भाग 1
दोस्तों, कहते हैं कि मरते समय इंसान की आँखों के सामने उसका पूरा जीवन घूम जाता है। लेकिन मालिनी रघुवंशी के सामने अपना जीवन नहीं, केवल उन लोगों के चेहरे घूम रहे थे जिनसे उसने जीवनभर प्रेम किया था।
अस्पताल के उस सफेद कमरे में उसकी साँसें लगातार धीमी होती जा रही थीं। उसके हाथों में ताकत नहीं बची थी। आँखों के आगे धुंध छाई हुई थी, लेकिन पर्दे के दूसरी ओर खड़े अपने माता-पिता की आवाज़ें वह साफ सुन पा रही थी।
डॉक्टर ने गंभीर स्वर में कहा, “आप एक बार फिर सोच लीजिए। मालिनी पूरी तरह स्वस्थ है। बिना उसकी सहमति के उसके अंग निकालना अपराध है। इस प्रक्रिया के बाद उसका बचना असंभव है।”
मालिनी के पिता, महेंद्र रघुवंशी, ने बिना किसी झिझक के कहा, “डॉक्टर, हमें कानून मत सिखाइए। दस्तावेजों पर उसके हस्ताक्षर हैं।”
“लेकिन ये हस्ताक्षर दबाव में—”
“आपको जितना पैसा चाहिए, मिल जाएगा,” महेंद्र ने डॉक्टर की बात काट दी। “अवनी की जान बचनी चाहिए। उसके लिए जो भी करना पड़े, कीजिए।”
मालिनी की माँ सविता की आवाज़ सुनाई दी, “पहले उसके दोनों गुर्दों की जाँच कर लीजिए। अवनी का हृदय भी कमजोर हो रहा है। अगर उसका दिल भी काम आ सकता है तो…”
पलंग पर पड़ी मालिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
वह उनकी असली बेटी थी।
उनके अपने खून से जन्मी बेटी।
फिर भी वे उसका दिल, गुर्दे, अस्थिमज्जा और न जाने क्या-क्या निकालकर उस लड़की को देना चाहते थे, जिसे उन्होंने गोद लिया था।
मालिनी ने पूरी ताकत लगाकर अपना हाथ उठाया। उसकी उँगलियाँ पर्दे से टकराईं।

“माँ…”
उसकी कमजोर आवाज़ सुनकर सविता कमरे में आई। एक पल के लिए मालिनी को लगा कि शायद माँ का दिल पिघल जाएगा। शायद वह उसके सिर पर हाथ फेरकर कहेगी कि सब कुछ रोक दिया गया है।
लेकिन सविता ने उसका हाथ हटाते हुए कहा, “मालिनी, तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? अवनी का जीवन तुमसे अधिक महत्वपूर्ण है।”
मालिनी की आँखें फैल गईं।
“मैं… आपकी बेटी हूँ…”
“इसीलिए तो तुम्हें अपनी बहन के लिए त्याग करना चाहिए,” सविता ने कहा। “अवनी की सगाई सिंघानिया परिवार में हुई है। उसके साथ पूरे रघुवंशी परिवार का भविष्य जुड़ा है। तुम्हारे अकेले के जीवन के कारण हम सबका भविष्य नष्ट नहीं कर सकते।”
मालिनी के बड़े भाई विक्रम ने दरवाजे के पास से कहा, “वैसे भी इसकी हालत देखो। इसकी न कोई पहचान है, न कोई सम्मान। अवनी देश की सबसे प्रसिद्ध अभिनेत्री बनने वाली है। अगर उसे कुछ हो गया तो करोड़ों का नुकसान होगा।”
