सौवीं दुल्हन और मृत्यु का जाल
दोस्तों, कभी-कभी किसी इंसान के पास दुनिया की हर वह चीज होती है, जिसका आम आदमी केवल सपना देख सकता है। बड़ा घर, अपार दौलत, ऊँचा नाम, हजारों लोगों पर असर डालने वाली ताकत और ऐसा चेहरा, जिसे देखकर कोई भी पहली नजर में ठहर जाए। लेकिन इन सबके बाद भी अगर उस इंसान के जीवन में अपना कहने वाला कोई न हो, तो उसकी दौलत भी एक खाली महल जैसी लगने लगती है।
दिल्ली के जाने-माने उद्योगपति परिवार का इकलौता वारिस आर्यवर्धन सिंघानिया भी ऐसा ही इंसान था।
सिंघानिया समूह का नाम पूरे देश में फैला हुआ था। बड़े-बड़े होटल, दवा बनाने वाले कारखाने, निर्माण कंपनियाँ और कई अस्पताल उनके परिवार के अधीन चलते थे। आर्यवर्धन की उम्र केवल उनतीस वर्ष थी, लेकिन व्यापार की दुनिया में उसका नाम बड़े-बड़े अनुभवी लोगों के साथ लिया जाता था।
वह लंबा, आकर्षक और गंभीर स्वभाव का युवक था। उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब-सी खामोशी रहती थी। बाहर से देखने पर लगता था कि उसके पास किसी चीज की कमी नहीं होगी, मगर सच यह था कि शहर का कोई भी व्यक्ति उसके पास आने से डरता था।
लोग उसे मनहूस कहते थे।
कहा जाता था कि आर्यवर्धन के करीब जाने वाला व्यक्ति किसी न किसी दुर्घटना का शिकार हो जाता है। कोई उसके साथ कार में बैठा तो गाड़ी खराब हो गई। किसी ने उससे विवाह का रिश्ता जोड़ा तो उसका पैर टूट गया। किसी लड़की ने उससे सगाई की तो उसके घर में आग लग गई। एक के बाद एक उसकी निन्यानवे सगाइयाँ टूट चुकी थीं।
कुछ लड़कियाँ सगाई के बाद बीमार पड़ गईं, कुछ के परिवार डर गए और कुछ ने शादी से ठीक पहले रिश्ता तोड़ दिया।
आर्यवर्धन ने धीरे-धीरे यह मान लिया था कि शायद सच में उसकी किस्मत में किसी का साथ नहीं है।
सिंघानिया भवन में उस दिन फिर से विवाह की तैयारियाँ की गई थीं। पूरा भवन फूलों, झालरों और रोशनी से सजा हुआ था। देश के कई बड़े व्यापारी और जाने-माने लोग मेहमान बनकर आए थे।

आर्यवर्धन की दादी सावित्री देवी की आँखों में उम्मीद थी। वह परिवार की मुखिया थीं और उम्र के इस पड़ाव पर उनकी सबसे बड़ी इच्छा केवल यही थी कि अपने पोते को घर बसाते हुए देख लें।
इस बार आर्यवर्धन का विवाह नैना मल्होत्रा से तय हुआ था। नैना एक सुंदर और पढ़ी-लिखी लड़की थी, लेकिन वह इस विवाह के लिए अपनी इच्छा से तैयार नहीं हुई थी। उसके पिता ने सिंघानिया परिवार से दो करोड़ रुपये लेकर यह रिश्ता स्वीकार किया था।
विवाह की रस्म शुरू होने वाली थी, मगर दुल्हन के कमरे में हंगामा मचा हुआ था।
“मैं यह शादी नहीं करूँगी!”
लाल जोड़े में खड़ी नैना घबराहट से काँप रही थी।
उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ा और समझाते हुए कहा, “बेटी, अब पीछे हटना आसान नहीं है। सारे मेहमान आ चुके हैं। तुम्हारे पिता पैसे ले चुके हैं।”
“मुझे पैसों से कोई मतलब नहीं है!” नैना लगभग चीख पड़ी। “सारा शहर जानता है कि आर्यवर्धन के साथ रहने वाला कोई भी इंसान सुरक्षित नहीं रहता। उसकी निन्यानवे मंगेतरें उससे दूर भाग चुकी हैं। मैं सौवीं बनकर मरना नहीं चाहती।”
“कैसी बातें कर रही हो? वह देश के सबसे अमीर युवकों में से एक है।”
“तो आप शादी कर लीजिए उससे!”
