Crime Story

जिस पत्नी को अरबपति ने अपनी पूरी कंपनी सौंपनी चाही, वही निकली सबसे बड़ी धोखेबाज़

WATCH THE STORY

वीडियो में पूरी कहानी देखें

RATE THIS STORY

इस कहानी को रेट करें

0.0/5 · 0 रेटिंग

SHARE THE STORY

यह कहानी किसी अपने के साथ साझा करें

7 बार पढ़ी गई
Whatsapp Telegram
कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

आरव सिंघानिया एक सफल अरबपति था, जिसके पास दौलत, प्रतिष्ठा और एक विशाल व्यापारिक साम्राज्य था। लेकिन उसके लिए इन सबसे अधिक कीमती थी उसकी पत्नी मेहर, जिससे वह अपनी जिंदगी से भी ज्यादा प्यार करता था।

मेहर के प्रेम पर भरोसा करते हुए आरव अपनी कंपनी के बड़े हिस्से के अधिकार उसके नाम करने वाला था। मगर हस्ताक्षर से कुछ दिन पहले एक दुर्घटना के कारण उसकी मुलाकात एक अनजान व्यक्ति से हुई। उस व्यक्ति की कलाई पर आरव ने वही विशेष घड़ी देखी, जो मेहर ने उसे यह कहकर दी थी कि दुनिया में ऐसी दूसरी घड़ी नहीं है।

घड़ी के पीछे लिखा संदेश भी बिल्कुल वही था।

यहीं से आरव की खूबसूरत प्रेम कहानी एक दर्दनाक रहस्य में बदल जाती है। सच की तलाश में उसे पता चलता है कि मेहर विवाह से पहले ही किसी और से प्रेम करती थी और उसने आरव से शादी केवल उसकी दौलत तथा कंपनी पर अधिकार पाने के लिए की थी।

लेकिन दोस्तों, कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। जिस प्रेमी के लिए मेहर ने अपने पति को धोखा दिया, वह भी उसके लिए एक ऐसी योजना बना चुका था, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी।

क्या आरव अपनी कंपनी और सम्मान बचा पाएगा?
क्या वह मेहर को क्षमा करेगा?
और जन्मदिन के समारोह में रखे गए कागजों में आखिर ऐसा क्या था, जिसने पूरी साजिश पलट दी?

पढ़ना शुरू करें ↓
आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 54 मिनट

भाग 1

मुंबई की उस सुबह में भी वही भागदौड़ थी, जो हर दिन शहर की पहचान बनकर सड़कों पर उतर आती थी। समुद्र के किनारे बने ऊँचे काँच के भवनों पर सूरज की हल्की किरणें पड़ रही थीं और शहर की सबसे ऊँची इमारतों में से एक के ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—सिंघानिया समूह।

इस विशाल व्यापारिक साम्राज्य का मालिक था आरव सिंघानिया।

उम्र लगभग बयालीस वर्ष, लंबा कद, शांत चेहरा और ऐसी गहरी आँखें, जिन्हें देखकर लोग अक्सर समझ नहीं पाते थे कि उनके पीछे क्या चल रहा है। व्यापार की दुनिया में आरव का नाम सम्मान के साथ-साथ थोड़े डर से भी लिया जाता था। वह निर्णय लेने में कभी देर नहीं करता था। करोड़ों की परियोजना हो या किसी पुराने विभाग को बंद करने का कठिन फैसला, उसकी आवाज कभी काँपती नहीं थी।

लेकिन दोस्तों, हर मजबूत दिखाई देने वाला इंसान भीतर से उतना ही मजबूत हो, यह जरूरी नहीं होता।

आरव की जिंदगी में एक खालीपन था, जिसे उसकी दौलत कभी भर नहीं सकी।

जब आरव केवल बारह साल का था, तभी उसकी माँ सविता सिंघानिया का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था। उसकी माँ ही उसके जीवन में एकमात्र ऐसी व्यक्ति थीं, जिन्होंने उसे बिना किसी अपेक्षा के प्रेम किया था। आरव के पिता महेंद्र सिंघानिया व्यापार के प्रति इतने कठोर थे कि उनके लिए भावनाएँ भी किसी सौदे की तरह थीं।

माँ के जाने के बाद आरव का बचपन अचानक समाप्त हो गया।

जिस उम्र में बच्चे अपने दोस्तों के साथ खेलते हैं, उस उम्र में आरव अपने पिता के कार्यालय में बैठकर हिसाब की पुरानी किताबें देखा करता था। उसे सिखाया गया कि किसी पर भरोसा मत करो, किसी के सामने कमजोर मत पड़ो और किसी को इतना अधिकार मत दो कि वह तुम्हें चोट पहुँचा सके।

आरव ने ये सभी बातें सीख लीं।

बस एक बात नहीं सीख पाया—अकेलेपन के साथ कैसे जिया जाए।

समय बीतता गया। महेंद्र सिंघानिया की मृत्यु के बाद आरव ने बिखरते हुए व्यापार को न केवल संभाला, बल्कि उसे देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में शामिल कर दिया। उसके पास निजी विमान था, समुद्र किनारे विशाल घर था, कई देशों में संपत्तियाँ थीं और उसके एक संकेत पर सैकड़ों लोग काम में लग जाते थे।

फिर भी जब वह रात में अपने विशाल शयनकक्ष में लौटता, तो कमरे की खामोशी उसे अपनी माँ की अनुपस्थिति और भी गहराई से महसूस कराती थी।

फिर उसकी जिंदगी में मेहर आई।

उनकी पहली मुलाकात दिल्ली में आयोजित एक परोपकारी समारोह में हुई थी। आरव उस समारोह का मुख्य अतिथि था। कार्यक्रम अनाथ बच्चों की शिक्षा के लिए धन इकट्ठा करने हेतु आयोजित किया गया था।

आरव मंच से उतरकर एक तरफ खड़ा कुछ लोगों से बात कर रहा था, तभी एक छोटी बच्ची दौड़ते हुए उससे टकरा गई। बच्ची के हाथ में रखा रस आरव के महँगे वस्त्रों पर गिर गया।

सुरक्षा कर्मचारी तुरंत बच्ची की ओर बढ़े, लेकिन उससे पहले मेहर वहाँ पहुँच गई।

उसने बच्ची को अपने पीछे किया और आरव की ओर देखकर बोली, “गलती से हुआ है। इसे डाँटने की जरूरत नहीं है।”

सुरक्षा कर्मचारियों ने उसकी ओर ऐसे देखा, जैसे किसी ने राजा के सामने ऊँची आवाज में बोलने का अपराध कर दिया हो।

लेकिन आरव चुप रहा।

मेहर ने अपने रूमाल से आरव के वस्त्र साफ करने की कोशिश की, फिर अचानक रुककर बोली, “वैसे ये दाग उतर जाएगा। लेकिन अगर बच्ची डर गई, तो शायद उसका डर जल्दी नहीं जाएगा।”

आरव ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

सादे सफेद वस्त्र, बिना किसी भारी आभूषण के, चेहरे पर आत्मविश्वास और आँखों में ऐसी सहजता, जैसे उसे सामने खड़े व्यक्ति की दौलत या पद का कोई प्रभाव ही न पड़ा हो।

वह मुस्कुराया और सुरक्षा कर्मचारियों को पीछे हटने का संकेत दिया।

उस छोटी-सी घटना के बाद मेहर और आरव की बातचीत शुरू हुई। मेहर ने बताया कि वह उस संस्था के साथ स्वयंसेवक के रूप में काम करती है। वह बच्चों को संगीत और चित्रकला सिखाती है।

आरव ने उसे देखकर कहा, “आपको पता है, लोग मुझसे बात करते समय शब्द चुनते हैं।”

मेहर मुस्कुराई। “शायद उन्हें डर होता होगा कि कहीं गलत शब्द की कीमत न चुकानी पड़े।”

“और आपको डर नहीं लगा?”

“नहीं। मुझे लगा कि आपके वस्त्रों से ज्यादा जरूरी उस बच्ची का चेहरा है।”

उस रात आरव अपने घर लौटते समय पहली बार किसी अनजान स्त्री के बारे में सोच रहा था।

दोस्तों, कभी-कभी हमारे जीवन में कोई व्यक्ति अचानक आता है और हमें लगता है कि हम उसे बहुत पहले से जानते हैं। आरव के साथ भी यही हुआ।

अगले कुछ महीनों में उनकी मुलाकातें बढ़ने लगीं। शुरुआत में वे संस्था के काम को लेकर मिलते थे। फिर कभी भोजन के लिए, कभी किसी कला प्रदर्शनी में और कभी केवल समुद्र किनारे टहलने के लिए।

मेहर आरव से उसकी दौलत के बारे में बहुत कम पूछती थी। वह उससे उसकी माँ के बारे में पूछती, उसके बचपन के बारे में पूछती और कभी-कभी ऐसी बातें पूछती, जिनका उत्तर आरव ने स्वयं से भी नहीं माँगा था।

एक शाम समुद्र किनारे बैठते हुए मेहर ने पूछा, “आपको सबसे ज्यादा डर किस बात से लगता है?”

