भाग 3
“लोगों को निकालना होगा,” निहारिका ने तुरंत कहा।
वीर ने सिर हिलाया। “मैंने कहा है, पर कई लोग घर छोड़ना नहीं चाहते। उन्हें लगता है सामान चोरी हो जाएगा।”
“जान बचेगी तो सामान फिर आ जाएगा,” निहारिका ने शॉल उठाते हुए कहा।
दोनों टॉर्च लेकर बाहर निकले। बारिश चेहरे पर सुइयों की तरह चुभ रही थी। रास्ता कीचड़ से फिसलन भरा हो चुका था। वे एक-एक घर जाकर दरवाजे खटखटाने लगे।
“ऊपर स्कूल में चलिए,” निहारिका लोगों से कहती। “बस रात भर की बात है।”
कुछ लोग मान गए। कुछ ने कहा, “हर साल बारिश होती है, कुछ नहीं होगा।” एक बुजुर्ग ने नाराज होकर कहा, “शहर से आई लड़की हमें पहाड़ समझाएगी?”
निहारिका ने जवाब नहीं दिया। उसने बस उनकी बहू की गोद में सोते बच्चे की तरफ देखा और कहा, “मैं पहाड़ नहीं समझा रही। बच्चों को सुरक्षित जगह ले जाने को कह रही हूं।”
धीरे-धीरे लोग तैयार होने लगे। महिलाएं जल्दी-जल्दी कंबल, दवाई और बच्चों के कपड़े समेटने लगीं। वीर ने दो लड़कों को भेजा कि वे स्कूल का बरामदा खोलें। निहारिका ने बच्चों को संभाला। पायल रो रही थी। बिट्टू बहादुर बनने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके हाथ ठंड से कांप रहे थे।
उसी समय तुषार वहां आया। वह भीग चुका था। शायद घर से चुपके निकला था। उसके हाथ में मीरा की चिट्ठी थी, जिसे उसने प्लास्टिक में लपेट रखा था।
“तुषार, तुम यहां क्यों आए?” निहारिका ने चिंता से पूछा।
वह कुछ नहीं बोला। उसने नीचे की तरफ इशारा किया। वहां प्रधान जी का पुराना अनाज-घर था, जिसके पीछे ढलान सबसे ज्यादा कमजोर थी।
वीर ने टॉर्च मारी। मिट्टी के एक हिस्से से पानी तेज धार बनकर निकल रहा था।
“यह अच्छा संकेत नहीं है,” वीर ने कहा। “सबको तुरंत ऊपर ले चलो।”
निहारिका ने आवाज लगाई। लोग तेज कदमों से स्कूल की ओर बढ़ने लगे। बारिश, अंधेरा और डर— तीनों एक साथ गांव पर टूट पड़े थे। कुछ बच्चे फिसले, किसी की चप्पल कीचड़ में धंस गई, एक बुजुर्ग महिला सांस फूलने से रुक गई। निहारिका ने उसे सहारा दिया। वीर ने एक बच्चे को कंधे पर उठा लिया। तुषार चुपचाप रास्ता दिखाता रहा।
स्कूल में पहुंचते-पहुंचते आधी रात हो चुकी थी। बरामदे में लालटेन जलाई गईं। बच्चों को अंदर बैठाया गया। महिलाएं भीगी साड़ियां निचोड़ रही थीं। कुछ आदमी बाहर पानी की दिशा देख रहे थे। स्कूल की पुरानी दीवारों में आज एक अलग गर्माहट थी। जिस जगह को लोग मौत की याद मानते थे, वही आज उनके लिए शरण बन गई थी।
निहारिका ने बच्चों को शांत करने के लिए कहानी शुरू की। उसकी आवाज बारिश की आवाज में दब रही थी, लेकिन बच्चे उसे ध्यान से सुन रहे थे।
“एक पहाड़ था,” उसने कहा, “जो सोचता था कि वह बहुत अकेला है। फिर एक दिन बारिश आई, नदी आई, पेड़ आए, लोग आए… और उसे समझ आया कि अकेलापन कभी-कभी बस इंतजार का दूसरा नाम होता है।”
तुषार दरवाजे के पास खड़ा था। उसकी नजर बाहर अंधेरे में थी।
तभी तेज आवाज हुई। जैसे कहीं भारी पत्थर गिरा हो। स्कूल के अंदर बैठे लोग सहम गए। वीर बाहर भागा। निहारिका भी पीछे गई। टॉर्च की रोशनी में दिखा कि नीचे की तरफ मिट्टी खिसक चुकी थी। दो छोटे घरों की पिछली दीवारों पर मलबा आ गिरा था। अगर लोग वहां होते, तो बड़ा हादसा हो सकता था।
वीर ने भारी सांस लेते हुए कहा, “समय पर निकल आए।”
निहारिका ने आंखें बंद कर भगवान का धन्यवाद किया।
लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ था। पानी अब स्कूल के पीछे वाले पुराने नाले की तरफ मुड़ रहा था। वही नाला जो पिछले हादसे की वजह बना था। वीर ने कहा, “अगर यह भर गया तो पानी मैदान में आएगा। अंदर तक नहीं आएगा शायद, लेकिन बरामदा भर सकता है।”
“क्या कर सकते हैं?” निहारिका ने पूछा।
“पीछे की रुकावट हटानी होगी। पत्थर और पत्तों से पानी अटक रहा है।”
“अंधेरे में?”
