भाग 4
जो हुआ, वह किसी ने सोचा नहीं था।
दो दिनों में इतने ऑर्डर आए कि गांव को काम बांटना पड़ा। पास के गांवों की महिलाएं भी जुड़ गईं। पत्रकार अनिरुद्ध ने फिर खबर की। इस बार कहानी आग की नहीं, राख से उठते गांव की थी।
जांच में धीरे-धीरे पता चला कि आग संयोग नहीं थी। पास की दुकान के सीसीटीवी में विक्रम के आदमी रात को वहां जाते दिखे। पुलिस ने पूछताछ शुरू की। विक्रम गायब हो गया। कंपनी ने आधिकारिक बयान देकर खुद को उससे अलग कर लिया और प्रोजेक्ट स्थगित कर दिया।
देवसारी बच गया था।
लेकिन इस जीत के बाद भी रिवान खुश नहीं दिख रहा था। एक शाम वह जलधारा के पास बैठा था। पानी पत्थरों से टकराकर बह रहा था। गौरी उसके पास आई।
“आप चुप क्यों हैं?”
रिवान ने कहा, “कभी-कभी लगता है, मैं जहां जाता हूं, संघर्ष साथ ले जाता हूं।”
गौरी ने कहा, “नहीं। संघर्ष पहले से होता है। आप बस उसे दिखा देते हैं।”
रिवान ने उसकी ओर देखा। “और तुम?”
“मैं?” गौरी मुस्कुराई। “मैं तो बस रास्ते में मिले लोगों को चाय पिलाती हूं।”
दोनों हंस पड़े। पर उस हंसी के पीछे एक गहरी समझ थी। उनका रिश्ता अब सिर्फ मदद करने वाले और मदद पाने वाले का नहीं रहा था। यह साथ चलने वालों का रिश्ता था जहां कोई आगे नहीं, कोई पीछे नहीं, दोनों एक ही दिशा में।
देवसारी में उम्मीद लौट आई थी। लेकिन पहाड़ की कहानियों में मौसम कभी पूरी तरह शांत नहीं रहता। आसमान साफ था, पर दूर कहीं बादल फिर बन रहे थे।
और इस बार आने वाला तूफान केवल जमीन या पानी का नहीं, रिवान के अपने भविष्य का था।
सर्दियों की शुरुआत थी। देवसारी के ऊपरी जंगलों पर हल्की धुंध उतरने लगी थी। सुबह-सुबह घास पर ओस मोती की तरह चमकती, और शाम होते ही हवा इतनी ठंडी हो जाती कि लोग जल्दी-जल्दी घरों में लौट आते। लेकिन इस ठंड में भी गांव के भीतर एक नई गर्माहट थी। देवसारी हाथ का काम बढ़ चुका था। स्कूल का डिजिटल कमरा अब केवल बच्चों की पढ़ाई की जगह नहीं था, बल्कि गांव की छोटी-सी दुनिया को बाहर की दुनिया से जोड़ने वाला दरवाजा बन गया था। महिलाएं ऑर्डर संभालतीं, बच्चे पैकिंग में मदद करते, युवा ऑनलाइन संदेश देखते, किसान मंडी की कीमतें जानने लगे।
गौरी अब सिर्फ गांव की मास्टरनी नहीं रही थी। लोग उसे सलाहकार, बेटी, बहन और नेता सब कुछ मानने लगे थे। लेकिन वह हर बार कहती, “नेता मत बनाइए, काम बांटिए। काम सबका होगा तो गांव सबका रहेगा।”
रिवान भी अब देवसारी में अपना सा हो गया था। फिर भी उसका जीवन गांव और शहर के बीच झूल रहा था। देहरादून में उसकी कुछ फ्रीलांस कमाई शुरू हो गई थी। डिजिटल केंद्र और देवसारी हाथ की वजह से उसका काम कई लोगों तक पहुंचा। एक दिन उसे मुंबई की एक बड़ी कंपनी से इंटरव्यू कॉल आया। पद बड़ा था, सैलरी अच्छी थी, और जीवन की सुरक्षा भी। यह वही मौका था जिसके लिए वह शहर में भटकता रहा था। अगर वह यह नौकरी ले लेता, तो उसकी आर्थिक परेशानी खत्म हो सकती थी। किराया, कर्ज, भविष्य सब संभल सकता था।
उसने यह बात पहले किसी को नहीं बताई। वह सोचता रहा। रात को लैपटॉप खोलकर इंटरव्यू की तारीख देखता, फिर बाहर जलधारा की आवाज सुनता। शहर उसे बुला रहा था। गांव उसे रोक नहीं रहा था, पर उसकी जरूरत जरूर थी।
गौरी ने उसकी चुप्पी पहचान ली।
एक शाम दोनों स्कूल की छत पर बैठे थे। नीचे बच्चे खेल रहे थे। पहाड़ों के पीछे सूरज लाल हो रहा था।
गौरी ने पूछा, “कहीं जाना है आपको?”
रिवान चौंका। “तुम्हें कैसे पता?”
