भाग 2
लोबसांग और पेम्बा का कोई निशान नहीं था।
विक्रम ने आवाज लगाई। कई बार। पर जवाब सिर्फ पहाड़ों से लौटती गूंज थी।
अनाया भी बाहर आ गई। उसने नीचे देखा और कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “हम वापस कैसे जाएंगे?”
विक्रम ने पहली बार अपनी बेटी की आंखों में डर देखा। वह डर जोर से रोने वाला नहीं था। वह शांत डर था—जो बच्चों की आंखों में तब आता है जब उन्हें समझ आ जाता है कि बड़े लोग भी सब नहीं जानते।
विक्रम ने आसपास नजर दौड़ाई। घना जंगल, टूटे रास्ते, धुंध, बहता पानी और कहीं दूर पहाड़ की सफेद चोटियां। नक्शे में यह जगह शायद एक छोटी लाइन भर रही होगी, लेकिन असल में यह एक बंद दुनिया थी।
उसने अनाया का हाथ पकड़ा और कहा, “हम रास्ता ढूंढेंगे। लेकिन जल्दबाजी नहीं करेंगे।”
उसके अंदर इंजीनियर जाग रहा था—ढलान देखो, पानी की दिशा देखो, सुरक्षित ऊंचाई ढूंढो, शरीर की ऊर्जा बचाओ। लेकिन उसके अंदर पिता भी पहली बार पूरी तरह जाग रहा था—बेटी को बचाना है, चाहे खुद कितना भी डर क्यों न लगे।
उन्होंने दिन भर आसपास की जगह देखी। आश्रय के पीछे एक पतली जलधारा थी, साफ और ठंडी। थोड़ा ऊपर जंगली बेर जैसे छोटे फल लगे थे, जिन्हें विक्रम पहचान नहीं पाया। अनाया ने अपनी स्कूल की किताबों में पढ़ा था कि चमकदार रंग वाले अजनबी फल खतरनाक हो सकते हैं। उसने खाने से मना किया। विक्रम ने उसकी बात मान ली। उसे पहली बार समझ आया कि उसकी बेटी सिर्फ बच्ची नहीं रही; वह सोचती है, देखती है, निर्णय लेती है।
दूसरी रात तक फोन बंद हो चुका था। पावर बैंक गीला होकर काम नहीं कर रहा था। शहर से उनका आखिरी धागा टूट गया था।
तीसरे दिन उन्होंने नीचे उतरने की कोशिश की। रास्ता फिसलन भरा था। एक जगह मिट्टी अचानक धंस गई और विक्रम का पैर घुटने तक धंस गया। अनाया ने पीछे से उसका बैग पकड़कर खींचा। वह खुद कांप रही थी, पर उसने हाथ नहीं छोड़ा। विक्रम बाहर निकला तो उसकी सांस फूल रही थी। उसने पहली बार अनाया को वैसे देखा जैसे किसी साथी को देखा जाता है, बोझ की तरह नहीं।
दोपहर तक उन्हें समझ आ गया कि नीचे जाना मौत को बुलाना होगा। सड़क गई थी। पुल बह चुका था। नदी पार करना असंभव था। ऊपर की तरफ शायद कोई पुराना मौसम केंद्र था, लेकिन वहां तक रास्ता अज्ञात था। उन्हें वापस उसी पत्थर के आश्रय में लौटना पड़ा।
रात को अनाया चुपचाप बैठी थी। विक्रम ने पूछा, “डर लग रहा है?”
वह कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “हां। लेकिन उससे ज्यादा अजीब लग रहा है।”
“क्या?”
“आप मेरे साथ हैं। इतने दिन लगातार। मुझे इसकी आदत नहीं है।”
विक्रम के पास कोई जवाब नहीं था। बाहर पहाड़ शांत था, लेकिन उसके भीतर बहुत कुछ टूट रहा था।
उसने धीरे से कहा, “मुझे माफ करना, अनाया।”
अनाया ने उसकी तरफ देखा। वह रोई नहीं। उसने बस पूछा, “किस बात के लिए?”