“करना पड़ेगा।”
कुछ गांव वाले डर रहे थे। पिछले साल का डर उनकी हड्डियों में बैठा था। प्रधान जी भी स्कूल पहुंचे थे। उनका चेहरा भीगा और थका हुआ था। उन्होंने स्थिति देखी और पहली बार बिना गुस्से के कहा, “नाले के पास मत जाओ। वही जगह खतरनाक है।”
वीर ने कहा, “अगर नहीं गए तो पानी इधर आएगा।”
प्रधान जी चुप हो गए।
निहारिका ने उनकी तरफ देखा। “पिछली बार गलती चुप्पी की थी। इस बार हम चुप नहीं रहेंगे।”
यह बात प्रधान जी के दिल में सीधे लगी। उनकी आंखों में दर्द उभरा। उन्होंने लाठी एक तरफ रखी और कहा, “मैं चलूंगा।”
वीर ने रोका, “आपकी उम्र—”
“यह बोझ उम्र से बड़ा है,” प्रधान जी ने कहा।
चार आदमी, वीर, प्रधान जी और निहारिका स्कूल के पीछे गए। बारिश में टॉर्च की रोशनी डगमगा रही थी। नाला पत्तों, टूटे टहनियों और पत्थरों से भर चुका था। पानी रुककर उफन रहा था। सबने मिलकर रास्ता साफ करना शुरू किया। हाथ कीचड़ से भर गए। पत्थर भारी थे। पानी का दबाव बढ़ रहा था।
तभी ऊपर से एक मोटी टहनी बहकर आई और प्रधान जी फिसल गए। वीर ने उन्हें पकड़ लिया, लेकिन उसी समय निहारिका का पैर कीचड़ में धंस गया। वह गिरते-गिरते बची। पानी की आवाज कान फाड़ रही थी।
स्कूल के बरामदे से बच्चे और औरतें यह सब देख रहे थे। तुषार भी वहीं था। वह कांप रहा था। उसकी आंखों में पिछले साल का दृश्य लौट आया था— मां पानी में फंसी हुई, लोग भागते हुए, आवाजें, चीखें, और फिर सन्नाटा।
उसने अपने कान बंद कर लिए। सांस तेज हो गई। पायल ने उसका हाथ पकड़ा, “भैया…”
तुषार ने आंखें खोलीं। उसने देखा कि निहारिका नाले के पास झुकी हुई है और पानी का रुख बदलने की कोशिश कर रही है। उसे अचानक अपनी मां की पीठ याद आई— वही हिम्मत, वही जिद।
पानी की तेज धार एक बड़े पत्थर से अटकी थी। वीर उसे हटाने की कोशिश कर रहा था, पर उसे दूसरी तरफ से सहारा चाहिए था। निहारिका ने हाथ बढ़ाया, लेकिन वह जगह बहुत फिसलन भरी थी। प्रधान जी ने आवाज लगाई, “मत जाओ!”
निहारिका रुकी नहीं।
तभी तुषार भागा।
वह बरामदे से नीचे उतरा, कीचड़ में फिसलता हुआ पीछे की तरफ दौड़ा। प्रधान जी ने उसे देखा और चीखे, “तुषार!”
वह नहीं रुका। वह सीधे नाले के पास पहुंचा और पूरी ताकत से हाथ उठाकर इशारा करने लगा। पर बारिश और शोर में कोई उसका इशारा समझ नहीं पाया।
उसके होंठ कांप रहे थे। गला जैसे वर्षों से बंद पड़ा था। उसने कोशिश की। आवाज नहीं निकली। उसने फिर कोशिश की। आंखों से आंसू बहने लगे। सामने पानी था, अंधेरा था, और फिर वही डर था जिसने उसकी आवाज छीन ली थी।
तभी निहारिका का पैर फिर फिसला।
और उसी क्षण तुषार के भीतर कुछ टूट गया।
“रुको!”
