भाग 1
2014 की गर्मियों की बात है। दिल्ली की भागती हुई सड़कों, मेट्रो की भीड़ और ऑफिस के कांच वाले कमरों के बीच रहने वाला एक आदमी धीरे-धीरे अपनी ही जिंदगी से दूर होता जा रहा था। उसका नाम था विक्रम मल्होत्रा। उम्र 43 साल। काम से सिविल इंजीनियर, लेकिन असल में वह उन लोगों में से था जिनकी पूरी पहचान उनके काम में घुल जाती है। सुबह साइट मीटिंग, दोपहर ड्रॉइंग, शाम क्लाइंट कॉल, रात को फाइलें और अगले दिन फिर वही दौड़।
दिल्ली के द्वारका में उसका एक छोटा सा फ्लैट था, जहां दीवारों पर अच्छे पेंट थे, फर्नीचर भी ठीक था, लेकिन घर में वह गर्माहट नहीं थी जो घर को घर बनाती है। विक्रम की पत्नी मीरा का पांच साल पहले एक बीमारी के कारण निधन हो गया था। उसके बाद घर में सिर्फ दो लोग रह गए थे—विक्रम और उसकी बेटी अनाया।
अनाया 15 साल की थी। शांत, समझदार और अपनी उम्र से कहीं ज्यादा गंभीर। वह स्कूल से लौटती, अपना बैग रखती, खुद खाना गरम करती और फिर पढ़ाई में लग जाती। कई बार विक्रम रात में घर आता तो उसे अनाया की कॉपी खुली मिलती, लेकिन अनाया सो चुकी होती। वह उसके माथे पर हाथ रखने की सोचता, फिर फोन बज जाता और वह वापस किसी साइट की समस्या में खो जाता।
विक्रम बुरा इंसान नहीं था। वह अपनी बेटी से प्यार करता था, लेकिन उसने प्यार को जिम्मेदारी समझ लिया था। उसे लगता था कि फीस भर देना, अच्छी किताबें दिला देना और सुरक्षित घर दे देना ही पिता होने का पूरा अर्थ है। उसे यह समझने में बहुत देर लगी कि बच्चे सिर्फ सुविधा से नहीं पलते, वे ध्यान से भी पलते हैं।
अनाया ने शिकायत करना बहुत पहले छोड़ दिया था। जब वह छोटी थी, तब दरवाजे पर बैठकर पिता का इंतजार करती थी। फिर धीरे-धीरे इंतजार कम हुआ, सवाल कम हुए और एक दिन वह खामोशी उसकी आदत बन गई। विक्रम को यह बदलाव दिखा जरूर था, लेकिन उसने इसे समझदारी समझ लिया। उसे लगा बेटी बड़ी हो रही है, इसलिए चुप है। असल में वह चुप इसलिए थी क्योंकि उसे लगने लगा था कि उसकी बातें सुनने वाला कोई नहीं है।
एक दिन अनाया के स्कूल में हिमालयी पारिस्थितिकी पर प्रोजेक्ट मिला। विषय था—“पहाड़, पानी और बदलता मौसम।” बाकी बच्चे इंटरनेट से तस्वीरें निकालने वाले थे, लेकिन अनाया ने कहा कि वह खुद पहाड़ देखना चाहती है। उसने पहली बार कई महीनों बाद अपने पिता से सीधे कुछ मांगा था।
“पापा, क्या हम सिक्किम जा सकते हैं? सिर्फ चार दिन के लिए। मुझे प्रोजेक्ट के लिए फोटो चाहिए और… थोड़ा घूमना भी है।”
