भाग 2
“माँ, अतिथि आने वाले हैं,” अवनी ने धीमे से कहा।
सविता वहीं रुक गई।
महेंद्र ने मालिनी को सिर से पैर तक देखा और सबसे पहले वकील से पूछा, “अगर यह सचमुच हमारी बेटी है तो हरिनारायण जी की संपत्ति पर इसका दावा बनेगा?”
मालिनी का पहला सपना उसी क्षण टूट गया।
विक्रम ने उसके साधारण कपड़े देखकर मुँह बनाया। नीरज ने पूछा, “क्या इसे आज ही लाना जरूरी था? अवनी की पार्टी खराब हो जाएगी।”
अवनी आगे बढ़ी और बड़ी मिठास से बोली, “दीदी, मुझे बहुत खुशी है कि आप वापस आईं।”
उसने मालिनी को गले लगाया, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान और आँखों में भय था।
मालिनी को सुंदर कमरा नहीं दिया गया। उसे घर के पिछले हिस्से में बने पुराने भंडार कक्ष में ठहराया गया।
“अभी घर में जगह कम है,” सविता ने कहा था। “कुछ दिनों में दूसरा कमरा तैयार करा देंगे।”
वह दूसरा कमरा कभी तैयार नहीं हुआ।
पहली रात अवनी मालिनी के कमरे में आई। उसके हाथ में वही आधा लॉकेट था जो मालिनी ने मेज पर रखा था।
“यह बहुत पुराना है,” अवनी ने कहा।
“यह मेरी माँ शारदा की आखिरी निशानी है,” मालिनी ने उत्तर दिया। “और शायद मेरे बचपन की भी।”
अवनी ने लॉकेट को देखा और अचानक उसे जमीन पर गिराकर पैर रख दिया।
लॉकेट बीच से टूट गया।
मालिनी स्तब्ध रह गई।
“तुमने यह क्या किया?”
अवनी ने मासूम चेहरा बनाकर कहा, “मेरे हाथ से गिर गया।”
“झूठ मत बोलो,” मालिनी के भीतर वर्षों का दर्द भड़क उठा। “तुम सुंदर कपड़े पहन सकती हो, अच्छे घर में पली हो सकती हो, लेकिन तुम्हारे भीतर दया नहीं है। तुम स्वार्थी और झूठी लड़की हो।”
जैसे ही ये शब्द निकले, अवनी के गले का ताबीज गर्म हो गया।
उसके मन में वही ठंडी आवाज़ गूँजी—
“शुद्ध रक्त-संबंध मिला।”
“वास्तविक अधिकारिणी की पहचान पूरी।”
“मुख्य जीवन-स्रोत से विपरीत बंधन स्थापित।”
अवनी की त्वचा चमकने लगी। चेहरे का दाग गायब हो गया। उसकी आँखें अधिक सुंदर और नाक की बनावट अधिक आकर्षक हो गई।
उधर मालिनी को तेज चक्कर आया और वह दीवार का सहारा लेकर बैठ गई।
अवनी शीशे के सामने खड़ी रह गई।
पहली बार उसने ऐसा परिवर्तन देखा था।
अगली सुबह मालिनी को अपनी कठोर बात पर पछतावा हुआ। उसने अवनी से कहा, “कल मुझे इतना कठोर नहीं बोलना चाहिए था। तुम सच में बहुत सुंदर हो। शायद तुमने लॉकेट जानबूझकर नहीं तोड़ा।”
अचानक अवनी के चेहरे का दाग वापस उभरने लगा।
ताबीज से आवाज़ आई—
“मुख्य जीवन-स्रोत द्वारा सकारात्मक आशीर्वाद।”
“पिछला हस्तांतरण रद्द किया जा रहा है।”
अवनी घबरा गई।
उसने मालिनी का मुँह दबा दिया।
“मेरी प्रशंसा मत करना!”