आवाज छोटी थी, टूटी हुई थी, लेकिन आवाज थी।
सब रुक गए।
प्रधान जी ने टॉर्च तुषार की तरफ घुमाई। उनकी आंखें फैल गईं।
तुषार कांपते हुए बोला, “पत्थर… नीचे से मत हटाओ… ऊपर वाली लकड़ी पहले निकालो… पानी सीधा आएगा…”
उसकी आवाज रुक-रुककर निकल रही थी, लेकिन हर शब्द साफ था।
वीर ने तुरंत टॉर्च ऊपर की तरफ मारी। सचमुच एक मोटी लकड़ी पानी को तिरछा रोक रही थी। अगर नीचे का पत्थर पहले हटता, तो पानी का दबाव सीधे उनकी तरफ आता। वीर ने दिशा बदली। दो लोगों ने लंबी डंडी से लकड़ी को हटाया। पानी का रास्ता अचानक खुला और तेज धार नाले से नीचे की ओर निकल गई। कुछ ही मिनटों में उफनता पानी कम होने लगा।
बारिश अब भी थी, लेकिन खतरा टल गया था।
प्रधान जी धीरे-धीरे तुषार के पास आए। उनके होंठ कांप रहे थे। “तू… तू बोला…”
तुषार ने दादा की तरफ देखा। उसकी आंखों में डर, गुस्सा, दर्द और राहत सब मिला हुआ था। वह बोला, “मां ने कहा था… स्कूल बंद मत करना…”
प्रधान जी जैसे वहीं टूट गए। उन्होंने तुषार को सीने से लगा लिया और रो पड़े। “मुझे माफ कर दे बेटा… मैं मीरा को नहीं बचा पाया… फिर उसके सपने से भी भागता रहा…”
तुषार पहली बार दादा के सीने से लगकर रोया। उसकी रुलाई में एक साल की चुप्पी बह रही थी।
सुबह तक बारिश धीमी हो गई। धौलागढ़ धुला हुआ लग रहा था। नीचे के दो घरों को नुकसान हुआ था, लेकिन कोई जान नहीं गई। लोग स्कूल के बरामदे में बैठे थे। रात की थकान चेहरों पर थी, पर आंखों में एक अलग चमक थी। जिस स्कूल को अपशकुनी कहा गया था, उसने पूरी रात गांव को बचाया था।
प्रधान जी सबके सामने खड़े हुए। उनकी आवाज भारी थी।
“मैंने गलती की। मीरा की चिट्ठियां मैंने छिपाईं। क्योंकि हर चिट्ठी मुझे मेरी कमी याद दिलाती थी। स्कूल की मरम्मत मैंने समय पर नहीं करवाई। हादसे के बाद मैंने स्कूल को दोष दिया ताकि खुद को दोष न देना पड़े। लेकिन कल रात अगर यह स्कूल न होता, अगर मास्टरनी जी और वीर न होते, अगर तुषार हमें न रोकता… तो हम फिर वही गलती दोहराते।”
गांव में सन्नाटा था।
प्रधान जी ने निहारिका की तरफ मुड़कर कहा, “आज से यह स्कूल सिर्फ खुलेगा नहीं, हम सब मिलकर इसे बनाएंगे। मीरा का सपना अब किसी ताले में नहीं रहेगा।”
उस दिन से धौलागढ़ बदलने लगा। बदलाव बहुत तेज नहीं था, लेकिन सच्चा था। लोग रोज थोड़ा-थोड़ा काम करने लगे। किसी ने दीवारों पर चूना किया। किसी ने मैदान की झाड़ियां काटीं। वीर ने प्राथमिक उपचार का छोटा कोना बनाया। निहारिका ने पुस्तकालय के लिए पुराने अखबारों में अपील लिखी। देहरादून से किताबें आईं, फिर अल्मोड़ा से, फिर किसी ने दिल्ली से बच्चों की कहानियों का डिब्बा भेजा।
स्कूल की एक कक्षा का नाम रखा गया— “मीरा कक्ष।”
उस कमरे की दीवार पर मीरा की चिट्ठी फ्रेम में लगाई गई—
“स्कूल इमारत नहीं होता, बच्चों की आवाज होता है।”
