भाग 4
अवनी हँसी।
“तुम हर बार यही कहती हो। लेकिन तुम्हारा भाई अभी तक तुम्हें ढूँढ़ नहीं पाया।”
रोशनी ने अवनी के चेहरे पर थूक दिया।
“तुम कभी सुंदर नहीं बन सकतीं। क्योंकि सुंदरता चेहरे में नहीं, इंसानियत में होती है।”
उस अपमान से अवनी का चेहरा और चमक उठा।
लेकिन वही शब्द उसके भीतर तीर की तरह लगे।
उसने डॉक्टर से कहा, “आज रात ही प्रक्रिया शुरू करो।”
रोशनी के गुर्दे और अस्थिमज्जा निकाल लिए गए। उसका शरीर दर्द सहन नहीं कर पाया।
उसकी मृत्यु हो गई।
उसके शव को नष्ट कर दिया गया।
अवनी के नए अंग कुछ समय तक ठीक चले, लेकिन तंत्र की शक्ति ने उन्हें भी कमजोर करना शुरू कर दिया। तभी परिवार ने तय किया कि अंतिम और स्थायी समाधान मालिनी ही होगी।
मंच पर खड़ी मालिनी ने यह पूरी घटना सुनाई।
देवांश की आँखें लाल हो चुकी थीं।
उसने पूछा, “तुम्हें जन्मचिह्न के बारे में कैसे पता?”
मालिनी ने कहा, “रोशनी के पेट के बाईं ओर लाल रंग का आधे चाँद जैसा निशान था।”
देवांश पीछे हट गया।
यह बात केवल परिवार के बहुत करीबी लोग जानते थे।
उसी समय बड़े पर्दे पर एक पुरानी आवाज़ चली।
रोशनी अपने भाई से कह रही थी—
“भैया, मेरी एक नई दोस्त बनी है। उसका नाम अवनी है। वह थोड़ी अजीब है। हमेशा कहती है कि मैं उसे बुरा-भला कहूँ।”
देवांश की साँस रुक गई।
उसे वह बातचीत याद थी।
उसने तब हँसकर कहा था कि रोशनी गलत लोगों में न पड़ जाए।
सहायक ने आगे कहा, “जाँच में पता चला है कि रोशनी के गायब होने वाली रात रघुवंशी परिवार की गाड़ी एक निजी चिकित्सालय के बाहर देखी गई थी। चिकित्सालय के पुराने अभिलेख में अवनी का नाम बदला गया था, लेकिन रक्त समूह और प्रक्रिया की तारीख मेल खाती है।”
महेंद्र ने तुरंत कहा, “यह सब अवनी की योजना थी!”
अवनी ने उसकी ओर अविश्वास से देखा।
“पापा?”
सविता ने भी कहा, “हमें कुछ पता नहीं था। अवनी ने हमें धोखा दिया।”
विक्रम बोला, “उसने कहा था कि रोशनी कोई अनाथ लड़की है।”
नीरज ने कहा, “अपहरण भी अवनी ने करवाया था।”
अवनी स्तब्ध रह गई।
कुछ ही मिनट पहले यही लोग उसे परिवार की शान कह रहे थे।
अब जैसे ही खतरा आया, वे सारी गलती उसी पर डाल रहे थे।
“हम सबने मिलकर योजना बनाई थी!” अवनी चिल्लाई। “पैसा आप सबने बाँटा था। चिकित्सालय से पापा ने बात की थी। रोशनी को विक्रम भैया लेकर आए थे।”
देवांश ने एक-एक करके सबकी ओर देखा।
उसकी आँखों में ऐसा क्रोध था कि कोई सामने टिक नहीं पा रहा था।
“मेरी बहन ने तुम पर विश्वास किया,” उसने अवनी से कहा।
अवनी रोते हुए उसके पास आई।
“देवांश, मुझसे गलती हो गई। मैं डर गई थी। मुझे लगा मेरा चेहरा बिगड़ जाएगा। मैंने तुम्हारी बहन को पहचान नहीं पाया था।”
देवांश ने उसका हाथ झटक दिया।
“अगर वह मेरी बहन न होती, तो क्या उसकी हत्या सही हो जाती?”
अवनी के पास कोई उत्तर नहीं था।
“और तुमने मुझे बचाने का झूठ बोला,” देवांश ने कहा। “मेरे विश्वास, मेरे प्रेम और मेरी बहन की मौत—सबको अपने लाभ के लिए इस्तेमाल किया।”
अवनी ने उसके पैरों में गिरकर कहा, “मैं तुमसे सच में प्रेम करती हूँ।”
मालिनी ने पीछे से कहा, “क्या वह आवाज़ भी सुनोगे जिसमें यह तुम्हारे बारे में अपने असली विचार बता रही थी?”
