Emotional Story

एक स्कूल प्रोजेक्ट पिता-बेटी को मौत की घाटी में ले गया, फिर बेटी ने किया नामुमकिन काम

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

एक व्यस्त पिता, जिसने अपनी बेटी को हमेशा समय से ज्यादा सुविधाएं दीं… और एक बेटी, जिसने शिकायत करना बहुत पहले छोड़ दिया था।
लेकिन एक छोटे से स्कूल प्रोजेक्ट के लिए शुरू हुई पहाड़ों की यात्रा अचानक ऐसी आपदा में बदल जाती है, जहां न सड़क बचती है, न फोन, न कोई मदद।

सिक्किम की एक वीरान घाटी में फंसे विक्रम और अनाया को बारिश, भूस्खलन, भूख, ठंड और टूटती उम्मीदों से लड़ना पड़ता है।
जहां एक पिता अपनी बेटी को बचाने की कोशिश करता है, वहीं धीरे-धीरे वही बेटी उसे जीना, संभलना और परिवार का असली मतलब समझा देती है।

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आप भाग 3 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 41 मिनट

भाग 3

उन्होंने जलधारा के पास एक छोटा गड्ढा बनाया जहां पानी जमा हो सके। आग की राख को सूखा रखने के लिए पत्थरों की छोटी दीवार बनाई। विक्रम ने अपने बेल्ट और तख्ते की मदद से एक अस्थायी फंदा बनाया, जिसमें कभी-कभी छोटे पक्षी फंस जाते। अनाया पहले उन्हें देखकर रो पड़ी। उसे जानवरों से लगाव था। लेकिन फिर उसने समझा कि जीवन कभी-कभी बहुत कठिन निर्णयों से चलता है। उसने हर बार खाना पकाने से पहले आंखें बंद कर धन्यवाद कहना शुरू किया। विक्रम को यह आदत अजीब लगी, फिर धीरे-धीरे वह भी उसके साथ चुप हो जाता।

एक महीने बाद विक्रम ने तय किया कि उन्हें ऊपर वाले पुराने मौसम केंद्र तक जाना चाहिए। शायद वहां कोई रेडियो, पुरानी बैटरी या रास्ते का संकेत मिल जाए। अनाया साथ जाना चाहती थी। रास्ता मुश्किल था, पर उसे अकेला छोड़ना उससे ज्यादा डरावना था। दोनों सुबह-सुबह निकले। उन्होंने जलधारा के किनारे-किनारे चढ़ाई की। ऊंचाई बढ़ने के साथ हवा पतली और ठंडी होती गई। पेड़ कम होते गए। रास्ते में पुराने लोहे के खंभे मिले, शायद कभी बिजली या तार के लिए लगे होंगे।

दोपहर तक वे एक जर्जर इमारत तक पहुंचे। दीवारें टूटी हुई थीं, खिड़कियां नहीं थीं, लेकिन अंदर कुछ पुराना सामान पड़ा था—जंग लगा टेबल, टूटी कुर्सी, एक अलमारी, कुछ फटे कागज और एक पुराना उपकरण जिसका डायल टूटा हुआ था। रेडियो था, पर पूरी तरह बेकार। छत पर सोलर पैनल जैसा कुछ लगा था, लेकिन तार कट चुके थे। अनाया ने ध्यान से देखा।

“अगर तार जोड़ें तो शायद कुछ हो सकता है,” उसने कहा।

विक्रम ने थके हुए स्वर में कहा, “यह सब खराब है।”

अनाया ने पहली बार थोड़ी झुंझलाहट से कहा, “आप हर चीज को पहले खराब क्यों मान लेते हैं?”

