भाग 3
उन्होंने आर्यवर्धन को देखकर प्यार से गले लगाना चाहा, मगर फिर कुछ सोचकर रुक गए।
आर्यवर्धन ने उनकी झिझक समझ ली।
“आप दूर ही रहें। श्रद्धा की सेहत पहले से कमजोर है।”
हरिनारायण की आँखों में दुख उतर आया।
“तुम बचपन से श्रद्धा के अच्छे मित्र थे। उसने कई बार तुम्हें याद किया।”
अवनी ने कहा, “अब इन्हें दूर रहने की जरूरत नहीं है।”
उसने हरिनारायण को भी सुरक्षा-धागा दिया।
कुछ देर बाद हरिनारायण ने सभी मेहमानों को मुख्य हॉल में बुलाया।
वहाँ श्रद्धा को सहारा देकर लाया गया।
उसका चेहरा पीला था, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और हाथ बहुत पतले हो चुके थे। मगर उसके चेहरे पर कमजोरी के साथ एक तेज भी था।
हरिनारायण ने कहा, “आज मैंने आप सबको केवल प्रदर्शनी के लिए नहीं बुलाया। मैं अपनी पोती श्रद्धा के लिए योग्य जीवनसाथी भी ढूँढ़ना चाहता हूँ। जो उससे विवाह करेगा, आगे चलकर राजवंशी परिवार की पूरी जिम्मेदारी उसी की होगी।”
इतना सुनते ही कई युवकों की रुचि बढ़ गई।
एक युवक आगे आया और अपनी दौलत का बखान करने लगा।
श्रद्धा ने उसे कुछ पल देखा और कहा, “तुम बहुत बोलते हो।”
वह युवक चुप हो गया।
फिर विक्रम आगे आया।
“श्रद्धा, हम बचपन में मिल चुके हैं।”
श्रद्धा ने उसे ध्यान से देखा।
“हाँ। तुम वही हो, जो आर्यवर्धन को मनहूस कहकर चिढ़ाता था।”
विक्रम असहज हो गया।
“बचपन की बातें थीं।”
“तुमने एक बार उसके पानी में चूहे मारने की दवा भी मिलाई थी।”
पूरा हॉल शांत हो गया।
आर्यवर्धन ने विक्रम की तरफ देखा।
विक्रम घबरा गया। “यह झूठ है!”
श्रद्धा ने कहा, “मैंने अपनी आँखों से देखा था। गिलास गिर गया था, इसलिए आर्यवर्धन बच गया।”
देवेंद्र ने तुरंत बेटे का हाथ पकड़ा।
“चलो यहाँ से।”
विक्रम गुस्से में चिल्लाया, “मुझे भी किसी बीमार लड़की से शादी करने का शौक नहीं है! सब लोग यहाँ तुम्हारी संपत्ति के लिए आए हैं। तुम कुछ दिनों की मेहमान हो।”
हरिनारायण का चेहरा अपमान से काँप उठा।
आर्यवर्धन आगे बढ़ा, मगर अवनी ने उसका हाथ रोक दिया।
श्रद्धा ने खुद कहा, “कम से कम मेरी बीमारी ने मुझे लोगों का असली चेहरा पहचानना तो सिखा दिया। तुम्हारे जैसा व्यक्ति इस परिवार की चौखट के लायक भी नहीं है।”
देवेंद्र विक्रम को लेकर वहाँ से चला गया।
अवनी श्रद्धा को लगातार देख रही थी।
उसे श्रद्धा के शरीर के आसपास गहरा धुआँ दिखाई दे रहा था। यह कोई प्राकृतिक बीमारी नहीं थी।
अवनी उसके पास गई।
“तुम्हारे हाथ का कंगन कहाँ से आया?”
श्रद्धा ने अपने दाहिने हाथ की तरफ देखा। उस पर हरे पत्थर का एक पुराना कंगन था।
“पिता जी ने पंद्रहवें जन्मदिन पर दिया था।”
हरिनारायण ने बताया, “मेरे बेटे ने इसे एक नीलामी से खरीदा था। उसी वर्ष एक दुर्घटना में उसका निधन हो गया।”
अवनी ने पूछा, “क्या श्रद्धा की तबीयत उसके बाद बिगड़नी शुरू हुई?”
हरिनारायण चौंक गए।
“हाँ।”
अवनी ने कंगन को छूने की कोशिश की। उसकी उँगली के पास आते ही हल्की चिंगारी निकली।
“यह कंगन किसी मृत व्यक्ति की समाधि से निकाला गया है। इसमें वर्षों की नकारात्मक ऊर्जा जमा है। इसे पहनने वाले की जीवन-शक्ति धीरे-धीरे खत्म होती रहती है।”
“क्या श्रद्धा ठीक हो सकती है?” हरिनारायण ने उम्मीद से पूछा।
“हो सकती है। लेकिन उपचार कठिन होगा।”
श्रद्धा ने थकी हुई आवाज में कहा, “अगर असफल हुईं तो?”