आरव हँस पड़ा। “मेरे बारे में कहा जाता है कि मुझे किसी बात का डर नहीं लगता।”

“दुनिया जो कहती है, मैं वह नहीं पूछ रही।”

आरव कुछ देर चुप रहा।

फिर धीमे स्वर में बोला, “मुझे डर है कि एक दिन मेरी जिंदगी समाप्त हो जाएगी और मुझे पता चलेगा कि मेरे पास सब कुछ था, बस कोई अपना नहीं था।”

मेहर ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं। उसने केवल अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया।

वह साधारण-सा स्पर्श आरव के लिए किसी बड़े वादे जैसा था।

धीरे-धीरे आरव ने अपने भीतर बंद सभी दरवाजे मेहर के लिए खोल दिए। उसने उसे अपनी माँ का कमरा दिखाया, जिसे उनकी मृत्यु के बाद लगभग वैसा ही रखा गया था। उसने उसे अपनी पुरानी डायरी पढ़ने दी। उसने वह छोटा लकड़ी का डिब्बा भी दिखाया, जिसमें उसकी माँ की चूड़ियों के कुछ टूटे हुए टुकड़े रखे थे।

मेहर ने हर बात को बहुत ध्यान से सुना।

जब आरव अपनी माँ के बारे में बताते हुए भावुक हुआ, तो उसने उसके आँसू पोंछे और कहा, “तुम्हें हर समय मजबूत बनने की जरूरत नहीं है। कम से कम मेरे सामने तो नहीं।”

यही वह वाक्य था, जिसने आरव का दिल पूरी तरह जीत लिया।

कुछ महीनों बाद आरव ने मेहर को विवाह का प्रस्ताव दिया।

वह कोई बहुत भव्य दृश्य नहीं था। न हजारों फूल थे, न बड़ी सभा और न ही समाचार माध्यम। आरव उसे अपनी माँ के पुराने घर में ले गया था। घर के आँगन में वही अमलतास का पेड़ था, जिसके नीचे वह बचपन में बैठा करता था।

आरव ने एक छोटी-सी अंगूठी निकालकर कहा, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे उस चीज के लिए स्वीकार करो, जो इन सबके पीछे है। एक ऐसा आदमी, जिसे अब भी कभी-कभी रात में अकेलेपन से डर लगता है।”

मेहर की आँखें नम हो गईं।

उसने हाँ कह दी।

उनका विवाह पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। बड़े उद्योगपति, प्रसिद्ध कलाकार, राजनेता और विदेशी मेहमान समारोह में आए। लेकिन आरव के लिए उस दिन भीड़ में केवल एक चेहरा मायने रखता था—मेहर का।

विवाह के बाद आरव सचमुच बदल गया।

पहले वह रात के दो बजे तक कार्यालय में रहता था। अब वह शाम को घर लौटने की कोशिश करता। पहले उसके घर में त्योहार केवल कर्मचारियों के लिए आयोजित कार्यक्रम हुआ करते थे। अब मेहर स्वयं दीये सजाती, रंगोली बनाती और आरव को हर रस्म में शामिल करती।

कभी वह उसकी आँखों पर हाथ रखकर रसोई तक ले जाती और कहती, “आज मैंने तुम्हारे लिए कुछ बनाया है।”

आरव जानता था कि मेहर अच्छा भोजन नहीं बना पाती, फिर भी वह हर बार पूरे उत्साह से खाता।

एक दिन उसने नमक के स्थान पर चीनी डाल दी थी। आरव ने बिना शिकायत पूरा व्यंजन खा लिया।

जब मेहर को अपनी गलती पता चली, तो वह हँसते-हँसते बोली, “तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

आरव ने कहा, “तुमने पहली बार मेरे लिए कुछ बनाया था। मैं उस याद को शिकायत से खराब नहीं करना चाहता था।”

मेहर ने उसे गले लगा लिया।

आरव के लिए यही प्रेम था।

छोटी-छोटी बातें, जो उसे यह विश्वास दिलाती थीं कि कोई व्यक्ति उसे उसके पद से नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व से प्रेम करता है।

उनकी शादी को तीन साल पूरे होने वाले थे।

मेहर ने उस अवसर पर आरव के लिए एक विशेष घड़ी बनवाई। गहरे नीले रंग की पट्टी, चाँदी के किनारे और भीतर बहुत बारीक नक्काशी। घड़ी के पीछे एक पंक्ति लिखी थी—

“जिंदगी हमें कहीं भी ले जाए, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास लौटेगा।”

मेहर ने घड़ी आरव की कलाई पर बाँधते हुए कहा, “पूरी दुनिया में ऐसी केवल एक घड़ी है।”

आरव लंबे समय तक उस घड़ी को देखता रहा।

“तुम्हें पसंद नहीं आई?” मेहर ने पूछा।

आरव ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में नमी थी।

“मुझे उपहार से ज्यादा उस पर लिखा वादा पसंद आया है।”

उसने मेहर को बाँहों में भर लिया।

उस दिन से आरव ने वह घड़ी लगभग हर समय पहननी शुरू कर दी। बड़ी से बड़ी बैठक हो, विदेश यात्रा हो या किसी कारखाने का निरीक्षण, वह घड़ी उसकी कलाई पर रहती।

व्यापार की दुनिया में लोग कई बार उसकी महँगी घड़ी की प्रशंसा करते। वह गर्व से कहता, “यह मेरी पत्नी ने दी है। ऐसी दूसरी कहीं नहीं मिलेगी।”

अब कहानी में थोड़ा और गहराई से उतरते हैं, दोस्तों।

मेहर बाहर से आरव की आदर्श पत्नी थी। वह उसके हर कार्यक्रम में साथ खड़ी रहती। कर्मचारियों के परिवारों से मिलती। समाजसेवा के कार्यों में भाग लेती। आरव के पुराने मित्रों का सम्मान करती और उसके पिता की बरसी पर स्वयं सारी व्यवस्था संभालती।

लेकिन कुछ रिश्ते बाहर से जितने सुंदर दिखाई देते हैं, भीतर से उतने ही खोखले हो सकते हैं।

मेहर के जीवन में आरव से पहले कोई और था।

उसका नाम था रिषभ खन्ना।

रिषभ और मेहर की मुलाकात महाविद्यालय के दिनों में हुई थी। रिषभ आकर्षक, महत्वाकांक्षी और बहुत चतुर था। उसके पास बड़े सपने थे, लेकिन उन्हें पूरा करने का धैर्य नहीं था। वह जल्दी पैसा कमाना चाहता था, जल्दी प्रभावशाली बनना चाहता था और उसे विश्वास था कि वह किसी भी व्यक्ति को अपनी बातों में फँसा सकता है।

मेहर उससे बहुत प्रेम करती थी।

दोनों ने साथ जीने की कसमें खाई थीं। लेकिन जब पढ़ाई समाप्त हुई, तो वास्तविक जीवन उनके सामने खड़ा था। रिषभ के छोटे-मोटे व्यापार लगातार असफल हो रहे थे। उस पर ऋण बढ़ता जा रहा था।

एक दिन उसने मेहर से कहा, “प्रेम से घर नहीं चलता। हमें कुछ बड़ा करना होगा।”

उसी समय उसे पता चला कि आरव सिंघानिया एक सामाजिक संस्था के कार्यक्रम में आने वाला है।

रिषभ ने योजना बनाई।

मेहर को कार्यक्रम में जाना था। उसे आरव का ध्यान अपनी ओर खींचना था। फिर धीरे-धीरे उसके जीवन में स्थान बनाना था।

शुरुआत में मेहर ने विरोध किया।

“मैं किसी अनजान आदमी की भावनाओं से नहीं खेल सकती,” उसने कहा था।

रिषभ ने उसका हाथ पकड़कर समझाया, “तुम्हें हमेशा उसके साथ थोड़े ही रहना है। बस कुछ वर्ष। जब सही समय आएगा, तुम उसकी संपत्ति में अपना हिस्सा लेकर अलग हो जाना। फिर हम दोनों हमेशा के लिए साथ रहेंगे।”

मेहर ने पूछा, “और अगर वह मुझसे सच में प्रेम करने लगा तो?”

रिषभ हँसा। “उस जैसे लोग किसी से प्रेम नहीं करते। उन्हें केवल अधिकार चाहिए होता है।”

मेहर ने रिषभ की बात मान ली।

आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 54 मिनट

भाग 2

रस गिराने वाली बच्ची की घटना भी संयोग नहीं थी।

उस संस्था में काम करने वाली एक महिला को पैसे देकर बच्ची को आरव की ओर भेजा गया था। मेहर को उसी क्षण सामने आना था, ताकि आरव उसे भीड़ से अलग समझे।

फिर मेहर ने धीरे-धीरे आरव की पसंद, आदतों और कमजोरियों के बारे में जानकारी जुटाई। उसने उसके पुराने कर्मचारियों से बात की। समाचारों में दिए उसके साक्षात्कार पढ़े। उसकी माँ के बारे में जाना और यह समझ लिया कि आरव के भीतर सबसे गहरा घाव अकेलेपन का है।

उसने उसी घाव को छुआ।

और आरव ने उसे प्रेम समझ लिया।

विवाह के बाद भी मेहर और रिषभ का संबंध समाप्त नहीं हुआ। वे छिपकर मिलते रहे। रिषभ ने अलग नाम से एक छोटा मकान लिया था, जहाँ मेहर उससे मिलने जाती थी।

आरव को लगता था कि मेहर समाजसेवा की बैठकों में जा रही है।

कई बार जब आरव विदेश यात्रा पर होता, रिषभ उसी घर के पास आ जाता, जिसे आरव ने अपने प्रेम से सजाया था।

फिर भी मेहर सावधान थी। उसने कभी ऐसी गलती नहीं की, जिससे आरव को शक हो।

तीन वर्षों तक सब कुछ योजना के अनुसार चलता रहा।

फिर एक दिन आरव ने ऐसा निर्णय लिया, जिसका रिषभ और मेहर लंबे समय से इंतजार कर रहे थे।

आरव ने अपने सबसे पुराने मित्र और कानूनी सलाहकार देव मल्होत्रा को कार्यालय में बुलाया।

देव बचपन से आरव को जानता था। वह उन कुछ लोगों में से था, जो उससे बिना डरे सच बोल सकते थे।

आरव ने उसके सामने कुछ कागज रखे।

“मैं कंपनी के चालीस प्रतिशत मतदान अधिकार मेहर के नाम करना चाहता हूँ।”

देव ने चौंककर उसकी ओर देखा।

“चालीस प्रतिशत?”

“हाँ। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मैं चाहता हूँ कि वह समूह को संभाले।”

देव ने कागज उठाकर ध्यान से पढ़े।

“आरव, क्या मेहर ने तुमसे ऐसा करने को कहा है?”

आरव की आँखों में नाराजगी आ गई।

“नहीं। उसे तो पता भी नहीं।”

“तो फिर इतनी जल्दी क्यों?”

“तीन साल जल्दी नहीं होते, देव।”

देव कुर्सी से पीछे हुआ और गंभीर स्वर में बोला, “प्रेम करो, पूरे दिल से करो। लेकिन किसी को अपना दिल देने और अपने सारे निर्णय देने में फर्क होता है।”

आरव ने कहा, “तुम मेहर को नहीं जानते।”

“मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम जब किसी पर भरोसा करते हो, तो आधा भरोसा नहीं करते।”

“और क्या यह गलत है?”

