भाग 4
उसने लकड़ी का मोटा डंडा पत्थर के नीचे अटकाया, जैसे स्कूल की विज्ञान कक्षा में लीवर पढ़ा था। उसने पूरा वजन डाला। पत्थर थोड़ा हिला। विक्रम ने पैर खींचा। वह बाहर तो आ गया, लेकिन टखना बुरी तरह चोटिल था। वे दोनों बारिश में भीगते हुए आश्रय से दूर एक बड़े पेड़ के नीचे बैठे रहे। रात भर कोई आग नहीं, कोई सूखी जगह नहीं। सिर्फ एक-दूसरे की सांसों की आवाज।
सुबह तक बारिश कम हुई। आश्रय आधा टूट चुका था। विक्रम चल नहीं पा रहा था। अनाया का चेहरा कठोर हो गया। वह रोना चाहती थी, पर रोई नहीं। अब उसे निर्णय लेना था।
उसने विक्रम को एक सुरक्षित कोने में बैठाया। बचे हुए सूखे सामान को निकाला। दीवार के पत्थर हटाकर छोटी जगह बनाई। फिर बोली, “मुझे ऊपर मौसम केंद्र जाना होगा।”
विक्रम ने तुरंत मना किया। “अकेले नहीं।”
“आप चल नहीं सकते।”
“मैं रेंगकर चलूंगा।”
“और रास्ते में फंस गए तो?” अनाया की आवाज कांपी, लेकिन उसने खुद को संभाला। “पापा, हमें मदद बुलानी है। पुराने सोलर पैनल में कुछ तो होगा। मैंने तार देखे हैं। शायद पूरी चीज खराब न हो।”
विक्रम ने उसे देखा। उसे पहली बार समझ आया कि बच्चों को हमेशा बचाकर रखना संभव नहीं होता। कभी-कभी उन्हें भरोसा देकर जाने देना पड़ता है।
“रास्ता गीला है,” उसने कहा।
“मैं चिन्ह देखकर जाऊंगी।”
“जल्दी मत करना।”
“नहीं करूंगी।”
“और अगर धुंध आ जाए तो?”
“वापस मुड़ आऊंगी।”
विक्रम ने उसका हाथ पकड़ा। “वादा?”
अनाया ने सिर हिलाया।
वह सुबह अकेली निकली। उसके हाथ में लकड़ी की छड़ी, बैग में पानी, धातु की प्लेट और कुछ सूखी घास। रास्ता मुश्किल था। कई जगह मिट्टी धंस चुकी थी। जलधारा उग्र थी। धुंध बीच-बीच में रास्ता निगल लेती थी। लेकिन अनाया अब वह लड़की नहीं थी जो हर चीज के लिए पिता की तरफ देखे। उसने कदम सोचकर रखे। जहां जमीन नरम लगी, वह पीछे हटी। जहां पत्थर ढीले लगे, उसने छड़ी से जांचा। हर कुछ दूरी पर उसने पेड़ की छाल पर निशान बनाए।
मौसम केंद्र पहुंचते-पहुंचते दोपहर हो चुकी थी। इमारत पहले से ज्यादा जर्जर लग रही थी। लेकिन सोलर पैनल अब भी छत पर था। अनाया छत पर चढ़ी। हाथ कटे, कपड़े फटे, लेकिन उसने पैनल साफ किया। नीचे आकर उसने पुराने उपकरण खोले। उसे electronics की पूरी समझ नहीं थी, लेकिन स्कूल में उसने एक बार science exhibition के लिए छोटा solar circuit बनाया था। वही याद अब जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी थी।