विक्रम ने पहले तो आदत के हिसाब से कहा, “देखते हैं।” लेकिन इस बार अनाया ने कुछ नहीं कहा। वह बस सिर हिलाकर अपने कमरे में चली गई। उस सिर हिलाने में उम्मीद नहीं थी, सिर्फ आदत थी। विक्रम को उसी रात पहली बार अपनी बेटी की चुप्पी चुभी।
अगले दिन उसने अपने ऑफिस में छुट्टी की बात की। बहुत मुश्किल से चार दिन निकाले। टिकट बुक हुए। दिल्ली से बागडोगरा, फिर सड़क से गंगटोक और वहां से उत्तर सिक्किम की तरफ। अनाया ने बहुत ज्यादा खुशी नहीं दिखाई, लेकिन उसकी आंखों में हल्की चमक लौट आई थी। विक्रम को लगा शायद अभी देर पूरी नहीं हुई।
सिक्किम पहुंचते ही दुनिया बदल गई। दिल्ली की धूल और शोर पीछे छूट गए। पहाड़ों पर बादल ऐसे लिपटे थे जैसे किसी ने सफेद रुई से चोटियों को ढक दिया हो। रास्तों के किनारे प्रार्थना के रंगीन झंडे हवा में हिलते थे और दूर कहीं नदी की आवाज लगातार सुनाई देती थी। अनाया खिड़की से बाहर देखती रहती। कभी पेड़, कभी झरने, कभी पहाड़ी घर। विक्रम उसे देखता और सोचता कि इतने सालों में उसने अपनी बेटी को सच में कितनी बार देखा है।
गंगटोक में एक स्थानीय गाइड मिला—लोबसांग। उम्र करीब 50 साल, चेहरा धूप में तपकर गहरा हो चुका था, आंखें छोटी लेकिन सतर्क। वह पहाड़ों को सिर्फ रास्ता नहीं, जीवित चीज की तरह समझता था। उसने बताया कि ऊपर की तरफ मौसम बदल रहा है। पिछले कुछ दिनों से बारिश ज्यादा हो रही थी और कुछ छोटे रास्ते बंद भी हो चुके थे।
विक्रम ने पूछा, “तो जाना सुरक्षित है?”
लोबसांग ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “सुरक्षित और असुरक्षित यहां जल्दी बदल जाता है साहब। अगर सुबह निकलेंगे और जल्दी लौट आएंगे, तो ठीक रहेगा।”
अनाया ने पिता की तरफ देखा। उसके चेहरे पर इतनी उम्मीद थी कि विक्रम ने ज्यादा सवाल नहीं किए। उसने सोचा, इतने लोग जाते हैं, हम भी चले जाएंगे। जिंदगी में कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो उस समय बहुत छोटे लगते हैं, लेकिन बाद में वही पूरी कहानी बदल देते हैं।
अगली सुबह वे एक पुरानी बोलेरो में निकले। ड्राइवर का नाम था पेम्बा। रास्ता संकरा था, एक तरफ पहाड़, दूसरी तरफ गहरी खाई और नीचे चांदी जैसी चमकती नदी। अनाया ने कैमरा निकाला और हर मोड़ पर तस्वीरें लेने लगी। विक्रम पहली बार उसके साथ बिना लैपटॉप, बिना मीटिंग और बिना किसी जल्दी के बैठा था। वह बातचीत शुरू करना चाहता था, लेकिन दोनों के बीच सालों की दूरी थी। शब्द आसानी से नहीं आते थे।

“स्कूल में सब ठीक है?” उसने पूछा।
“हां,” अनाया ने छोटा सा जवाब दिया।
“दोस्त हैं अच्छे?”