मालिनी हैरान रह गई।
उसी दिन अवनी ने अपनी माँ को सारी बात बता दी।
सविता ने पहले विश्वास नहीं किया। लेकिन उसने गुप्त रूप से परीक्षण करने का निर्णय लिया।
पहले विक्रम ने अवनी को बदसूरत कहा। उसके चेहरे पर बहुत हल्का बदलाव आया, जो शाम तक समाप्त हो गया।
फिर महेंद्र ने उसकी प्रशंसा की। कोई प्रभाव नहीं हुआ।
इसके बाद सविता ने मालिनी पर चोरी का झूठा आरोप लगाया। अपमान और क्रोध से भरी मालिनी ने अवनी को कपटी कहा।
अवनी का चेहरा तुरंत निखर उठा।
मालिनी बेहोश होकर गिर गई।
अब परिवार के सामने सब स्पष्ट था।
सविता को डरना चाहिए था। उसे अपनी असली बेटी की रक्षा करनी चाहिए थी।
लेकिन उसने अवनी के सुंदर चेहरे को देखते हुए कहा, “अगर मालिनी के कुछ शब्दों से तुम्हें इतना सुंदर रूप मिल सकता है, तो यह वरदान है।”
उस दिन से मालिनी को प्रतिदिन अवनी का अपमान करने के लिए मजबूर किया जाने लगा।
कभी उसके भोजन में नमक डालकर दोष अवनी पर डाल दिया जाता। कभी उसके कपड़े फाड़े जाते। कभी माँ स्वयं कहती—
“मालिनी, इसे कुछ कठोर शब्द कहो। अवनी को एक समारोह में जाना है।”
यदि मालिनी मना करती, उसे खाना नहीं मिलता। कभी उसे कमरे में बंद कर दिया जाता। कभी भाइयों से पिटवाया जाता।
बाहर की दुनिया समझती थी कि मालिनी अपनी छोटी बहन से जलती है।
अवनी धीरे-धीरे शहर की सबसे सुंदर लड़की बनती गई। उसे अभिनय के अवसर मिले। विज्ञापनों में उसका चेहरा दिखाई देने लगा। लोग उसकी सुंदरता की प्रशंसा करते, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ता, क्योंकि सामान्य प्रशंसा का तंत्र पर कोई प्रभाव नहीं था।
केवल मालिनी के शब्द मायने रखते थे।
मालिनी कमजोर होती गई। उसके बाल झड़ने लगे, रंग फीका पड़ गया और आत्मविश्वास टूट गया।
जब कोई पूछता, परिवार कहता कि गाँव में पली होने के कारण उसकी सेहत कमजोर है।
समय के साथ अवनी की शक्ति की एक और कीमत सामने आई। बाहर से वह जितनी सुंदर होती गई, भीतर उसके अंग उतने ही कमजोर होने लगे।
एक रात ताबीज ने चेतावनी दी—
“चुराई हुई जीवन-ऊर्जा शरीर की सीमा से अधिक।”
“हृदय और गुर्दों पर गंभीर दबाव।”
डॉक्टरों ने जाँच की तो पता चला कि मालिनी के अंग अवनी के शरीर के लिए लगभग पूर्ण रूप से अनुकूल थे।
महेंद्र ने उसी रात परिवार के सामने कहा, “जब जरूरत पड़ेगी, मालिनी के अंग अवनी को दे दिए जाएँगे।”
सविता ने एक पल के लिए भी विरोध नहीं किया।
अवनी ने केवल पूछा, “क्या इससे मेरी सुंदरता हमेशा बनी रहेगी?”
महेंद्र ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा, “तुम्हारे लिए हम कुछ भी करेंगे।”
और दोस्तों, यही वह रात थी जब मालिनी ने कमरे के बाहर खड़े होकर उनकी पूरी बातचीत सुन ली थी।
लेकिन पिछले जीवन की मालिनी कमजोर थी। उसे अब भी उम्मीद थी कि शायद उसका परिवार बदल जाएगा। शायद माँ के भीतर कभी ममता जागेगी।
उसकी वही उम्मीद अंत में उसकी मृत्यु का कारण बनी।
अब वह सगाई वाले दिन दोबारा लौट चुकी थी।
सामने खड़ी अवनी अपनी महँगी पोशाक दिखाते हुए कह रही थी, “दीदी, आज मुझे पहले से अधिक कठोर शब्द कहना। सगाई का सीधा प्रसारण होगा। लोग मुझे बेचारी समझेंगे और मेरा चेहरा भी चमक उठेगा।”
मालिनी धीरे-धीरे पलंग से उठी।
उसने अवनी को ध्यान से देखा।
फिर उसके होंठों पर ऐसी मुस्कान आई जिसे देखकर अवनी पहली बार असहज हो गई।
मालिनी ने कहा, “मेरी प्यारी बहन, आज मैं तुम्हारा अपमान क्यों करूँगी?”
“क्या?”
