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99 लड़कियाँ छोड़ गईं, 100वीं दुल्हन ने खोल दिया करोड़पति की मौत का खतरनाक राज

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

आज की कहानी है आर्यवर्धन सिंघानिया नाम के एक ऐसे करोड़पति की, जिसके पास दौलत, ताकत और शोहरत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन पूरा शहर उसे मनहूस समझता था। कहा जाता था कि जो भी उसके करीब जाता, वह किसी न किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता। इसी डर के कारण उसकी निन्यानवे सगाइयाँ टूट चुकी थीं।

जब उसकी सौवीं दुल्हन भी विवाह के दिन मंडप से भाग जाती है, तभी पहाड़ों से आई रहस्यमयी अवनी उसकी जिंदगी में प्रवेश करती है। अवनी बिना किसी डर के आर्यवर्धन से विवाह कर लेती है, लेकिन विवाह के बाद उसे सिंघानिया भवन में छिपा एक ऐसा मृत्यु-जाल दिखाई देता है, जिसे आर्यवर्धन के तीसवें जन्मदिन पर उसकी जान लेने के लिए बनाया गया था।
दोस्तों, आज की कहानी है आर्यवर्धन सिंघानिया नाम के एक ऐसे करोड़पति की, जिसके पास दौलत, ताकत और शोहरत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन पूरा शहर उसे मनहूस समझता था। कहा जाता था कि जो भी उसके करीब जाता, वह किसी न किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता। इसी डर के कारण उसकी निन्यानवे सगाइयाँ टूट चुकी थीं।

जब उसकी सौवीं दुल्हन भी विवाह के दिन मंडप से भाग जाती है, तभी पहाड़ों से आई रहस्यमयी अवनी उसकी जिंदगी में प्रवेश करती है। अवनी बिना किसी डर के आर्यवर्धन से विवाह कर लेती है, लेकिन विवाह के बाद उसे सिंघानिया भवन में छिपा एक ऐसा मृत्यु-जाल दिखाई देता है, जिसे आर्यवर्धन के तीसवें जन्मदिन पर उसकी जान लेने के लिए बनाया गया था।

अब सवाल यह था कि क्या आर्यवर्धन सच में जन्म से मनहूस था, या फिर उसका कोई अपना ही वर्षों से उसकी मौत की योजना बना रहा था?

जैसे-जैसे अवनी इस रहस्य को सुलझाती है, उसके सामने शापित वस्तुएँ, आठ रत्नों वाला दुर्लभ ताबीज, वर्षों पुरानी हत्याएँ, संपत्ति के लिए रचा गया पारिवारिक षड्यंत्र और उसके अपने माता-पिता की मृत्यु का सच सामने आने लगता है।

अवनी ने आर्यवर्धन से विवाह अपनी अधूरी किस्मत को पूरा करने के लिए किया था, लेकिन धीरे-धीरे वही व्यक्ति उसकी जिंदगी, उसका परिवार और उसका सच्चा प्रेम बन जाता है।

क्या अवनी आर्यवर्धन के तीसवें जन्मदिन से पहले उसके ऊपर छाया मृत्यु का संकट समाप्त कर पाएगी?

आर्यवर्धन के अपने परिवार में वह कौन था, जो वर्षों से उसे मारने की कोशिश कर रहा था?

और क्या अपने पति को बचाते हुए अवनी स्वयं अपनी जान खो देगी?

जानने के लिए इस रहस्य, प्रेम, विश्वासघात और रोमांच से भरी पूरी कहानी को अंत तक जरूर सुनिए।

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आप भाग 4 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 48 मिनट

भाग 4

विक्रम के कार्यालय में उसे एक धातु का छोटा चिह्न मिला था। उस पर सूर्य और चंद्रमा का वही निशान था, जो उसके गुरु के दिए तांबे के सिक्के पर बना था।

अवनी उसे लेकर उस पहाड़ी आश्रम पहुँची, जहाँ वह पली थी।

गुरु जी अब जीवित नहीं थे, मगर उनके पुराने साथी भैरवनाथ वहाँ रहते थे।

चिह्न देखते ही उनका चेहरा बदल गया।

“यह तुम्हें कहाँ मिला?”

