Crime Story

जिस पत्नी को दुनिया ने बेवफा कहा, उसी के लिए आईपीएस बनकर लौटा पति

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

रुद्रपुर के गरीब युवक कबीर का सपना अफसर बनने का था, और उसकी पत्नी राधिका ने अपने गहने बेचकर उसे दिल्ली भेज दिया। लेकिन कबीर की गैरमौजूदगी में उसका सबसे भरोसेमंद दोस्त विक्रम ही राधिका की जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया। समाज ने राधिका को बेवफा समझ लिया, पुलिस ने कबीर की फरियाद ठुकरा दी, और कबीर टूटकर भी हार नहीं माना। तीन साल बाद जब वह आईपीएस बनकर लौटा, तो एक ऐसा सच सामने आया जिसने दोस्ती, प्यार और न्याय की पूरी परिभाषा बदल दी।

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 28 मिनट

भाग 1

पंजाब और हिमाचल की सीमा पर बसा एक छोटा सा पहाड़ी गाँव था—’रुद्रपुर’। यह गाँव अपनी शांत वादियों, देवदार के ऊँचे पेड़ों और सर्दियों में गिरने वाली बर्फ के लिए जाना जाता था। यहाँ की ज़िंदगी पहाड़ों की ढलान की तरह धीमी और संभलकर चलती थी। गाँव के ज़्यादातर लोग या तो सेब के बागानों में मज़दूरी करते थे या सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करते थे। इसी गाँव के एक छोर पर, जहाँ से पथरीला रास्ता जंगलों की तरफ जाता था, एक पुरानी लकड़ी और पत्थरों से बनी ढहती हुई कोठरी थी। इस कोठरी में रहता था कबीर।

कबीर एक बेहद स्वाभिमानी, शांत और गहरी आँखों वाला नौजवान था। गाँव के दूसरे लड़कों की तरह उसने कभी सेना में जाने या शहर के किसी कारखाने में काम करने की नहीं सोची थी। उसकी आँखों में एक अलग ही आग थी—वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में जाकर देश की प्रशासनिक व्यवस्था को बदलना चाहता था। लेकिन रुद्रपुर जैसे पिछड़े गाँव में, जहाँ ढंग की बिजली भी सिर्फ कुछ घंटों के लिए आती थी, कबीर का यह सपना लोगों के लिए एक मज़ाक से कम नहीं था। जब भी कबीर हाथ में मोटी-मोटी किताबें लेकर पोस्ट ऑफिस की टूटी बेंच पर बैठता, तो गाँव के ज़मींदार और बुज़ुर्ग हँसते हुए कहते, “ओए कबीर! बाप पूरी ज़िंदगी दूसरों के खेतों में कुदाल चलाता रहा, और बेटा राजा बाबू बनने के ख्वाब देख रहा है। ज़मीन पर आ जा, नहीं तो ऊपर से गिरेगा तो हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी।” कबीर इन तानों को सुनता, अपनी आँखें नीचे करता और चुपचाप वहाँ से उठ जाता। उसने खुद से वादा किया था कि वह अपनी जुबान से नहीं, बल्कि अपनी कलम और कामयाबी से इन सब का मुँह बंद करेगा।

इस मुश्किल सफर में अगर कोई कबीर की रीढ़ की हड्डी बनकर खड़ी थी, तो वह थी उसकी पत्नी राधिका। राधिका पास के ही एक सीधे-साधे परिवार की बेटी थी। वह दिखने में जितनी सौम्य और शांत थी, भीतर से उतनी ही दृढ़ संकल्पी थी। कबीर और राधिका की शादी को अभी जुम्मा-जुम्मा दो साल ही हुए थे, लेकिन राधिका ने कबीर के सपनों को इस कदर अपना लिया था कि अब दोनों की साँसें एक ही मकसद के लिए चलती थीं। दिनभर राधिका दूसरों के घरों में सिलाई-कढ़ाई का काम करती, ताकि घर का चूल्हा जल सके, और रात होते ही वह कबीर की परछाई बन जाती। पहाड़ी रातों में जब कबीर टेबल लैंप की मद्धम रोशनी में इतिहास और भूगोल के पन्ने पलटता, तो राधिका बिना कहे उसके पास आकर बैठ जाती। कभी वह उसके सिर पर तेल की मालिश करती, तो कभी कड़कड़ाती ठंड में अदरक वाली गर्मागर्म चाय बनाकर लाती। कई बार रात के दो-तीन बज जाते, कबीर पढ़ते-पढ़ते थक जाता, लेकिन राधिका की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं होता था। कबीर जब उससे कहता, “राधिका, तुम सो जाओ, सुबह तुम्हें काम पर भी जाना है,” तो वह मुस्कुराकर कहती, “जब तक आप इस लाल बत्ती वाली गाड़ी का सपना पूरा नहीं कर लेते, मेरी आँखों को सोने का कोई हक नहीं है। मुझे पता है कि हमारी ये काली रातें एक दिन बहुत खूबसूरत सुबह लेकर आएंगी।”