यह कहकर नैना ने अपनी माँ का हाथ झटक दिया।
कुछ ही देर बाद वह पीछे के दरवाजे से निकल गई। भारी जोड़े में भागते हुए वह मुख्य सड़क की ओर पहुँच गई। उसके पीछे परिवार के लोग उसे ढूँढ़ रहे थे, मगर नैना किसी तरह वहाँ से दूर निकल जाना चाहती थी।
उसी समय सामने से एक पुरानी बस आकर रुकी। उसमें से एक युवती नीचे उतरी।
उसने साधारण पीले रंग का कुर्ता पहना हुआ था। कंधे पर कपड़े का पुराना थैला लटका था और लंबे काले बाल एक ढीली चोटी में बँधे हुए थे। चेहरे पर थकान थी, मगर आँखों में असाधारण चमक।
यह युवती अवनी त्रिपाठी थी।
अवनी ने सामने लाल जोड़े में भागती नैना को देखा तो हैरानी से पूछा, “बहन, तुम्हारे पीछे कोई डाकू पड़ा है क्या?”
नैना ने चिढ़कर कहा, “तुम्हें क्या मतलब?”
“मतलब तो कुछ नहीं है, पर शादी का जोड़ा पहनकर कोई लड़की सड़क पर ऐसे भागे तो सवाल अपने आप निकल जाता है।”
नैना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। अवनी के कपड़े सादे थे और उसके बोलने का तरीका पहाड़ी इलाके के लोगों जैसा था।
“मुझे परेशान मत करो। अपना रास्ता देखो।”
अवनी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने सामने खड़े एक आदमी से पूछा, “भैया, सिंघानिया भवन किस तरफ है?”
नैना अचानक रुक गई।
“तुम सिंघानिया भवन क्यों जा रही हो?”
“मुझे आर्यवर्धन सिंघानिया से मिलना है।”
नैना ने कुछ पल उसे देखा, फिर उसके चेहरे पर एक अजीब विचार उभरा।
“तुम आर्यवर्धन को जानती हो?”
“नहीं।”
“फिर मिलने क्यों जा रही हो?”
अवनी ने अपने थैले से एक पुराना तांबे का सिक्का निकाला। उस पर सूर्य और चंद्रमा का चिह्न बना हुआ था।
“मेरे गुरु ने मरने से पहले कहा था कि दिल्ली में एक ऐसा आदमी है, जिसके चारों तरफ मृत्यु का अंधेरा दिखाई देगा, मगर उसकी आत्मा पर लंबी जिंदगी का प्रकाश होगा। मुझे लगता है वह आदमी आर्यवर्धन है।”
नैना को उसकी आधी बात भी समझ नहीं आई। लेकिन उसे अपने बचने का रास्ता जरूर दिखाई दे गया।
“तुम उससे मिलना चाहती हो न?”
“हाँ।”
“तो मेरे साथ चलो।”
नैना उसे वापस एक गाड़ी के पास ले गई, जहाँ उसके माता-पिता उसे खोजते हुए पहुँच चुके थे। पहले तो वे अवनी को देखकर भड़क गए, मगर जब नैना ने कहा कि अवनी उसकी जगह विवाह करने के लिए तैयार है, तो सभी चुप हो गए।
“तुम सच में आर्यवर्धन से शादी करोगी?” नैना के पिता ने पूछा।
अवनी ने सरलता से कहा, “अगर वही वह व्यक्ति है जिसे मैं खोज रही हूँ, तो जरूर करूँगी।”
“लेकिन तुम जानती हो कि लोग उसे मनहूस कहते हैं?”
“लोग पहाड़ों पर दिखने वाली धुंध को भी भूत समझ लेते हैं। हर दिखाई देने वाली चीज सच नहीं होती।”
नैना के पिता ने पत्नी की तरफ देखा। उनके पास सोचने का समय नहीं था। अगर विवाह टूटता तो सिंघानिया परिवार न केवल अपना पैसा वापस माँगता, बल्कि मल्होत्रा परिवार की बदनामी भी हो जाती।
“ठीक है,” उन्होंने कहा, “लेकिन बाद में यह मत कहना कि हमने तुम्हें मजबूर किया था।”
अवनी मुस्कराई। “मैं अपनी इच्छा से जा रही हूँ।”
दोस्तों, अब जरा सोचिए। जिस आदमी से पूरा शहर डरता था, उससे विवाह करने के लिए एक ऐसी लड़की तैयार हो गई थी जिसने उसे कभी देखा तक नहीं था। मगर असली हैरानी अभी बाकी थी।
सिंघानिया भवन के मुख्य मंडप में बेचैनी फैल चुकी थी।
आर्यवर्धन ने काले रंग की शेरवानी पहन रखी थी। उसका चेहरा शांत था, जैसे उसे पहले से पता हो कि यह विवाह भी नहीं होगा।
एक कर्मचारी ने आकर धीरे से कहा, “आर्यवर्धन जी, दुल्हन गायब है।”
सावित्री देवी के हाथ काँप गए।
“गायब है? इसका क्या मतलब है?”