उसने तारों को जोड़ा। जंग हटाई। पुराने रेडियो जैसा उपकरण खोला। कई हिस्से बेकार थे। लेकिन एक छोटा transmitter मॉड्यूल शायद पूरी तरह मृत नहीं था। उसने पैनल से तार जोड़े। कुछ नहीं हुआ। उसने फिर जोड़ा। फिर भी कुछ नहीं। तीसरी बार उसने धातु की प्लेट से संपर्क साफ किया। अचानक बहुत हल्की सी खड़खड़ाहट सुनाई दी।
अनाया की सांस रुक गई।
उपकरण से साफ आवाज नहीं आई, सिर्फ टूटती-फूटती static। लेकिन इसका मतलब था कि कहीं कुछ जिंदा है। उसने माइक्रोफोन जैसा टूटा हिस्सा उठाया और बोली, “हेलो… कोई सुन रहा है? हम दो लोग फंसे हैं… नीलधारा घाटी… पुराना मौसम केंद्र… प्लीज…”
उसकी आवाज शायद कहीं नहीं गई। शायद हवा में खो गई। शायद पहाड़ों से टकराकर लौट आई। लेकिन उसने बार-बार कहा। जब तक गला बैठ नहीं गया। फिर उसने रेडियो को वैसा ही छोड़ दिया, उम्मीद में कि शायद कोई संकेत कभी बाहर निकल जाए।
वापस लौटते समय शाम हो रही थी। धुंध बढ़ गई। एक जगह वह रास्ता भटक गई। दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने खुद को रोका। घबराहट में भागना पहाड़ पर सबसे बड़ी गलती है। उसने अपने बनाए निशान ढूंढे। एक पेड़ पर खरोंच दिखी। फिर दूसरा। धीरे-धीरे वह वापस रास्ते पर आई।
जब वह आश्रय के पास पहुंची तो अंधेरा उतर चुका था। विक्रम ने उसे देखते ही राहत की ऐसी सांस ली जैसे कई घंटों से सांस रोके बैठा हो।
“कुछ हुआ?” उसने पूछा।
अनाया ने थककर बैठते हुए कहा, “मुझे नहीं पता। आवाज आई थी। मैंने बोल दिया।”
विक्रम ने उसका माथा चूमा। शायद सालों बाद पहली बार। “तुमने जितना कर सकती थीं, उससे ज्यादा किया।”
अगले कई दिन इंतजार में बीते। विक्रम का पैर धीरे-धीरे ठीक होने लगा, पर वह अब भी पूरी तरह चल नहीं पाता था। अनाया रोज मौसम साफ होने पर ऊपर जाती, उपकरण देखती, संदेश दोहराती। कई बार कोई आवाज नहीं आती। कभी सिर्फ static। कभी बहुत दूर से टूटी हुई ध्वनि जैसी लगती, लेकिन शब्द नहीं।
फिर एक सुबह, जब धूप साफ थी और हवा उत्तर से आ रही थी, उपकरण से कुछ अलग आवाज आई। अनाया उस समय अकेली थी। पहले खड़खड़ाहट, फिर जैसे किसी ने बहुत दूर से कहा—“…repeat… location…”
अनाया का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने उपकरण पकड़ा और पूरी ताकत से बोली, “दो लोग जिंदा हैं। नीलधारा घाटी। पुराना मौसम केंद्र। सड़क बह गई। कृपया मदद भेजिए।”
कुछ सेकंड कुछ नहीं हुआ। फिर आवाज आई—“Signal weak… stay visible… smoke…”
अनाया रो पड़ी। लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला। वह नीचे दौड़ी नहीं। वह संभलकर उतरी, क्योंकि अब गिरना मना था। जब उसने विक्रम को बताया तो वह कुछ देर उसे देखता रहा, जैसे बात समझने में समय लग रहा हो। फिर उसकी आंखें भर आईं।