इसी गाँव में कबीर का एक लंगोटिया यार था, जिसका नाम था विक्रम। विक्रम गाँव के एक रसूखदार और संपन्न परिवार से था। उसके पिता के पास सेब के कई बड़े बागान थे। विक्रम और कबीर बचपन से एक ही स्कूल में पढ़े थे, एक ही थाली में खाना खाया था और गाँव की गलियों में साथ बड़े हुए थे। पूरे रुद्रपुर में उनकी दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं। कबीर को विक्रम पर अपनी जान से भी ज़्यादा भरोसा था। वह अक्सर राधिका से कहता था, “अगर इस दुनिया में मेरे माता-पिता के बाद कोई मेरा अपना है, तो वह विक्रम है। उसके रहते मुझे किसी बात की चिंता नहीं होती।” विक्रम भी बाहर से ऐसा ही दिखाता था। जब भी कबीर को किताबों के लिए या फॉर्म भरने के लिए पैसों की तंगी होती, विक्रम सबसे पहले आगे आकर कबीर की जेब में पैसे डाल देता था। अगर गाँव का कोई रसूखदार कबीर का मज़ाक उड़ाता, तो विक्रम उससे लड़ने पर उतारू हो जाता था। राधिका भी विक्रम को अपने सगे भाई की तरह मानती थी और जब भी वह घर आता, उसके लिए बड़े चाव से पहाड़ी पकवान बनाती थी।

लेकिन इंसानी दिमाग की परतें बहुत गहरी होती हैं। विक्रम के इस दोस्ताना चेहरे के पीछे एक गहरा, काला और डरावना राज छुपा था, जिससे कबीर और राधिका पूरी तरह अनजान थे। कॉलेज के दिनों में विक्रम राधिका को एकतरफा चाहने लगा था। उसने कभी किसी से अपने दिल की बात नहीं कही थी, क्योंकि राधिका हमेशा कबीर के प्रति समर्पित थी। जब कबीर और राधिका की शादी तय हुई, तो विक्रम के पैरों तले जमीन खिसक गई थी, लेकिन उसने अपनी नफरत और जलन को दोस्ती के एक बेहद खूबसूरत मुखौटे के पीछे छुपा लिया। वह अंदर ही अंदर कबीर की सादगी, उसकी पढ़ाई और सबसे ज़्यादा राधिका के उसके प्रति अगाध प्रेम से जलता था। वह सही मौके के इंतज़ार में था, जहाँ वह कबीर को इस कदर बर्बाद कर सके कि वह कभी उठ न पाए।

एक शाम, जब आसमान में काले बादल घिरे थे और पहाड़ों पर ठंडी हवाएं चल रही थीं, कबीर अपनी कोठरी के बाहर एक लकड़ी के स्टूल पर बैठा था। उसके सामने देश के सबसे कठिन इम्तिहान का सिलेबस खुला हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कहीं दूर शून्य में तैर रही थीं। राधिका ने चूल्हे से हाथ धोए और उसके पास आकर बैठ गई। उसने कबीर के कंधे पर हाथ रखकर पूछा, “क्या बात है कबीर? आज पन्ने पलट नहीं रहे, बस ठहर गए हैं। कोई परेशानी है?” कबीर ने एक ठंडी और लंबी साँस ली और राधिका का हाथ थामते हुए बोला, “राधिका, मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे साथ अन्याय कर रहा हूँ। गाँव की इस छोटी सी कोठरी में बैठकर, बिना किसी कोचिंग और सही किताबों के, मैं कभी आईएएस (IAS) की परीक्षा पास नहीं कर पाऊँगा। दिल्ली या चंडीगढ़ जैसे बड़े शहर जाना ही होगा। वहाँ रहने, खाने और बड़ी कोचिंग की फीस के लिए लाखों रुपये चाहिए। और हमारे पास… हमारे पास तो अगले महीने के राशन के भी पूरे पैसे नहीं हैं।” कबीर की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी।

राधिका कुछ पल के लिए शांत रही। उसने कबीर की आँखों में छिपी उस लाचारी को देखा जो उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। वह उठी, कमरे के अंदर गई और काफी देर तक बाहर नहीं आई। कबीर को लगा कि शायद राधिका उदास हो गई है। लेकिन जब वह बाहर आई, तो उसके हाथों में एक मखमली पुराना कपड़ा था। उसने कबीर के सामने वह कपड़ा खोला। उसके अंदर राधिका के सोने के कंगन, गले का हार और झुमके चमक रहे थे—यह वह इकलौता जेवर था जो राधिका की माँ ने उसे शादी में दिया था। कबीर झटके से खड़ा हो गया और बोला, “नहीं राधिका! यह कभी नहीं होगा। मैं तुम्हारी माँ की आखिरी निशानी बेचकर अपने सपनों की लाश नहीं सजाऊँगा। मैं मज़दूरी कर लूँगा, लेकिन इन गहनों को हाथ नहीं लगाने दूँगा।”