देव कुछ क्षण उसे देखता रहा।

“गलत नहीं है। खतरनाक जरूर है।”

आरव उठकर खिड़की के पास चला गया।

नीचे शहर बहुत छोटा दिखाई दे रहा था।

“जब मेरी माँ गई थीं, तो मुझे लगा था कि अब कोई मुझे उस तरह नहीं समझेगा। मेहर ने मुझे फिर से जीना सिखाया है। कंपनी मेरी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन मेहर मेरी जिंदगी है।”

देव ने गहरी साँस ली।

“कम से कम कागजों की स्वतंत्र जाँच करवा लो।”

आरव ने कहा, “तुम तैयार कर दो। मैं उसके जन्मदिन पर हस्ताक्षर करूँगा।”

देव ने मित्र होने के नाते चेतावनी दे दी थी। लेकिन आरव का निर्णय हो चुका था।

जब आरव ने उसी रात मेहर को बताया कि उसके जन्मदिन पर उसके लिए एक बहुत बड़ा उपहार है, तो मेहर ने अनजान बनने का अभिनय किया।

“क्या है?”

“अभी नहीं बताऊँगा।”

“हीरे का कोई हार?”

“उससे बड़ा।”

“नया घर?”

“उससे भी बड़ा।”

मेहर हँसते हुए उसके कंधे पर सिर रखकर बोली, “मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस तुम मेरे साथ रहो।”

आरव ने उसका माथा चूम लिया।

उधर उसी रात मेहर ने रिषभ को संदेश भेजा—

“वह कंपनी के अधिकार मेरे नाम करने वाला है। हमारा इंतजार खत्म होने वाला है।”

रिषभ का उत्तर आया—

“बस एक बार कागजों पर हस्ताक्षर हो जाएँ। फिर वह हमारे रास्ते से हट जाएगा।”

कुछ दिन बाद मुंबई में बहुत तेज बारिश हो रही थी।

आरव एक महत्वपूर्ण बैठक समाप्त करके लौट रहा था। उसकी कार के आगे सुरक्षा वाहन चल रहा था। रास्ते में अचानक एक दूसरी गाड़ी फिसलकर उनके सामने आ गई। चालक ने तेजी से ब्रेक लगाया।

हल्की टक्कर हुई।

आरव सुरक्षित था, लेकिन दूसरी गाड़ी का चालक घायल हो गया था।

आरव स्वयं कार से उतरकर उसके पास गया।

वह व्यक्ति रिषभ था।

दोनों ने एक-दूसरे को पहले कभी आमने-सामने नहीं देखा था।

रिषभ के हाथ पर हल्की चोट लगी थी। बारिश बढ़ती जा रही थी। वाहन ठीक होने तक दोनों पास के एक छोटे भोजनालय में चले गए।

आरव ने रिषभ के लिए प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करवाई।

रिषभ ने कहा, “आपको देखकर लगता नहीं कि इतने बड़े उद्योगपति सड़क पर किसी अनजान आदमी की मदद के लिए रुकेंगे।”

आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “समाचारों में हर बात सच नहीं होती।”

दोनों के बीच सामान्य बातचीत होने लगी।

रिषभ ने अपना परिचय एक स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार के रूप में दिया। उसने यह नहीं बताया कि वह आरव को पहले से बहुत अच्छी तरह जानता था।

रिषभ भीतर से घबराया हुआ था। उसे डर था कि कहीं मेहर का कोई संदेश न आ जाए। उसने अपना दूरभाष यंत्र मेज पर उलटा रख दिया।

बात करते समय उसने अपनी भीगी बाँह ऊपर की।

उसी क्षण आरव की दृष्टि उसकी कलाई पर पड़ी।

गहरे नीले रंग की पट्टी।

चाँदी के किनारे।

वही बारीक नक्काशी।

आरव की आँखें ठहर गईं।

उसने अपनी कलाई की ओर देखा, फिर रिषभ की घड़ी की ओर।

दोनों घड़ियाँ एक जैसी थीं।

उसके भीतर अचानक एक अजीब-सी बेचैनी उठी, लेकिन उसने अपने चेहरे पर कोई परिवर्तन नहीं आने दिया।

“आपकी घड़ी काफी अलग है,” आरव ने सहजता से कहा।

रिषभ ने मुस्कुराकर घड़ी उतारी। “मुझे भी बहुत प्रिय है।”

उसने घड़ी मेज पर रख दी।

आरव ने पीछे की ओर देखा।

वहाँ वही पंक्ति लिखी थी—

“जिंदगी हमें कहीं भी ले जाए, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास लौटेगा।”

कुछ क्षणों के लिए आरव को लगा कि शायद उसने शब्द गलत पढ़े हैं।

उसकी साँस भारी हो गई।

फिर भी उसने स्वयं को संभाला।

“यह कहाँ से मिली?”

रिषभ ने उत्तर दिया, “एक बहुत खास व्यक्ति ने दी है।”

“पत्नी ने?”

रिषभ हल्के से हँसा। “अभी पत्नी नहीं। लेकिन वह स्त्री मुझे महाविद्यालय के दिनों से प्रेम करती है।”

आरव की उँगलियाँ अनायास अपनी घड़ी पर कस गईं।

“ऐसी दूसरी घड़ी भी है?”

रिषभ ने कहा, “नहीं। उसने कहा था कि यह केवल मेरे लिए बनवाई गई है।”

उसी समय रिषभ का दूरभाष यंत्र चमका।

उसने जल्दी से उसे उठाया, लेकिन आरव की नजर संदेश पर पड़ चुकी थी।

भेजने वाले का नाम केवल एक अक्षर से सुरक्षित किया गया था—“म”।

संदेश में लिखा था—

“तुम सुरक्षित पहुँच गए? मुझे चिंता हो रही थी।”

आरव के मन में उसी समय मेहर का भेजा हुआ संदेश घूम गया। कुछ मिनट पहले उसने भी यही लिखा था—

“तुम सुरक्षित पहुँच गए? मुझे चिंता हो रही थी।”

शब्द वही थे।

विराम तक वही।

आरव ने खिड़की के बाहर होती बारिश की ओर देखा।

उसके भीतर पहली बार प्रेम और संदेह आमने-सामने खड़े थे।

उसने स्वयं से कहा—यह केवल संयोग है।

एक जैसी घड़ी भी बन सकती है।

एक जैसे शब्द भी लिखे जा सकते हैं।

नाम का पहला अक्षर “म” होने से कोई व्यक्ति मेहर नहीं हो जाता।

आरव अपने प्रेम को बचाने के लिए कारण खोज रहा था।

वाहन ठीक होने के बाद दोनों बाहर आए। रिषभ ने हाथ मिलाते हुए कहा, “आज की मुलाकात याद रहेगी।”

आरव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मुझे भी।”

घर पहुँचते ही मेहर दौड़कर उसके पास आई।

“तुम ठीक हो? मैंने सुना रास्ते में दुर्घटना हुई थी।”

उसने आरव का चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा।

आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।

उस चेहरे को, जिस पर उसने कभी संदेह नहीं किया था।

“मैं ठीक हूँ,” उसने कहा।

“तुम्हें चोट तो नहीं लगी?”

“नहीं।”

मेहर ने उसे गले लगा लिया।

आरव ने भी अपनी बाँहें उसके चारों ओर रख दीं, लेकिन आज पहली बार उसे उस आलिंगन में शांति नहीं मिली।

रात को मेहर उसके पास सो गई।

आरव जागता रहा।

कमरे की हल्की रोशनी में उसने अपनी कलाई की घड़ी को देखा।

वही वादा।

वही पंक्ति।

वही प्रेम, जो शायद केवल उसका नहीं था।

सुबह उसने मेहर से अचानक पूछा, “क्या तुमने मुझसे पहले कभी किसी से प्रेम किया था?”

मेहर के हाथ एक क्षण के लिए रुक गए।

फिर उसने मुस्कुराकर कहा, “यह सवाल अचानक क्यों?”

“बस ऐसे ही।”

मेहर उसके पास आई और उसकी आँखों में देखते हुए बोली, “नहीं। तुम पहले व्यक्ति हो, जिससे मैंने सच में प्रेम किया।”

आरव के भीतर कुछ टूटकर गिरा।

अगर वह सच कह देती, तो शायद वह उसे समझने की कोशिश करता।

लेकिन उसने उसकी आँखों में देखकर झूठ कहा था।

उस दिन आरव कार्यालय पहुँचा, लेकिन किसी काम पर ध्यान नहीं लगा सका। उसने देव को बुलाया।

देव कमरे में आया तो आरव खिड़की के सामने खड़ा था।

“कंपनी के अधिकारों का हस्तांतरण रोक दो,” आरव ने बिना मुड़े कहा।

देव कुछ क्षण चुप रहा।

“क्या हुआ?”

आरव ने धीरे से अपनी घड़ी उतारी और मेज पर रख दी।

“मुझे नहीं पता। लेकिन अब मुझे सच जानना है।”

दोस्तों, कई बार धोखे का पहला प्रमाण कोई बड़ी तस्वीर या खुला हुआ संदेश नहीं होता। कभी-कभी वह बस एक छोटी-सी वस्तु होती है, जो अचानक हमारे पूरे अतीत पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।

आरव के लिए वह वस्तु एक घड़ी थी।

और अब कहानी उस मोड़ पर पहुँच चुकी थी, जहाँ प्रेम को सच साबित होना था—या पूरी तरह बिखर जाना था।

कंपनी के अधिकारों का हस्तांतरण रोकने के बाद आरव ने स्वयं को काम में व्यस्त दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसका मन लगातार उसी घड़ी पर अटका हुआ था।

वह जितना उस घटना को भूलना चाहता, उतना ही हर छोटी बात उसे रिषभ की ओर ले जाती।

मेहर का देर रात तक संदेश लिखना।

अचानक बाहर जाने के लिए नए कारण बनाना।

कुछ दूरभाष वार्ताएँ, जिन्हें वह आरव के कमरे में आते ही बंद कर देती थी।

पहले आरव ने कभी इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था। वह इसे मेहर की स्वतंत्रता समझता था। उसे गर्व था कि वह अपनी पत्नी पर निगरानी नहीं रखता।

अब वही विश्वास उसे अपनी सबसे बड़ी भूल जैसा लगने लगा था।

लेकिन आरव अभी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचना चाहता था।

उसके भीतर दो आवाजें थीं।

एक कहती—मेहर झूठ बोल रही है।

दूसरी कहती—तुम उस स्त्री पर शक कर रहे हो, जिसने तुम्हारे सबसे कमजोर क्षणों में तुम्हारा साथ दिया।

आरव ने तय किया कि वह बिना प्रमाण मेहर से कोई प्रश्न नहीं करेगा।

उसने देव से कहा, “मैं किसी निजी जासूस को उसके पीछे नहीं लगाना चाहता।”

देव ने उत्तर दिया, “फिर सच कैसे पता चलेगा?”