“वह अपने कमरे में नहीं है। उसके परिवार वाले भी उसे खोज रहे हैं।”
आर्यवर्धन ने बिना कोई हैरानी दिखाए कहा, “मेहमानों को भोजन कराकर विदा कर दीजिए। विवाह रद्द है।”
“नहीं!” सावित्री देवी ने कहा। “तेरे तीसवें जन्मदिन में केवल दस दिन बचे हैं। पंडित जी ने साफ कहा था कि अगर तीस वर्ष पूरे होने से पहले विवाह नहीं हुआ, तो तेरे जीवन पर संकट आ जाएगा।”
आर्यवर्धन ने थकी हुई आवाज में कहा, “दादी, निन्यानवे बार कोशिश हो चुकी है। अब किस चमत्कार की उम्मीद कर रही हैं?”
तभी मंडप के बाहर से एक लड़की की आवाज आई—
“चमत्कार की।”
सभी ने पलटकर देखा।
अवनी लाल विवाह के जोड़े में धीरे-धीरे मंडप की ओर आ रही थी। उसके कपड़ों से साफ पता चल रहा था कि वह जोड़ा उसके लिए तैयार नहीं किया गया था। घूँघट थोड़ा टेढ़ा था और भारी गहनों को सँभालते हुए वह बार-बार परेशान हो रही थी।
आर्यवर्धन ने उसे पहली बार देखा।
अवनी ने भी उसकी तरफ देखा और कुछ क्षण के लिए उसका चेहरा गंभीर हो गया।
उसे आर्यवर्धन के शरीर के आसपास हल्की काली धुंध दिखाई दे रही थी। वह धुंध प्राकृतिक नहीं थी। उसके माथे पर जीवन की रेखा तेज और साफ थी, मगर छाती के आसपास किसी अज्ञात शक्ति की गाँठ बँधी हुई थी।
अवनी मन ही मन बोली, “गुरु जी सही थे। यही वह आदमी है।”
सावित्री देवी ने पूछा, “बेटी, तुम कौन हो?”
अवनी ने मुस्कराकर कहा, “दुल्हन।”
वहाँ खड़े लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
“नैना कहाँ है?” आर्यवर्धन ने पूछा।
“वह आपसे शादी नहीं करना चाहती।”
“और तुम चाहती हो?”
“हाँ।”
“क्यों?”
अवनी ने कुछ पल सोचा। वह यह तो नहीं बता सकती थी कि उसके गुरु ने उसकी किस्मत आर्यवर्धन से जुड़ी बताई थी।
उसने कहा, “आप अच्छे दिखते हैं, अमीर हैं और आपको दुल्हन चाहिए। मुझे पति चाहिए। बात बराबर है।”
मंडप में दबे स्वर में हँसी सुनाई दी।
आर्यवर्धन ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। कोई और लड़की होती तो उसकी आँखों में भय होता, मगर अवनी की आँखों में उत्सुकता थी।
“तुमने मेरे बारे में सुना नहीं?”
“सुना है।”
“मेरे पास आने वाले लोगों के साथ दुर्घटनाएँ होती हैं।”
“होने दीजिए।”
“मेरी निन्यानवे सगाइयाँ टूट चुकी हैं।”
“तो मैं सौवीं हूँ। संख्या भी पूरी हो जाएगी।”
आर्यवर्धन के होंठों पर अनजाने में हल्की मुस्कान आ गई।
सावित्री देवी तुरंत आगे बढ़ीं और अवनी का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए बोलीं, “बेटी, तुम सच में यह विवाह करना चाहती हो?”