“तो अधिक से अधिक वही होगा, जो अभी धीरे-धीरे हो रहा है।”
श्रद्धा पहली बार मुस्कराई। “ठीक है। मुझे मंजूर है।”
अवनी ने पहले कंगन उतारा। जैसे ही उसने उसे जमीन पर रखा, पत्थर के नीचे का संगमरमर काला पड़ गया।
उसने कंगन को लाल कपड़े में लपेटा और हथौड़े से तोड़ दिया।
फिर श्रद्धा को एक शांत कमरे में ले जाया गया।
“किसी को अंदर नहीं आना है,” अवनी ने कहा।
उपचार शुरू हुआ।
अवनी ने कमरे में दीपक जलाए, नमक और जड़ी-बूटियों से एक घेरा बनाया और श्रद्धा को बीच में बैठाया। वह घंटों तक मंत्र पढ़ती रही।
धीरे-धीरे श्रद्धा के शरीर से काले धुएँ जैसी ऊर्जा बाहर निकलने लगी।
अवनी के माथे पर पसीना आ गया। उसकी साँसें भारी हो रही थीं। श्रद्धा की नकारात्मक ऊर्जा कई वर्षों से जमा थी और उसे बाहर निकालना आसान नहीं था।
बाहर आर्यवर्धन बेचैनी से घूम रहा था।
उसने हरिनारायण से पूछा, “अवनी ने पहले भी ऐसा उपचार किया है?”
“मुझे नहीं पता।”
“फिर आपने उसे अकेले अंदर क्यों जाने दिया?”
हरिनारायण ने कहा, “क्योंकि उसकी आँखों में लालच नहीं था। केवल विश्वास था।”
कई घंटे बाद कमरे का दरवाजा खुला।
अवनी बाहर आई और लड़खड़ाकर गिरने लगी।
आर्यवर्धन ने उसे पकड़ लिया।
“अवनी!”
उसका चेहरा पूरी तरह सफेद था।
“श्रद्धा कैसी है?”
“ठीक है,” अवनी ने मुश्किल से कहा। “अब उसे धूप, अच्छा भोजन और आराम चाहिए।”
कुछ देर बाद श्रद्धा खुद अपने पैरों पर चलकर बाहर आई।
हरिनारायण की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने अवनी के सामने हाथ जोड़ दिए।
“तुमने मेरी बच्ची को नई जिंदगी दी है। जो चाहो माँग लो।”
अवनी ने बिना सोचे कहा, “आठ रत्नों वाला ताबीज।”
सभी चौंक गए।
हरिनारायण ने ताबीज की तरफ देखा। वह उनके परिवार की सबसे मूल्यवान धरोहर थी।
लेकिन श्रद्धा ने कहा, “दादा जी, मेरी जिंदगी से ज्यादा मूल्यवान कुछ नहीं है।”
हरिनारायण ने ताबीज अवनी को दे दिया।
अवनी ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और सीधे आर्यवर्धन के पास गई।
“इसे पहनिए।”
आर्यवर्धन ने ताबीज लेने से पहले पूछा, “तुमने अपनी सारी शक्ति केवल मेरे लिए खर्च की?”
“श्रद्धा को ठीक करना जरूरी था।”
“और ताबीज?”
अवनी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “वह आपके लिए जरूरी था।”
“तुम्हारी किस्मत के लिए?”
अवनी की आँखें नम हो गईं।
“शुरुआत में शायद हाँ। लेकिन आज जब मैं अंदर कमजोर पड़ रही थी, तब मुझे अपने भाग्य की नहीं, आपकी चिंता थी। मुझे डर था कि अगर मैं बाहर नहीं आई तो यह ताबीज आपको कौन पहनाएगा।”
आर्यवर्धन कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर उसने धीरे से कहा, “तुम खुद पहना दो।”
अवनी ने उसके गले में ताबीज डाल दिया।
उस पल उसे आर्यवर्धन के आसपास की काली धुंध टूटती हुई दिखाई दी। वर्षों से बँधी हुई गाँठ खुल गई।
आर्यवर्धन ने गहरी साँस ली। उसे लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी बोझ उतर गया हो।
वापसी के रास्ते में पहली बार कोई दुर्घटना नहीं हुई।
न टायर फटा, न कोई वाहन सामने आया, न कोई वस्तु गिरी।
अवनी बार-बार खिड़की से बाहर देखकर खुश हो रही थी।
“आपकी किस्मत ठीक हो गई!”
