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एक कप चाय और सौ सवाल: पहाड़ की ख़ामोश जलधारा ने क्या छुपा रखा था?

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कहानी की एक झलक

आगे क्या होने वाला है?

आधी-रात, तेज़ बारिश, टूटी सड़क…
एक अजनबी शहर से भागता हुआ पहाड़ों में आ अटकता है।
उसे बचाती है सिर्फ़ एक कप चाय—लेकिन इसके बदले में वह क्या खो बैठेगा… या पा जाएगा?

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आप भाग 1 पढ़ रहे हैं पूरी कहानी: लगभग 51 मिनट

भाग 1

नदी के उस पार बसे छोटे से पहाड़ी गांव देवसारी में सुबहें हमेशा किसी पुराने गीत की तरह खुलती थीं। देवदार के लंबे पेड़ों के बीच से जब धूप की पहली किरणें उतरतीं, तो मिट्टी की पगडंडियां सोने जैसी चमकने लगतीं। दूर-दूर तक सीढ़ीनुमा खेत फैले थे, जिनमें कभी गेहूं झूमता, कभी मंडुआ, कभी सरसों की पीली चादर बिछ जाती। गांव छोटा था, पर लोगों के दिल बड़े थे। यहां कोई किसी के घर बिना आवाज दिए पानी पी सकता था, कोई बच्चा किसी भी आंगन में बैठकर रोटी खा सकता था, और किसी बूढ़े की लकड़ी गिर जाए तो दस हाथ उसे उठाने दौड़ पड़ते थे।

इसी गांव में रहती थी गौरी।

गौरी कोई बड़ी अमीर लड़की नहीं थी। उसके पिता मोहनलाल गांव के छोटे किसान थे और मां सरोजा घर संभालने के साथ-साथ गांव की औरतों के साथ हाथ से ऊनी शालें बुनती थीं। गौरी की एक छोटी बहन थी, काजल, जो स्कूल में पढ़ती थी और डॉक्टर बनने का सपना देखती थी। गौरी खुद गांव के इंटर कॉलेज तक पढ़ी थी। आगे शहर जाकर पढ़ने की इच्छा थी, लेकिन घर की हालत ने उसे गांव में ही रोक लिया। फिर भी उसने अपने सपनों को मरने नहीं दिया। वह बच्चों को शाम को पढ़ाती, बुजुर्गों के सरकारी कागज भरती, और गांव की महिलाओं को मोबाइल पर पैसे भेजना, बैंक का मैसेज पढ़ना और ऑनलाइन फॉर्म भरना सिखाती।

गांव वाले उसे मजाक में “हमारी मास्टरनी” कहते थे। लेकिन गौरी को यह नाम अच्छा लगता था। उसे लगता था कि ज्ञान केवल किताबों में नहीं होता, किसी का हाथ पकड़कर उसे रास्ता दिखाना भी ज्ञान ही है।

उधर शहर में, बहुत दूर नहीं, लेकिन दुनिया के हिसाब से बहुत दूर, रिवान नाम का एक युवक रहता था। उम्र छब्बीस साल के करीब थी। वह देहरादून में एक छोटी डिजाइन कंपनी में काम करता था। पढ़ा-लिखा, मेहनती और शांत स्वभाव का। उसके माता-पिता बचपन में ही अलग-अलग बीमारियों से गुजर गए थे, इसलिए रिवान ने बहुत कम उम्र में अकेलेपन को अपना साथी बना लिया था। वह शहर की भीड़ में रहता था, लेकिन उसके कमरे में अक्सर सन्नाटा रहता। वह दिनभर ऑफिस में वेबसाइट और पोस्टर बनाता, रात को किराए के कमरे में बैठकर अपने पुराने लैपटॉप पर कुछ नया सीखता।