“देवेंद्र सिंघानिया के बेटे के पास।”

भैरवनाथ लंबे समय तक चुप रहे।

फिर उन्होंने वह सच बताया, जिसका अवनी को बचपन से इंतजार था।

अवनी के माता-पिता प्राचीन वस्तुओं के जानकार थे। वे पुलिस और पुरातत्व विभाग को उन लोगों की जानकारी देते थे, जो मंदिरों और समाधियों से दुर्लभ वस्तुएँ चुराकर बेचते थे।

देवेंद्र उसी गिरोह से जुड़ा था।

अवनी के माता-पिता ने उसके खिलाफ प्रमाण इकट्ठे कर लिए थे। मगर पुलिस तक पहुँचने से पहले उनकी कार पहाड़ से नीचे गिर गई।

उस दुर्घटना में केवल छोटी-सी अवनी बची थी।

गुरु जी ने उसे वहाँ से निकालकर आश्रम में पाला।

भैरवनाथ ने कहा, “तुम्हारे गुरु जानते थे कि एक दिन तुम्हारा सामना देवेंद्र से होगा। इसी कारण उन्होंने तुम्हें आर्यवर्धन तक पहुँचने का रास्ता बताया।”

अवनी की आँखों में आँसू भर आए।

“तो मेरा आर्यवर्धन से मिलना केवल किस्मत के कारण नहीं था?”

“तुम दोनों के माता-पिता एक ही दुश्मन का शिकार हुए थे।”

अवनी तुरंत दिल्ली लौटी और आर्यवर्धन को सब बताया।

आर्यवर्धन ने पहली बार उसे रोते देखा।

उसने अवनी को अपने सीने से लगा लिया।

“अब यह केवल तुम्हारी लड़ाई नहीं है।”

अवनी ने कहा, “और आपकी भी अकेली नहीं।”

दोनों ने मिलकर देवेंद्र के पुराने अपराधों के प्रमाण जुटाने शुरू किए।

लेकिन देवेंद्र भी समझ चुका था कि समय उसके हाथ से निकल रहा है।

उसने अंतिम योजना बनाई।

एक सुबह आर्यवर्धन और अवनी को कंपनी की एक नई परियोजना देखने पहाड़ी क्षेत्र में जाना था। उनकी कार की जाँच पहले ही हो चुकी थी, मगर रात में विक्रम चुपके से गैराज में गया और ब्रेक की नली काट दी।

सुरक्षा कैमरे में उसका चेहरा साफ दर्ज हो गया, लेकिन उस समय किसी ने तस्वीर नहीं देखी।

कार पहाड़ी रास्ते पर पहुँची।

अचानक चालक ने कहा, “ब्रेक काम नहीं कर रहे!”

अवनी का देखा हुआ दृश्य सच हो रहा था।

सामने गहरी खाई थी।

आर्यवर्धन ने चालक को पीछे हटने को कहा और खुद गाड़ी सँभाली। अवनी ने आठ रत्नों के ताबीज पर हाथ रखा और आँखें बंद कर लीं।

सड़क के किनारे एक बड़ा पेड़ था।

अवनी ने कहा, “गाड़ी उस तरफ मोड़िए!”

“टक्कर होगी।”

“खाई में गिरने से बेहतर है!”

आर्यवर्धन ने पूरी ताकत से गाड़ी पेड़ की ओर मोड़ी। कार पेड़ से टकराई। सामने का हिस्सा टूट गया, मगर गाड़ी खाई में गिरने से बच गई।

अवनी के माथे से खून बह रहा था। आर्यवर्धन के हाथ में चोट लगी थी।

फिर भी दोनों जीवित थे।

कुछ ही देर बाद आद्या ने सुरक्षा कैमरे की तस्वीर पुलिस को दे दी। विक्रम गिरफ्तार कर लिया गया।

देवेंद्र का धैर्य खत्म हो गया।

उसने अपनी पत्नी विकी के साथ सावित्री देवी का अपहरण कर लिया।

दादी को परिवार के पुराने बंद पड़े महल में ले जाया गया, जो शहर से दूर था।

आर्यवर्धन के पास देवेंद्र का फोन आया।

“अगर अपनी दादी को जीवित देखना चाहते हो तो विक्रम के खिलाफ शिकायत वापस लो। कंपनी के सारे हिस्से मेरे नाम करो और अवनी को लेकर पुराने महल में आओ।”

आर्यवर्धन ने पुलिस को सूचना देने की कोशिश की, मगर देवेंद्र ने चेतावनी दी कि महल के आसपास उसके आदमी मौजूद हैं।

अवनी ने कहा, “हम जाएँगे।”

“यह जाल है।”

“मुझे पता है।”

“मैं तुम्हें खतरे में नहीं डालूँगा।”