राधिका की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसके चेहरे पर एक गजब का आत्मबल था। उसने कबीर का हाथ पकड़ा और उन गहनों को उसकी हथेली पर रखते हुए कहा, “कबीर, गहने तो सिर्फ शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन आपका सपना इस आत्मा की शोभा है। अगर आज ये गहने नहीं बिके, तो कल ये समाज आपकी काबिलियत को बेच खाएगा। जब आप बड़े अफसर बन जाएंगे, तो मुझे इससे भी सुंदर गहने दिला देना। पर आज, आपको दिल्ली जाना ही होगा।” कबीर राधिका के इस त्याग के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया। उस रात दोनों बहुत रोए, लेकिन उन आँसूओं में उम्मीद की एक नई किरण थी।

अगले दिन, राधिका ने शहर जाकर अपने सारे गहने बेच दिए। जब यह खबर गाँव में फैली, तो लोगों ने थू-थू करना शुरू कर दिया। चाय के टपरों पर बातें होने लगीं कि “कबीर कैसा मर्द है जो लुगाई के गहने बेचकर अय्याशी करने शहर जा रहा है।” लेकिन राधिका ने अपने कान बंद कर लिए। उसे सिर्फ कबीर की आँखों का वह संकल्प दिखाई दे रहा था।

वह दिन भी आ गया जब कबीर को दिल्ली की बस पकड़नी थी। सुबह से ही रुद्रपुर का मौसम बेहद भावुक था। हल्के कोहरे के बीच कबीर, राधिका और विक्रम गाँव के बस स्टॉप पर खड़े थे। बस आने में कुछ ही मिनट बाकी थे। कबीर के कंधे पर एक पुराना कपड़ा का थैला था, जिसमें राधिका के बेचे हुए गहनों के पैसे, कुछ जोड़ी कपड़े और ढेर सारी उम्मीदें थीं। राधिका ने अपने आँसूओं को जबरन रोकते हुए कबीर के पैर छुए और कहा, “कबीर, वहाँ जाकर सिर्फ पढ़ाई करना। इस गाँव की, मेरी या इन तानों की फिक्र मत करना। बस एक बात याद रखना, जब लौटना तो पीठ दिखाकर मत लौटना।” कबीर ने उसके सिर पर हाथ रखा और मुस्कुराया।

तभी पास खड़े विक्रम ने आगे बढ़कर कबीर को गले लगा लिया। उसने कबीर की पीठ थपथपाते हुए कहा, “भाई कबीर, तू जा और दिल्ली फतह कर। यहाँ रुद्रपुर में तेरी राधिका और तेरे घर की जिम्मेदारी मेरी है। जब तक तेरा यह भाई ज़िंदा है, राधिका भाभी को कोई तकलीफ नहीं होगी। तू बस आँखें बंद करके अपनी किताबों में डूब जा।” कबीर की आँखों में विक्रम के लिए सम्मान और बढ़ गया। उसने कहा, “विक्रम, मुझे पता है कि तेरे जैसा भाई हो तो इंसान दुनिया की हर जंग जीत सकता है। राधिका का ख्याल रखना।” विक्रम ने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।

बस हॉर्न बजाती हुई आई और कबीर उसमें सवार हो गया। खिड़की वाली सीट पर बैठकर कबीर ने आखिरी बार पीछे देखा। राधिका हाथ हिला रही थी, उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, और उसके ठीक पीछे खड़ा था विक्रम, जिसके चेहरे पर एक बेहद अजीब, रहस्यमयी मुस्कान थी। वह मुस्कान किसी दोस्त की नहीं, बल्कि एक शिकारी की थी जिसे पता था कि उसका शिकार अब पूरी तरह अकेला हो चुका है। बस धीरे-धीरे मुड़कर पहाड़ों के पीछे ओझल हो गई। कबीर दिल्ली की तरफ बढ़ रहा था, जहाँ उसे किताबों से लड़ना था, लेकिन वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि रुद्रपुर में उसकी ज़िंदगी की सबसे खौफनाक और घिनौनी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी थी।

भाग 2: अँधेरी सुरंग और विश्वासघातदिल्ली पहुँचने के बाद कबीर को एहसास हुआ कि हकीकत किताबों में लिखी बातों से कहीं ज़्यादा कड़वी होती है। करोल बाग की तंग गलियों में, जहाँ सूरज की रोशनी भी बमुश्किल पहुँचती थी, उसने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। उस कमरे की दीवारें सीलन से भरी थीं और छत से प्लास्टर गिरता रहता था। कोचिंग की भारी फीस देने के बाद कबीर के पास जो पैसे बचे थे, उन्हें वह फूंक-फूंक कर खर्च कर रहा था। कबीर सुबह पाँच बजे उठता, दिल्ली की कड़कड़ाती ठंड में तैयार होकर लाइब्रेरी जाता और रात के ग्यारह बजे तक वहीं बैठा रहता। पैसों की कमी के कारण वह दिन में सिर्फ एक बार ढाबे पर आधी प्लेट दाल और दो रोटियाँ खाता था। कई बार भूख के मारे उसके पेट में मरोड़ उठती, सिर चकराने लगता, लेकिन जैसे ही वह हार मानने की सोचता, वह अपनी जेब से राधिका की एक छोटी सी मुड़ी-तुड़ी तस्वीर निकाल लेता। उस तस्वीर को देखकर उसके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता और वह फिर से किताबों के पन्नों में खो जाता।