विक्रम चुप रह गया। उसे एहसास हुआ कि वह सिर्फ मशीनों की बात नहीं कर रही। शायद वह उनके रिश्ते की बात भी कर रही थी।

उन्होंने कुछ तार, एक धातु की प्लेट और पुराने प्लास्टिक के कंटेनर साथ लिए। लौटते समय अनाया फिसल गई। उसका घुटना पत्थर से टकराया और खून निकल आया। विक्रम घबरा गया। उसने कपड़े का टुकड़ा फाड़कर पट्टी बांधी। अनाया दर्द में थी, पर उसने कहा, “मैं चल सकती हूं।”

उस शाम वे बहुत मुश्किल से आश्रय तक लौटे। घुटने की चोट छोटी दिख रही थी, लेकिन पहाड़ में छोटी चोट भी खतरा बन सकती है। दो दिन बाद अनाया को बुखार चढ़ गया। उसका शरीर तप रहा था। विक्रम की दुनिया जैसे फिर से टूटने लगी। आग जल रही थी, पानी था, पर दवाई नहीं थी। वह उसके माथे पर गीला कपड़ा रखता, जलधारा से पानी लाता, उसे थोड़ा-थोड़ा पीने को देता। रात भर वह जागता रहा। हर बार जब अनाया करवट बदलती, वह डर जाता।

उस रात उसे मीरा की आखिरी बीमारी याद आई। अस्पताल के कमरे, दवाइयों की गंध, मशीनों की आवाज और उसका लगातार काम में भागते रहना। उसने तब भी खुद को मजबूत समझा था, पर असल में वह कमजोर था। वह दर्द के सामने टिक नहीं पाता था। अब कोई अस्पताल नहीं था, कोई डॉक्टर नहीं था, कोई भागने की जगह नहीं थी। अब उसे यहीं रहना था, अपनी बेटी के पास, पूरी रात, पूरी तरह।

तीन दिन बाद अनाया का बुखार कम हुआ। उसने आंखें खोलीं तो विक्रम उसी जगह बैठा था। दाढ़ी बढ़ी हुई, आंखें लाल, हाथ में पानी का कटोरा। अनाया ने कमजोर आवाज में कहा, “आप सोए नहीं?”

विक्रम ने मुस्कुराने की कोशिश की। “तुम सो रही थीं, मुझे पहरा देना था।”

अनाया ने बहुत धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। वह पकड़ बहुत हल्की थी, लेकिन विक्रम के लिए वह किसी पुरस्कार से बड़ी थी। सालों से जो रिश्ता शब्दों में नहीं बन पाया था, वह उस बुखार की रातों में चुपचाप बनने लगा।

मौसम बदलने लगा। पहाड़ों पर ठंड उतरने लगी। हवा में काटने वाली धार आ गई। अब बारिश की जगह कभी-कभी बर्फ जैसी ओस जमने लगी। विक्रम ने समझा कि अगर उन्होंने तैयारी नहीं की तो सर्दी उन्हें मार देगी। उन्होंने आश्रय की दीवारों में मिट्टी भरी। छत पर घास और तख्तों की दूसरी परत लगाई। आग को रात भर जिंदा रखने की तकनीक सीखी—बड़ी लकड़ी नीचे, राख ऊपर, हवा कम। अनाया ने सूखी घास के बंडल बनाए। उसने अपने नोटबुक के आखिरी पन्नों पर दिन गिनने शुरू किए। पहले वह तारीख लिखती थी, फिर उसे एहसास हुआ कि तारीख का अर्थ तभी है जब कैलेंडर हो। उसने दिनों को नाम देना शुरू किया—पहला साफ आसमान, बड़ी मछली वाला दिन, बुखार के बाद की सुबह, पहली बर्फ की रात।

दिसंबर आया तो घाटी सफेद होने लगी। भोजन कम हो गया। जलधारा पतली पड़ गई। कई रातें ऐसी आईं जब पेट खाली था और आग कमजोर। अनाया कभी-कभी अपनी मां की बात करती। विक्रम सुनता। अब वह बीच में फोन नहीं उठाता था, न बात बदलता था। वह सुनना सीख रहा था। अनाया ने भी धीरे-धीरे उसे फिर से पिता की जगह देना शुरू किया। पूरी तरह नहीं, पर थोड़ा-थोड़ा।

एक रात, जब बाहर बर्फ गिर रही थी, अनाया ने पूछा, “पापा, अगर हम दिल्ली वापस गए तो क्या सब पहले जैसा हो जाएगा?”