“जो आदमी बच्चों की हंसी सुनकर भी चुप रहे, उसके मन में कोई भारी बात जरूर होती है।”
रिवान ने इंटरव्यू की बात बताई। गौरी ने ध्यान से सुना। फिर मुस्कुराकर बोली, “यह तो अच्छी बात है। आपको जाना चाहिए।”
रिवान ने उसकी ओर देखा। “इतनी आसानी से?”
“आपने यहां बहुत किया है। इसका मतलब यह नहीं कि आपकी जिंदगी यहीं रुक जाए।”
“और देवसारी?”
“देवसारी अब चलना सीख रहा है। आपने हाथ पकड़ा था, हमेशा गोद में उठाकर नहीं चलाना।”
रिवान चुप हो गया। उसे उम्मीद थी कि गौरी रोकेगी, या कम से कम उदास होगी। लेकिन गौरी ने उसे मुक्त कर दिया। शायद यही सच्चा अपनापन था किसी को अपने पास रखने की इच्छा होते हुए भी उसके रास्ते पर भरोसा करना।
इंटरव्यू तीन दिन बाद था। रिवान को अगले सुबह शहर निकलना था। गांव वालों को जब पता चला तो सबने उसे शुभकामनाएं दीं। बच्चों ने कार्ड बनाया “रिवान भैया, बड़े शहर जाकर हमें मत भूलना।” काजल ने उसे एक छोटी नोटबुक दी जिसमें बच्चों ने अपने-अपने सपने लिखे थे। किसी ने लिखा था शिक्षक बनना है, किसी ने नर्स, किसी ने इंजीनियर, किसी ने जंगल बचाने वाला अधिकारी। आखिरी पन्ने पर गौरी ने लिखा था “जहां भी जाइए, रास्ते में पड़े किसी इंसान को पहचानना मत भूलिए।”
रिवान ने वह नोटबुक अपने बैग में रख ली।
लेकिन पहाड़ों में योजनाएं अक्सर आसमान से हार जाती हैं।
रात के करीब ग्यारह बजे अचानक तेज गर्जना हुई। गांव के ऊपर बादल फटने जैसी आवाज आई। पहले लोगों ने सोचा बिजली गिरी है, फिर पानी का भयानक शोर सुनाई दिया। ऊपरी नाले में अचानक मलबा और पानी भरकर नीचे की ओर भागा। बारिश ऐसी थी जैसे आसमान फट गया हो। घरों की छतों पर पानी पीटने लगा। लोग घबराकर बाहर निकले।
“ऊपरी बस्ती!” किसी ने चिल्लाया।
देवसारी की ऊपरी बस्ती में पांच घर थे और वही रास्ता स्कूल के पीछे से जाता था। अगर मलबा मुड़कर नीचे आया, तो स्कूल और डिजिटल कमरा भी खतरे में पड़ सकते थे। सबसे बड़ी चिंता थी बच्चे। काजल और कुछ बच्चे स्कूल में अगले दिन की प्रस्तुति की तैयारी के लिए रुके थे। बारिश शुरू होते ही वे वहीं फंस गए।
गौरी ने बिना देर किए बरसाती उठाई। “मैं स्कूल जा रही हूं।”
सरोजा ने रोका, “इस बारिश में?”
गौरी बोली, “काजल वहां है।”
रिवान ने बैग उठाया, जिसमें इंटरव्यू के कागज और नोटबुक रखी थी। उसने बैग वापस रखा और कहा, “मैं भी चल रहा हूं।”
मोहनलाल बोले, “सुबह तुम्हें शहर जाना है बेटा।”
रिवान ने एक पल के लिए उनकी ओर देखा। फिर बोला, “शहर कल भी होगा। बच्चे अभी हैं।”
गौरी ने कुछ कहना चाहा, पर उसके चेहरे पर समझ आ गई। दोनों टॉर्च लेकर निकले। गांव के कुछ युवक भी साथ हो लिए। बारिश में पगडंडी नदी बन चुकी थी। हर कदम संभलकर रखना पड़ रहा था। हवा में मिट्टी, पत्तों और डर की गंध थी।
स्कूल के पास पहुंचे तो देखा कि पीछे की दीवार से पानी अंदर घुस रहा है। बच्चे कमरे में एक कोने में सिमटे थे। काजल उन्हें शांत रखने की कोशिश कर रही थी। कंप्यूटर कमरे की खिड़की से पानी आ रहा था। रिवान ने तुरंत मुख्य स्विच बंद किया। गौरी ने बच्चों को एक-एक करके बाहर निकालना शुरू किया। लेकिन बाहर रास्ता सुरक्षित नहीं था। ऊपर से मलबा आने की आवाज बढ़ रही थी।
“हमें बच्चों को पंचायत भवन ले जाना होगा,” रिवान ने कहा।
“बीच का रास्ता टूट गया है,” एक युवक बोला।
रिवान ने स्कूल के पुराने नक्शे को याद किया। पीछे से एक संकरी पगडंडी थी जो जलधारा के किनारे से होकर नीचे आती थी। सामान्य दिनों में लोग कम इस्तेमाल करते थे, पर शायद अभी वही रास्ता बचा था। उसने टॉर्च उस दिशा में घुमाई। पानी तेज था, पर गुजरना संभव था अगर रस्सी बांध दी जाए।
गौरी ने तुरंत स्कूल के स्टोर से रस्सी निकाली। रिवान और गांव के युवक पहले आगे बढ़े, उन्होंने दो पेड़ों के बीच रस्सी बांधी। बच्चे डर रहे थे। एक छोटा बच्चा रोते हुए बोला, “मैं नहीं जाऊंगा।”
गौरी उसके सामने घुटनों पर बैठी। “तुम्हें याद है तुमने कहा था कि तुम पायलट बनोगे?”