आरव ने धीमे स्वर में कहा, “मैं चाहता हूँ कि मैं गलत साबित हो जाऊँ।”

देव ने अपने मित्र की ओर देखा। उसे पहली बार समझ आया कि आरव सच खोजने से ज्यादा अपने प्रेम को बचाने की कोशिश कर रहा था।

आरव ने मेहर को बताया कि कानूनी प्रक्रिया में कुछ कठिनाइयों के कारण कंपनी के कागजों पर हस्ताक्षर कुछ समय के लिए टालने पड़ेंगे।

मेहर ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में घबराहट उभर आई।

“कितने समय के लिए?”

“पता नहीं। शायद कुछ सप्ताह।”

“पर तुमने तो कहा था सब तैयार है।”

आरव ने उसकी प्रतिक्रिया ध्यान से देखी।

“तुम इतनी चिंतित क्यों हो?”

मेहर तुरंत उसके पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैं अपने लिए चिंतित नहीं हूँ। मुझे लगा तुमने बहुत सोचकर फैसला लिया होगा। अगर अचानक कुछ रुक गया है, तो शायद कोई परेशानी होगी।”

“हो सकती है।”

“क्या देव ने कुछ कहा है?”

“तुम्हें क्यों लगता है कि देव ने कहा होगा?”

मेहर चुप हो गई।

आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 54 मिनट

भाग 3

फिर हँसते हुए बोली, “क्योंकि उसे शुरू से लगता है कि मैं तुम्हारे लिए ठीक नहीं हूँ।”

आरव ने कोई उत्तर नहीं दिया।

उस रात मेहर छत पर गई और रिषभ को दूरभाष किया।

आरव नीचे पुस्तकालय में बैठा था। घर की सुरक्षा व्यवस्था के कारण छत के बाहरी हिस्से का दृश्य एक विशेष कक्ष में दिखाई देता था। उसने ध्वनि नहीं सुनी, लेकिन मेहर की बेचैन चाल और हाथों की गति देख सकता था।

उधर रिषभ ने उससे कहा, “तुम घबरा क्यों रही हो? हो सकता है सच में कानूनी समस्या हो।”

मेहर ने कहा, “नहीं। आरव बदल गया है। वह मुझे ऐसे देख रहा था, जैसे मेरे शब्दों के पीछे कुछ पढ़ रहा हो।”

“क्या उसने मुझसे मुलाकात के बारे में कुछ कहा?”

“नहीं।”

रिषभ कुछ देर चुप रहा।

“घड़ी?”

मेहर का चेहरा पीला पड़ गया।

“तुमने वह घड़ी पहन रखी थी?”

“मैं रोज पहनता हूँ।”

“मैंने कहा था उसे बाहर मत पहनना।”

रिषभ चिढ़कर बोला, “तुमने दोनों के लिए एक जैसी घड़ी क्यों बनवाई?”

मेहर ने धीमे स्वर में कहा, “मैंने सोचा था आरव कभी तुम्हें देखेगा ही नहीं।”

रिषभ ने कहा, “अब सुनो। उससे सामान्य व्यवहार करो। हस्तांतरण जल्द होना चाहिए। मेरे ऊपर ऋण बढ़ रहा है।”

“तुम्हें हर समय पैसे की ही पड़ी रहती है।”

“हमने यह सब किसलिए शुरू किया था?”

मेहर चुप हो गई।

रिषभ की आवाज कठोर हो गई।

“तुम कहीं उस आदमी से सचमुच प्रेम तो नहीं करने लगी?”

मेहर तुरंत बोली, “नहीं।”

लेकिन यह “नहीं” कहते समय उसकी आवाज में वह दृढ़ता नहीं थी, जिसकी रिषभ को उम्मीद थी।

असल में, इन तीन वर्षों में कुछ बदल चुका था।

मेहर ने आरव से प्रेम करने का अभिनय शुरू किया था, लेकिन आरव का प्रेम अभिनय नहीं था। वह उसकी छोटी जरूरतों का ध्यान रखता था। उसने कभी उस पर कोई अधिकार नहीं जताया। उसने उसे सम्मान दिया। जब मेहर के पिता बीमार पड़े, आरव ने रातभर अस्पताल में उनके साथ समय बिताया।

मेहर यह सब देखती रही।

कई बार उसे अपराधबोध हुआ।

लेकिन हर बार रिषभ उसे उनके पुराने प्रेम, संघर्ष और भविष्य की याद दिलाता।

वह दो जिंदगियों के बीच फँसती गई।

फिर भी उसने आरव को सच नहीं बताया।

और यही उसकी सबसे बड़ी भूल थी।

अगले दिन आरव ने घर लौटकर कहा, “मुझे आज रात अचानक पुणे जाना है। एक कारखाने में समस्या हुई है।”

मेहर ने पूछा, “कब लौटोगे?”

“शायद सुबह।”

आरव ने सामान लिया और घर से निकल गया।

उसकी कार मुख्य द्वार से बाहर चली गई।

लेकिन लगभग एक किलोमीटर दूर जाकर आरव दूसरी गाड़ी में बैठ गया। उसका चालक पहली कार लेकर आगे चला गया, ताकि किसी को संदेह न हो।

आरव उसी स्थान पर वापस लौटा और घर से कुछ दूरी पर खड़ी गाड़ी में बैठकर प्रतीक्षा करने लगा।

वह स्वयं से नफरत कर रहा था।

उसे लगता था कि वह अपनी पत्नी की जासूसी कर रहा है।

लेकिन वह उस झूठ के साथ भी नहीं जी सकता था, जो उसके आसपास फैलता जा रहा था।

लगभग बीस मिनट बाद मेहर की गाड़ी घर से निकली।

आरव ने चालक से उसका पीछा करने को कहा।

मेहर शहर के एक शांत क्षेत्र में पहुँची। वहाँ एक साधारण-सी इमारत थी। उसने गाड़ी खड़ी की और जल्दी-जल्दी भीतर चली गई।

आरव भी कुछ दूरी पर उतर गया।

इमारत के सामने कोई सुरक्षाकर्मी नहीं था। वह धीरे-धीरे भीतर गया।

तीसरी मंजिल के गलियारे में पहुँचकर उसने मेहर को एक दरवाजे के सामने खड़े देखा।

दरवाजा खुला।

सामने रिषभ था।

मेहर ने बिना कुछ कहे उसे गले लगा लिया।

आरव वहीं सीढ़ियों की छाया में खड़ा रह गया।

उसके आसपास की सभी आवाजें जैसे समाप्त हो गईं।

उसे न बारिश की बूँदें सुनाई दीं, न नीचे चलती गाड़ियों की आवाज और न ही अपनी साँस।

वह केवल मेहर को रिषभ की बाँहों में देख रहा था।

वही मेहर, जिसने विवाह के दिन उसके हाथ पकड़कर साथ निभाने की प्रतिज्ञा की थी।

वही मेहर, जो हर रात उसके पास सोती थी।

वही मेहर, जिसने कुछ घंटे पहले उसे सावधानी से यात्रा करने को कहा था।

रिषभ ने मेहर का चेहरा अपने हाथों में लिया।

फिर दोनों भीतर चले गए।

दरवाजा बंद हो गया।

आरव सीढ़ियों पर बैठ गया।

उसके हाथ काँप रहे थे।

उसने अपनी कलाई से घड़ी उतारी। कुछ क्षण उसे देखा और फिर मुट्ठी में इतनी जोर से दबाया कि उसका किनारा उसकी हथेली में चुभ गया।

खून की हल्की रेखा उभर आई।

लेकिन उसे दर्द महसूस नहीं हुआ।

उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

आरव सिंघानिया, जो पूरे व्यापारिक संसार के सामने कभी नहीं टूटा, उस अपरिचित इमारत की सीढ़ियों पर बैठकर एक बच्चे की तरह रो रहा था।

उसने अपने चालक को बुलाया।

गाड़ी में बैठते समय चालक ने उसकी आँखें देखीं, लेकिन कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई।

कुछ दूर जाने के बाद आरव ने कहा, “आज जो देखा, वह किसी से मत कहना।”

चालक ने सिर झुका दिया।

आरव सीधे अपनी माँ के पुराने घर गया।

वह उसी कमरे में बैठा, जहाँ कभी उसने मेहर को अपना सबसे बड़ा भय बताया था।

उसे याद आया कि मेहर ने कहा था—“कम से कम मेरे सामने तुम्हें मजबूत बनने की जरूरत नहीं।”

अब वही शब्द उसे किसी जाल की तरह लग रहे थे।

क्या उसने सच में उसकी भावनाएँ समझी थीं?

या केवल उन्हें इस्तेमाल किया था?

अगली सुबह आरव सामान्य समय पर घर लौटा।

मेहर भोजन की मेज पर बैठी थी।

“कारखाने की समस्या ठीक हो गई?” उसने पूछा।

आरव ने उसकी ओर देखा।

“हाँ। जो खराबी थी, उसका कारण पता चल गया।”

मेहर मुस्कुराई। “अच्छा हुआ।”

आरव ने मन ही मन सोचा—काश तुम समझ पाती कि मैं किस खराबी की बात कर रहा हूँ।

उसने उस दिन भी कोई प्रश्न नहीं किया।

अब उसे केवल संबंध का प्रमाण नहीं चाहिए था। उसे यह जानना था कि धोखा कितना गहरा है।

क्या मेहर केवल रिषभ से मिल रही थी?

