भाग 2
अवनी ने बताया, “नौ शापित वस्तुओं को विशेष दिशाओं में रखा गया है। इनके बीच रहने वाले व्यक्ति की ऊर्जा धीरे-धीरे खत्म होती रहती है। जाल तुरंत नहीं मारता। पहले उसके आसपास दुर्घटनाएँ बढ़ाता है, लोगों को उससे दूर करता है और फिर तय समय पर उसकी जान लेता है।”
सावित्री देवी ने काँपती आवाज में पूछा, “तय समय?”
“आर्यवर्धन का तीसवाँ जन्मदिन।”
सावित्री देवी कुर्सी पकड़कर बैठ गईं।
“क्या इसे तोड़ा जा सकता है?”
अवनी मुस्कराई। “किसी और के लिए मुश्किल होगा। मेरे लिए नहीं।”
उसने सभी दरवाजे बंद करवाए। फिर नौ लाल धागे लेकर हर वस्तु के चारों ओर बाँध दिए। बीच में बैठकर उसने आँखें बंद कर लीं।
हवा अचानक भारी हो गई। खिड़कियाँ बिना हवा के काँपने लगीं। काला हाथी अपने आप फर्श पर गिरा और बीच से टूट गया।
एक-एक करके सभी वस्तुओं में दरार आने लगी।
अवनी ने जोर से जमीन पर हाथ मारा।
नौ वस्तुएँ एक साथ टूट गईं।
उसी पल शहर के दूसरे हिस्से में आर्यवर्धन का चाचा देवेंद्र अपने कमरे में बैठा था। अचानक उसके सीने में तेज दर्द उठा। उसके मुँह से खून निकला और वह फर्श पर गिर पड़ा।
उसकी पत्नी विकी घबराकर उसके पास पहुँची।
“क्या हुआ?”
देवेंद्र ने मुश्किल से कहा, “मृत्यु-जाल… किसी ने तोड़ दिया।”
विकी का चेहरा बदल गया।
“यह कैसे हो सकता है?”
देवेंद्र की आँखों में क्रोध था। “आर्यवर्धन की नई दुल्हन। उस लड़की का पता लगाओ।”
सिंघानिया भवन में अवनी ने टूटे हुए टुकड़ों को अलग-अलग कपड़े में बँधवाया।
“इन्हें नदी में नहीं बहाना,” उसने कहा। “इन्हें शहर से दूर जमीन में अलग-अलग जगह दबाना होगा।”
आर्यवर्धन उसके पास आया।
“तुम्हें कैसे पता कि यह जाल मेरे लिए था?”
“क्योंकि इसका केंद्र आपका कमरा है।”
“और इसे लगाने वाला?”
“वही, जो आपके घर में बिना रोक-टोक आ सकता है। वही, जो आपकी मौत से सबसे ज्यादा लाभ पाएगा।”
आर्यवर्धन कुछ पल खामोश रहा।
उसके माता-पिता की मृत्यु बचपन में एक कार दुर्घटना में हुई थी। परिवार में अब केवल दादी, चाचा देवेंद्र, चाची विकी और चचेरा भाई विक्रम थे।
यदि आर्यवर्धन मर जाता, तो उसकी संपत्ति पहले सावित्री देवी को मिलती और उनके बाद देवेंद्र के परिवार को।
आर्यवर्धन ने धीरे से कहा, “चाचा?”
अवनी ने कहा, “संदेह और प्रमाण अलग होते हैं। अभी हमें केवल संदेह है।”
उसी शाम देवेंद्र और विक्रम भवन आए।
देवेंद्र का चेहरा पीला था। उसने बीमारी का बहाना बनाया, मगर अवनी ने उसकी आँखों के नीचे उभरी काली रेखाएँ देख ली थीं।
विक्रम ने अवनी को देखकर हँसते हुए कहा, “तो यही है वह पहाड़ी लड़की, जिसने मेरे भाई को फँसा लिया?”
अवनी ने आँखें तरेरकर पूछा, “किसे पहाड़ी लड़की कहा?”
“तुम्हें। कपड़े और बोलने का तरीका देखकर साफ पता चलता है।”
अवनी ने उसका हाथ पकड़कर इतनी तेजी से मोड़ा कि विक्रम दर्द से चिल्ला उठा।
“मैं पहाड़ से आई हूँ, इसमें शर्म की क्या बात है? लेकिन अगली बार तमीज से बात करना।”
“छोड़ो मुझे!”
आर्यवर्धन आगे आया और विक्रम का हाथ छुड़ाने के बजाय बोला, “पहले अवनी से माफी माँगो।”
“मैं?”
“वह मेरी पत्नी है।”
विक्रम ने दादी और आर्यवर्धन की ओर देखा। उसे मजबूरी में कहना पड़ा, “माफ कर दो।”
अवनी ने उसका हाथ छोड़ दिया।
फिर वह मुस्कराकर बोली, “शादी में छोटा भाई उपहार देता है न?”