तुषार अब रोज स्कूल आता था। शुरुआत में उसकी आवाज धीमी रहती, जैसे कोई पुराना वाद्य फिर से सुर पकड़ रहा हो। लेकिन धीरे-धीरे वह बच्चों को नक्शे दिखाने लगा। वह पायल को बताता कि समुद्र कहां होता है, बिट्टू को बताता कि रेल की पटरियां पहाड़ों से कैसे निकलती हैं। कभी-कभी वह अटकता, तो निहारिका उसे जल्दी नहीं करती। वह जानती थी कि हर लौटती आवाज को समय चाहिए।
कुछ महीने बाद स्कूल का औपचारिक उद्घाटन हुआ। अधिकारी आए, गांव वाले आए, बच्चे साफ कपड़ों में आए। मंच बहुत बड़ा नहीं था। बस मैदान में चटाइयां बिछी थीं, फूलों की माला थी, और बरामदे में वही पुरानी घंटी थी।
लोग चाहते थे कि निहारिका भाषण दे। उसने माइक लिया, लेकिन बहुत लंबा नहीं बोली।
“मैं यहां नौकरी करने आई थी,” उसने कहा। “मुझे लगा था कि मैं बच्चों को पढ़ाऊंगी। लेकिन इस गांव ने मुझे सिखाया कि पढ़ाई सिर्फ किताबों से नहीं होती। गलती स्वीकार करना भी शिक्षा है। डर के बावजूद हाथ बढ़ाना भी शिक्षा है। और किसी की आखिरी इच्छा को जिंदा रखना भी शिक्षा है।”
उसने माइक तुषार को दिया।
भीड़ में हलचल हुई। प्रधान जी की आंखें भर आईं। वीर मुस्कुरा रहा था।
तुषार ने कागज़ खोला। उसके हाथ हल्के कांप रहे थे, लेकिन इस बार वह भागा नहीं। उसने पढ़ना शुरू किया—
“मेरी मां कहती थीं कि पहाड़ स्थिर होते हैं, पर इनके भीतर भी रास्ते चलते रहते हैं। मैं पहले सोचता था कि मेरी आवाज खो गई है। फिर मुझे समझ आया कि आवाज खोती नहीं, कभी-कभी दुख के नीचे दब जाती है। उसे वापस बुलाने के लिए किसी एक इंसान का भरोसा काफी होता है।”
निहारिका की आंखें नम हो गईं।
तुषार ने आगे पढ़ा, “मैं बड़ा होकर नक्शे बनाऊंगा। ऐसे नक्शे जिनमें धौलागढ़ छोटा बिंदु नहीं होगा। उसमें हमारा स्कूल भी होगा, हमारी घंटी भी, और मीरा कक्ष भी।”
तालियां गूंज उठीं। पहाड़ों ने जैसे वह आवाज दूर तक पहुंचा दी।
उस शाम निहारिका स्कूल की सीढ़ियों पर बैठी थी। सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था। आसमान गुलाबी और सुनहरा हो गया था। वीर उसके पास आया और दो कप बुरांश की चाय रखी।
“शहर वापस जाने का मन करता है?” उसने पूछा।
निहारिका ने दूर बच्चों को खेलते देखा। तुषार पायल को ग्लोब पर कुछ समझा रहा था। प्रधान जी बरामदे की टूटी रेलिंग ठीक कर रहे थे।
“पहले लगता था कि मैं यहां अपने दुख से भागकर आई हूं,” निहारिका ने कहा। “अब लगता है कि शायद मैं यहां किसी अधूरे वादे को पूरा करने आई थी।”
वीर ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी पहाड़ बुलाते नहीं, रोक लेते हैं।”
निहारिका ने चाय का कप हाथ में लिया। हवा ठंडी थी, लेकिन भीतर एक गहरी गर्माहट थी। उसे पहली बार लगा कि घर हमेशा वह जगह नहीं होता जहां हम जन्म लेते हैं। घर कभी-कभी वह जगह बन जाता है जहां हमारे टूटे हिस्से किसी और की उम्मीद से जुड़ जाते हैं।
रात होने लगी। स्कूल की घंटी हवा से हल्की सी हिली और धीमे से बज उठी। उसकी आवाज में अब डर नहीं था। उसमें बच्चों की हंसी थी, मीरा की याद थी, तुषार की लौटी हुई आवाज थी, और निहारिका की नई शुरुआत थी।
धौलागढ़ के पहाड़ों के पार सुबह आ चुकी थी।
और इस बार वह सुबह सिर्फ सूरज की नहीं, पूरे गांव की थी।