या उसकी कंपनी को लेकर भी कोई योजना थी?

आरव ने देव को सब बता दिया।

देव कुछ देर तक कुछ बोल नहीं पाया।

“मैंने कभी नहीं सोचा था…” उसने कहा।

आरव ने उसे रोक दिया।

“मुझे सांत्वना मत देना।”

“आरव…”

“मुझे सत्य चाहिए। पूरा सत्य।”

देव ने एक विश्वसनीय जाँच दल नियुक्त किया। उन्होंने मेहर और रिषभ के पुराने संबंध, उनके वित्तीय व्यवहार और मुलाकातों की जानकारी जुटानी शुरू की।

इस बीच आरव ने एक और योजना बनाई।

उसने रिषभ को कार्यालय में बुलाया।

रिषभ को लगा कि आरव उनकी सड़क वाली मुलाकात से प्रभावित हुआ है और शायद उसे व्यापार में अवसर देना चाहता है।

आरव ने कहा, “आप वित्तीय सलाहकार हैं। हमारी एक नई परियोजना है। मैं चाहूँगा कि आप उसके बारे में कुछ सुझाव दें।”

रिषभ प्रसन्न हो गया।

“यह मेरे लिए सम्मान की बात होगी।”

आरव ने जानबूझकर उसे अपने घर रात्रिभोज के लिए आमंत्रित कर दिया।

“मेरी पत्नी भी कुछ सामाजिक परियोजनाएँ संभालती है। शायद आप दोनों की सोच मिल सके।”

रिषभ के चेहरे पर एक क्षण के लिए तनाव आया, लेकिन उसने तुरंत मुस्कुराकर निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

उस रात मेहर ने जब रिषभ को घर में प्रवेश करते देखा, तो उसके हाथ से पानी का गिलास लगभग छूट गया।

आरव ने सहजता से कहा, “मेहर, ये रिषभ हैं। कुछ दिन पहले सड़क पर हमारी मुलाकात हुई थी।”

मेहर ने अभिनय करते हुए हाथ जोड़े।

“नमस्ते।”

रिषभ ने भी ऐसे ही व्यवहार किया, जैसे वह उसे पहली बार देख रहा हो।

“आपसे मिलकर खुशी हुई।”

तीनों भोजन की मेज पर बैठे।

आरव बातचीत करता रहा, लेकिन उसका ध्यान उन दोनों की हर छोटी हरकत पर था।

मेहर ने बिना पूछे रिषभ के पास से मशरूम वाली सब्जी हटाकर दूसरी ओर रख दी।

रिषभ ने कहा, “आपको कैसे पता कि मुझे मशरूम पसंद नहीं?”

मेहर एक क्षण के लिए रुक गई।

फिर बोली, “आपने शायद अभी बातचीत में बताया था।”

रिषभ ने तुरंत कहा, “हाँ, शायद।”

कुछ देर बाद मेहर ने रिषभ के गिलास में सामान्य पानी की जगह हल्का गर्म पानी डाला।

आरव जानता था कि रिषभ ने उससे कभी यह नहीं कहा था कि वह गर्म पानी पीता है।

जब रिषभ ने अपनी जेब से दवा निकाली, मेहर ने तुरंत कहा, “यह भोजन के बाद लेनी चाहिए।”

फिर उसने बात सँभाली।

“मेरा मतलब… आमतौर पर ऐसी दवाएँ भोजन के बाद ली जाती हैं।”

आरव शांत बैठा रहा।

उसे याद आया कि विवाह के शुरुआती दिनों में जब मेहर उसकी चाय में सही मात्रा में दालचीनी डालती थी, तो वह कितना खुश होता था। उसे लगता था कि मेहर ने उसकी आदतें प्रेम से सीखी हैं।

अब उसे समझ आया कि शायद किसी और की आदतों को समझना उसका पुराना अभ्यास था।

रात्रिभोज के बीच आरव ने अपनी घड़ी उतारकर मेज पर रख दी।

“रिषभ, हमारी घड़ियाँ सच में बहुत मिलती हैं।”

मेहर की साँस रुक गई।

रिषभ ने अपनी कलाई ढकने का प्रयास किया, लेकिन अब देर हो चुकी थी।

आरव ने कहा, “पीछे लिखा वाक्य भी बिल्कुल एक जैसा है।”

मेज पर अचानक खामोशी छा गई।

मेहर के हाथ से गिलास छूटकर टूट गया।

“क्या हुआ?” आरव ने पूछा।

“कुछ नहीं। हाथ फिसल गया।”

रिषभ ने कहा, “मेरी घड़ी शायद किसी नीलामी में बनी दूसरी घड़ी की नकल है।”

“लेकिन आपने उस दिन कहा था कि यह आपको एक खास व्यक्ति ने दी है।”

“हाँ। उसने नीलामी से खरीदी होगी।”

आरव ने मेहर की ओर देखा।

“अजीब संयोग है, है न?”

मेहर ने काँपते हुए होंठों से कहा, “दुनिया में कई चीजें एक जैसी होती हैं।”

आरव मुस्कुराया।

“सही कहा। कभी-कभी भावनाएँ भी।”

उसके शब्दों का अर्थ दोनों समझ गए।

भोजन समाप्त होने के बाद रिषभ जल्दी चला गया।

मेहर ने कमरे में आते ही पूछा, “तुम आज बहुत अजीब व्यवहार कर रहे थे।”

आरव ने कहा, “मैं?”

“हाँ। घड़ी की बात बार-बार क्यों कर रहे थे?”

“क्योंकि तुमने कहा था, ऐसी केवल एक घड़ी है।”

मेहर कुछ क्षण चुप रही।

फिर उसके पास आकर बोली, “शायद घड़ी बनाने वाले ने वैसी दूसरी बना दी होगी। दुकानदार भी झूठ बोलते हैं।”

आरव ने पूछा, “और पत्नी?”

मेहर ने उसकी ओर देखा।

“क्या मतलब?”

“पत्नी भी झूठ बोल सकती है?”

मेहर का चेहरा उतर गया।

“तुम मुझ पर शक कर रहे हो?”

आरव के भीतर वर्षों का प्रेम चीख रहा था। वह चाहता था कि मेहर अभी सब स्वीकार कर ले। वह उसे सच बताए, क्षमा माँगे और कहे कि कम से कम कुछ पल वास्तविक थे।

लेकिन मेहर ने उल्टा आहत होने का अभिनय किया।

“मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ छोड़ा और आज तुम मुझ पर शक कर रहे हो?”

आरव ने पूछा, “तुमने मेरे लिए क्या छोड़ा?”

मेहर की आँखें फैल गईं।

“अपना जीवन, अपनी स्वतंत्रता…”

“और रिषभ?”

कमरे में जैसे बिजली गिर गई।

मेहर का चेहरा सफेद पड़ गया।

आरव ने पहली बार उसका नाम उसके सामने लिया था।

कुछ क्षण बाद मेहर ने स्वयं को संभाला।

“कौन रिषभ?”

आरव की आँखों से आँसू छलक आए, लेकिन उसकी आवाज शांत थी।

“यह आखिरी अवसर था, मेहर।”

“तुम क्या कह रहे हो?”

“मैं चाहता था कि तुम मुझे सच बता दो।”

“मैं सच ही कह रही हूँ।”

आरव ने कुछ नहीं कहा।

वह कमरे से बाहर चला गया।

मेहर वहीं खड़ी रही।

अगले दो दिनों में जाँच दल की पहली सूचना आई।

मेहर और रिषभ छह वर्षों से एक-दूसरे के साथ थे।

जाँचकर्ताओं ने पुराने चित्र जुटाए। एक चित्र में दोनों महाविद्यालय के समारोह में साथ थे। दूसरे में रिषभ ने मेहर को अंगूठी पहनाई थी। वह चित्र उस समय का था, जब आरव और मेहर की पहली मुलाकात होने में केवल तीन सप्ताह बाकी थे।

फिर और भी चौंकाने वाली जानकारी मिली।

परोपकारी समारोह में मेहर का आरव से मिलना संयोग नहीं था।

आप भाग 4 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 54 मिनट

भाग 4

उस छोटी बच्ची के परिवार के खाते में समारोह के कुछ दिन बाद एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा धन भेजा गया था। वही धन रिषभ से जुड़े एक खाते से आया था।

आरव देर तक उस जानकारी को देखता रहा।

उसकी प्रेम कहानी का पहला दृश्य भी झूठ था।

जिस घटना को उसने भाग्य माना था, वह एक योजना थी।

उसने देव से कहा, “मुझे सभी संदेश, सभी खाते और सभी पुराने संपर्क चाहिए।”

जाँच आगे बढ़ी।

कुछ दिनों बाद उन्हें एक पुरानी ध्वनि रिकॉर्डिंग मिली। रिषभ अपनी सुरक्षा के लिए कई वार्ताएँ रिकॉर्ड करता था।

उस रिकॉर्डिंग में मेहर की आवाज थी।

वह कह रही थी, “वह मुझसे बहुत जुड़ गया है। कभी-कभी मुझे डर लगता है।”

रिषभ ने पूछा, “डर किस बात का?”

“अगर उसे सच पता चला, तो वह टूट जाएगा।”

रिषभ हँसा।

“वह तुमसे प्रेम नहीं करता। वह केवल इस भावना से प्रेम करता है कि किसी ने आखिरकार उसे चुना है।”

मेहर ने बहुत धीमे स्वर में कहा, “शायद।”

रिकॉर्डिंग समाप्त हो गई।

आरव ने उसे दोबारा चलाया।

फिर तीसरी बार।

हर बार वही वाक्य उसके भीतर उतरता गया।

“वह केवल इस भावना से प्रेम करता है कि किसी ने आखिरकार उसे चुना है।”

क्या उसका प्रेम इतना कमजोर था?

क्या मेहर ने उसके अकेलेपन को पहचाना और उसी का उपयोग किया?