“आज तो मैं सबको बताऊँगी कि तुम कितनी सुंदर, दयालु और पवित्र हो।”
ताबीज से तेज चेतावनी गूँजी—
“मुख्य जीवन-स्रोत द्वारा प्रशंसा आरंभ।”
“सौन्दर्य स्तर घट रहा है।”
अवनी के चेहरे की चमक एक पल में कम हो गई।
उसकी आँखों के नीचे काले घेरे उभर आए।
मालिनी उसके करीब जाकर फुसफुसाई—
“इस जन्म में तुम्हारा चेहरा भी वापस जाएगा, मेरा जीवन भी… और जिस परिवार को तुमने अपना समझा है, उसका असली चेहरा भी पूरी दुनिया देखेगी।”
अवनी ने घबराकर अपने चेहरे को छुआ।
अभी कुछ क्षण पहले जो त्वचा चिकनी और चमकदार थी, वह अचानक ढीली और फीकी दिखाई देने लगी थी। उसके बाएँ गाल पर वर्षों पहले गायब हो चुका हल्का दाग फिर उभर आया।
“दीदी, चुप हो जाओ,” उसने मालिनी का हाथ पकड़ते हुए कहा।
मालिनी ने बड़ी मासूमियत से पूछा, “क्यों? क्या मैंने कुछ गलत कहा? तुम सुंदर हो, प्रतिभाशाली हो, पूरे परिवार की शान हो।”
ताबीज की आवाज़ अवनी के मन में गूँजी—
“सकारात्मक आशीर्वाद जारी।”
“नाक की बनावट पूर्व स्थिति में लौट रही है।”
अवनी ने तुरंत मालिनी का मुँह दबा दिया।
“मुझे सुंदर मत कहो!”
मालिनी ने उसका हाथ झटक दिया।
“अरे, तुम तो हमेशा चाहती थीं कि पूरी दुनिया तुम्हारी प्रशंसा करे। आज अपनी बड़ी बहन की प्रशंसा से इतना डर क्यों लग रहा है?”
शोर सुनकर सविता, महेंद्र, विक्रम और नीरज कमरे में आ गए।
सविता ने अवनी का चेहरा देखा तो चीख पड़ी, “यह क्या हो गया?”
अवनी रोते हुए बोली, “मालिनी मेरी प्रशंसा कर रही है। मेरा चेहरा वापस बदल रहा है।”
महेंद्र ने मालिनी की ओर उँगली उठाई। “तुम्हें नियम पता हैं। तुरंत इसे अपमानित करो।”
मालिनी ने शांत स्वर में कहा, “मैं अपनी छोटी बहन का अपमान क्यों करूँ? वह तो बहुत अच्छी है।”
“नाटक बंद करो,” विक्रम गरजा। “जो कहा जा रहा है, वही करो।”
“लेकिन भैया,” मालिनी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “आपने ही तो हमेशा कहा था कि बहनों को एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए।”
नीरज ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। “अवनी की सगाई दस मिनट में शुरू होने वाली है। उसका चेहरा खराब हुआ तो सिंघानिया परिवार रिश्ता तोड़ देगा।”
“तो रिश्ता उसके चरित्र से हुआ है या चेहरे से?” मालिनी ने पूछा।
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
अवनी मालिनी के पैरों में बैठ गई।
“दीदी, मैं तुमसे विनती करती हूँ। मुझे बदसूरत कहो। झूठी कहो। लालची कहो। जितना बुरा बोल सकती हो, बोलो।”
मालिनी ने उसे नीचे देखा।
पिछले जीवन में यही लड़की अस्पताल के पलंग के पास खड़ी होकर कह रही थी कि उसके अंग पहली बार किसी काम आएँगे।
उसके भीतर गुस्सा था, लेकिन इस बार वह गुस्से को अपना मालिक नहीं बनने देना चाहती थी।
उसने अवनी को उठाते हुए कहा, “तुम मेरी छोटी बहन हो। मैं तुम्हारे बारे में गंदे शब्द कैसे कह सकती हूँ?”
महेंद्र ने दाँत भींचकर कहा, “मालिनी, अगर तुमने आज अवनी की मदद नहीं की तो मुझे पिता मत कहना।”
मालिनी के चेहरे पर फीकी मुस्कान आ गई।
“पिता?”
उसने धीरे से दोहराया।
“जिस दिन मैं पहली बार इस घर आई थी, आपने मुझसे यह नहीं पूछा था कि मैंने इतने वर्ष कैसे बिताए। आपने वकील से पूछा था कि नाना की संपत्ति किसे मिलेगी। आज आपको अचानक याद आ रहा है कि आप मेरे पिता हैं?”
महेंद्र का चेहरा लाल हो गया।
सविता ने समझाने वाले स्वर में कहा, “मालिनी, पुरानी बातें भूल जाओ। अभी परिवार की इज्जत का सवाल है।”
“परिवार की इज्जत बचाने के लिए हमेशा मेरी ही इज्जत क्यों मिटाई जाती है, माँ?”