छोटा भाई नीरज भी बोला, “और यह सब मालिनी की गलती है। अगर इसने अवनी को ठीक से अपमानित किया होता तो उसकी हालत इतनी खराब नहीं होती।”
मालिनी ने आँखें बंद कर लीं।
उसे वह दिन याद आया जब वह पहली बार इस घर में आई थी। उसे लगा था कि वर्षों बाद उसे अपना परिवार मिल गया है। लेकिन वह परिवार नहीं था। वह एक ऐसा पिंजरा था जिसमें उसे केवल इसलिए रखा गया था ताकि उसका जीवन निचोड़कर अवनी को दिया जा सके।
ऑपरेशन की तैयारी होने लगी।
अवनी को बगल के कमरे से पहियों वाले पलंग पर लाया गया। उसका सुंदर चेहरा पीला पड़ा था, फिर भी आँखों में वही घमंड था।
उसने मालिनी की ओर देखकर धीमे से कहा, “दीदी, नाराज़ मत होना। तुम्हारा जीवन पहली बार किसी काम आ रहा है।”
मालिनी ने उसे देखा।
अवनी के चेहरे पर वही सुंदरता थी जो वर्षों तक मालिनी से चुराई गई थी।
उसका उजला रंग, चमकती आँखें, घने बाल, लोगों को अपनी ओर खींच लेने वाला आकर्षण—कुछ भी अवनी का अपना नहीं था।
सब मालिनी से छीना गया था।
अवनी उसके करीब झुकी और फुसफुसाई, “तुम्हें पता है, सबसे मजेदार बात क्या है? तुम्हारे माँ-पापा जानते हैं कि तुम्हें मारकर मुझे बचाया जाएगा। फिर भी उन्होंने एक बार भी तुम्हारा पक्ष नहीं लिया।”
मालिनी की आँखों में आँसू नहीं बचे थे।
उसके भीतर केवल आग थी।
उसने मन ही मन कहा—
“अगर मुझे एक और जीवन मिला, तो मैं तुम्हें अपनी एक बूँद तक नहीं दूँगी। मैं तुम्हारे सामने रोऊँगी नहीं। तुम्हारी बनाई हुई इस झूठी दुनिया को तुम्हारी आँखों के सामने तोड़ूँगी। और मेरे परिवार… तुम सबको भी समझाऊँगी कि जिस बेटी को तुमने कमजोर समझा था, वही तुम्हारा अंत बनेगी।”
बेहोशी की दवा उसके शरीर में उतरने लगी।
आवाज़ें दूर होती गईं।
रोशनी बुझ गई।
और फिर—
मालिनी ने अचानक आँखें खोल दीं।
उसकी साँस तेजी से चल रही थी। माथे पर पसीना था। वह किसी अस्पताल में नहीं, एक छोटे अँधेरे कमरे में थी।
सामने टूटी हुई अलमारी, कोने में पुराना संदूक और दीवार पर नमी के दाग थे।
यह वही कमरा था जिसमें उसे रघुवंशी हवेली में रहने के लिए दिया गया था।
मालिनी काँपते हुए उठ बैठी।
उसने अपने हाथ देखे। त्वचा पर सुई के निशान नहीं थे। शरीर स्वस्थ था। पेट पर किसी ऑपरेशन का घाव नहीं था।
तभी कमरे का दरवाजा खुला।
भारी लाल पोशाक पहने अवनी भीतर आई। उसके गले में हीरों का हार था और चेहरे पर दुल्हन जैसा श्रृंगार।
“दीदी, तुम अभी तक तैयार नहीं हुई?”