आरव उस रात फिर अपनी माँ के पुराने घर गया।

वहाँ बैठकर उसने पहली बार जोर से कहा, “माँ, मैंने गलत व्यक्ति को अपना घर दे दिया।”

कमरा शांत रहा।

आरव ने आँखें बंद कर लीं।

उसे लगा जैसे माँ कह रही हों—घर देने में गलती नहीं थी, बेटे। गलती उस व्यक्ति की थी, जिसने घर को लूटने की जगह समझ लिया।

जाँच में एक और रहस्य सामने आया।

रिषभ ने विदेश में एक गुप्त कंपनी बनाई थी। योजना यह थी कि मेहर को मिलने वाले कंपनी के अधिकार धीरे-धीरे उस गुप्त कंपनी के नियंत्रण में चले जाएँ।

लेकिन उन दस्तावेजों में मेहर का नाम कहीं नहीं था।

सभी अधिकार केवल रिषभ के पास जाने वाले थे।

यानी रिषभ मेहर को भी धोखा दे रहा था।

कंपनी पर नियंत्रण मिलते ही वह मेहर को छोड़कर धन लेकर भागना चाहता था।

देव ने कहा, “तुम मेहर को यह बता सकते हो। शायद वह हमारे पक्ष में आ जाए।”

आरव ने कुछ देर सोचा।

फिर बोला, “वह मेरा पक्ष तब चुनती, जब उसके पास अवसर था। अब अगर वह रिषभ के विरुद्ध आती है, तो वह केवल स्वयं को बचाने के लिए आएगी।”

“तो तुम क्या करोगे?”

आरव ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा, “मैं दोनों को वह दूँगा, जिसके वे हकदार हैं।”

उधर मेहर और रिषभ के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था।

रिषभ चाहता था कि मेहर किसी भी तरह आरव पर दबाव डाले। मेहर अब डरने लगी थी।

वह समझ चुकी थी कि आरव को कुछ पता चल गया है।

एक रात उसने आरव को पुस्तकालय में अकेले बैठे देखा।

वह उसके पास गई।

“तुम मुझसे दूर क्यों हो गए हो?”

आरव ने पुस्तक बंद की।

“क्या तुम सच में जानना चाहती हो?”

“हाँ।”

“क्या तुम्हें हमारे विवाह का पहला वर्ष याद है?”

“हाँ।”

“जब मैं माँ की बरसी पर टूट गया था, तब तुमने मुझे पूरी रात संभाला था।”

मेहर की आँखें झुक गईं।

आरव ने पूछा, “क्या वह सच था?”

मेहर ने तुरंत कहा, “हाँ।”

“जब तुमने कहा कि तुम्हें मेरी दौलत से कोई फर्क नहीं पड़ता, वह सच था?”

“हाँ।”

“जब तुमने कहा कि तुमने मुझसे पहले किसी से प्रेम नहीं किया, वह भी सच था?”

मेहर ने कोई उत्तर नहीं दिया।

आरव की आवाज भर्रा गई।

“मुझे केवल यह जानना है कि क्या हमारे बीच कोई एक पल ऐसा था, जिसमें तुम अभिनय नहीं कर रही थीं?”

मेहर की आँखों से आँसू निकल आए।

शायद पहली बार वे आँसू पूरी तरह झूठे नहीं थे।

लेकिन वह फिर भी सच बोलने का साहस नहीं जुटा सकी।

उसने कहा, “तुम्हें आराम करना चाहिए। काम का तनाव तुम्हें बहुत प्रभावित कर रहा है।”

आरव उसे देखता रह गया।

अब उसे रिषभ और मेहर की अगली योजना समझ आ गई थी।

वे उसे मानसिक रूप से अस्थिर घोषित करना चाहते थे।

कुछ दिनों बाद आरव ने घोषणा की कि मेहर के जन्मदिन पर एक भव्य समारोह होगा। उसी समारोह में कंपनी के अधिकारों से जुड़े कागजों पर हस्ताक्षर किए जाएँगे।

मेहर ने राहत की साँस ली।

उसने तुरंत रिषभ को सूचना दी।

रिषभ ने कहा, “देखा? मैंने कहा था वह कुछ नहीं जानता।”

मेहर ने पूछा, “और हस्ताक्षर के बाद?”

“हम कुछ सप्ताह प्रतीक्षा करेंगे। फिर उसके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रश्न उठाएँगे। चिकित्सकीय प्रमाण तैयार हैं।”

“और उसके बाद?”

“तुम अध्यक्ष बनोगी। मैं तुम्हारा सलाहकार।”

“फिर हम साथ रहेंगे?”

रिषभ कुछ क्षण चुप रहा।

“हाँ। हमेशा।”

लेकिन उसी समय वह अपने सामने रखे उन दस्तावेजों को देख रहा था, जिनमें मेहर का भविष्य भी पहले ही उससे छीन लिया गया था।

दोस्तों, अब कहानी में हर व्यक्ति किसी न किसी भ्रम में जी रहा था।

आरव कभी मेहर के प्रेम के भ्रम में था, लेकिन अब जाग चुका था।

मेहर अब भी रिषभ के प्रेम के भ्रम में थी।

और रिषभ को भ्रम था कि वह आरव सिंघानिया से अधिक चतुर है।

जन्मदिन का समारोह केवल उत्सव नहीं था।

वह एक ऐसा मंच बनने वाला था, जहाँ प्रेम, लालच और धोखे का पूरा खेल सबके सामने खुलने वाला था।

मेहर के जन्मदिन का दिन आ गया।

सिंघानिया समूह के मुख्य सभागार को भव्य रूप से सजाया गया था। ऊँची छत से सफेद और सुनहरे फूलों की लंबी सजावट लटक रही थी। मंच के पीछे विशाल पर्दे पर मेहर और आरव की मुस्कुराती हुई तस्वीर दिखाई दे रही थी।

समाचार माध्यमों को बताया गया था कि आरव सिंघानिया इस अवसर पर कंपनी से जुड़ी बड़ी घोषणा करने वाला है।

देश के प्रमुख उद्योगपति, कंपनी के निदेशक, वरिष्ठ कर्मचारी, कानूनी सलाहकार और निवेशक वहाँ उपस्थित थे।

मेहर ने गहरे लाल रंग की सुंदर साड़ी पहन रखी थी। उसके गले में वही हीरों का हार था, जो आरव ने उनकी पहली वर्षगाँठ पर दिया था।

आईने के सामने खड़ी मेहर स्वयं को देख रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा चिंता थी।

उसने कई बार रिषभ को संदेश भेजा।

“तुम पहुँच गए?”

कुछ देर बाद उत्तर आया—

“हाँ। सभा में पीछे बैठा हूँ।”

मेहर ने पूछा—

“सब ठीक रहेगा न?”

रिषभ ने लिखा—

“आज के बाद हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं होगी।”

मेहर ने गहरी साँस ली।

उसी समय आरव कमरे में आया।

उसने काले रंग का बंदगला पहना था। उसके चेहरे पर गहरी शांति थी।

मेहर उसकी ओर मुड़ी।

“मैं कैसी लग रही हूँ?”

आरव कुछ क्षण उसे देखता रहा।

एक समय था, जब वह उसे देखकर शब्द भूल जाता था।

आज भी वह सुंदर थी।

लेकिन अब उस सुंदरता के पीछे उसे झूठ की परतें दिखाई दे रही थीं।

फिर भी उसने कहा, “बहुत सुंदर।”

मेहर उसके पास आई।

“आरव, क्या हम आज से सब कुछ फिर से शुरू कर सकते हैं?”

आरव ने पूछा, “क्या समाप्त हुआ है?”

“पिछले कुछ दिनों से हमारे बीच दूरी है।”

“दूरी अचानक नहीं आती, मेहर। वह उन बातों से बनती है, जो लोग एक-दूसरे से छिपाते हैं।”

मेहर की आँखें झुक गईं।

आरव ने जेब से एक छोटा डिब्बा निकाला।

मेहर ने सोचा, शायद कोई नया आभूषण है।

आरव ने डिब्बा खोला।

उसमें वही घड़ी रखी थी, जो मेहर ने उसे दी थी।

“आज इसे पहनोगे नहीं?” उसने पूछा।

आरव ने कहा, “आज इसकी जरूरत मंच पर पड़ेगी।”

मेहर का चेहरा पीला पड़ गया।

“क्या मतलब?”

“समारोह शुरू होने वाला है।”

आरव बाहर चला गया।

सभागार में तालियों के बीच दोनों मंच पर पहुँचे। आरव ने मेहर के जन्मदिन पर उसके सामाजिक कार्यों की प्रशंसा की। उसने कहा कि मेहर के आने के बाद उसके जीवन में बहुत परिवर्तन आया।

उसकी आवाज में इतना अपनापन था कि मेहर को एक क्षण के लिए लगा, शायद सब ठीक है।

आरव ने कहा, “किसी भी मनुष्य के जीवन में विश्वास सबसे बड़ी पूँजी होता है। हम धन खोकर फिर कमा सकते हैं। व्यापार खोकर फिर बना सकते हैं। लेकिन विश्वास टूट जाए, तो कभी-कभी पूरी जिंदगी भी उसे वापस लाने के लिए कम पड़ जाती है।”

सभा में बैठे लोग ध्यान से सुन रहे थे।

मेहर की उँगलियाँ ठंडी होने लगीं।

आरव ने आगे कहा, “मैंने अपने जीवन में बहुत कम लोगों पर भरोसा किया। क्योंकि मुझे बचपन से सिखाया गया था कि विश्वास कमजोरी है। फिर एक व्यक्ति मेरी जिंदगी में आया और उसने मुझे विश्वास दिलाया कि किसी को अपना सब कुछ सौंप देना भी प्रेम हो सकता है।”

उसने मेहर की ओर देखा।

उसकी आँखों में आँसू थे।

सभा को वे आँसू प्रेम के दिखाई दिए।

मेहर जानती थी कि वे किसी और कारण से थे।

“आज,” आरव ने कहा, “मैं कंपनी के भविष्य से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने जा रहा हूँ।”

तालियाँ गूँज उठीं।

देव कागज लेकर मंच पर आया।

उसने उन्हें मेहर के सामने रखा।

मेहर ने जल्दी से पन्ने देखे। कानूनी भाषा कठिन थी। कुछ अनुच्छेद बदले हुए लग रहे थे, लेकिन रिषभ ने उससे कहा था कि आरव के सामने अधिक प्रश्न न करना।

आरव ने कलम उसकी ओर बढ़ा दी।

“पढ़ना चाहोगी?”