अवनी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “जब मैं पहली बार आपके जीवन में आई थी, तब मुझे केवल अपना भाग्य दिखाई देता था। आज मुझे आपके बिना कुछ दिखाई नहीं देता। इसलिए अब जहाँ आप जाएँगे, मैं साथ जाऊँगी।”

दोनों रात के अंधेरे में पुराने महल पहुँचे।

महल वर्षों से बंद था। दीवारों पर सीलन थी, टूटी खिड़कियों से हवा अंदर आ रही थी और लंबे गलियारों में उनके कदमों की आवाज गूँज रही थी।

मुख्य हॉल में सावित्री देवी कुर्सी से बँधी थीं।

देवेंद्र उनके पीछे खड़ा था। विकी के हाथ में बंदूक थी।

“कागज लाए?” देवेंद्र ने पूछा।

आर्यवर्धन ने कहा, “पहले दादी को छोड़ो।”

“पहले हस्ताक्षर।”

अवनी ने चारों तरफ देखा। दीवारों पर कई पुरानी वस्तुएँ लगी थीं। उन्हीं में आर्यवर्धन के घर से हटाए गए मृत्यु-जाल जैसी आकृतियाँ थीं।

उसे समझ आया कि देवेंद्र ने आखिरी शापित वस्तु यहाँ छिपा रखी थी।

देवेंद्र हँसा।

“तुम्हें लगता है तुमने मेरा जाल तोड़ दिया? वह केवल पहला हिस्सा था।”

उसने दीवार से एक काली मूर्ति उठाई।

अवनी के गुरु का सूर्य-चंद्र चिह्न उसी मूर्ति पर बना था।

“यह तुम्हारे माता-पिता की आखिरी खोज थी,” देवेंद्र ने कहा। “उन्हें लगा था कि वे मुझे रोक लेंगे। जैसे आर्यवर्धन के माता-पिता को लगा था कि वे मेरी हिस्सेदारी की चोरी पकड़कर मुझे परिवार से निकाल देंगे।”

आर्यवर्धन की आँखें लाल हो गईं।

“मेरे माता-पिता की दुर्घटना भी तुमने करवाई थी?”

“हाँ।”

सावित्री देवी ने अविश्वास से बेटे की तरफ देखा।

“देवेंद्र… तूने अपने भाई को मरवा दिया?”

देवेंद्र ने कहा, “वह हमेशा मुझसे आगे था। पिता ने कारोबार उसे दिया। बाद में सब कुछ आर्यवर्धन को मिलने वाला था। मैं कब तक दूसरों के हिस्से पर जीता?”

सावित्री देवी रो पड़ीं।

“मैंने तुझे बेटे की तरह नहीं, अपने जीवन की तरह माना।”

“लेकिन आपने हमेशा आर्यवर्धन को चुना।”

देवेंद्र ने काली मूर्ति जमीन पर रखी और कुछ शब्द बोलने लगा।

कमरे की हवा भारी हो गई।

आर्यवर्धन के गले का ताबीज गर्म होने लगा।

अवनी ने कहा, “वह आर्यवर्धन की जीवन-शक्ति को फिर से बाँधने की कोशिश कर रहा है।”

उसने अपने थैले से तांबे का सिक्का निकाला और मूर्ति की ओर फेंका। दोनों के टकराते ही तेज आवाज हुई।

दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।

विकी ने घबराकर गोली चला दी।

आर्यवर्धन ने अवनी को धक्का देकर बचाया। गोली उसके कंधे को छूती हुई निकल गई।

अवनी ने क्रोध में हाथ उठाया। कमरे में रखा भारी पर्दा हवा से उड़कर विकी के ऊपर गिरा और बंदूक उसके हाथ से छूट गई।

आर्यवर्धन ने देवेंद्र की तरफ बढ़ना चाहा, मगर काली मूर्ति से निकली ऊर्जा ने उसे जमीन पर गिरा दिया।

अवनी उसके सामने बैठ गई।

उसने दोनों हाथ ताबीज पर रखे और आँखें बंद कर लीं।

ऊर्जा इतनी तेज थी कि उसके हाथ जलने लगे।

आर्यवर्धन ने मुश्किल से कहा, “अवनी, पीछे हटो।”

“नहीं।”

“तुम मर जाओगी।”

“आपके बिना बचकर क्या करूँगी?”

उसने पूरी शक्ति से गुरु का सिखाया अंतिम मंत्र बोला।

आठ रत्नों के ताबीज से सुनहरी रोशनी निकली। तांबे के सिक्के पर बना सूर्य-चंद्र चिह्न चमक उठा।

काली मूर्ति काँपने लगी।

देवेंद्र चिल्लाया, “इसे रोको!”