उस दिन उन्होंने लगातार धुआं किया। हरी पत्तियां, गीली घास, सब आग में डालीं। धुआं आकाश में उठता रहा। शाम तक कुछ नहीं हुआ। रात आई। अनाया ने कहा, “शायद उन्होंने सुना होगा।”
विक्रम ने कहा, “उन्होंने सुना है।”
अब उसकी आवाज में पहली बार सचमुच भरोसा था।
अगली सुबह पहाड़ों के ऊपर एक हल्की गूंज सुनाई दी। पहले अनाया ने सोचा हवा है। फिर आवाज बढ़ी। विक्रम ने बाहर आकर आसमान देखा। धुंध के ऊपर से एक छोटा हेलीकॉप्टर घूमता हुआ आया। फिर दूसरा चक्कर। वह बहुत नीचे नहीं आ सकता था, पर उसने धुएं को देखा। अनाया धातु की प्लेट लेकर धूप में चमकाने लगी। विक्रम लंगड़ाते हुए पत्थरों के संकेत के पास गया। दोनों ने हाथ हिलाए, चिल्लाए, रोए।
हेलीकॉप्टर ने ऊपर से चक्कर काटा और आगे बढ़ गया। अनाया का चेहरा उतर गया।
विक्रम ने कहा, “वह हमें देखकर गया है। अब वे रास्ता ढूंढेंगे।”
करीब दो घंटे बाद घाटी की दूसरी तरफ से रस्सियों और उपकरणों के साथ rescue team उतरी। वे पहाड़ बचाव दल और स्थानीय सेना की संयुक्त टीम थी। उनमें से एक अधिकारी ने बताया कि पिछले साल की आपदा के बाद यह घाटी अस्थिर मानकर बंद कर दी गई थी। कई जगह खोज हुई थी, लेकिन उनका वाहन और बाकी लोग नीचे की बाढ़ में लापता हो गए थे। माना गया था कि सब बह गए। कुछ सप्ताह पहले satellite mapping में पुराने मौसम केंद्र की दिशा में हल्का heat irregularity दिखा था, पर मौसम खराब था। फिर कल उन्हें कमजोर radio signal मिला। आज smoke signal ने स्थान पक्का कर दिया।
जब बचाव दल ने विक्रम और अनाया को देखा, तो वे कुछ क्षण चुप रह गए। उनके सामने दो लोग थे—कमजोर, दुबले, धूप और ठंड से बदले हुए, लेकिन जिंदा। अनाया की आंखों में उम्र से ज्यादा अनुभव था। विक्रम की दाढ़ी सफेद हो चुकी थी। लेकिन जब rescue worker ने पूछा, “चल पाएंगे?” तो अनाया ने अपने पिता की तरफ देखकर कहा, “हम साथ चलेंगे।”
उन्हें रस्सियों की मदद से सुरक्षित ऊंचाई तक ले जाया गया। हेलीकॉप्टर में बैठते समय अनाया ने नीचे घाटी को देखा। वह जगह जिसने उससे उसका स्कूल, दोस्त, शहर और एक साल से ज्यादा की जिंदगी छीन ली थी। लेकिन उसी जगह ने उसे उसका पिता भी लौटाया था। वह तय नहीं कर पा रही थी कि उस घाटी से नफरत करे या उसे धन्यवाद दे।
हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने कहा कि उनका बचना असाधारण था। कुपोषण, संक्रमण, चोट, ठंड—सबके बावजूद वे जिंदा थे। पत्रकारों ने सवाल किए। कैसे बचे? क्या खाया? क्या उम्मीद छोड़ी? किसने हिम्मत दी?