विक्रम ने कहा, “शायद बहुत सारी बातों के लिए। उन सब दिनों के लिए जब मुझे होना चाहिए था और मैं नहीं था।”
अनाया ने कोई बड़ा संवाद नहीं कहा। उसने बस अपनी नजरें नीचे कर लीं। लेकिन उसके चेहरे की कठोरता थोड़ी कम हुई। कभी-कभी माफी तुरंत सब ठीक नहीं करती, पर वह बंद दरवाजे में पहली दरार जरूर डाल देती है।
उन्हें उस समय यह नहीं पता था कि यह पहाड़ उन्हें चार दिन नहीं, चार मौसमों तक रोककर रखने वाला है। उन्हें नहीं पता था कि जिस यात्रा को वे एक स्कूल प्रोजेक्ट समझकर आए थे, वही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान बनने वाली है। और सबसे बड़ी बात, उन्हें यह भी नहीं पता था कि खो जाना हमेशा अंत नहीं होता। कभी-कभी इंसान रास्ता खोकर वह रिश्ता पा लेता है, जिसे उसने अपने ही घर में खो दिया था।
पहाड़ पर चौथा दिन शुरू हुआ तो भूख ने डर से ज्यादा तेज आवाज करनी शुरू कर दी। पहले तीन दिन शरीर सदमे में था। बारिश, ठंड, फिसलन, टूटे रास्ते और लोबसांग-पेम्बा की चिंता के बीच भूख कहीं पीछे चली गई थी। लेकिन चौथे दिन सुबह अनाया उठी तो उसका चेहरा पीला था और होंठ सूखे हुए। विक्रम ने जलधारा से पानी लाकर उसे दिया। पानी इतना ठंडा था कि दांतों में दर्द होने लगे, लेकिन वही जीवन था।
अब सवाल सिर्फ बच निकलने का नहीं था। सवाल था कि जब तक रास्ता नहीं मिलता, तब तक जिंदा कैसे रहना है।
विक्रम ने आश्रय को ध्यान से देखा। यह शायद कभी गर्मियों में चरवाहों के रुकने की जगह रही होगी। पत्थर की तीन दीवारें थीं और चौथी तरफ लकड़ी के टूटे तख्ते। छत पतली टिन और घास से ढकी थी, जिसमें कई जगह छेद थे। कोने में पुराना चूल्हा था और दीवार पर काले धुएं के निशान। इसका मतलब था कि कभी यहां आग जली थी। आग जल सकती थी। बस तरीका चाहिए था।
अनाया ने अपने बैग में से सामान निकाला। एक नोटबुक, दो पेन, कैमरा जिसकी बैटरी अब बेकार थी, एक छोटा टॉर्च, पानी की बोतल, दो चॉकलेट रैपर जिनमें बस खुशबू बची थी, और स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए रखी हुई एक छोटी मैग्निफाइंग शीट। विक्रम ने उसे हाथ में लेकर कुछ देर देखा। धूप निकले तो इससे सूखी घास में आग लगाई जा सकती थी। उस समय तक धूप धुंध के पीछे थी, लेकिन उम्मीद की एक छोटी सी खिड़की खुल गई थी।
उन्होंने पूरा दिन आसपास सूखी चीजें ढूंढने में बिताया। बारिश के बाद पहाड़ में सूखा लकड़ी का टुकड़ा मिलना आसान नहीं होता, पर आश्रय के अंदर दीवारों की दरारों में कुछ पुराने छिलके और घास बची थी। अनाया ने पतली घास अलग की। विक्रम ने बड़े टुकड़े जमा किए। दोपहर तक धूप थोड़ी निकली। अनाया ने मैग्निफाइंग शीट को ऐसे पकड़ा कि रोशनी एक बिंदु पर गिरे। पहले धुआं उठा, फिर छोटी सी लाल चिंगारी। विक्रम ने सांस रोककर घास को धीरे-धीरे फूंका। कुछ सेकंड बाद लौ उठी।
आग देखकर अनाया की आंखों में पहली बार सच्ची राहत आई। वह मुस्कुराई नहीं, लेकिन उसके चेहरे पर जीवन लौट आया।
विक्रम ने आग के पास हाथ फैलाए और बहुत धीमे कहा, “तुमने हमें बचा लिया।”
अनाया ने तुरंत कहा, “हमने।”
यह छोटा सा शब्द विक्रम के भीतर उतर गया। वह अब आदेश देने वाला पिता नहीं था। वे दोनों एक टीम थे। मजबूरी ने उन्हें बराबरी पर खड़ा कर दिया था।
अगले कुछ दिन उन्होंने जगह को रहने लायक बनाने में लगाए। विक्रम ने पत्थरों से छत के छेद बंद करने की कोशिश की। अनाया ने जलधारा तक जाने का सुरक्षित रास्ता चिन्हित किया। उसने रास्ते में छोटे-छोटे पत्थर रख दिए ताकि धुंध में भी रास्ता मिले। विक्रम ने नीचे की तरफ जाने की एक और कोशिश करना चाहा, लेकिन अनाया ने रोका।
“कल वाली मिट्टी अभी भी हिल रही थी। अगर फिर फिसले तो आप भी नीचे चले जाओगे,” उसने कहा।
विक्रम पहले शायद कहता कि उसे ज्यादा पता है। लेकिन अब वह सुनता था। उसने सिर हिलाया।