रिवान के अंदर एक सपना था। वह पहाड़ी गांवों के लिए ऐसा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाना चाहता था, जहां गांव की महिलाएं अपने हाथ से बनी चीजें बेच सकें, किसान अपनी फसल की कीमत जान सकें, और बच्चे घर बैठे पढ़ाई की मदद पा सकें। लेकिन सपना होना और सपना पूरा होना दो अलग बातें हैं। शहर में किराया, खाने का खर्च, पुरानी देनदारियां और नौकरी की अनिश्चितता ने उसके सपने को कई बार अधूरा छोड़ दिया।

एक दिन अचानक कंपनी में बड़ी मीटिंग हुई। मालिक ने सबको बुलाकर बताया कि कंपनी बंद हो रही है। कुछ प्रोजेक्ट रुक गए हैं, कुछ क्लाइंट पैसे नहीं दे रहे, और अब कर्मचारियों को रखना संभव नहीं है। रिवान ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी मेज पर रखा छोटा-सा पौधा उठाया, लैपटॉप बैग कंधे पर डाला और ऑफिस से बाहर आ गया।

शहर की सड़कें उसी तरह चल रही थीं। लोग उसी तरह भाग रहे थे। दुकानें खुली थीं, चाय के ठेले पर भीड़ थी, ट्रैफिक का शोर था। लेकिन रिवान को लगा जैसे उसके अंदर की आवाज बंद हो गई है।

उसने कई दिनों तक नौकरी ढूंढी। जगह-जगह इंटरव्यू दिए। कहीं अनुभव कम बताया गया, कहीं सैलरी बहुत कम थी, कहीं जवाब आया कि “हम आपको बाद में बताएंगे।” बाद में कभी नहीं आया। बचत धीरे-धीरे खत्म होने लगी। मकान मालिक ने किराया मांगना शुरू कर दिया। एक दोस्त ने कहा, “तू शहर छोड़ दे, कहीं गांव में सस्ता कमरा लेकर ऑनलाइन काम देख।” दूसरे ने कहा, “यह समय भावुक होने का नहीं, जो काम मिले कर ले।” रिवान सुनता रहा, लेकिन अंदर से टूटता गया।

इसी टूटन के बीच उसे एक छोटा काम मिला। देवसारी गांव के पास एक संस्था स्कूल के बच्चों के लिए डिजिटल लर्निंग केंद्र खोलना चाहती थी। वहां पुराने कंप्यूटर लगाने थे, इंटरनेट की व्यवस्था देखनी थी और बच्चों के लिए शुरुआती डिजिटल कक्षाएं बनानी थीं। काम अस्थायी था, पैसे भी ज्यादा नहीं थे, पर रिवान को लगा कि शायद यह उसके सपने से जुड़ा पहला कदम हो सकता है। उसने तुरंत हां कर दी।

अगले दिन सुबह वह पहाड़ की बस में बैठ गया। बैग में कुछ कपड़े, पुराना लैपटॉप, कुछ तार, एक छोटी डायरी और मां की धुंधली तस्वीर थी। रास्ते में शहर पीछे छूटता गया। सड़कें संकरी होती गईं। पहाड़ शुरू हो गए। बादल इतने पास लग रहे थे जैसे हाथ बढ़ाकर छू लेगा। रिवान ने खिड़की से बाहर देखा और लंबे समय बाद उसे थोड़ा सुकून महसूस हुआ।

लेकिन पहाड़ की राहें जितनी सुंदर होती हैं, उतनी ही अनिश्चित भी।

दोपहर बाद अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। पहले बूंदें आईं, फिर घनी चादर की तरह पानी गिरने लगा। पहाड़ी मोड़ पर बस धीमी हुई। सामने सड़क पर मिट्टी खिसक आई थी। चालक ने बस रोक दी। लोग घबराकर खिड़कियों से देखने लगे। कुछ यात्री उतरकर हाल देखने लगे। रिवान भी अपना बैग लेकर नीचे उतर आया। बारिश कम होने का नाम नहीं ले रही थी। मोबाइल नेटवर्क बार-बार गायब हो रहा था। संस्था के आदमी को फोन नहीं लग रहा था।