“हां।”
बात वहीं खत्म हो गई। विक्रम को लगा जैसे वह अपनी बेटी से नहीं, किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर रहा है जिसे वह बहुत कम जानता है।
दोपहर तक वे एक छोटे से पहाड़ी गांव पहुंचे। वहां से आगे एक पुरानी कच्ची सड़क थी जो एक व्यू-पॉइंट और पुराने मौसम माप केंद्र तक जाती थी। लोबसांग ने बताया कि वहां से पूरी घाटी दिखती है और अनाया के प्रोजेक्ट के लिए बहुत अच्छी जगह होगी। आसमान उस समय साफ था। बादल दूर थे। हवा ठंडी लेकिन शांत थी।
उन्होंने आगे बढ़ने का फैसला किया।
लगभग एक घंटे बाद मौसम ने अपना चेहरा बदलना शुरू किया। पहले हवा बदली। फिर पहाड़ों के पीछे से काले बादल उठे। कुछ ही मिनटों में रोशनी फीकी पड़ने लगी। लोबसांग ने माथे पर शिकन के साथ आसमान देखा।
“हमें वापस मुड़ना चाहिए,” उसने कहा।
पेम्बा ने गाड़ी मोड़ने की कोशिश की, लेकिन सड़क इतनी संकरी थी कि जगह ढूंढनी पड़ी। तभी पहली तेज गर्जना हुई। पहाड़ों में बिजली की आवाज मैदानों जैसी नहीं होती। वह सिर्फ सुनाई नहीं देती, सीने के अंदर तक लगती है। अनाया ने सीट पकड़ ली। विक्रम ने पहली बार बिना सोचे उसका हाथ थाम लिया।
बारिश अचानक नहीं आई, वह टूटकर आई। जैसे किसी ने आसमान की पूरी नदी खोल दी हो। सड़क पर मिट्टी बहने लगी। पहाड़ की ढलान से छोटे पत्थर गिरने लगे। लोबसांग ने चिल्लाकर कहा, “जल्दी नीचे उतरना होगा!”
गाड़ी आगे बढ़ी ही थी कि सामने की सड़क पर जोरदार धमाका हुआ। पहाड़ का एक हिस्सा टूटकर सड़क पर गिरा। पेम्बा ने ब्रेक मारा। पीछे से भी मिट्टी और पत्थर गिरने लगे। गाड़ी बीच में फंस गई। कुछ सेकंड के लिए सब स्थिर हो गया, फिर नीचे घाटी से नदी की आवाज बढ़ने लगी। वह सामान्य नदी की आवाज नहीं थी। वह पानी नहीं, गर्जना थी।
“क्लाउडबर्स्ट,” लोबसांग ने बहुत धीमी आवाज में कहा।
विक्रम ने यह शब्द पहले समाचारों में सुना था। उस दिन उसने उसे अपनी आंखों से देखा।
ऊपर कहीं भारी बारिश ने पानी को अचानक नालों में धकेल दिया था। पतली धाराएं मिनटों में भूरे रंग की जंगली लहरों में बदल गईं। गाड़ी के पास से पानी बहने लगा। लोबसांग ने दरवाजा खोला और सबको बाहर निकलने को कहा। विक्रम ने अनाया का हाथ कसकर पकड़ा। वे सड़क के किनारे ऊपर की तरफ भागे, लेकिन जमीन फिसल रही थी। पानी टखनों तक आया, फिर घुटनों तक।
तभी एक बड़ा पत्थर गाड़ी से टकराया। पेम्बा पीछे छूट गया। लोबसांग उसे खींचने लौटा। विक्रम ने मुड़कर देखा, लेकिन उसी समय मिट्टी का एक तेज बहाव बीच में आ गया। लोबसांग की आवाज आई—“ऊपर जाओ! पीछे मत देखो!”