एक और रिकॉर्डिंग चली।
अवनी की आवाज़ थी—
“देवांश बदसूरत और गुस्सैल है। शादी के बाद उसकी संपत्ति अपने नाम करवाऊँगी। फिर धीरे-धीरे पूरे सिंघानिया परिवार को रास्ते से हटा दूँगी।”
देवांश ने आँखें बंद कर लीं।
अवनी का अंतिम सहारा भी टूट गया।
उसने अपने गले का हार, हाथों की चूड़ियाँ और सगाई की अंगूठी उतारकर जमीन पर फेंक दी।
“आज से यह रिश्ता समाप्त।”
अवनी ने चीखकर कहा, “नहीं!”
देवांश ने सुरक्षा कर्मियों को आदेश दिया, “रघुवंशी परिवार के किसी सदस्य को बाहर मत जाने देना। पुलिस रास्ते में है।”
महेंद्र तुरंत उसके सामने झुक गया।
“देवांश जी, हमारी बात सुनिए। व्यापार में हमारी साझेदारी—”
“तुम्हें अभी भी व्यापार की चिंता है?”
महेंद्र चुप हो गया।
देवांश ने कहा, “आज से सिंघानिया परिवार रघुवंशी समूह के साथ हर संबंध समाप्त करता है। जिन कंपनियों को मैंने निवेश दिया था, सारी राशि वापस ली जाएगी।”
सविता रोने लगी।
“हम सड़क पर आ जाएँगे।”
देवांश की आवाज़ बर्फ जैसी ठंडी थी।
“जब मेरी बहन दर्द से मर रही थी, क्या उसने भी तुमसे यही कहा होगा?”
पुलिस समारोह में पहुँच गई।
अवनी का चेहरा अब लगभग पूरी तरह अपने पुराने रूप में लौट चुका था। ताबीज लगातार चेतावनी दे रहा था—
“मुख्य जीवन-स्रोत द्वारा प्रशंसा से चुराई हुई शक्ति वापस।”
“आंतरिक अंग विफलता का खतरा।”
अवनी ने मालिनी की ओर देखा।
“दीदी, मुझे अपमानित करो।”
मालिनी शांत रही।
“मैं मर जाऊँगी,” अवनी रोई। “बस एक बार मुझे कुरूप कह दो।”
मालिनी उसके पास गई।
अवनी के चेहरे पर पहली बार असली भय था।
“तुम्हें याद है,” मालिनी ने कहा, “पिछले जीवन में मैं अस्पताल में तुमसे जीवन माँग रही थी। तुमने कहा था कि मेरा जीवन पहली बार किसी काम आएगा।”
अवनी की आँखें फैल गईं।
“तुम… क्या कह रही हो?”
“मैं सब याद रखती हूँ।”
अवनी पीछे हट गई।
“तुम भी वापस आई हो?”
मालिनी ने उत्तर दिया, “हाँ। इस बार मैं तुम्हें अपना रूप, स्वास्थ्य या जीवन नहीं दूँगी।”
अवनी घुटनों के बल बैठ गई।
“मैं बदल जाऊँगी।”
“तुम्हें बदलने का अवसर तब मिला था जब रोशनी तुम्हारे सामने बँधी हुई थी। जब मैं पहली बार इस घर में आई थी। जब तुमने मेरा लॉकेट तोड़ा था। जब मेरे अंग निकालने की योजना बनी थी। हर बार तुमने अपना लाभ चुना।”
पुलिस अवनी और रघुवंशी परिवार को ले गई।
लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।
क्योंकि लालची लोग संकट आने पर पश्चाताप नहीं करते। वे केवल नया रास्ता खोजते हैं।
तीन महीने बाद रघुवंशी परिवार अस्थायी जमानत पर बाहर आया। उनका व्यापार लगभग समाप्त हो चुका था। बैंक ने संपत्तियाँ जब्त करना शुरू कर दिया था।
देवांश ने मालिनी के लिए अलग घर और सुरक्षा की व्यवस्था की थी। उसने अपनी बहन रोशनी के नाम की संपत्ति का बड़ा हिस्सा मालिनी को देने की घोषणा भी की।
महेंद्र और सविता अचानक मालिनी के घर पहुँचे।
सविता ने उसे गले लगाने की कोशिश की।
“मेरी बच्ची, तुम कैसी हो?”