वह अवनी की ओर दौड़ा, मगर आर्यवर्धन ने घायल होने के बावजूद उसका पैर पकड़कर गिरा दिया।

अवनी ने अंतिम बार जोर से जमीन पर हाथ मारा।

काली मूर्ति हजारों टुकड़ों में टूट गई।

एक तेज रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।

देवेंद्र दीवार से जा टकराया। अवनी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ी।

उसी समय बाहर पुलिस की गाड़ियों की आवाज सुनाई दी।

आद्या ने आर्यवर्धन के मोबाइल में लगी गुप्त स्थान-सूचना के सहारे पुलिस को महल तक पहुँचा दिया था।

देवेंद्र, विकी और उनके सभी आदमी गिरफ्तार कर लिए गए।

सावित्री देवी को मुक्त कराया गया।

आर्यवर्धन ने अवनी को अपनी बाँहों में उठाया।

“आँखें खोलो।”

लेकिन अवनी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

अस्पताल में तीन दिन तक वह बेहोश रही।

आर्यवर्धन उसके पास से एक पल के लिए भी नहीं हटा। सिंघानिया समूह के सारे काम आद्या सँभाल रही थी।

चौथे दिन सुबह अवनी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।

उसने आर्यवर्धन को कुर्सी पर सिर झुकाए सोते देखा।

उसने कमजोर आवाज में कहा, “आप सोते हुए कम डरावने लगते हैं।”

आर्यवर्धन की आँख खुल गई।

वह तुरंत उसके पास आया।

“तुम ठीक हो?”

“शायद।”

“तुमने फिर अपनी जान खतरे में क्यों डाली?”

अवनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “पत्नी का काम है।”

आर्यवर्धन की आँखें नम हो गईं।

“तुम शुरुआत में मेरे पास अपनी किस्मत के लिए आई थीं।”

अवनी का चेहरा गंभीर हो गया।

“हाँ।”

“लेकिन अब?”

“अब मेरी किस्मत आपसे अलग है ही नहीं।”

आर्यवर्धन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“मैंने जिंदगी भर यही सुना कि मेरे पास आने वाला इंसान बर्बाद हो जाएगा। तुम पहली थीं, जिसने मेरे पास आकर मुझे बचाया।”

अवनी ने कहा, “आप मनहूस कभी थे ही नहीं। आपके आसपास के लोग गलत थे।”

देवेंद्र के अपराधों की जाँच में कई पुराने प्रमाण मिले। आर्यवर्धन के माता-पिता की हत्या, अवनी के माता-पिता की दुर्घटना, प्राचीन वस्तुओं की तस्करी, कंपनी के हिस्सों की चोरी और हत्या के कई प्रयास साबित हो गए।

देवेंद्र को लंबी कैद की सजा मिली। विकी और विक्रम को भी उनके अपराधों के अनुसार दंड मिला। नैना को जहर देने की साजिश में सजा हुई।

सावित्री देवी को अपने बेटे का सच स्वीकार करने में समय लगा, मगर अवनी और आर्यवर्धन ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा।

कुछ महीनों बाद सिंघानिया भवन फिर से सजाया गया।

इस बार कोई भागी हुई दुल्हन नहीं थी। कोई सौदा नहीं था। कोई भय नहीं था।

आर्यवर्धन और अवनी का विवाह पूरे रीति-रिवाज से हुआ।

अवनी ने लाल जोड़ा पहना था, मगर इस बार वह उसके लिए बनाया गया था। घूँघट टेढ़ा नहीं था और गहनों को सँभालते हुए वह परेशान भी नहीं हो रही थी।

विवाह के बाद दोनों उसी मंडप में बैठे जहाँ पहली बार अवनी अचानक दुल्हन बनकर पहुँची थी।

आर्यवर्धन ने पूछा, “अगर उस दिन नैना नहीं भागती तो?”

अवनी ने कहा, “मैं फिर भी आपको ढूँढ़ लेती।”

“कैसे?”

“आपकी मनहूसियत की कहानियाँ पूरे शहर में फैली थीं। इतना प्रसिद्ध आदमी छिप भी कहाँ सकता था?”