आर्यवर्धन ने पूछा, “इतनी खुशी क्यों हो रही है?”
“क्योंकि अब मैं आपके पास बिना डर के बैठ सकती हूँ।”
वह थोड़ा और पास खिसक गई।
“पहले भी तो डरती नहीं थीं।”
“पहले बहादुरी दिखा रही थी। अब सच में नहीं डर रही।”
आर्यवर्धन मुस्करा दिया।
दोस्तों, यहीं से दोनों का रिश्ता धीरे-धीरे बदलने लगा।
अवनी आर्यवर्धन के कार्यालय जाने लगी। उसे वहाँ की बड़ी-बड़ी मशीनें, काँच की दीवारें और हर जगह लगे कंप्यूटर देखकर हैरानी होती।
एक दिन उसने आर्यवर्धन के लिए कॉफी बनाने की कोशिश की। चीनी समझकर नमक डाल दिया।
आर्यवर्धन ने एक घूँट पीते ही चेहरा बना लिया।
“यह क्या बनाया है?”
अवनी ने खुद चखा और तुरंत कप नीचे रख दिया।
“नमकीन कॉफी।”
“मुझे दिखाई दे रहा है।”
“स्वाद बुरा है, मगर शरीर के लिए शायद अच्छा हो।”
“मुझे मारने के लिए अब चाचा की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
अवनी हँस पड़ी।
एक शाम सावित्री देवी ने दोनों को बाहर घूमने भेजा।
अवनी ने पूछा, “मुलाकात पर क्या करते हैं?”
आर्यवर्धन ने कहा, “लोग खाना खाते हैं, फिल्म देखते हैं, बातें करते हैं।”
“और हाथ पकड़ते हैं?”
“शायद।”
अवनी ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
कुछ दूर चलने के बाद उसने कहा, “अच्छा लगता है।”
“क्या?”
“किसी का हाथ पकड़कर चलना। पहाड़ों पर मैं हमेशा अकेली चलती थी।”
आर्यवर्धन ने उसकी उँगलियों को थोड़ा मजबूती से पकड़ लिया।
“अब अकेली नहीं हो।”
यह सुनकर अवनी चुप हो गई।
लेकिन उनके जीवन में शांति अधिक देर टिकने वाली नहीं थी।
ताबीज मिलने और आर्यवर्धन के बदलते भाग्य की खबर पूरे शहर में फैल गई।
नैना मल्होत्रा को जब पता चला कि आर्यवर्धन अब दुर्घटनाओं से मुक्त हो चुका है और अवनी को सिंघानिया परिवार में बहुत सम्मान मिल रहा है, तो उसे अपने फैसले पर पछतावा हुआ।
वह एक दिन सिंघानिया भवन पहुँच गई।
“यह विवाह गलत है,” उसने सबके सामने कहा। “अवनी ने मेरी जगह लेकर धोखा किया है।”
अवनी ने जवाब दिया, “तुम खुद भागी थीं।”
“मैं डर गई थी। इसका मतलब यह नहीं कि कोई दूसरी लड़की मेरा अधिकार छीन ले।”
आर्यवर्धन सीढ़ियों से नीचे आया।
“तुम्हारा कोई अधिकार नहीं था।”
नैना ने उसकी तरफ देखा। “आर्यवर्धन, हमारे परिवारों ने रिश्ता तय किया था।”
“तुमने मंडप छोड़ दिया था।”
“मैं वापस आने के लिए तैयार हूँ।”
आर्यवर्धन ने अवनी का हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन मैं नहीं हूँ। अवनी मेरी पत्नी है।”
“वह तुम्हारी दौलत के लिए आई थी!”
“मुझे पता है।”
नैना चौंकी।
आर्यवर्धन ने कहा, “वह जिस कारण आई थी, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह कब-कब मेरे साथ खड़ी रही। उसने मेरी जान बचाई, मेरे घर का मृत्यु-जाल तोड़ा और अपनी जान खतरे में डालकर मेरी किस्मत ठीक की। तुमने डर के कारण मुझे छोड़ा था। उसने अपने डर के बावजूद मेरा साथ चुना।”
अवनी की आँखें भर आईं।
नैना अपमानित होकर वहाँ से चली गई।
लेकिन बाहर देवेंद्र उसका इंतजार कर रहा था।
उसने कहा, “तुम आर्यवर्धन को वापस चाहती हो?”