तभी पीछे से अचानक शोर उठा। एक छोटा पत्थर ऊपर से लुढ़का और सड़क किनारे खड़े लोगों में भगदड़ मच गई। रिवान बचने के लिए जल्दी से पीछे हटा, लेकिन पैर फिसल गया। वह कीचड़ में गिर पड़ा। उसका बैग खुल गया। लैपटॉप तो बच गया, लेकिन मोबाइल हाथ से छूटकर नीचे बहते पानी में चला गया। पर्स भी शायद उसी अफरातफरी में गिर गया। जब तक उसे होश आया, बस वाले यात्रियों को वापस चढ़ा रहे थे। सड़क खुलने में समय लगना था। कुछ लोग दूसरी ओर पैदल निकल रहे थे।

रिवान ने अपना भीगा बैग उठाया। चेहरे पर मिट्टी लगी थी। आंखों में घबराहट थी। बिना मोबाइल, बिना पर्स, बिना संपर्क के वह एक अनजान पहाड़ी रास्ते पर खड़ा था।

उसी समय गौरी वहां पहुंची।

वह गांव से नीचे बाजार गई थी। काजल की किताबें और मां के लिए दवा लेने। बारिश तेज हुई तो उसने सिर पर दुपट्टा कस लिया और जल्दी-जल्दी गांव लौटने लगी। रास्ते में उसने भीड़ देखी। पहले उसने सोचा कोई दुर्घटना हुई है। फिर उसकी नजर एक युवक पर पड़ी, जो सड़क किनारे पत्थर पर बैठा था। कपड़े भीगे हुए, चेहरा थका हुआ, और हाथ में मिट्टी लगा बैग। बाकी लोग अपने रास्ते में व्यस्त थे, पर उस युवक की आंखों में ऐसा खालीपन था जो गौरी को रोक गया।

वह उसके पास गई और बोली, “आप ठीक हैं?”

रिवान ने सिर उठाया। सामने एक लड़की खड़ी थी। चेहरे पर चिंता थी, पर आवाज में मजबूती।

“हां,” उसने आदत से कहा, “मैं ठीक हूं।”

गौरी ने उसकी हालत देखी और हल्की नाराजगी से बोली, “ठीक लोग इस तरह बारिश में पत्थर पर बैठकर आसमान नहीं देखते। सच बताइए, क्या हुआ?”

रिवान ने पहले चुप रहना चाहा। उसे अजनबियों से अपनी हालत बताने की आदत नहीं थी। लेकिन शायद थकान इतनी गहरी थी कि आवाज खुद बाहर आ गई। उसने पूरी बात बता दी कंपनी बंद होना, यहां काम के लिए आना, रास्ते में मोबाइल और पर्स खो जाना, संस्था से संपर्क न हो पाना।

गौरी ने ध्यान से सुना। उसने बीच में कोई दया भरी आवाज नहीं निकाली, कोई बड़ी बात नहीं कही। बस इतना पूछा, “खाना खाया है?”

रिवान चुप हो गया।

गौरी ने समझ लिया।

“चलिये,” उसने कहा।

“कहां?”

“पहले चाय पीजिए, फिर सोचेंगे दुनिया कैसे बचानी है।”

रिवान ने कमजोर मुस्कान दी। “मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

गौरी ने सीधा जवाब दिया, “मैंने पैसे नहीं पूछे। मैंने कहा चाय पीजिए।”

वह उसे सड़क से थोड़ी दूर बने छोटे ढाबे पर ले गई। ढाबे वाले ने गौरी को देखते ही कहा, “अरे मास्टरनी, इतनी बारिश में?”