विक्रम ने कैमरों की तरफ नहीं देखा। उसने अनाया की तरफ देखा और कहा, “मैं तो कई बार हार चुका था। इसने मुझे हारने नहीं दिया।”
अनाया ने तुरंत कहा, “ऐसा नहीं है। आपने मुझे अकेला नहीं छोड़ा।”
उन दोनों के बीच यह बातचीत किसी interview के लिए नहीं थी। यह उन रातों का सच था जब आग धीमी पड़ती थी, पेट खाली होता था और फिर भी दोनों एक-दूसरे को सुबह तक पहुंचा देते थे।
दिल्ली लौटने पर सब कुछ बदला हुआ लगा। वही सड़कें, वही फ्लैट, वही कमरे, लेकिन अब वे लोग वही नहीं थे। विक्रम ने अपनी नौकरी तुरंत नहीं छोड़ी, लेकिन उसने अपनी जिंदगी की रफ्तार बदल दी। उसने छोटे प्रोजेक्ट लेने शुरू किए, घर से दूर लंबे contract बंद कर दिए। शाम को वह घर आता, फोन साइलेंट करता और अनाया के साथ बैठता। शुरुआत में दोनों को सामान्य बातचीत फिर से सीखनी पड़ी। शहर का जीवन भी एक तरह की वापसी यात्रा था।
अनाया ने स्कूल दोबारा शुरू किया। उसकी उम्र के हिसाब से वह पीछे रह गई थी, लेकिन उसकी समझ बहुत आगे जा चुकी थी। उसने बाद में पर्यावरण विज्ञान और आपदा प्रबंधन पढ़ने का फैसला किया। उसे पहाड़ों से डर भी लगता था और खिंचाव भी। वह कहती थी, “प्रकृति दुश्मन नहीं होती, पर उसे हल्के में लेना सबसे बड़ी गलती है।”
विक्रम ने भी आपदा-रोधी निर्माण पर काम शुरू किया। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, पुल और जल निकासी को लेकर वह पहले सिर्फ तकनीकी भाषा में सोचता था। अब हर नक्शे के पीछे उसे कोई परिवार दिखाई देता था। कोई बच्चा, कोई पिता, कोई यात्री, कोई गाइड। उसे पता था कि एक गलत अनुमान किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।
कई साल बाद, एक शाम अनाया और विक्रम अपने फ्लैट की बालकनी में बैठे थे। दिल्ली में हल्की बारिश हो रही थी। सड़क की लाइटें पानी में चमक रही थीं। अनाया ने चाय का कप पकड़े हुए कहा, “आपको कभी उस घाटी की याद आती है?”
विक्रम ने लंबी सांस ली। “हर दिन। लेकिन डर की तरह नहीं।”
“फिर कैसे?”
“जैसे किसी कठोर शिक्षक की याद आती है। जिसने बहुत दर्द देकर सबसे जरूरी बात सिखाई।”
अनाया मुस्कुराई। “कि परिवार को समय देना चाहिए?”
विक्रम ने कहा, “कि परिवार समय से नहीं बनता, उपस्थिति से बनता है। और उपस्थिति का मतलब सिर्फ कमरे में होना नहीं, सच में साथ होना है।”
अनाया ने कुछ देर बारिश देखी। फिर धीरे से बोली, “मुझे खुशी है कि हम खोए थे।”
विक्रम ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
वह बोली, “क्योंकि अगर हम नहीं खोते, तो शायद हम कभी मिलते ही नहीं।”
विक्रम की आंखें नम हो गईं। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपनी बेटी का हाथ पकड़ लिया। इस बार डर से नहीं। आदत से नहीं। बल्कि उस रिश्ते की कृतज्ञता से, जो पहाड़ों की धुंध, बारिश, भूख और लंबी रातों से गुजरकर फिर से जन्मा था।
कभी-कभी जीवन हमें ऐसे रास्ते पर धकेल देता है जिसे हम दुर्घटना समझते हैं। हम रोते हैं, टूटते हैं, वापस लौटने की कोशिश करते हैं। लेकिन बहुत बाद में समझ आता है कि कुछ रास्ते मंजिल तक नहीं, भीतर तक ले जाते हैं। विक्रम और अनाया के लिए नीलधारा घाटी वही रास्ता थी। उसने उनसे बहुत कुछ छीना, लेकिन बदले में उन्हें वह दे दिया जो किसी शहर, किसी नौकरी, किसी सुविधा से नहीं मिल सकता था—एक-दूसरे का सच्चा साथ।