उसकी आवाज़ सुनते ही मालिनी का शरीर सिहर उठा।
अवनी शीशे के सामने घूमते हुए बोली, “देखो, देवांश ने यह पोशाक खास मेरे लिए विदेश से मँगवाई है। इसकी कीमत उतनी है जितना तुम कई साल काम करके भी नहीं कमा सकतीं।”
मालिनी ने सामने रखे दिनदर्शक की ओर देखा।
आज वही दिन था।
अवनी और देवांश सिंघानिया की सगाई का दिन।
उसकी मृत्यु से ठीक तीन महीने पहले का दिन।
वह वापस आ चुकी थी।
दोस्तों, अब कहानी में आगे बढ़ने से पहले हमें लगभग सत्रह वर्ष पीछे जाना होगा। क्योंकि मालिनी और अवनी की कहानी उस सगाई से नहीं, बल्कि एक अस्पताल में लगी भयानक आग से शुरू हुई थी।
महेंद्र और सविता रघुवंशी की पहली संतान के जन्म का दिन था। बच्ची के नाना, हरिनारायण चौधरी, शहर के बड़े व्यापारी थे। उन्होंने अपनी पहली नातिन को गोद में लेते ही घोषणा की थी कि उनकी आधी संपत्ति इसी बच्ची के नाम होगी।
उन्होंने उसका नाम रखा था—मालिनी।
जन्म के तीसरे दिन अस्पताल के भंडार कक्ष में आग लग गई। धुआँ फैलते ही पूरे अस्पताल में भगदड़ मच गई। उसी अफरातफरी में एक परिचारिका नवजात मालिनी को उठाकर बाहर की ओर भागी।
लेकिन रास्ते में छत का एक हिस्सा गिर पड़ा। परिचारिका घायल हो गई और बच्ची को लेकर पिछले दरवाजे से निकल गई। सिर पर गंभीर चोट के कारण उसकी स्मृति चली गई। उसके पास न कोई पहचान बची, न यह याद रहा कि बच्ची किसकी थी।
रघुवंशी परिवार को बताया गया कि बच्ची आग में मर गई। शव पूरी तरह जल जाने की बात कहकर मामला बंद कर दिया गया।
उधर वह परिचारिका मालिनी को लेकर एक पहाड़ी कस्बे में पहुँच गई। उसे बस इतना याद था कि यह बच्ची उसकी जिम्मेदारी है। उसने अपना नाम शारदा बताया और मालिनी को अपनी बेटी की तरह पालने लगी।
शारदा गरीब थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। वह लोगों के घरों में काम करती और शाम को मालिनी के लिए कभी गुड़, कभी खिलौना और कभी पुरानी कहानी की किताब ले आती।
मालिनी को कभी महसूस नहीं हुआ कि उसके पास कुछ कम है।
जब मालिनी सात वर्ष की हुई, शारदा गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। मरने से पहले उसने मालिनी को चाँदी का आधा लॉकेट और एक पुरानी डायरी दी।
“बिटिया,” उसने कमजोर स्वर में कहा, “मुझे नहीं पता तुम कौन हो। इतना जरूर जानती हूँ कि तुम मेरी नहीं हो, लेकिन तुमसे अधिक अपना भी कोई नहीं।”
मालिनी रोते हुए उससे लिपट गई।
शारदा की मृत्यु के बाद मालिनी को कस्बे के एक अनाथालय में भेज दिया गया।
दूसरी ओर, मालिनी की मृत्यु का समाचार मिलने के बाद सविता कई महीनों तक गहरे सदमे में रही। परिवार के एक परिचित ने उन्हें एक अनाथालय से बच्ची गोद लेने की सलाह दी।
वहीं उन्होंने दो वर्ष की एक बच्ची को देखा। बड़ी-बड़ी आँखें, पतला शरीर और चेहरे के बाएँ हिस्से पर हल्का जन्मजात दाग।
उसका नाम अवनी था।
सविता ने उसे सीने से लगा लिया।
महेंद्र ने भी सोचा कि घर में बच्ची आने से पत्नी का दुख कम हो जाएगा। इस तरह अवनी रघुवंशी परिवार में आ गई।
समय बीता। अवनी को महँगे कपड़े, बड़ा कमरा, अच्छे विद्यालय और दोनों भाइयों का प्यार मिला। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, उसे अपनी सच्चाई भी समझ आने लगी।
वह जानती थी कि वह इस परिवार की असली बेटी नहीं है।
एक दिन विद्यालय में कुछ लड़कियों ने उसे घेरकर कहा, “तुम्हारी माँ तुम्हें कहीं से उठाकर लाई हैं। जिस दिन उनकी असली बेटी मिल गई, वे तुम्हें वापस भेज देंगी।”
अवनी रोती हुई विद्यालय से भाग गई।
शहर के बाहर एक पुराना मंदिर था, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहाँ कभी एक ऐसी राजकुमारी पूजा करती थी जो अपनी सुंदरता को लेकर पागल थी।
मंदिर वर्षों से बंद पड़ा था। दीवारों पर बेलें चढ़ी थीं और भीतर अँधेरा था।
अवनी रोते-रोते अंदर पहुँच गई। वहाँ उसे काले कपड़े से ढका एक विशाल दर्पण दिखाई दिया।
जैसे ही उसने कपड़ा हटाया, दर्पण में अपना चेहरा नहीं, एक अत्यंत सुंदर स्त्री का चेहरा दिखाई दिया।
अवनी डरकर पीछे हट गई।
दर्पण से धीमी आवाज़ आई, “तुम क्यों रो रही हो?”
