक चुप रही।
उसे समझ आ गया कि यह लड़ाई सिर्फ स्कूल खोलने की नहीं थी। यह एक बच्चे की आवाज लौटाने की लड़ाई थी। यह एक मां की आखिरी इच्छा को सम्मान देने की लड़ाई थी। यह उस गांव को उसके अपराध-बोध से बाहर निकालने की लड़ाई थी।
अगली सुबह स्कूल की पुरानी घंटी बरामदे में टांगी गई। बच्चे मैदान में खड़े थे। कुछ माता-पिता भी आए थे। वीर दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था। प्रधान जी नहीं आए।
निहारिका ने तुषार की तरफ देखा। “घंटी तुम बजाओगे?”
तुषार ने घबराकर गर्दन झुका ली। हाथ कांप रहे थे। उसने रस्सी पकड़ी, फिर छोड़ दी। उसकी सांस तेज हो गई। निहारिका उसके पास आई और धीमे से बोली, “तुम्हारी मां ने लिखा था— पहली घंटी किसी बच्चे के हाथ से बजनी चाहिए। शिक्षक के हाथ से नहीं।”
तुषार ने आंखें बंद कीं। उसकी मुट्ठी में मीरा की चिट्ठी थी। उसने रस्सी पकड़ी और खींच दी।
घंटी की आवाज पहाड़ों में फैल गई।
उसी क्षण दूर प्रधान जी अपने घर के बरामदे में खड़े थे। आवाज उनके कानों तक पहुंची। उनका चेहरा कांप गया। वह कुर्सी पर बैठ गए और पहली बार खुलकर रो पड़े।
पर उसी शाम, जब सबको लगा कि अब रास्ता आसान होगा, आसमान फिर काला होने लगा। मौसम विभाग की चेतावनी आई— अगले चालीस घंटे भारी बारिश। पहाड़ी इलाकों में खतरा।
वीर ने स्कूल की छत देखते हुए कहा, “अगर बारिश बहुत बढ़ी तो गांव के नीचे वाले घरों को खाली कराना पड़ेगा।”
निहारिका ने मैदान में खेलते बच्चों को देखा। तुषार घंटी के पास खड़ा था। उसकी आंखों में डर लौट आया था।
पहाड़ फिर परीक्षा लेने वाला था।
और इस बार निहारिका को सिर्फ स्कूल नहीं, पूरे गांव को बचाना था।
बारिश ने रात होते-होते धौलागढ़ को पूरी तरह घेर लिया। पहाड़ों पर बादल ऐसे अटके थे जैसे किसी ने आसमान को गांव के ऊपर झुका दिया हो। हवा में नमी बढ़ती जा रही थी। टीन की छतों पर बूंदों की आवाज पहले धीमी थी, फिर तेज, फिर इतनी तेज कि लोगों को अपनी ही आवाज सुनाई नहीं दे रही थी।
निहारिका पंचायत-कक्ष में बैठी मौसम की सूचना सुन रही थी। मोबाइल नेटवर्क बार-बार जा रहा था। बाहर वीर टॉर्च लेकर नाली और रास्ते देख रहा था। गांव के नीचे वाले हिस्से में आठ-दस घर थे, जिनके पीछे पहाड़ी ढलान थी। वही ढलान पिछले साल स्कूल की तरफ पानी भेज चुकी थी।
निहारिका ने मन ही मन हिसाब लगाया। स्कूल ऊंचे हिस्से में था। उसकी दीवारें पुरानी जरूर थीं, लेकिन बरामदा मजबूत था। अगर नीचे के घर खाली कराने पड़े, तो बच्चों और औरतों को वहीं रखा जा सकता था।
रात के करीब दस बजे वीर भीगता हुआ अंदर आया। “नाला भर रहा है,” उसने कहा। “अगर दो घंटे बारिश ऐसे ही रही तो नीचे वाले घरों में पानी घुस जाएगा।”