विक्रम चौंका। “कौन-सा उपहार?”
“ग्यारह लाख रुपये ठीक रहेंगे।”
“क्या तुम मुझे लूट रही हो?”
सावित्री देवी हँस पड़ीं। “दे दो। पहली बार तुम्हारे भाई का घर बसा है।”
विक्रम ने गुस्से में पैसे भेज दिए।
अवनी ने अपने मोबाइल में आई सूचना देखकर खुश होते हुए कहा, “धन्यवाद।”
देवेंद्र ने अवनी को ध्यान से देखा। “तुम आर्यवर्धन से प्रेम करती हो?”
अवनी ने कहा, “अभी तो ठीक से जानती भी नहीं हूँ।”
“तो विवाह क्यों किया?”
“क्योंकि हमारी किस्मतें जुड़ी हैं।”
देवेंद्र की आँखों में एक पल के लिए डर दिखाई दिया।
रात में आर्यवर्धन ने अवनी से पूछा, “तुमने मेरे चाचा को इतनी ध्यान से क्यों देखा?”
अवनी ने कहा, “मृत्यु-जाल टूटने पर जिसने उसे बनाया था, उसे उलटा असर सहना पड़ता। आपके चाचा के चेहरे पर वही असर है।”
“तो उन्होंने ही इसे बनाया?”
“बहुत संभव है।”
आर्यवर्धन खिड़की के पास चला गया। उसकी आँखों में पीड़ा थी।
“माता-पिता के बाद मैंने उन्हें अपने पिता जैसा माना। बचपन से वह मेरे साथ रहे।”
अवनी उसके पास पहुँची।
“कई बार अपने लोग ही सबसे गहरा घाव देते हैं। क्योंकि बाहरी दुश्मन से हम सावधान रहते हैं, मगर अपने लोगों के सामने दिल खुला होता है।”
आर्यवर्धन ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारे अपने कौन हैं?”
अवनी का चेहरा कुछ पल के लिए बुझ गया।
“मेरे गुरु थे। अब शायद कोई नहीं।”
“माता-पिता?”
“मुझे उनके बारे में कुछ नहीं पता। गुरु जी ने कहा था कि सही समय पर सच अपने आप मेरे सामने आएगा।”
पहली बार दोनों के बीच एक शांत अपनापन पैदा हुआ।
लेकिन अगले ही दिन आर्यवर्धन को अवनी की एक और सच्चाई पता चल गई।
अवनी अपने पुराने थैले में कुछ कागज रख रही थी। उनमें से एक पत्र नीचे गिर गया। आर्यवर्धन ने उसे उठा लिया।
पत्र उसके गुरु का था।
उसमें लिखा था कि अवनी की किस्मत में धन का अभाव है। वह जितना भी धन कमाएगी, वह उसके हाथ से चला जाएगा। उसका भाग्य तभी संतुलित होगा जब वह संसार के सबसे प्रबल धन-भाग्य वाले व्यक्ति से विवाह करेगी।
वह व्यक्ति आर्यवर्धन था।
आर्यवर्धन ने पत्र पढ़कर पूछा, “तो यह है तुम्हारे विवाह का सच?”
अवनी पलटी और उसके हाथ में पत्र देखकर चुप हो गई।
“तुम मेरे पास मेरे लिए नहीं आई थीं। तुम्हें केवल मेरा भाग्य चाहिए था।”
“मैं झूठ नहीं बोलूँगी,” अवनी ने कहा। “शुरुआत में मैं इसी कारण आई थी।”
आर्यवर्धन की आँखों में निराशा उतर आई।
“मुझे लगा था कि कम से कम एक इंसान ऐसा मिला है जो मुझसे नहीं डरता। लेकिन तुम भी बाकी लोगों की तरह मेरे पास अपने लाभ के लिए आईं।”
“मैंने आपकी जान बचाई है।”
“क्योंकि मेरी जान से तुम्हारी किस्मत जुड़ी है।”
अवनी कुछ कहना चाहती थी, मगर उसके पास सही शब्द नहीं थे।
आर्यवर्धन ने कहा, “तुम इस घर में रह सकती हो। दादी तुम्हें पसंद करती हैं। कानूनी रूप से तुम मेरी पत्नी हो। लेकिन मुझसे किसी रिश्ते की उम्मीद मत रखना।”
वह कमरे से चला गया।
दोस्तों, कहानी यहाँ एक ऐसे मोड़ पर आ चुकी थी जहाँ पहली बार अवनी को समझ आया कि सच बोल देना आसान होता है, मगर उस सच से किसी के दिल पर क्या गुजरती है, यह समझना मुश्किल।
वह आर्यवर्धन के पास अपने भाग्य के लिए आई थी, मगर कुछ ही दिनों में उसे उसकी खामोशी, उसका अकेलापन और उसके भीतर छिपा दर्द दिखाई देने लगा था।
उस रात अवनी लंबे समय तक सो नहीं पाई।