उधर रुद्रपुर गाँव में राधिका की ज़िंदगी एक अलग ही इम्तिहान से गुज़र रही थी। कबीर के जाने के बाद कोठरी का सन्नाटा उसे काटने को दौड़ता था। वह दिनभर खेतों में मज़दूरी करती, रात को आकर सिलाई का काम करती ताकि कबीर को हर महीने कुछ पैसे भेज सके। पहाड़ों में नेटवर्क की भारी समस्या थी, इसलिए हफ्ते में सिर्फ एक या दो बार कबीर का फोन पीसीओ (PCO) पर आता था। वह पाँच मिनट की बातचीत ही राधिका के जीने का सहारा थी। कबीर हमेशा कहता, “राधिका, मैं ठीक हूँ, तुम अपना ख्याल रखना।” और राधिका अपने छाले पड़े हाथों को छुपाकर कहती, “मैं यहाँ रानी की तरह हूँ कबीर, आप बस पढ़ाई पर ध्यान दो।”

इसी दौरान गाँव में विक्रम की हलचल बहुत बढ़ गई थी। वह रोज़ शाम को कबीर की कोठरी के चक्कर लगाने लगा था। कभी वह राधिका के लिए बाज़ार से राशन ले आता, तो कभी कुएं से पानी भरने में उसकी मदद करने की ज़िद करता। शुरुआत में राधिका को लगा कि विक्रम एक सच्चे दोस्त का फर्ज निभा रहा है। गाँव की औरतें भी कहती थीं, “धन्य है विक्रम जैसी दोस्ती, कबीर शहर में है पर विक्रम ने राधिका को कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।” लेकिन धीरे-धीरे विक्रम की आँखों की चमक और उसकी बातें बदलने लगीं। वह अक्सर राधिका से कहता, “भाभी, कबीर तो दिल्ली के बड़े शहर में खो गया है। वहाँ बड़ी-बड़ी लड़कियाँ हैं, चकाचौंध है। क्या पता वह तुम्हें याद भी करता है या नहीं? तुम यहाँ इतनी मेहनत क्यों करती हो, मुझसे कहो, मैं तुम्हें ऐश की ज़िंदगी दूँगा।” राधिका को विक्रम की ये बातें खटकने लगीं। उसने विक्रम से दूरी बनानी शुरू कर दी और उसे घर आने से मना कर दिया। राधिका का यह इनकार विक्रम के अहंकार पर एक गहरी चोट था। उसका वह दबा हुआ पागलपन अब एक खतरनाक साज़िश में बदलने लगा था।

वक्त बीतता गया और कबीर की मेहनत रंग लाने लगी। उसने सिविल सेवा की प्रारंभिक (Prelims) और मुख्य (Mains) परीक्षा बड़े अच्छे अंकों से पास कर ली थी। अब सिर्फ इंटरव्यू बाकी था। जब कबीर ने फोन पर राधिका को यह खबर सुनाई, तो राधिका गाँव के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर फूट-फूंट कर रो पड़ी। पूरे रुद्रपुर में सनसनी फैल गई कि एक गरीब का बेटा देश का सबसे बड़ा अफसर बनने की कगार पर है। जो लोग कबीर का मज़ाक उड़ाते थे, वे अब राधिका के आगे-पीछे घूमने लगे थे। लेकिन इस कामयाबी की खबर ने विक्रम के भीतर के शैतान को पूरी तरह जगा दिया था। उसे लगा कि अगर कबीर आईएएस बन गया, तो राधिका हमेशा के लिए उसकी पहुँच से दूर हो जाएगी और वह कबीर के सामने कभी सिर उठाकर नहीं देख पाएगा।

एक रात, रुद्रपुर में आंधी-तूफान का मंज़र था। पहाड़ों पर तेज़ बारिश हो रही थी और बिजली के खंभे गिर जाने से पूरे गाँव में घुप्प अँधेरा था। राधिका अपनी कोठरी में अकेली थी और लालटेन की रोशनी में कबीर के लिए स्वेटर बुन रही थी। अचानक आधी रात को उसके दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई। राधिका का दिल दहल गया। उसने डरते-डरते दरवाज़ा खोला। सामने विक्रम खड़ा था, वह पूरी तरह भीगा हुआ था और उसके चेहरे पर एक नकली खौफ था। उसने हांफते हुए कहा, “राधिका भाभी! अनर्थ हो गया। दिल्ली से कबीर के दोस्त का फोन आया था… कबीर का बहुत भयानक एक्सीडेंट हो गया है। वह अस्पताल में वेंटिलेटर पर है और बार-बार तुम्हारा नाम ले रहा है। जल्दी चलो, मेरी गाड़ी बाहर खड़ी है।”