दोनों हँस पड़े।

समय आगे बढ़ता गया।

अवनी ने सिंघानिया परिवार के अस्पतालों में ऐसे लोगों के लिए एक नया विभाग शुरू कराया, जिन्हें लंबे समय से बीमारी हो मगर कारण न मिल रहा हो। वहाँ आधुनिक इलाज के साथ योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा की व्यवस्था की गई।

आर्यवर्धन ने पहली बार काम के अलावा जीवन पर ध्यान देना शुरू किया।

वह अवनी के साथ पहाड़ों पर गया, उसके आश्रम को दोबारा बनवाया और भैरवनाथ के लिए एक छोटा चिकित्सालय खुलवाया।

एक शाम अवनी हाथ में एक कागज लेकर उसके कार्यालय पहुँची।

आर्यवर्धन कंप्यूटर के सामने बैठा था।

“मुझे आपसे जरूरी बात करनी है,” अवनी ने कहा।

आर्यवर्धन ने तुरंत कंप्यूटर बंद कर दिया।

“क्या हुआ?”

“मेरी तबीयत कुछ दिनों से अलग लग रही थी, इसलिए मैं अस्पताल गई थी।”

आर्यवर्धन घबरा गया।

“सब ठीक है?”

अवनी ने कागज उसकी तरफ बढ़ाया।

“हमारे घर में एक नया सदस्य आने वाला है।”

आर्यवर्धन कुछ पल समझ नहीं पाया।

फिर उसकी आँखें फैल गईं।

“तुम…?”

अवनी ने मुस्कराकर सिर हिला दिया।

आर्यवर्धन ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

“मैं पिता बनने वाला हूँ?”

“हाँ। मगर पहले ही बता रही हूँ, बच्चे को डराकर काम नहीं करवाना।”

“मैं किसी को नहीं डराता।”

“कार्यालय के लोग आपको देखते ही सीधे खड़े हो जाते हैं।”

“वह सम्मान है।”

“हाँ, बिल्कुल। बहुत डरावना सम्मान।”

दोस्तों, कहानी के अंत में जिस आदमी को पूरा शहर मनहूस समझता था, वही आदमी अपने परिवार के साथ सबसे सुखी जीवन जीने लगा।

और जो लड़की अपने अधूरे भाग्य को पूरा करने के लिए पहाड़ों से नीचे आई थी, उसे केवल धन का भाग्य नहीं मिला। उसे अपना घर मिला, अपना परिवार मिला और ऐसा जीवनसाथी मिला, जिसके लिए वह अपनी जान तक दाँव पर लगा सकती थी।

एक रात दोनों सिंघानिया भवन की छत पर खड़े शहर की रोशनी देख रहे थे।

आर्यवर्धन ने अवनी से पूछा, “तुम्हारे गुरु ने कहा था कि मुझसे विवाह करने पर तुम्हारी किस्मत पूरी हो जाएगी। अब तुम्हें क्या लगता है? सच में पूरी हुई?”

अवनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“किस्मत धन मिलने से पूरी नहीं होती। किस्मत तब पूरी होती है, जब इंसान को ऐसा कोई मिल जाए जिसके सामने वह बिना डर के अपना असली रूप दिखा सके।”

आर्यवर्धन ने मुस्कराकर कहा, “तो मेरी किस्मत भी उसी दिन पूरी हुई थी, जब एक अनजान लड़की लाल जोड़ा पहनकर मंडप में घुस आई थी।”

अवनी हँस पड़ी।

“अनजान नहीं। आपकी सौवीं दुल्हन।”

“और आखिरी।”

नीचे से सावित्री देवी की आवाज आई—

“तुम दोनों वहीं खड़े रहोगे या खाना भी खाओगे?”

अवनी ने आवाज लगाई, “आ रहे हैं दादी!”

वह आर्यवर्धन का हाथ पकड़कर सीढ़ियों की ओर बढ़ी।

पीछे खुले आसमान में चाँद चमक रहा था।

अब उसके आसपास कोई काला घेरा नहीं था।

क्योंकि जिस अंधेरे को लोग किस्मत समझ बैठे थे, उसे अवनी के विश्वास और प्रेम ने हमेशा के लिए मिटा दिया था।

और सच कहें दोस्तों, यही इस कहानी की सबसे बड़ी बात है।

किसी इंसान को दुनिया चाहे कितने भी नाम दे, चाहे उसे मनहूस कहे, कमजोर कहे या अकेला छोड़ दे, उसका असली भाग्य उस दिन बदलता है जब कोई व्यक्ति उसके डर के पीछे छिपे दर्द को पहचान लेता है।

आर्यवर्धन को दुनिया की दौलत विरासत में मिली थी।

लेकिन जीवन की असली दौलत उसे अवनी ने दी थी।

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