दूसरी तरफ आर्यवर्धन अपने कमरे में अकेला बैठा था। बरसों बाद उसने किसी पर भरोसा करना शुरू किया था और अब उसे लग रहा था कि वह भरोसा भी सौदे का हिस्सा था।
मगर दोनों नहीं जानते थे कि अगले कुछ दिनों में आने वाला संकट उनके रिश्ते की असली परीक्षा बनने वाला था।
सुबह सिंघानिया भवन में एक अजीब खामोशी थी।
अवनी पहले की तरह हँसती हुई नाश्ते की मेज पर नहीं आई। आर्यवर्धन भी जल्दी कार्यालय निकल गया। सावित्री देवी ने दोनों के चेहरे देखकर समझ लिया कि उनके बीच कुछ हुआ है, मगर उन्होंने तुरंत सवाल करना ठीक नहीं समझा।
दोपहर को अवनी पूजा वाले छोटे कमरे में बैठी थी। उसके सामने तांबे की एक थाली रखी थी, जिसमें पानी, कुछ जड़ी-बूटियाँ और आर्यवर्धन की जन्मतिथि लिखी हुई पर्ची थी।
वह काफी देर तक गणना करती रही।
फिर उसने गहरी साँस ली।
“मृत्यु-जाल टूट गया है,” उसने खुद से कहा, “मगर उसकी किस्मत पर पड़ा दबाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।”
सावित्री देवी कमरे में आईं।
“क्या हुआ बेटी?”
अवनी ने उन्हें बताया, “आर्यवर्धन की जिंदगी पर बना बड़ा संकट टल गया है, लेकिन इतने वर्षों तक नकारात्मक ऊर्जा के बीच रहने से उसकी किस्मत अधूरी हो चुकी है। दुर्घटनाएँ कम होंगी, मगर पूरी तरह बंद नहीं होंगी।”
“तो उपाय क्या है?”
“आठ रत्नों का भाग्य-ताबीज।”
सावित्री देवी ने नाम सुना था।
यह ताबीज कई पीढ़ियों पहले हिमालय के ठंडे पत्थर से बनाया गया था। उसमें आठ छोटे रत्न लगे थे और वर्षों तक अलग-अलग संतों ने उसे आशीर्वाद दिया था। माना जाता था कि वह ताबीज किसी व्यक्ति की बिखरी हुई किस्मत को जोड़ सकता है।
“वह ताबीज अब कहाँ है?” सावित्री देवी ने पूछा।
“मुझे नहीं पता।”
उसी समय आद्या वहाँ आई।
“दादी जी, राजवंशी परिवार की ओर से निमंत्रण आया है। वे अपनी पुरानी वस्तुओं की प्रदर्शनी कर रहे हैं।”
उसने निमंत्रण पत्र अवनी को दिया।
पत्र पर प्रदर्शनी की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु का चित्र बना था।
अवनी उसे देखते ही खड़ी हो गई।
“यही है!”
“क्या?”
“आठ रत्नों का ताबीज।”
राजवंशी परिवार दिल्ली के सबसे पुराने और सम्मानित परिवारों में से एक था। उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के सलाहकार रहे थे। समय के साथ उनकी राजनीतिक ताकत कम हुई, मगर समाज में सम्मान अब भी बहुत था।
परिवार के मुखिया हरिनारायण राजवंशी अपनी पोती श्रद्धा के साथ रहते थे। श्रद्धा बचपन में बहुत चंचल और हँसमुख थी, मगर पंद्रह वर्ष की उम्र के बाद उसकी सेहत लगातार बिगड़ने लगी।
अब वह पच्चीस वर्ष की थी। उसका शरीर इतना कमजोर हो चुका था कि वह अधिक देर खड़ी भी नहीं रह पाती थी।
हरिनारायण ने देश-विदेश के बड़े चिकित्सकों से उसका इलाज कराया, मगर कोई लाभ नहीं हुआ।
प्रदर्शनी केवल पुरानी वस्तुओं को दिखाने के लिए नहीं थी। उसके पीछे एक और उद्देश्य था। हरिनारायण अपनी पोती के लिए ऐसा जीवनसाथी ढूँढ़ना चाहते थे, जो उसके बाद राजवंशी परिवार और श्रद्धा दोनों की देखभाल कर सके।
निमंत्रण मिलने के बाद आर्यवर्धन शाम को घर लौटा तो सावित्री देवी ने उसे प्रदर्शनी में जाने के लिए कहा।
उसने साफ मना कर दिया।
“मुझे ऐसे समारोह पसंद नहीं।”
अवनी ने कहा, “आपको जाना पड़ेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि वहाँ वह चीज है, जो आपकी किस्मत ठीक कर सकती है।”
आर्यवर्धन ने उसकी तरफ देखा। पिछली रात की कड़वाहट अब भी मौजूद थी।
“मेरी किस्मत ठीक करके तुम्हें क्या मिलेगा?”