गौरी ने कहा, “भइया, दो चाय और दो गरम परांठे लगा दो।”

रिवान ने फिर मना करना चाहा, पर गौरी ने सिर्फ आंखों से रोक दिया। वह बैठ गया। गरम चाय का पहला घूंट उसके भीतर जैसे कहीं जमा हुआ डर पिघलाने लगा। परांठे खाते समय उसकी आंखें भर आईं। उसने चेहरा दूसरी ओर कर लिया, पर गौरी ने देख लिया।

“शर्माने की जरूरत नहीं,” वह बोली, “भूख सबको लगती है। बस फर्क इतना है कि कुछ लोग मान लेते हैं, कुछ लोग नहीं मानते।”

रिवान ने धीरे से कहा, “मैं आपका एहसान कैसे चुकाऊंगा?”

गौरी ने मुस्कुराकर कहा, “एहसान नहीं है। पहाड़ में रास्ते पर मिला आदमी मेहमान होता है। और इंसानियत का हिसाब किताब में नहीं रखा जाता।”

बारिश कम होने लगी थी। लेकिन शाम ढल रही थी। सड़क पूरी तरह खुलने में देर थी। गौरी ने ढाबे वाले से संस्था के बारे में पूछा। पता चला कि संस्था का आदमी नीचे कस्बे में अटका हुआ है और आज गांव नहीं पहुंच पाएगा। रिवान के पास न मोबाइल था, न पैसे, न रहने की जगह।

गौरी ने फैसला कर लिया।

“आप हमारे घर चलिए। सुबह संस्था वालों से संपर्क कर देंगे।”

रिवान पीछे हट गया। “नहीं, यह ठीक नहीं होगा। आपके घर वाले…”

“मेरे घर वाले इंसान हैं,” गौरी ने शांत स्वर में कहा, “और इंसान मुश्किल में किसी को रास्ते पर नहीं छोड़ते।”

रिवान ने उसकी ओर देखा। इस लड़की की बातों में दया कम और सम्मान ज्यादा था। शायद इसलिए उसे मदद लेना अपमान नहीं लगा।

गौरी उसे अपने गांव ले गई। रास्ता पगडंडी वाला था। बारिश से मिट्टी फिसलन भरी हो गई थी। कई बार रिवान फिसला, हर बार गौरी ने बिना कुछ कहे हाथ बढ़ा दिया। ऊपर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिर आया था। गांव में छोटे-छोटे घरों से धुआं उठ रहा था। कहीं गायों की घंटियां बज रही थीं, कहीं बच्चे बारिश में भीगकर हंस रहे थे।

गौरी के घर पहुंचते ही मां सरोजा ने दरवाजा खोला। गौरी ने सब बताया। सरोजा ने बिना सवाल किए रिवान को अंदर बुलाया, सूखा तौलिया दिया और चूल्हे के पास बैठा दिया। मोहनलाल खेत से लौटे तो उन्होंने भी सिर्फ इतना कहा, “बेटा, पहाड़ में रात जल्दी हो जाती है। बाहर ठहरना ठीक नहीं। आराम करो।”

उस रात रिवान ने पहली बार किसी अजनबी घर में अपनेपन की गर्माहट महसूस की। रसोई में मंडुए की रोटी, गहत की दाल और पहाड़ी नमक की चटनी थी। खाना साधारण था, पर शहर के महंगे रेस्टोरेंट से ज्यादा सुकून भरा। काजल ने जिज्ञासा से पूछा, “भैया, आप कंप्यूटर ठीक कर लेते हैं?”

रिवान ने मुस्कुराकर कहा, “कभी-कभी कंप्यूटर मुझे ठीक कर देते हैं।”

काजल हंस पड़ी। गौरी भी मुस्कुराई।

अगली सुबह गौरी ने गांव के पुराने पंचायत भवन में लगे फोन से संस्था वालों से संपर्क कराया। पता चला कि डिजिटल केंद्र का काम सचमुच रिवान को ही करना था, लेकिन बारिश के कारण टीम देरी से आएगी। संस्था वाले दो दिन बाद पहुंचेंगे। तब तक रिवान गांव में रुक सकता था।

रिवान ने सोचा था कि वह बस दो दिन बिताएगा। लेकिन देवसारी ने उसके भीतर कुछ बदलना शुरू कर दिया।

भाग 1/5 अगला →
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