मेहर ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे तुम पर भरोसा है।”

आरव की आँखों में दर्द उभरा।

“ठीक वही भरोसा, जो मुझे तुम पर था?”

मेहर का हाथ काँप गया।

सभा में बैठे लोगों को लगा कि यह पति-पत्नी के बीच कोई भावुक बात है।

मेहर ने हस्ताक्षर कर दिए।

आरव ने भी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।

रिषभ पीछे बैठा मुस्कुरा रहा था।

उसे लगा योजना सफल हो गई।

आरव ने देव को संकेत किया।

मंच के पीछे लगी विशाल पट्टिका पर नई जानकारी दिखाई दी।

“सिंघानिया कर्मचारी न्यास।”

सभा में फुसफुसाहट शुरू हो गई।

आरव ने कहा, “आज से सिंघानिया समूह के चालीस प्रतिशत मतदान अधिकार किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उन कर्मचारियों के न्यास को सौंपे जा रहे हैं, जिन्होंने वर्षों की मेहनत से इस कंपनी को बनाया है।”

मेहर ने चौंककर आरव की ओर देखा।

“यह क्या है?”

आरव ने शांत स्वर में कहा, “वही दस्तावेज, जिन पर तुमने मुझ पर भरोसा करके हस्ताक्षर किए।”

मेहर की साँस तेज हो गई।

रिषभ अपनी सीट पर सीधा बैठ गया।

आरव ने आगे कहा, “कंपनी के शेष नियंत्रक अधिकार मेरे पास रहेंगे। कोई भी व्यक्ति निजी संबंध, दबाव या धोखे के माध्यम से इस समूह पर अधिकार नहीं कर सकेगा।”

अब सभा में पूर्ण खामोशी थी।

मेहर ने धीमे स्वर में कहा, “आरव, यह सब क्या हो रहा है?”

आरव ने मंच पर रखा छोटा डिब्बा खोला।

उसने अपनी घड़ी बाहर निकाली।

फिर देव ने दूसरा डिब्बा खोला।

उसमें रिषभ की घड़ी थी, जिसे जाँच दल ने कानूनी प्रमाण के रूप में प्राप्त किया था।

दोनों घड़ियाँ एक-दूसरे के पास रखी गईं।

सभा में बैठे रिषभ का चेहरा उतर गया।

आरव ने कहा, “कुछ उपहार केवल समय नहीं बताते। वे यह भी बताते हैं कि हमारा समय किस झूठ में बीत रहा था।”

मेहर की आँखों से आँसू बहने लगे।

“आरव, मेरी बात सुनो।”

“तीन साल तक मैंने केवल तुम्हारी बात सुनी, मेहर। आज तुम मेरी सुनोगी।”

उसके संकेत पर पर्दे पर वित्तीय दस्तावेज दिखाई देने लगे।

रिषभ से जुड़े गुप्त खाते।

मेहर के नाम से तैयार किए गए अधिकार हस्तांतरण के मसौदे।

आरव को मानसिक रूप से अस्थिर घोषित करने के लिए तैयार नकली चिकित्सकीय कागज।

विदेशी कंपनी का विवरण।

सभा में लोग स्तब्ध रह गए।

सुरक्षा कर्मचारियों ने दरवाजे बंद कर दिए।

रिषभ उठकर बाहर जाने लगा, लेकिन दो अधिकारी उसके सामने आ गए।

आरव ने कहा, “रिषभ खन्ना, अगर आप जा रहे हैं, तो कम से कम अपनी योजना का अंतिम भाग तो सुनते जाइए।”

आप भाग 5 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 54 मिनट

भाग 5

पर्दे पर नए कागज दिखाई दिए।

वे दस्तावेज, जिनमें रिषभ ने मेहर को भी धोखा देने की योजना बनाई थी।

विदेशी कंपनी के सभी अधिकार केवल रिषभ के नाम थे। मेहर के नाम कोई हिस्सा नहीं था।

मेहर अविश्वास से पर्दे को देखती रही।

“यह झूठ है,” उसने रिषभ की ओर देखते हुए कहा।

रिषभ चुप रहा।

“रिषभ, कुछ बोलो।”

वह बोला, “अभी इन बातों का समय नहीं है।”

मेहर उसके पास जाने लगी, लेकिन सुरक्षा कर्मचारियों ने रोक दिया।

“तुमने कहा था हम दोनों साथ रहेंगे,” मेहर रोते हुए बोली।

रिषभ ने नजरें फेर लीं।

आरव ने उसे देखा।

एक समय वह इस दृश्य की कल्पना करके संतोष पा सकता था। उसे लग सकता था कि जिस स्त्री ने उसे धोखा दिया, अब उसे भी धोखा मिला है।

लेकिन उसे कोई खुशी नहीं हुई।

केवल गहरा खालीपन था।

आरव ने सभा की ओर मुड़कर कहा, “मैं यहाँ अपने विवाह की निजी बातें सार्वजनिक करने नहीं आया था। लेकिन जब निजी धोखा हजारों कर्मचारियों और निवेशकों के भविष्य को खतरे में डालने लगे, तो वह केवल निजी नहीं रहता।”

उसने देव को संकेत किया।

कानूनी अधिकारियों ने रिषभ को वित्तीय धोखाधड़ी, दस्तावेजों की जालसाजी और षड्यंत्र के आरोप में हिरासत में ले लिया।

मेहर वहीं खड़ी रो रही थी।

एक अधिकारी उसके पास भी आया।

आरव ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

“मेहर से अभी कोई कठोर व्यवहार नहीं होगा। वह जाँच में सहयोग करेगी।”

देव ने धीमे स्वर में कहा, “आरव, उसके विरुद्ध भी पर्याप्त प्रमाण हैं।”

“मुझे पता है।”

“फिर?”

आरव ने कहा, “न्याय होगा। अपमान नहीं।”

समारोह समाप्त कर दिया गया।

समाचार माध्यमों को केवल इतना बताया गया कि कंपनी के विरुद्ध एक वित्तीय षड्यंत्र पकड़ा गया है। आरव ने निजी संबंधों के विवरण सार्वजनिक नहीं होने दिए।

उसने मेहर को सबके सामने अपमानित करने से बचाया।

शायद इसलिए नहीं कि वह इसकी पात्र थी।

बल्कि इसलिए कि आरव अब भी अपने प्रेम की गरिमा बचाना चाहता था।

उस रात सिंघानिया भवन असामान्य रूप से शांत था।

मेहर अपने कमरे में बैठी थी। उसके सामने दो सूटकेस खुले थे। अलमारी से वस्त्र निकालते समय उसके हाथ काँप रहे थे।

आरव दरवाजे पर खड़ा था।

मेहर ने उसकी ओर देखा।

“तुम मुझे पुलिस के हवाले क्यों नहीं कर रहे?”

आरव ने कहा, “जाँच होगी। कानून निर्णय करेगा।”

“तुम चाहो, तो मेरा जीवन समाप्त कर सकते हो।”

“मैंने तुम्हें जीवन दिया था या नहीं, यह नहीं जानता। लेकिन मैं तुम्हारा जीवन समाप्त करने वाला व्यक्ति नहीं बनना चाहता।”

मेहर रोते हुए उसके पास आई।

“मैंने गलती की।”

आरव ने कहा, “गलती?”

उसकी आवाज पहली बार कठोर हुई।

“गलती तब होती है, जब कोई गलत तिथि लिख दे। तुमने मेरे जीवन में प्रवेश करने की योजना बनाई। मेरी माँ के बारे में जानकारी जुटाई। मेरे अकेलेपन को समझा। मुझसे विवाह किया। तीन साल तक किसी और से मिलती रहीं। मेरी कंपनी छीनने की योजना बनाई। फिर मुझे मानसिक रूप से अस्थिर घोषित करना चाहा।”

मेहर के पास कोई उत्तर नहीं था।

आरव की आँखें लाल हो गईं।

“इन सब में कौन-सा हिस्सा गलती था?”

मेहर ने सिर झुका लिया।

कुछ देर बाद उसने कहा, “शुरुआत में सब योजना थी।”

आरव की साँस रुक गई।

वह अब भी भीतर कहीं एक उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था।

“और बाद में?”

मेहर रोने लगी।

“बाद में सब वैसा नहीं रहा।”

“क्या मतलब?”

“तुम वैसे नहीं थे, जैसा रिषभ ने बताया था। उसने कहा था तुम अहंकारी होगे, कठोर होगे, मुझे केवल एक सजावट की तरह रखोगे। लेकिन तुमने मुझे सम्मान दिया। मेरे पिता की देखभाल की। मेरी हर बात सुनी।”

आरव ने पूछा, “क्या तुमने कभी मुझसे प्रेम किया?”

मेहर ने उसकी ओर देखा।

“मुझे नहीं पता।”

आरव की आँखों से आँसू बह निकले।

“तीन साल बाद भी तुम्हें नहीं पता?”

“मैं तुम्हारी परवाह करने लगी थी।”

“परवाह और प्रेम में फर्क होता है।”

“मुझे डर था कि रिषभ को छोड़ दूँगी, तो मेरा पुराना जीवन झूठ हो जाएगा। और अगर तुम्हारे साथ रहूँगी, तो मुझे हर दिन अपने अपराध के साथ जीना पड़ेगा।”

आरव ने कहा, “तुमने दोनों में से कोई रास्ता नहीं चुना। तुमने केवल झूठ चुना।”

मेहर फूट-फूटकर रोने लगी।

“मुझे एक अवसर दे दो।”

आरव ने धीरे से पूछा, “किसलिए?”

“सब ठीक करने के लिए।”

“क्या तुम वह रात वापस ला सकती हो, जब मैं तुम्हें अपनी माँ के कमरे में लेकर गया था?”

मेहर चुप रही।

“क्या तुम हमारे विवाह का पहला दिन वापस ला सकती हो?”