विक्रम ने आग में लकड़ी डाली। फिर कहा, “नहीं। अगर हम वापस गए तो मैं पहले जैसा नहीं रहूंगा।”

“आपको कैसे पता?”

“क्योंकि अब मुझे पता है कि मैंने क्या खोया था।”

अनाया ने पूछा, “क्या?”

विक्रम ने उसकी तरफ देखकर कहा, “तुम्हें। जबकि तुम मेरे सामने ही थीं।”

अनाया ने कुछ नहीं कहा। पर उस रात वह पहली बार आग के पास आकर उसके कंधे से टिक गई। विक्रम स्थिर बैठा रहा, जैसे हिलने से यह क्षण टूट जाएगा।

सर्दी लंबी थी। कई बार लगा कि वे नहीं बचेंगे। कई बार विक्रम को लगा कि किसी सुबह वह अनाया को उठाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा। लेकिन हर सुबह वे उठे। कभी कमजोर, कभी भूखे, कभी निराश, लेकिन उठे। पहाड़ ने उन्हें नर्म नहीं रखा। उसने उनसे हर सुविधा छीन ली। लेकिन उसी कठोरता में उसने उन्हें एक-दूसरे की जरूरत समझा दी।

जब पहली बार बर्फ पिघली और जलधारा फिर तेज हुई, अनाया ने बाहर खड़े होकर बहुत देर तक पानी को देखा। उसकी आंखों में चमक थी।

“हमने एक मौसम काट लिया,” उसने कहा।

विक्रम ने उसके पास खड़े होकर कहा, “हमने नहीं, तुमने मुझे काटना सिखाया।”

अनाया ने मुस्कुराकर कहा, “अब अगला मौसम भी काट लेंगे।”

विक्रम ने उस मुस्कान को देखा। वह दिल्ली वाली लड़की नहीं रही थी जो चुपचाप अपने कमरे में चली जाती थी। वह पहाड़ की बेटी जैसी हो गई थी—थकी हुई, पर मजबूत; डरी हुई, पर टूटी नहीं।

और विक्रम भी वही आदमी नहीं रहा था जो काम को जीवन समझता था। अब उसे पता था कि जीवन का असली अर्थ किसी प्रोजेक्ट की डेडलाइन में नहीं, किसी प्रिय व्यक्ति की सांस सुनते हुए रात काटने में भी हो सकता है।

उन्हें अब भी नहीं पता था कि रेस्क्यू कब आएगा। शायद कोई नहीं आएगा। शायद उन्हें खुद रास्ता बनाना होगा। लेकिन अब वे सिर्फ फंसे हुए लोग नहीं थे। वे एक-दूसरे के साथी थे। और कभी-कभी इंसान को जीवित रखने के लिए खाना, आग और पानी के साथ-साथ यही चौथी चीज सबसे जरूरी होती है—साथ।

वसंत लौट आया था, लेकिन उसके साथ घर लौटने का रास्ता नहीं लौटा। घाटी में बर्फ पिघलने लगी थी। पेड़ों पर हल्की हरियाली दिखाई देने लगी थी। पक्षियों की आवाजें फिर बढ़ने लगी थीं। जलधारा अब पतली फुसफुसाहट नहीं, एक साफ बहती हुई रेखा बन चुकी थी। बाहर से देखने वाला कोई व्यक्ति सोचता कि प्रकृति कितनी सुंदर है। लेकिन विक्रम और अनाया जानते थे कि सुंदरता और खतरा पहाड़ में अक्सर एक ही चेहरे के दो हिस्से होते हैं।

अब उन्हें इस घाटी में लगभग आठ महीने हो चुके थे। शुरुआत में वे हर दिन सोचते थे कि आज कोई आएगा। फिर हर हफ्ते। फिर हर महीने। अब उम्मीद एक स्थिर आग की तरह हो गई थी—बहुत तेज नहीं, लेकिन बुझी भी नहीं। विक्रम हर सुबह ऊंचाई पर जाकर आसमान देखता। अनाया हर शाम पत्थरों से बने संकेत को ठीक करती। “2 ALIVE” अब मौसम से धुंधला होने लगा था, पर वह उसे फिर से साफ कर देती। वह कहती, “जब कोई आएगा तो उसे साफ दिखना चाहिए।”