आप भाग 2 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 28 मिनट

भाग 2

यह सुनते ही राधिका के हाथ से स्वेटर और लालटेन छूट कर गिर गए। कबीर के एक्सीडेंट की बात सुनते ही उसका दिमाग सुन्न हो गया। उसने न कोई सवाल किया, न कुछ सोचा। वह बस रोती हुई विक्रम के साथ उसकी जीप की तरफ भागी। बारिश बहुत तेज़ थी। जीप जैसे ही गाँव की सीमा पार करके घने जंगलों वाले रास्ते पर पहुँची, राधिका को कुछ अजीब लगा। उसने रोते हुए पूछा, “विक्रम भाई, यह रास्ता तो शहर नहीं जाता, तुम गाड़ी कहाँ ले जा रहे हो?” विक्रम ने कोई जवाब नहीं दिया, उसने बस एक घिनौनी मुस्कान बिखेरी। इससे पहले कि राधिका कुछ समझ पाती, जीप के पीछे बैठे विक्रम के दो गुर्गों ने अचानक राधिका के मुँह पर क्लोरोफॉर्म से भीगा हुआ कपड़ा दबा दिया। राधिका ने छटपटाने की कोशिश की, कबीर का नाम पुकारा, लेकिन कुछ ही सेकंड में उसकी आँखों के सामने गहरा अँधेरा छा गया।

जब राधिका को होश आया, तो वह किसी अस्पताल में नहीं थी। चारों तरफ सड़ी हुई सीलन की बदबू थी। वह एक पुरानी, आधी ढही हुई हवेली के बेसमेंट में एक लोहे के खंभे से बंधी हुई थी। खिड़की के नाम पर सिर्फ एक छोटी सी झरी थी, जहाँ से दिन का उजाला भी बमुश्किल अंदर आता था। तभी भारी जूतों की आवाज़ गूंजी और लोहे का भारी दरवाज़ा खुला। सामने विक्रम हाथ में शराब की बोतल लिए खड़ा था। राधिका ने चीखते हुए कहा, “विक्रम! यह क्या नीचता है? मेरा कबीर कहाँ है? मुझे उसके पास जाने दो!”

विक्रम ज़ोर से हँसा, उसकी हँसी में एक पागलपन था। उसने राधिका के चेहरे को बेरहमी से पकड़कर कहा, “कबीर को कुछ नहीं हुआ राधिका! वह दिल्ली में मजे में है। लेकिन अब तुम कभी उसके पास नहीं जा पाओगी। मैंने कबीर से बदला ले लिया है। वह अफसर तो बन जाएगा, लेकिन अपनी सबसे कीमती चीज़—यानी तुम्हें—कभी नहीं ढूंढ पाएगा। अब यही तुम्हारी दुनिया है, और मैं तुम्हारा भगवान।” राधिका ने उसके मुँह पर थूक दिया और कहा, “मेरा कबीर तुम्हें छोड़ना नहीं, धरती चीर कर भी वह मुझे ढूंढ निकालेगा।” विक्रम ने गुस्से में उसे एक जोरदार थप्पड़ मारा और वहाँ से चला गया।

अगले दिन दिल्ली में कबीर का इंटरव्यू था, लेकिन उसका मन बहुत बेचैन था। उसने राधिका को फोन करने की कोशिश की, लेकिन गाँव का हर फोन बंद आ रहा था। उसने सोचा कि शायद पहाड़ी मौसम के कारण नेटवर्क ठप होगा। इंटरव्यू खत्म होने के बाद उसने फिर कोशिश की, लेकिन कोई संपर्क नहीं हो पाया। दो दिन, तीन दिन बीत गए, कबीर की बेचैनी अब एक गहरे डर में बदल चुकी थी। उसने गाँव के एक पड़ोसी को फोन मिलाया। पड़ोसी ने झिझकते हुए कहा, “कबीर भाई… राधिका तो तीन दिन से गाँव में नहीं है। वह विक्रम के साथ कहीं गई थी और तब से दोनों का कुछ पता नहीं है। गाँव में बातें हो रही हैं कि…” पड़ोसी की बात पूरी होने से पहले ही कबीर के हाथ से फोन छूट गया।

कबीर बिना एक पल गंवाए पहली बस पकड़कर रुद्रपुर पहुँचा। जब वह अपनी कोठरी में दाखिल हुआ, तो वहाँ सिर्फ सन्नाटा और बिखरा हुआ सामान था। चूल्हा ठंडा पड़ा था, और ज़मीन पर वह आधा बुना हुआ स्वेटर पड़ा था जिसे राधिका उसके लिए बना रही थी। कबीर पागलों की तरह गाँव की गलियों में भागा। तभी सामने से विक्रम आता हुआ दिखा। विक्रम के चेहरे पर एक झूठी चिंता और मायूसी थी। उसने कबीर को गले लगाते हुए कहा, “कबीर भाई! मैं बर्बाद हो गया। मैं राधिका भाभी को नहीं बचा पाया। तीन दिन पहले वह किसी शहर के आदमी के साथ जीप में बैठकर कहीं चली गई। मैंने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी। पूरे गाँव में बदनामी हो रही है भाई।”