मालिनी पीछे हट गई।
महेंद्र ने कहा, “हमसे गलतियाँ हुईं। लेकिन आखिर हम तुम्हारे माता-पिता हैं।”
विक्रम मिठाई का डिब्बा लाया था। नीरज फूलों का गुलदस्ता।
मालिनी समझ गई कि वे क्यों आए हैं।
देवांश द्वारा दी गई संपत्ति और प्रभाव के कारण अब मालिनी उनके लिए फिर उपयोगी बन गई थी।
वह उन्हें अंदर ले गई।
सविता ने कहा, “देवांश तुम्हारी बात मानता है। अगर तुम उससे कह दो तो वह हमारे व्यापार से रोक हटा देगा।”
मालिनी ने मासूम बनते हुए कहा, “मैं कोशिश कर सकती हूँ। लेकिन शायद उसे भरोसा दिलाने के लिए हमें अपनी बची हुई संपत्ति उसके पास सुरक्षा के रूप में रखनी होगी।”
महेंद्र ने सोचा।
उनके पास कुछ जमीन, सोना और गुप्त धन बचा था।
व्यापार बचाने की लालच में उसने सब मालिनी के नाम कर दिया।
मालिनी ने दस्तावेज सुरक्षित कर लिए।
तभी दरवाजा खुला।
अवनी भीतर आई।
जमानत पर बाहर आने के बाद वह देवांश के घर से भागी थी। उसका चेहरा बिगड़ चुका था। बाल कम हो गए थे और शरीर कमजोर था।
वह मालिनी पर चिल्लाई, “यह सब तुम्हारी वजह से हुआ!”
मालिनी ने कहा, “नहीं अवनी। यह सब तुम्हारे कर्मों की वजह से हुआ।”
अवनी माता-पिता की ओर दौड़ी।
“माँ, पापा, मुझे अपने साथ ले चलिए। मैं उस घर में नहीं रह सकती।”
सविता का चेहरा बदल गया।
“तुम यहाँ क्यों आई हो? तुम्हारे कारण हमारा परिवार बर्बाद हुआ।”
“माँ, आपने कहा था आप मुझे लेने आएँगी।”
महेंद्र ने कठोर स्वर में कहा, “तुम अब हमारे किसी काम की नहीं हो। न तुम्हारे पास रूप है, न सिंघानिया परिवार का रिश्ता।”
अवनी स्तब्ध रह गई।
“मैं आपकी सबसे प्यारी बेटी थी।”
विक्रम हँसा, “जब तुम्हारे पास तंत्र था और तुमसे हमें फायदा होता था।”
नीरज ने कहा, “अब तुम केवल मुसीबत हो।”
अवनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
मालिनी ने मेज पर रखा छोटा यंत्र चालू कर दिया।
उसमें कुछ देर पहले महेंद्र और सविता की बातचीत दर्ज थी।
सविता कह रही थी—
“अवनी को घर वापस लाने का कोई सवाल नहीं। वह अब बदसूरत और बीमार है।”
महेंद्र की आवाज़ आई—
“हमारी असली बेटी मालिनी है। अब उसी के पास पैसा और देवांश का समर्थन है। अवनी को भूल जाओ।”
अवनी ने काँपते हुए माता-पिता को देखा।
“तो जब मैं भागती थी और देवांश के लोग हर बार मुझे पकड़ लेते थे… क्या आप लोग उन्हें बताते थे?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
महेंद्र ने नजरें फेर लीं।
अवनी सब समझ गई।
जिस परिवार के लिए उसने रोशनी की हत्या की, मालिनी को मरवाने की योजना बनाई और अपना पूरा जीवन झूठ पर खड़ा किया, उसी परिवार ने उसे बचाने के बजाय बार-बार उसकी जानकारी देवांश तक पहुँचाई थी।
अवनी की हँसी निकल गई।
वह हँसी धीरे-धीरे रोने में बदल गई।
“मैंने सोचा था मैं मालिनी की जगह ले रही हूँ,” उसने कहा। “लेकिन इस घर में किसी की जगह कभी थी ही नहीं। यहाँ केवल लाभ की जगह है।”
उसने अपने कपड़ों से एक छोटा यंत्र निकाला।
उसमें रघुवंशी परिवार के पुराने अपराधों से जुड़ी आवाज़ें, धन के अभिलेख और चिकित्सालय से हुई बातचीत सुरक्षित थी।
“अगर मैं डूबूँगी,” अवनी ने कहा, “तो आप सबको साथ लेकर डूबूँगी।”
महेंद्र उसके हाथ से यंत्र छीनने दौड़ा।
लेकिन बाहर खड़ी पुलिस भीतर आ गई।
मालिनी ने पहले ही सूचना दे दी थी।
अवनी ने सभी प्रमाण पुलिस को सौंप दिए।
कुछ महीनों बाद न्यायालय में मुकदमा शुरू हुआ।
रोशनी के अपहरण, अवैध अंग प्रत्यारोपण, हत्या, धोखाधड़ी और मालिनी की हत्या की योजना से जुड़े प्रमाण स्पष्ट थे।
महेंद्र, सविता, विक्रम और नीरज को लंबी सजा मिली।
अवनी ने अपराध स्वीकार कर लिया। उसे भी कठोर कारावास मिला, लेकिन जाँच में सहयोग करने के कारण उसकी सजा कुछ कम की गई।
सजा सुनाए जाने के दिन अवनी ने मालिनी से अंतिम बार पूछा, “क्या तुम मुझे कभी क्षमा कर पाओगी?”