“हाँ, दादी।”
अवनी ने उन्हें पहली मुलाकात में ही दादी कह दिया। सावित्री देवी की आँखें भर आईं।
आर्यवर्धन ने साफ कहा, “विवाह की रस्म अभी नहीं होगी। पहले कानूनी विवाह होगा। उसके बाद जब मुझे विश्वास हो जाएगा कि यह किसी का खेल नहीं है, तब परिवार के सामने विधि से विवाह करेंगे।”
अवनी ने सिर हिला दिया। “मुझे मंजूर है।”
दोनों विवाह पंजीकरण कार्यालय जाने के लिए गाड़ी में बैठे। उनके साथ आर्यवर्धन की सहायक आद्या और एक चालक था।
गाड़ी कुछ ही दूर पहुँची थी कि चालक ने अचानक घबराकर कहा, “ब्रेक काम नहीं कर रहे!”
सामने लाल बत्ती थी और सड़क पर कई वाहन खड़े थे।
आद्या चीख पड़ी।
आर्यवर्धन ने चालक से गाड़ी मोड़ने को कहा, मगर रफ्तार तेज थी।
अवनी ने तुरंत अपने थैले से लाल धागा निकाला, उसे दोनों हाथों में पकड़ा और आँखें बंद कर कुछ शब्द बोले। फिर उसने धागा गाड़ी के अगले हिस्से की तरफ फेंका।
उसी क्षण सड़क के किनारे जमा रेत का एक बड़ा ढेर हवा से खिसककर गाड़ी के सामने आ गया। चालक ने गाड़ी उसी तरफ मोड़ दी। पहिए रेत में धँस गए और गाड़ी एक खंभे से कुछ दूरी पहले रुक गई।
आद्या का चेहरा सफेद पड़ चुका था।
“यह… यह आपने कैसे किया?”
अवनी ने धूल झाड़ते हुए कहा, “पहाड़ों में गाड़ियाँ कम होती हैं, मगर मुश्किल रास्तों से बचने के तरीके बहुत होते हैं।”
आर्यवर्धन गाड़ी से बाहर आया और नीचे झुककर ब्रेक की नली देखने लगा।
नली साफ काटी गई थी।
उसने अवनी की तरफ देखा।
“तुम्हें पहले से पता था कि कुछ होगा?”
“नहीं। लेकिन आपकी किस्मत से ज्यादा किसी इंसान के हाथ इस दुर्घटना में दिखाई दे रहे हैं।”
विवाह पंजीकरण कार्यालय बंद होने वाला था। वे दूसरी गाड़ी से वहाँ पहुँचे और कानूनी रूप से पति-पत्नी बन गए।
कागज पर हस्ताक्षर करने के बाद अवनी ने प्रमाणपत्र को ध्यान से देखा और मुस्कराकर कहा, “पहला काम पूरा हुआ।”
आर्यवर्धन ने पूछा, “दूसरा काम क्या है?”
अवनी ने सहजता से कहा, “आपकी किस्मत ठीक करना।”
कुछ देर रुककर वह बोली, “और उसके बाद परिवार बढ़ाना।”
आद्या ने खाँसी का बहाना बनाकर चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
आर्यवर्धन ने पहली बार सच में असहज होकर कहा, “तुम हर बात इतनी सीधे कहती हो?”
“घुमा-फिराकर बोलने से बात बदल तो नहीं जाती।”
सिंघानिया भवन पहुँचते ही सेवकों ने फूल बरसाकर उनका स्वागत किया। सावित्री देवी ने दोनों की आरती उतारी।
अवनी भवन के भीतर कदम रखते ही रुक गई।
उसे हवा में सड़न जैसी गंध महसूस हुई।
“यहाँ कुछ गलत है,” उसने धीरे से कहा।
आर्यवर्धन ने पूछा, “क्या?”
अवनी ने जवाब नहीं दिया। वह बैठक में रखी सजावटी वस्तुओं को देखने लगी। एक काला हाथी, लाल पत्थर की चिड़िया, धातु का पुराना दीपक, एक टूटा हुआ आईना और कुछ विचित्र मूर्तियाँ अलग-अलग जगह रखी थीं।
उसने गिनती की।
कुल नौ वस्तुएँ थीं।
अवनी का चेहरा गंभीर हो गया।
“इन चीजों को किसने यहाँ रखा?”
सावित्री देवी ने कहा, “कई वर्षों में रिश्तेदारों ने उपहार दिए हैं। कुछ देवेंद्र लाया था, कुछ विक्रम और कुछ पुराने परिचितों ने।”
“किसी को इन्हें छूना नहीं है।”
“क्यों?”
अवनी ने फर्श पर बने संगमरमर के नमूनों को ध्यान से देखा। नौ वस्तुएँ एक विशेष आकार बना रही थीं।
“यह सजावट नहीं है। यह मृत्यु-जाल है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आर्यवर्धन ने कहा, “सीधे शब्दों में समझाओ।”