अवनी कुछ पल चुप रही।
फिर उसने कहा, “पहले मुझे लगता था कि केवल मेरा भाग्य पूरा होगा। अब लगता है कि अगर आपका जीवन ठीक नहीं हुआ, तो मेरा भाग्य पूरा होकर भी बेकार रहेगा।”
आर्यवर्धन ने उसकी बात का उत्तर नहीं दिया, मगर अगले दिन वह प्रदर्शनी में जाने के लिए तैयार हो गया।
राजवंशी भवन किसी पुराने महल जैसा था। ऊँची छतें, लकड़ी की नक्काशी, बड़े-बड़े चित्र और दीवारों पर पुरानी तलवारें लगी थीं।
देश के कई बड़े परिवार वहाँ आए हुए थे।
जैसे ही आर्यवर्धन अंदर पहुँचा, लोग उससे दूरी बनाने लगे।
“वह आर्यवर्धन है।”
“इतनी भीड़ में क्यों आया है?”
“उसकी मनहूसियत किसी पर पड़ गई तो?”
अवनी ने लोगों की बातें सुनीं, मगर आर्यवर्धन का चेहरा शांत रहा। वह शायद ऐसी बातें सुनने का आदी हो चुका था।
तभी विक्रम अपने पिता देवेंद्र के साथ वहाँ पहुँचा।
विक्रम ने हँसते हुए कहा, “भैया, आपको तो घर में रहना चाहिए था। लोग यहाँ वस्तुएँ देखने आए हैं, दुर्घटना का तमाशा नहीं।”
अवनी आगे बढ़ी। “अगर डर लग रहा है तो तुम घर चले जाओ।”
“मैं क्यों जाऊँ?”
“क्योंकि तुम्हारा चेहरा देखकर तो पुरानी वस्तुएँ भी टूट सकती हैं।”
पास खड़े कुछ लोग हँस पड़े।
विक्रम का चेहरा लाल हो गया।
अवनी ने अपने थैले से छोटे-छोटे पीले धागे निकाले।
“जिसे आर्यवर्धन के पास आने से डर लगता है, वह यह सुरक्षा-धागा पहन सकता है।”
एक महिला ने पूछा, “क्या सच में काम करेगा?”
“पहनकर देख लीजिए।”
अवनी ने आद्या को एक धागा बाँधा और उसे आर्यवर्धन के पास खड़ा कर दिया। कुछ नहीं हुआ।
फिर उसने आद्या का धागा उतरवाया। जैसे ही आद्या आर्यवर्धन के पास से गुजरी, उसका पैर कालीन में फँसा और वह गिरते-गिरते बची।
लोग हैरान रह गए।
कुछ ही देर में सबने अवनी से सुरक्षा-धागे माँगने शुरू कर दिए।
विक्रम भी डरते हुए आगे आया।
“मुझे भी एक दो।”
“तुम्हारे लिए बीस हजार रुपये।”
“बाकी सबको मुफ्त दिया है!”
“बाकी लोगों ने मेरे पति का अपमान नहीं किया।”
विक्रम ने गुस्से में पैसे दिए और धागा ले लिया।
देवेंद्र ने भी एक धागा माँगा।
अवनी ने उसे धागा देते समय उसकी कलाई को हल्के से छुआ। उसे वही उलटी ऊर्जा महसूस हुई, जो मृत्यु-जाल टूटने के बाद पैदा होती है।
अब उसका संदेह लगभग यकीन में बदल गया था।
प्रदर्शनी के बीचोंबीच काँच के एक बड़े संदूक में आठ रत्नों वाला ताबीज रखा था।
अवनी उसे देखकर कुछ पल के लिए सब भूल गई।
ताबीज से हल्की सुनहरी चमक निकल रही थी।
“यही आपकी आखिरी उम्मीद है,” उसने आर्यवर्धन से कहा।
आर्यवर्धन बोला, “यह राजवंशी परिवार की सबसे मूल्यवान वस्तु है। वे इसे बेचेंगे नहीं।”
“तो ऐसा काम करेंगे कि वे खुद हमें दे दें।”
आर्यवर्धन ने पहली बार हल्के अंदाज में पूछा, “तुम हर समस्या का हल इतनी आसानी से सोच लेती हो?”
“सोचना आसान होता है। करना मुश्किल होगा।”
उसी समय हरिनारायण राजवंशी वहाँ आए।