खाने की समस्या सबसे बड़ी थी। जलधारा ने पानी दिया, आग ने गर्मी दी, पर पेट को कुछ चाहिए था। जंगल में कई पौधे थे। कुछ फल जैसे दिखते थे, कुछ जड़ें थीं, कुछ पत्ते। विक्रम को कुछ पहचान नहीं थी। अनाया को स्कूल की किताबों से बस इतना पता था कि अनजान पौधे सीधे नहीं खाने चाहिए। उन्होंने पहले बहुत छोटे हिस्से से परीक्षण करना शुरू किया। एक पत्ती को हाथ पर रगड़ा, इंतजार किया। फिर होंठों से छुआ, इंतजार किया। फिर बहुत छोटा टुकड़ा चखा। यह सब धीमा था, लेकिन जल्दबाजी का मतलब जहर हो सकता था।
तीन दिन बाद उन्हें एक सुरक्षित चीज मिली—जंगली कंद जैसी जड़, जिसे आग में सेंकने पर हल्की मीठी गंध आती थी। वह स्वादिष्ट नहीं थी, पर पेट को धोखा दे देती थी। कुछ दिनों बाद अनाया ने जलधारा के पास छोटी मछलियां देखीं। पानी उथला था। विक्रम ने एक टहनी को नुकीला बनाया और घंटों कोशिश के बाद एक छोटी मछली पकड़ी। उसे आग पर सेंका गया। दोनों ने इतना छोटा हिस्सा बांटा कि शहर में कोई उसे खाना नहीं कहता, लेकिन उस शाम वह किसी दावत से कम नहीं था।
विक्रम को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि पहाड़ पर जीना शक्ति से ज्यादा धैर्य मांगता है। शहर में वह समस्या आते ही फोन करता था—मजदूर बुलाओ, मशीन लाओ, पेमेंट रोक दो, सप्लायर बदल दो। यहां कोई फोन नहीं था। यहां चीजें मनाने से नहीं, समझने से मिलती थीं। पानी कहां जाता है, हवा किस दिशा से आती है, कौन सी मिट्टी फिसलती है, कौन सा पेड़ सूखा है, किस पत्थर के नीचे कीड़े मिल सकते हैं—हर छोटी बात ज्ञान बन गई थी।
अनाया इस नए संसार में आश्चर्यजनक रूप से तेज सीख रही थी। वह चीजों को ध्यान से देखती थी। वह आवाजों को पहचानने लगी थी। किस समय पक्षी चुप हो जाते हैं, किस ढलान पर पानी ज्यादा गिरता है, किन पत्तों पर सुबह की ओस ज्यादा टिकती है। विक्रम कभी-कभी उसे देखकर सोचता कि जिस बच्ची को उसने घर में हमेशा अकेला छोड़ा, उसने अकेले रहकर निरीक्षण करना सीख लिया था। उसकी चुप्पी कमजोरी नहीं थी, एक तरह की तैयारी थी।
एक रात आग के पास बैठे हुए अनाया ने पूछा, “पापा, अगर हम वापस नहीं गए तो?”
विक्रम के हाथ रुक गए। वह लकड़ी ठीक कर रहा था।
“हम जाएंगे,” उसने कहा।
“लेकिन अगर बहुत देर हो गई तो?”
विक्रम ने उसे देखा। उसका मन था कि कह दे—ऐसा मत सोचो। पर उसने अब झूठे भरोसे कम कर दिए थे।
“अगर देर हुई, तो भी हम जिंदा रहेंगे। जब तक रास्ता नहीं मिलता, हम हार नहीं मानेंगे।”
अनाया ने धीरे से कहा, “मम्मी होतीं तो बहुत डर जातीं।”
विक्रम ने पहली बार मीरा का नाम इस तरह सुना। इतने सालों से दोनों ने मीरा की बात कम ही की थी। दुख से बचने के लिए उन्होंने स्मृति को भी बंद कर दिया था।
विक्रम ने कहा, “तुम्हारी मम्मी डरतीं, लेकिन वह हमसे ज्यादा मजबूत थीं।”
अनाया की आंखों में नमी आ गई। “आपने कभी उनके बारे में बात क्यों नहीं की?”
विक्रम बहुत देर तक चुप रहा। फिर बोला, “क्योंकि मुझे लगता था बात करूंगा तो टूट जाऊंगा। लेकिन शायद बात न करके मैंने तुम्हें अकेला छोड़ दिया।”
अनाया ने आग की तरफ देखते हुए कहा, “मैं भी उनके बारे में बात करना चाहती थी। पर आप हमेशा जल्दी में होते थे।”
वह वाक्य आग से ज्यादा गरम था। विक्रम ने सिर झुका लिया। पहाड़ की ठंडी रात में उसने पहली बार अपने अपराध को साफ महसूस किया। दुख से भागते हुए उसने अपनी बेटी को उसी दुख में अकेला छोड़ दिया था।
दिन हफ्तों में बदलने लगे। बारिश कम हुई। धूप थोड़ी बढ़ी। उन्होंने आश्रय के बाहर पत्थरों से एक बड़ा संकेत बनाया—“HELP” नहीं, बल्कि “2 ALIVE”। अनाया ने कहा कि अगर ऊपर से कोई देखे तो समझे कि दो लोग हैं। विक्रम ने उसे देखा और मुस्कुराया। संकट में भी उसकी सोच स्पष्ट थी।