विक्रम और अनाया किसी तरह चट्टानों को पकड़ते हुए ऊपर चढ़े। बारिश आंखें खोलने नहीं दे रही थी। कपड़े भीगकर शरीर से चिपक गए थे। सांसें टूट रही थीं। अनाया का पैर फिसला। विक्रम ने उसे खींच लिया। शायद वह पहली बार था जब अनाया को लगा कि उसका पिता सच में उसके लिए मौजूद है।
कुछ देर बाद उन्हें एक पुरानी पगडंडी दिखी जो जंगल की तरफ जा रही थी। नीचे सड़क अब दिख नहीं रही थी। सब मिट्टी, पानी और धुंध में खो चुका था। वे पगडंडी पर चढ़ते गए। कितनी देर चले, उन्हें पता नहीं। पहाड़ पर समय बारिश में घुल जाता है। बस कदम बचाना होता है और अगला सहारा ढूंढना होता है।
शाम होने तक बारिश कुछ हल्की हुई। दोनों एक पत्थर की दीवार जैसे ढांचे के पास पहुंचे। वह एक पुराना चरवाहों का आश्रय था—आधा टूटा हुआ, छत में छेद, अंदर सूखी घास के कुछ पुराने ढेर और कोने में पत्थरों से बना छोटा चूल्हा। उस समय वह जगह किसी महल से कम नहीं लगी।
विक्रम ने अनाया को अंदर बैठाया। उसके हाथ ठंड से कांप रहे थे। वह बोल नहीं रही थी। विक्रम ने अपना जैकेट उतारकर उसके कंधों पर रखा। बाहर बारिश फिर तेज हो गई। पहाड़ अंधेरे में डूब रहा था।
विक्रम ने फोन निकाला। स्क्रीन टूट चुकी थी, लेकिन चालू थी। नेटवर्क नहीं था। बैटरी 12 प्रतिशत। उसने लोबसांग को कॉल करने की कोशिश की। कुछ नहीं हुआ। पेम्बा का नंबर नहीं लगा। उसने लोकेशन खोलनी चाही, लेकिन सिग्नल गायब था। अनाया ने धीरे से पूछा, “पापा, वे लोग ठीक होंगे?”
विक्रम ने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली। वह झूठ बोलना नहीं चाहता था, लेकिन सच उसके पास था ही नहीं।
“मुझे नहीं पता बेटा,” उसने कहा, “लेकिन हमें अभी रात काटनी है। सुबह रास्ता देखेंगे।”
यह पहली बार था जब उसने अनाया से कोई खाली भरोसा नहीं दिया। उसने सच कहा, और शायद इसी वजह से अनाया ने सिर हिलाकर उसकी बात मान ली।
रात बहुत लंबी थी। पहाड़ों में अंधेरा जल्दी उतरता है और जब बारिश के बाद हवा चलती है तो ठंड हड्डियों तक पहुंचती है। विक्रम ने सूखी घास को एक जगह जमा किया। पुराने चूल्हे में राख थी, लेकिन आग जलाने के लिए माचिस नहीं थी। उसने अपनी जेबें टटोलीं। एक छोटा पावर बैंक, वॉलेट, फोन, कुछ सिक्के, होटल की रसीद और अनाया के बैग में बिस्कुट का आधा पैकेट। यही सब था।
उन्होंने बिस्कुट बांटे। अनाया ने आधा टुकड़ा खाकर बाकी विक्रम की तरफ बढ़ाया।
“आप खा लो,” उसने कहा।
विक्रम का गला भर आया। उसने टुकड़ा वापस उसकी हथेली में रख दिया।
“हम दोनों खाएंगे। बराबर।”
बाहर बारिश पत्थरों पर गिरती रही। अंदर पिता और बेटी एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर बैठे रहे। यह दूरी अब कमरे की नहीं, सालों की थी। लेकिन उस रात दोनों के बीच पहली बार कोई दीवार थोड़ी सी हिली।
सुबह जब विक्रम की आंख खुली, तो बारिश बंद थी। बाहर धुंध थी। पूरी घाटी दूध जैसे सफेद बादलों में छिपी हुई थी। उसने बाहर कदम रखा और जो देखा, उससे उसका दिल बैठ गया। जिस रास्ते से वे आए थे, उसका बड़ा हिस्सा गायब था। नीचे सड़क की जगह मिट्टी का चौड़ा घाव था। पेड़ उखड़े हुए थे। पत्थर बिखरे थे। नदी पहले से कहीं ज्यादा चौड़ी और उग्र दिख रही थी।