मालिनी ने उत्तर दिया, “क्षमा का अर्थ यह नहीं कि अपराध मिट जाता है। मैं तुम्हारी नफरत अपने भीतर नहीं रखूँगी, लेकिन तुम्हारे कर्मों का दंड तुम्हें भुगतना होगा।”
देवांश ने रोशनी के नाम की संपत्ति मालिनी को देने का प्रस्ताव फिर रखा।
मालिनी ने उसका अधिकांश हिस्सा अवैध अंग तस्करी से पीड़ित लोगों, अनाथ बच्चों और उन लड़कियों के लिए दान कर दिया जिन्हें परिवारों ने केवल लाभ के लिए इस्तेमाल किया था।
उसने उस अनाथालय को भी दोबारा खुलवाया जहाँ उसने अपना बचपन बिताया था।
एक दिन मालिनी फिर उसी पुराने मंदिर पहुँची जहाँ अवनी को ताबीज मिला था।
दर्पण अब भी वहाँ था।
उसमें वही सुंदर स्त्री दिखाई दी।
“तुमने शक्ति को हरा दिया,” उसने कहा।
मालिनी ने उत्तर दिया, “नहीं। शक्ति कभी समस्या नहीं थी। उसे पाने के लिए दूसरों का जीवन छीनने की इच्छा समस्या थी।”
दर्पण की स्त्री मुस्कराई।
“क्या तुम यह शक्ति लेना चाहोगी? तुम्हें केवल एक नया जीवन-स्रोत चुनना होगा।”
मालिनी ने पास पड़ा पत्थर उठाया।
“मेरी सुंदरता किसी के अपमान, दुख या जीवन पर नहीं टिकेगी।”
उसने पूरी ताकत से पत्थर दर्पण पर दे मारा।
दर्पण हजारों टुकड़ों में टूट गया।
काला ताबीज राख बन गया।
मंदिर की दीवारों में गूँजती ठंडी आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई।
बाहर सुबह का सूरज निकल रहा था।
देवांश मंदिर की सीढ़ियों के पास उसका इंतजार कर रहा था।
उसने पूछा, “सब समाप्त हो गया?”
मालिनी ने खुले आकाश की ओर देखा।
“नहीं,” उसने मुस्कराकर कहा, “अब पहली बार मेरा जीवन शुरू हुआ है।”
दोस्तों, इस कहानी में मालिनी को दूसरा जीवन बदला लेने के लिए जरूर मिला था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी जीत परिवार को नष्ट करना नहीं थी।
उसकी जीत यह थी कि उसने स्वयं को उस प्रेम की भूख से मुक्त कर लिया, जो उसे कभी मिला ही नहीं था।
उसने समझ लिया था कि केवल खून का रिश्ता परिवार नहीं बनाता। परिवार वह होता है जहाँ आपकी साँसों की कीमत किसी के चेहरे, धन या प्रतिष्ठा से कम न समझी जाए।
और अवनी?
उसे एक ऐसा वरदान मिला था जो उसे संसार की सबसे सुंदर लड़की बना सकता था। लेकिन दूसरों की रोशनी चुराकर पाया गया चेहरा आखिर कब तक चमकता?
जिस दिन मालिनी ने उसकी प्रशंसा की, उसका असली चेहरा केवल बाहर नहीं, पूरी दुनिया के सामने भीतर से भी दिखाई दे गया।
क्योंकि झूठी सुंदरता को सबसे अधिक डर अपमान से नहीं होता।
उसे सबसे अधिक डर सच से होता है।