सविता की आँखें झुक गईं, लेकिन केवल एक पल के लिए।
अवनी के ताबीज से नई चेतावनी आई—
“सौन्दर्य स्तर पंद्रह अंश कम।”
“मुख्य कार्यक्रम से पहले विपरीत शब्द आवश्यक।”
अवनी ने रोते हुए कहा, “दीदी, मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करूँगी। बस मेरा अपमान कर दो।”
मालिनी कुछ सोचने का अभिनय करने लगी।
फिर बोली, “ठीक है। लेकिन इतने वर्षों से मैंने किसी को बुरा-भला नहीं कहा। मुझे डर है कि कहीं मैं ठीक से न कर पाऊँ।”
विक्रम ने झुँझलाकर कहा, “इसमें सीखने जैसा क्या है?”
“मुझे थोड़ा अभ्यास करना होगा।”
“किस पर?”
मालिनी ने कमरे में खड़े सभी लोगों की ओर देखा।
“आप सब पर।”
महेंद्र गरज उठा, “तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है?”
मालिनी मुड़कर जाने लगी। “तो रहने दीजिए। अवनी वैसे भी भीतर से बहुत सुंदर है। बाहरी रूप का क्या है?”
ताबीज से चेतावनी आई—
“सकारात्मक शब्द।”
“सौन्दर्य स्तर और घटा।”
अवनी ने तुरंत पिता का हाथ पकड़ लिया।
“पापा, इसे करने दीजिए। यह केवल कुछ शब्द ही तो कहेगी।”
सविता ने भी कहा, “समय कम है। सह लीजिए।”
महेंद्र ने अनिच्छा से सिर हिला दिया।
मालिनी सबसे पहले सविता के सामने खड़ी हुई।
“माँ, मान लीजिए आप मेरी दुश्मन हैं।”
सविता ने कठोर स्वर में कहा, “जल्दी करो।”
मालिनी की आँखें ठंडी हो गईं।
“तुम ऐसी माँ हो जिसने अपनी असली बेटी के लौटने पर उसे गले लगाने से पहले नकली बेटी का चेहरा देखा। तुम्हारी ममता उस तराजू की तरह है जिसमें एक तरफ पैसा रखा जाए तो दूसरी तरफ अपनी संतान भी हल्की पड़ जाती है।”
सविता का चेहरा बदल गया।
“मालिनी!”
“अभी तो अभ्यास शुरू हुआ है, माँ।”
फिर वह पिता के सामने गई।
“और आप ऐसे पिता हैं जो अपनी बेटियों को संतान नहीं, सौदे का सामान समझते हैं। एक बेटी के नाम की संपत्ति चाहिए और दूसरी के विवाह से मिलने वाला पैसा। जहाँ लाभ दिखे, वहीं आपकी ममता जाग जाती है।”
महेंद्र ने हाथ उठाया, लेकिन अवनी ने रोक लिया।
“पापा, अभी नहीं!”
मालिनी विक्रम की ओर मुड़ी।
“बड़े भैया, आपने महँगी पढ़ाई की, बड़े कपड़े पहने, ऊँचे लोगों में उठे-बैठे। लेकिन अपनी बहन के आँसू और किसी नौकर की तकलीफ में फर्क नहीं समझ पाए। आपकी शिक्षा दीवार पर लगी डिग्री से आगे कभी पहुँची ही नहीं।”
फिर नीरज की ओर देखा।
“और तुम… हर बार ताकतवर की तरफ खड़े होने वाले ऐसे आदमी हो जिसे अपनी कोई रीढ़ नहीं। जब अवनी मजबूत होती है तो उसके पीछे छिपते हो और जब पिता नाराज़ होते हैं तो उनके पीछे।”
नीरज आगे बढ़ा, “मैं तुम्हारा मुँह तोड़ दूँगा।”
मालिनी ने मुस्कराकर कहा, “देखा? अभ्यास अच्छा हो रहा है।”
अवनी बेचैनी से बोली, “अब मेरा अपमान करो।”
मालिनी उसके सामने खड़ी हुई।
कमरे में सबकी साँसें थम गईं।
“अवनी,” मालिनी ने कहा, “तुमने मेरे कपड़े पहने, मेरे माता-पिता का प्यार लिया, मेरी पहचान पर अपना नाम लिखा। बाहर से तुम जितनी सुंदर दिखाई देती हो, भीतर से उतनी ही भयभीत हो। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुम्हारी चमक तुम्हारी नहीं है।”