कबीर ने विक्रम के कॉलर को पकड़ लिया और चिल्लाया, “झूठ! सफेद झूठ! मेरी राधिका ऐसा कभी नहीं कर सकती। वह मेरे लिए अपने गहने बेच सकती है, अपनी जान दे सकती है, लेकिन मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती।” कबीर सीधे थाने पहुँचा। वहाँ के भ्रष्ट और सुस्त थानेदार ने कबीर की बात सुनने से साफ़ मना कर दिया। थानेदार ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, “ओए लड़के! रोज़ का काम है हमारा। पहाड़ की लड़कियाँ शहर के चकाचौंध में किसी के भी साथ भाग जाती हैं। तुम्हारे पास कोई सबूत है तो लाओ, नहीं तो यहाँ आकर हमारा वक्त मत बर्बाद करो।” कबीर गिड़गिड़ाया, रोया, पैर पकड़े, लेकिन उस गरीब और बेबस कबीर की सुनने वाला कोई नहीं था। उस दिन कबीर को समझ आया कि इस देश में न्याय भी सिर्फ अमीरों की जागीर है।

दिन हफ़्तों में और हफ़्तों महीनों में बदलने लगे। कबीर पागलों की तरह हर बस स्टैंड, हर अस्पताल, हर रेलवे स्टेशन पर राधिका की तस्वीर लेकर भटकता रहा। गाँव वालों ने भी धीरे-धीरे कबीर से बात करना बंद कर दिया, सब मान चुके थे कि राधिका भाग गई है। विक्रम हर वक्त कबीर के साथ रहने का नाटक करता, उसे दिलासा देता, जबकि पीठ पीछे वह राधिका के पास जाकर उस पर ज़ुल्म ढाता था। कबीर पूरी तरह टूट चुका था। लेकिन एक रात, जब वह राधिका की तस्वीर के सामने बैठा था, उसकी आँखों के आँसू सूख कर अंगारे बन गए। उसने आसमान की तरफ देखकर कहा, “अगर यह सिस्टम मेरी राधिका को नहीं ढूंढ सकता, तो मैं खुद इस सिस्टम का सबसे बड़ा हिस्सा बनूँगा। मैं लौटूँगा राधिका, इस खाकी वर्दी में लौटूँगा, और जो भी इस साज़िश के पीछे है, उसे पाताल से भी खोद निकालूँगा।” कबीर ने अपनी बिखरी हुई किताबों को समेटा और एक नए, खौफनाक संकल्प के साथ फिर से पढ़ाई में जुट गया।

भाग 3: प्रतिशोध और न्याय की सुबहवक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूमता रहा। एक साल, दो साल और फिर देखते-देखते तीन साल का लंबा समय बीत गया। इन तीन सालों में रुद्रपुर गाँव में बहुत कुछ बदल गया था, लेकिन कबीर की कोठरी का वह अँधेरा और कबीर के दिल की आग वैसी ही थी। कबीर अब वह पुराना, सीधा-साधा लड़का नहीं रह गया था। उसकी आँखों में एक कठोरता आ चुकी थी और चेहरे की मासूमियत की जगह एक फौलादी दृढ़ता ने ले ली थी। इन तीन सालों में उसने दिन-रात को एक कर दिया था। आखिरकार, यूपीएससी (UPSC) का अंतिम परिणाम आया और कबीर ने पूरे देश में शीर्ष रैंक हासिल की। वह भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के लिए चुना गया था।

पूरे रुद्रपुर गाँव में ढोल-नगाड़े बज रहे थे। जो लोग कभी कबीर को ताने मारते थे, वे अब उसके घर के बाहर गुलदस्ते लेकर खड़े थे। कबीर गाँव आया, लेकिन उसके चेहरे पर कामयाबी की कोई खुशी नहीं थी। उसने अपनी झोपड़ी में कदम रखा और सीधे राधिका की तस्वीर के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने अपनी आँखें बंद कीं और धीरे से कहा, “राधिका, मैं अफसर बन गया हूँ। तुम्हारी माँ के गहनों की कीमत आज मैंने चुका दी है। लेकिन तुम कहाँ हो? मेरा यह ताज तुम्हारे बिना अधूरा है।” कबीर की आँखों से एक आँसू टपक कर राधिका की तस्वीर पर गिर गया।