बच्चे ने सिर हिलाया।
“तो पायलट डरते हैं, लेकिन रुकते नहीं।”
बच्चे ने उसका हाथ पकड़ लिया।
एक-एक कर बच्चों को निकाला जाने लगा। बारिश चेहरे पर चोट कर रही थी। रिवान रस्सी पकड़े खड़ा था। हर बच्चे को पार कराते समय वह कहता, “मुझे देखो, पानी को नहीं।” काजल आखिरी बच्चों में थी। जब वह पार कर रही थी, तभी ऊपर से तेज मलबा आया। एक बड़ा पत्थर पानी के साथ लुढ़का और रास्ते का हिस्सा टूट गया। काजल फिसल गई।
गौरी चीखी, “काजल!”
रिवान ने बिना सोचे रस्सी छोड़कर छलांग लगाई। उसने काजल का हाथ पकड़ लिया, लेकिन खुद भी घुटनों तक बहते मलबे में धंस गया। पानी का वेग इतना तेज था कि दोनों को खींचने लगा। गौरी ने दूसरे सिरे से रस्सी पकड़ी और पूरी ताकत से खींचा। गांव के युवक दौड़े। कुछ सेकंड जैसे कई जन्मों में बदल गए। आखिर सबने मिलकर रिवान और काजल को बाहर खींच लिया।
काजल रो रही थी, पर सुरक्षित थी। रिवान के पैर में चोट लगी थी। घुटने से खून बह रहा था। फिर भी उसने सबसे पहले पूछा, “सारे बच्चे निकल गए?”
गौरी की आंखों से बारिश और आंसू साथ बह रहे थे। “हां। सब निकल गए।”
बच्चों को पंचायत भवन पहुंचाया गया। रात भर गांव जागता रहा। कुछ लोग ऊपरी बस्ती से परिवारों को नीचे लाए। कुछ लोग पशुओं को खोलकर सुरक्षित जगह ले गए। महिलाएं चाय बनाती रहीं। डिजिटल कमरे के कुछ उपकरण भी बचा लिए गए, लेकिन बहुत सामान भीग गया। रिवान का शहर जाने वाला बैग स्कूल में रह गया था। सुबह जब बारिश थमी और वह बैग मिला, तो अंदर रखे इंटरव्यू के कागज भीग चुके थे। लैपटॉप किसी तरह बच गया, पर दस्तावेज खराब हो गए।
गौरी ने बैग हाथ में लिया। “आपका इंटरव्यू…”
रिवान ने भीगे कागज देखे। एक पल के लिए उसके चेहरे पर दर्द आया। फिर उसने पंचायत भवन में सोते बच्चों को देखा। काजल अपनी नोटबुक सीने से लगाए सो रही थी।
वह बोला, “कुछ इंटरव्यू छूट जाते हैं, कुछ जवाब मिल जाते हैं।”
गौरी कुछ नहीं बोली। लेकिन उसके मन में रिवान के लिए जो सम्मान था, वह अब शब्दों से बड़ा हो चुका था।
सुबह नुकसान का असली दृश्य सामने आया। ऊपरी नाले ने रास्ता काट दिया था। स्कूल की पिछली दीवार कमजोर हो गई थी। जलधारा में मिट्टी भर गई थी। कुछ खेत बह गए थे। दो घरों की दीवारें टूट गईं। देवसारी फिर एक कठिन मोड़ पर खड़ा था।
लेकिन इस बार गांव डरा हुआ जरूर था, टूटा नहीं था।
रिवान ने पैर पर पट्टी बंधवाई और उसी दिन काम में जुट गया। गौरी ने महिलाओं और युवाओं की टीम बनाई। मोहनलाल ने किसानों को संगठित किया। सरोजा ने राहत रसोई शुरू की। काजल और बच्चों ने सुरक्षित जगह पर छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया ताकि डर कम हो। हरिदत्त ने पुराने रास्तों की जानकारी दी। पंचायत ने जिला प्रशासन को सूचना भेजी।
इस बार गांव ने मदद मांगी भी, और खुद काम भी शुरू किया। रिवान ने नुकसान की तस्वीरें, स्थान और जरूरी जरूरतों की सूची बनाकर ऑनलाइन साझा की। उसने स्पष्ट लिखा “हमें दया नहीं, पुनर्निर्माण में साझेदारी चाहिए।” यह वाक्य लोगों को छू गया। कई जगह से मदद आने लगी किताबें, कंबल, सौर लैम्प, स्कूल के लिए उपकरण, और कुछ धन।