उसने सिर झुका लिया।

“क्या तुम मेरी हर उस याद से अपना झूठ निकाल सकती हो, जिसे मैंने अब तक प्रेम समझकर सँभाला?”

मेहर के पास कोई उत्तर नहीं था।

आरव ने कहा, “कुछ चीजें ठीक नहीं होतीं, मेहर। केवल स्वीकार की जाती हैं।”

मेहर ने रोते हुए पूछा, “क्या तुम मुझे कभी क्षमा कर पाओगे?”

आरव कुछ देर शांत रहा।

फिर बोला, “शायद एक दिन।”

मेहर ने आशा से उसकी ओर देखा।

लेकिन आरव ने आगे कहा, “पर क्षमा का अर्थ यह नहीं कि मैं तुम्हें दोबारा अपने जीवन में वही स्थान दे दूँ। मैं तुम्हारे प्रति घृणा लेकर नहीं जीना चाहता। लेकिन मैं स्वयं के प्रति अन्याय करके तुम्हें वापस भी नहीं स्वीकार कर सकता।”

मेहर ने अपनी अंगूठी उतारकर मेज पर रख दी।

आरव ने उसे नहीं रोका।

घर से निकलते समय मेहर मुख्य द्वार पर एक बार पीछे मुड़ी।

आरव सीढ़ियों के पास खड़ा था।

कभी वह उसकी वापसी की प्रतीक्षा करता था।

आज वह उसे जाते हुए देख रहा था।

दरवाजा बंद हो गया।

कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।

रिषभ के विरुद्ध जालसाजी, धोखाधड़ी और षड्यंत्र के गंभीर आरोप सिद्ध हुए। जाँच में यह भी सामने आया कि उसने कई अन्य लोगों को वित्तीय योजनाओं में धोखा दिया था।

मेहर ने जाँच में सहयोग किया। उसने अपने सभी संदेश, खाते और दस्तावेज अधिकारियों को सौंप दिए। इस कारण उसे रिषभ की तुलना में कम दंड मिला, लेकिन उसे भी अपने अपराधों की कीमत चुकानी पड़ी।

आरव ने किसी अधिकारी पर दबाव नहीं डाला।

न उसने दंड बढ़वाया, न कम करवाया।

देव ने उससे पूछा, “तुम चाहो तो उसके लिए कठिनाई बढ़ सकती है।”

आरव ने कहा, “मैं न्याय चाहता हूँ, बदला नहीं।”

आने वाले महीनों में आरव के जीवन में बहुत परिवर्तन आया।

वह पहले की तरह काम में डूबने लगा, लेकिन अब उसका उद्देश्य अलग था। उसने कर्मचारियों के लिए बने न्यास को मजबूत किया। कंपनी के मुनाफे का एक हिस्सा कर्मचारियों के परिवारों की शिक्षा और चिकित्सा के लिए निर्धारित किया गया।

उसने अपनी माँ सविता सिंघानिया के नाम पर एक संस्था बनाई, जो ऐसे बच्चों की सहायता करती थी, जिन्होंने कम उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया था।

संस्था के उद्घाटन के दिन देव ने उससे पूछा, “तुम ठीक हो?”

आरव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “ठीक होने का अर्थ बदल गया है।”

“कैसे?”

“पहले मुझे लगता था ठीक होने के लिए किसी का साथ होना जरूरी है। अब समझ आया है कि कभी-कभी स्वयं का साथ भी काफी होता है।”

फिर भी कुछ रातें कठिन होती थीं।

कभी वह अनायास दो कप चाय बनवा देता।

कभी घर लौटते समय दूर से किसी स्त्री को देखकर उसे मेहर समझ बैठता।

कभी किसी पुरानी धुन को सुनकर उसे वह शाम याद आ जाती, जब मेहर ने उसके कंधे पर सिर रखकर कहा था कि उसे कुछ नहीं चाहिए।

आरव ने उन यादों से भागना बंद कर दिया।

उसने समझ लिया कि उसका प्रेम झूठा नहीं था।

जिसने धोखा दिया, उसका व्यवहार झूठा था।

लेकिन जिसने सच्चे मन से प्रेम किया, उसकी भावनाएँ अपमानित नहीं हो जातीं।

लगभग एक वर्ष बाद आरव उसी सड़क से गुजर रहा था, जहाँ उसकी कार रिषभ की गाड़ी से टकराई थी।

बारिश हो रही थी।

उसने चालक से गाड़ी रोकने को कहा।

वह उसी छोटे भोजनालय में गया।

वही खिड़की, वही कोने की मेज और बाहर बरसती हुई बूँदें।

आरव वहाँ अकेला बैठ गया।

उसने अपनी जेब से वह पुराना घड़ी का डिब्बा निकाला।

घड़ी अब उसमें नहीं थी।

कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद वह घड़ी उसे वापस मिल गई थी, लेकिन उसने उसे पहनना छोड़ दिया था।

उसने घड़ी को नष्ट भी नहीं किया।

वह उसके लिए धोखे का प्रतीक जरूर थी, लेकिन उसके अपने प्रेम की याद भी थी।

कुछ देर बाद एक छोटा लड़का मेज के पास आया। वह भोजनालय के मालिक का बेटा था।

उसने डिब्बे को देखकर पूछा, “इसमें क्या है?”

आरव मुस्कुराया।

“एक पुरानी कहानी।”

“अच्छी कहानी?”

आरव ने बाहर बारिश की ओर देखते हुए कहा, “शुरुआत बहुत अच्छी थी।”

“और अंत?”

आरव कुछ क्षण सोचता रहा।

फिर बोला, “अंत ने मुझे मजबूत बना दिया।”

लड़का दौड़कर चला गया।

आरव ने डिब्बा बंद किया और उसे अपनी जेब में रख लिया।

उसने समझ लिया था कि कुछ अध्यायों को मिटाया नहीं जाता। उन्हें केवल समाप्त मानकर आगे बढ़ा जाता है।

घर लौटकर उसने वह डिब्बा अपनी माँ की पुरानी अलमारी में रख दिया।

उसके पास ही माँ की टूटी हुई चूड़ियों वाला लकड़ी का डिब्बा था।

आरव ने दोनों को देखा।

एक डिब्बे में उस प्रेम की निशानी थी, जिसने उसे जीवन दिया था।

दूसरे में उस प्रेम की, जिसने उसे तोड़ा था।

लेकिन दोनों ने उसे कुछ सिखाया था।

माँ के प्रेम ने सिखाया कि सच्चा प्रेम मनुष्य को सुरक्षित महसूस कराता है।

मेहर के धोखे ने सिखाया कि प्रेम में स्वयं को पूरी तरह खो देना प्रेम नहीं, आत्मविस्मृति है।

आरव ने अलमारी बंद कर दी।

अगली सुबह वह कंपनी के कर्मचारियों के बीच था। पहली बार उसने अधिकारियों की मेज पर बैठने के बजाय साधारण कर्मचारियों के भोजनालय में उनके साथ भोजन किया।

एक पुराने कर्मचारी ने कहा, “सर, आप बहुत बदल गए हैं।”

आरव मुस्कुराया।

“बदलना बुरा है?”

“नहीं। अब आप पहले से ज्यादा अपने लगते हैं।”

आरव ने उन शब्दों को चुपचाप अपने भीतर रख लिया।

शायद यही उसका वास्तविक पुनर्जन्म था।

कभी वह सोचता था कि मेहर ने उसे चुना है, इसलिए वह महत्वपूर्ण है।

अब वह जानता था कि उसका मूल्य किसी के चुनने या छोड़ने पर निर्भर नहीं करता।

दोस्तों, इस कहानी का अंत किसी नई प्रेमिका के आने से नहीं होता। क्योंकि हर टूटे हुए इंसान की कहानी को पूरा करने के लिए तुरंत नया प्रेम जरूरी नहीं होता।

कभी-कभी आत्मसम्मान ही सबसे सुंदर नया रिश्ता बन जाता है।

आरव ने मेहर को क्षमा करने का प्रयास किया, लेकिन उसे अपने जीवन में वापस नहीं बुलाया।

उसने रिषभ से बदला नहीं लिया, लेकिन उसे उसके अपराधों से बचाया भी नहीं।

उसने अपनी दौलत को किसी एक व्यक्ति के हाथों में देने के बजाय उन हजारों लोगों के साथ बाँटा, जिन्होंने उसके साथ मिलकर उसे बनाया था।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—उसने दोबारा स्वयं पर भरोसा करना सीखा।

कहानी की अंतिम रात आरव अपने घर की छत पर खड़ा था। नीचे मुंबई की रोशनियाँ चमक रही थीं। समुद्र से ठंडी हवा आ रही थी।

उसने अपनी खाली कलाई की ओर देखा।

जहाँ कभी वह घड़ी बँधी थी, वहाँ अब कुछ नहीं था।

लेकिन पहली बार उसे वह खालीपन बुरा नहीं लगा।

क्योंकि कुछ खाली स्थान हमें किसी नए व्यक्ति के लिए नहीं, स्वयं के लिए चाहिए होते हैं।

आरव ने आसमान की ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा—

“वह मेरे जीवन में मेरी दौलत के लिए आई थी। जाते-जाते वह मेरा भरोसा भी ले जाना चाहती थी। लेकिन उसने अनजाने में मुझे उससे भी कीमती चीज लौटा दी—मेरा आत्मसम्मान।”

समुद्र की लहरें किनारे से टकराती रहीं।

शहर चलता रहा।

और आरव सिंघानिया, जो कभी इस डर में जीता था कि कोई उसे छोड़ न दे, अब इस विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा था कि सही व्यक्ति साथ रहे या न रहे—वह स्वयं को फिर कभी नहीं छोड़ेगा।

SHARE THE STORY

यह कहानी किसी अपने के साथ साझा करें

7 बार पढ़ी गई
Whatsapp Telegram
DILFEVER YOUTUBE

ऐसी ही नई कहानियाँ वीडियो में सुनें

@DilFever

Subscribe करें
आपकी राय

अगर आप मुख्य किरदार की जगह होते, तो क्या फैसला लेते?

अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर लिखें।

Leave a Comment