उधर, उस घने जंगल के बीच स्थित पुरानी हवेली के तहखाने में राधिका के लिए ये तीन साल किसी नरक से बदतर रहे थे। विक्रम और उसके आदमियों ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से इस कदर तोड़ा था कि उसका शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा रह गया था। उसके लंबे और खूबसूरत बाल अब बिखरे और उलझे हुए थे, चेहरा पीला पड़ चुका था और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे बन गए थे। विक्रम रोज़ वहाँ आता, उसे कभी खाना देता तो कभी भूखा छोड़ देता, और हर बार कहता, “अब तो मान जा राधिका, कबीर अब बड़ा अफसर बन गया है, वह दिल्ली की मेमों के साथ ऐश कर रहा होगा। वह तुझे भूल चुका है।” लेकिन राधिका के भीतर की लौ अभी भी जल रही थी। वह अपनी कमज़ोर आवाज़ में हर बार यही कहती, “मेरा कबीर मुझे कभी नहीं भूलेगा। वह आएगा… वह यमराज के मुँह से भी मुझे छीन लाएगा।”

एक शाम, विक्रम बेहद नशे में धुत होकर उस तहखाने में आया। कबीर के आईपीएस बनने की खबर ने उसके दिमाग का संतुलन बिगाड़ दिया था। वह राधिका के सामने आकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने और चिल्लाने लगा, “वह बन गया! कबीर साला आईपीएस बन गया! लेकिन क्या फायदा? वह आज भी अपनी पत्नी के लिए तड़प रहा है। राधिका, तूने मुझे ठुकराकर उस भिखारी को चुना था ना? देख, आज तीन साल हो गए, वह लाल बत्ती की गाड़ी में घूमता है पर तुझे इस कालकोठरी से नहीं निकाल पाया।” विक्रम नशे में अंधा होकर बड़बड़ाता रहा और गुस्से में उसने हवेली के पुराने चौकीदार को लात मार दी। वह यह भूल गया कि उस हवेली के बाहर, घने जंगलों में एक बूढ़ा गड़रिया अपनी भेड़ों को ढूंढते हुए बारिश से बचने के लिए हवेली के टूटे हुए बरामदे में छुपा बैठा था। उस बूढ़े गड़रिये ने विक्रम की चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें और ‘कबीर’ और ‘राधिका’ का नाम साफ-साफ सुन लिया था। वह बूढ़ा रुद्रपुर का ही रहने वाला था और कबीर की कहानी से अच्छी तरह वाकिफ था।

अगली सुबह, वह बूढ़ा गड़रिया थरथर कांपता हुआ सीधे कबीर की कोठरी पर पहुँचा। कबीर उस वक्त अपनी वर्दी की टोपी हाथ में लिए घर से निकलने वाला था। बूढ़े ने कबीर के पैर पकड़ लिए और रोते हुए कहा, “कबीर बेटा… कबीर बेटा, अनर्थ हो गया है। तेरी राधिका मरी नहीं है, वह ज़िंदा है!” यह सुनते ही कबीर के हाथ से पुलिस की टोपी छूटकर ज़मीन पर गिर गई। उसने बूढ़े को उठाकर अपने सीने से लगाया और पूछा, “काका! आप क्या कह रहे हैं? मेरी राधिका कहाँ है? सच-सच बताइए!” बूढ़े ने कांपते हुए उस घने जंगल की पुरानी हवेली और रात को विक्रम के मुँह से सुनी सारी बातें कबीर को बता दीं।

कबीर के दिमाग में जैसे कोई बम फूटा हो। तीन साल का सारा सस्पेंस, सारी कड़ियाँ एक पल में जुड़ गईं। वह समझ गया कि जिस विक्रम को वह अपना भाई मानता था, वही इस पूरी तबाही का मास्टरमाइंड था। कबीर का खून खौल उठा, उसकी आँखें लाल हो गईं। उसने तुरंत अपने सीनियर अधिकारियों को फोन किया और भारी पुलिस बल मंगवाया। कबीर खुद अपनी सरकारी गाड़ी में बैठा और पुलिस की कई गाड़ियाँ सायरन बजाती हुई उस घने जंगल की तरफ दौड़ पड़ीं।

जब पुलिस बल उस पुरानी हवेली के पास पहुँचा, तो कबीर ने गाड़ियाँ दूर ही रुकवा दीं ताकि विक्रम को भनक न लगे। कबीर अपनी पिस्तौल हाथ में लेकर पुलिसकर्मियों के साथ दबे पाँव हवेली के अंदर दाखिल हुआ। हवेली के तहखाने का भारी लोहे का दरवाज़ा बंद था। कबीर ने अपनी पूरी ताकत से उस दरवाज़े पर लात मारी। एक ज़ोरदार धमाके के साथ दरवाज़ा टूट कर गिर गया। अंदर का मंज़र देखकर कबीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

कोने में लोहे की सांकलों से बंधी, एक कमज़ोर, बीमार और टूटी हुई महिला पड़ी थी। कबीर ने चिल्लाया, “राधिका!” राधिका ने बहुत मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। धुंधली रोशनी में उसने खाकी वर्दी पहने, कंधों पर सितारे चमकाए खड़े कबीर को देखा। राधिका की सूखी आँखों से आँसूओं का सैलाब बह निकला। उसने कांपते होठों से कहा, “कबीर… मुझे पता था… मुझे पता था तुम आओगे।” कबीर दौड़कर उसके पास पहुँचा और उसकी सांकलें तोड़ दीं। उसने राधिका को अपनी बाहों में भर लिया। तीन साल का दर्द, तड़प और इंतज़ार उस एक आलिंगन में पिघल गए। राधिका कबीर की छाती से लगकर रोते-रोते बेहोश हो गई। कबीर ने उसे अपनी गोदी में उठाया और चिल्लाकर अपने मातहतों से कहा, “एम्बुलेंस बुलाओ! तुरंत!”