विक्रम कभी-कभी सोचता कि क्या नीचे दुनिया ने उन्हें मृत मान लिया होगा। क्या दिल्ली में उनके फ्लैट पर ताला लगा होगा? क्या ऑफिस में किसी ने कुछ दिनों तक खोज की होगी और फिर नई फाइलों में खो गया होगा? क्या अनाया के स्कूल ने उसकी खाली बेंच पर कुछ समय तक फूल रखे होंगे? ये सवाल उसे भीतर से तोड़ते थे, लेकिन वह उन्हें अनाया के सामने नहीं लाता।

एक दिन अनाया ने खुद ही कहा, “शायद सबको लगता होगा हम नहीं रहे।”

विक्रम ने उसकी तरफ देखा। वह पत्थरों पर बैठी अपनी नोटबुक में कुछ बना रही थी—घाटी का नक्शा। उसमें जलधारा, आश्रय, पुराना मौसम केंद्र, फिसलन वाली ढलान और सुरक्षित रास्ते चिन्हित थे।

“क्यों कह रही हो ऐसा?” विक्रम ने पूछा।

“क्योंकि अगर वे खोज रहे होते तो अब तक कोई आता।”

विक्रम के पास इस बार भी कोई आसान जवाब नहीं था। उसने कहा, “कई बार पहाड़ आदमी को बहुत अच्छे से छिपा लेता है।”

अनाया ने नक्शे पर एक रेखा खींची। “तो हमें खुद को दिखाना पड़ेगा।”

उस दिन से उनका ध्यान सिर्फ जीने पर नहीं, दिखने पर भी गया। उन्होंने धुएं के लिए अलग आग तैयार की। हरी पत्तियां डालने पर धुआं गाढ़ा उठता था। उन्होंने खुले मैदान में सफेद पत्थर जमा किए। पुराने मौसम केंद्र से लाई गई धातु की प्लेट को रगड़कर थोड़ा चमकाया ताकि धूप में संकेत दिया जा सके। अनाया ने अपने कैमरे के टूटे लेंस का एक हिस्सा निकाला और उसे छोटे दर्पण की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की।

विक्रम को अपनी बेटी पर गर्व होने लगा था। यह गर्व वैसा नहीं था जैसा रिपोर्ट कार्ड देखकर होता है। यह गर्व गहरा था। उसने अनाया को प्रकृति, भूख, ठंड और डर से लड़ते देखा था। उसने उसे टूटते, उठते, सीखते और फिर आगे बढ़ते देखा था। उसे लगता था कि शहर ने जिसे शांत लड़की समझा, पहाड़ ने उसे योद्धा बना दिया।

लेकिन हर कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है जब ताकत की भी परीक्षा होती है।

बरसात फिर लौटने लगी थी। पहले हल्की बौछारें आईं। फिर दो दिन लगातार बारिश हुई। मिट्टी फिर नरम होने लगी। विक्रम ने चिंता से ढलानों को देखा। पिछले साल की आपदा की याद दोनों के भीतर अभी ताजा थी। उन्होंने आश्रय के आसपास पानी की निकासी के लिए छोटी नालियां खोदीं। पत्थरों की दीवार मजबूत की। आग की सूखी लकड़ी अंदर जमा कर ली।

तीसरी रात तेज बारिश में आश्रय के पीछे की ढलान से मिट्टी खिसकी। आवाज इतनी भारी थी कि दोनों नींद से उछलकर उठे। विक्रम ने अनाया को बाहर धकेला। अगले ही पल पीछे की दीवार का एक हिस्सा टूट गया। पत्थर और कीचड़ अंदर घुस आए। एक बड़ा पत्थर विक्रम के पैर पर गिरा। वह दर्द से चीख उठा।

अनाया ने उसे खींचने की कोशिश की। बारिश, अंधेरा, कीचड़ और टूटती दीवार—सब मिलकर उस रात को भयावह बना रहे थे। उसने पूरी ताकत लगाई। पत्थर हल्का नहीं था। विक्रम ने कहा, “भागो अनाया!”

अनाया चिल्लाई, “नहीं!”

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