नैना ने कहा, “हाँ।”
“और मैं अवनी को इस परिवार से बाहर करना चाहता हूँ।”
दोनों के बीच एक नया समझौता हो गया।
उधर देवेंद्र ने भी तय कर लिया था कि अब ताबीज और जाल से काम नहीं चलेगा। उसे सीधे हमला करना होगा।
उस रात अवनी ने ध्यान करते समय एक भयानक दृश्य देखा।
एक कार पहाड़ी रास्ते पर नियंत्रण खो रही थी। काँच टूट रहा था। खून बह रहा था। और दूर अंधेरे में देवेंद्र खड़ा मुस्करा रहा था।
अवनी ने आँखें खोलीं।
आर्यवर्धन उसके पास था।
“क्या देखा?”
अवनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अगला हमला बहुत जल्दी होने वाला है।”
अगले कुछ दिनों में आर्यवर्धन ने अपने चाचा की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी।
आद्या ने कंपनी के पुराने कागजों और हिस्सेदारी से जुड़ी जानकारी निकलवाई। पता चला कि देवेंद्र पिछले कई वर्षों से सिंघानिया समूह के छोटे हिस्सेदारों से गुप्त रूप से हिस्से खरीद रहा था।
अगर आर्यवर्धन की मृत्यु हो जाती और सावित्री देवी को रास्ते से हटा दिया जाता, तो देवेंद्र कंपनी पर कब्जा करने की स्थिति में आ जाता।
आर्यवर्धन ने कागज मेज पर रखे और कहा, “यह केवल संपत्ति का मामला नहीं है। वह वर्षों से योजना बना रहा था।”
अवनी ने पूछा, “दादी को बताएँगे?”
आर्यवर्धन चुप हो गया।
“वह उनका बेटा है। अगर बिना पूरे प्रमाण के बताया तो उनका दिल टूट जाएगा।”
अवनी ने कहा, “सच देर से बताने पर और ज्यादा चोट देता है।”
“मुझे प्रमाण चाहिए।”
इसी बीच सिंघानिया समूह का वार्षिकोत्सव आया।
देश के बड़े उद्योगपति, कर्मचारी और कई जाने-माने लोग विशाल सभा-भवन में जमा थे। मंच पर सावित्री देवी ने घोषणा की कि अवनी अब सिंघानिया परिवार की बहू ही नहीं, बल्कि परिवार के सामाजिक संस्थानों की नई प्रमुख होगी।
“इस लड़की ने मेरे पोते को केवल जीवनसाथी नहीं दिया,” सावित्री देवी ने कहा, “इसने उसे जीने का भरोसा दिया है।”
तालियाँ बजने लगीं।
देवेंद्र, विकी और विक्रम के चेहरे उतर गए।
नैना भी वहाँ मौजूद थी। वह देवेंद्र के कहने पर अतिथि बनकर आई थी।
कार्यक्रम के दौरान उसने एक कर्मचारी को पैसे देकर अवनी के लिए रखे पेय में तेज जहर मिलवा दिया।
अवनी ने गिलास उठाया। जैसे ही वह उसे होंठों के पास लाई, उसकी नाक तक एक हल्की कड़वी गंध पहुँची।
वह समझ गई कि गिलास में कुछ मिला है।
उसने तुरंत पेय नहीं फेंका। उसने थोड़ा-सा हिस्सा होंठों से लगाया और जानबूझकर कुछ देर बाद चक्कर खाकर गिर गई।
पूरा हॉल घबरा गया।
आर्यवर्धन दौड़कर उसके पास पहुँचा।
“अवनी!”
उसे अस्पताल ले जाया गया।
नैना और देवेंद्र को लगा कि उनकी योजना सफल हो गई।
लेकिन अस्पताल में अवनी ने आँखें खोल दीं।
आर्यवर्धन हैरान था।
“तुम ठीक हो?”
“जहर मैंने निगला नहीं था।”
“फिर यह नाटक?”
“जिसने जहर दिया है, उसे खुलकर सामने आने देना होगा।”
आद्या ने सभा-भवन के सुरक्षा कैमरों की तस्वीरें निकलवाईं। एक कैमरे में नैना कर्मचारी को पैसे देती दिखाई दी। दूसरे में कर्मचारी अवनी के गिलास में कुछ मिला रहा था।
पुलिस को बुलाया गया।
नैना ने पहले इनकार किया, मगर जब अवनी ने उसके सामने सत्य बोलने वाला ताबीज रखा, तो वह घबरा गई।
“देवेंद्र ने कहा था कि अगर अवनी रास्ते से हट गई तो वह मेरा विवाह आर्यवर्धन से करवा देगा!”
पूरा सच सामने आ गया।
देवेंद्र ने आरोप से बचने की कोशिश की। उसने कहा कि नैना झूठ बोल रही है।
मगर अब आर्यवर्धन ने चाचा पर खुलकर नजर रखने का फैसला कर लिया।
उधर अवनी को देवेंद्र के पुराने घर से जुड़ी एक और बात पता चली।