राधिका को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर लेकिन खतरे से बाहर बताई। होश में आने के बाद राधिका ने मजिस्ट्रेट और कबीर के सामने अपना बयान दर्ज कराया। उसने विक्रम की उस काली रात की साज़िश, धोखे और तीन साल के ज़ुल्म की पूरी दास्तान सुनाई। कबीर चुपचाप सुनता रहा, उसकी मुट्ठियाँ इस कदर कसी हुई थीं कि उसके नाखूनों से खून आने लगा था। लेकिन उसने कानून की शपथ ली थी, वह कोई गैर-कानूनी कदम नहीं उठाना चाहता था। वह विक्रम को ऐसी सज़ा देना चाहता था जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें।

उधर विक्रम को खबर मिल चुकी थी कि पुलिस ने हवेली पर छापा मार दिया है। वह अपनी जीप में पैसे भरकर नेपाल सीमा की तरफ भागने की कोशिश कर रहा था। लेकिन कबीर ने पूरे ज़िले की नाकेबंदी कर दी थी। हाईवे पर कबीर की सरकारी गाड़ी ने विक्रम की जीप को आगे से घेर लिया। विक्रम ने भागने की कोशिश की, लेकिन कबीर ने गाड़ी से उतरकर सीधे उसकी जीप के टायर पर गोली मार दी। जीप पलटते-पलटते बची।

विक्रम गाड़ी से बाहर निकला, उसका चेहरा खौफ से पीला पड़ चुका था। सामने कबीर आईपीएस की वर्दी में, आँखों में साक्षात यमराज का रूप लिए खड़ा था। विक्रम ने घुटनों के बल बैठकर हाथ जोड़ लिए और कहा, “कबीर भाई… मुझे माफ कर दे। मैं भटक गया था। हमारी बचपन की दोस्ती की खातिर मुझे छोड़ दे।” कबीर आगे बढ़ा, उसने विक्रम को कॉलर से उठाकर एक ऐसा जोरदार थप्पड़ मारा कि विक्रम के मुँह से खून निकल आया। कबीर ने कड़कती आवाज़ में कहा, “दोस्ती? तूने सिर्फ मुझसे दुश्मनी नहीं की विक्रम, तूने उस पवित्र रिश्ते का कत्ल किया है। और याद रख, यह कबीर नहीं, इस देश का कानून बोल रहा है। तूने एक औरत की अस्मत और उसकी आज़ादी को ठेस पहुँचाई है, इसकी सज़ा तुझे इसी जनम में और इसी धरती पर भुगतनी होगी।”

मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चला। कबीर ने खुद सारे सबूत, गवाह और फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की। विक्रम और उसके गुर्गों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाना था। अदालत ने पूरे मामले को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मानते हुए विक्रम और उसके साथियों को उम्रकैद की सख्त सज़ा सुनाई। जब जज का हथौड़ा टेबल पर पड़ा, तो विक्रम फूट-फूट कर रोने लगा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

इस घटना के दो साल बाद, रुद्रपुर गाँव में एक नई सुबह हुई। कबीर का ट्रांसफर उसी ज़िले के पुलिस कप्तान (SP) के रूप में हो चुका था। एक शाम, कबीर और राधिका अपनी पुरानी कोठरी के बाहर खड़े होकर ढलते हुए सूरज को देख रहे थे। राधिका अब काफी स्वस्थ हो चुकी थी और उसके चेहरे पर वही पुरानी सौम्य मुस्कान लौट आई थी। राधिका ने कबीर की वर्दी पर हाथ रखकर पूछा, “अब तो आपका सपना पूरा हो गया ना कबीर? अब तो आप खुश हैं?”

कबीर ने राधिका का हाथ अपने हाथ में लिया और दूर पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “नहीं राधिका, सपना उस दिन पूरा होगा जब इस देश के किसी गरीब को इंसाफ पाने के लिए, अपनी बात साबित करने के लिए तीन साल का नरक नहीं झेलना पड़ेगा। जब कोई विक्रम किसी राधिका की आज़ादी को छीनने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। मेरा सफर तो अब शुरू हुआ है।” राधिका ने मुस्कुराकर अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। हवाएं चल रही थीं, देवदार के पेड़ झूम रहे थे, और रुद्रपुर की वादियों में यह संदेश गूंज रहा था कि सच्चे रिश्ते और सच्चा प्यार कभी साज़िशों से टूटते नहीं, वे वक्त की आग में तपकर और भी निखर जाते हैं।

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