“सब कहते हैं मैं किसी की अपनी बेटी नहीं हूँ,” अवनी ने आँसू पोंछते हुए कहा। “मैं सुंदर भी नहीं हूँ। जिस दिन इस परिवार की असली बेटी वापस आई, कोई मुझे प्यार नहीं करेगा।”
दर्पण की स्त्री मुस्कराई।
“तुम्हें ऐसा रूप मिल सकता है जिसे देखकर लोग तुम्हें छोड़ने की कल्पना भी न कर सकें।”
अवनी की आँखों में चमक आ गई।
“कैसे?”
दर्पण के नीचे रखा काले पत्थर का छोटा ताबीज चमकने लगा।
“इसे पहन लो। जो तुम्हारा अपमान करेगा, उसके रूप और जीवन का एक छोटा हिस्सा तुम्हारे पास आ जाएगा।”
अवनी ने ताबीज उठा लिया।
“और जो मेरी प्रशंसा करेगा?”
स्त्री ने उत्तर दिया, “सामान्य लोगों की प्रशंसा से कुछ नहीं होगा। लेकिन जिस व्यक्ति के भाग्य को यह तंत्र तुम्हारे साथ बाँध देगा, उसका अपमान तुम्हें बनाएगा और उसका आशीर्वाद तुम्हारे चुराए हुए रूप को वापस कर देगा।”
“वह व्यक्ति कौन होगा?”
“जो स्थान तुमने पाया है, उसका असली अधिकारी।”
अवनी उस समय इन शब्दों का अर्थ नहीं समझी।
उसने ताबीज पहन लिया।
दर्पण में चमक उठी और उसके मन में एक ठंडी आवाज़ गूँजी—
“विपरीत जीवन-बंधन सक्रिय।”
अगले दिन विद्यालय में उसी लड़की ने फिर कहा, “देखो, नकली बेटी आ गई।”
अवनी के चेहरे का दाग थोड़ा हल्का हो गया।
उसे लगा शायद यह उसका भ्रम है।
उसकी अध्यापिका ने उसी दिन कहा, “अवनी, आज तुम बहुत प्यारी लग रही हो।”
अवनी घबरा गई और तुरंत शीशे के सामने गई। लेकिन उसके चेहरे पर कोई नकारात्मक बदलाव नहीं हुआ।
धीरे-धीरे उसे पता चला कि सामान्य लोगों का अपमान केवल बहुत हल्का और थोड़े समय का प्रभाव डालता है। कोई उसे कुरूप कहे तो त्वचा कुछ घंटों के लिए साफ हो जाती। कोई उसे बेकार कहे तो उसके भीतर थोड़ी ऊर्जा आ जाती।
लेकिन वह असाधारण सुंदरता अभी भी उससे दूर थी।
समय बीतता गया।
उधर पहाड़ी कस्बे के अनाथालय में रहने वाली मालिनी सत्रह वर्ष की हो चुकी थी। अनाथालय बंद होने वाला था, इसलिए सभी बच्चों के पुराने दस्तावेजों की जाँच शुरू हुई।
मालिनी के संदूक से शारदा की डायरी, आधा चाँदी का लॉकेट और अस्पताल की पुरानी पट्टी मिली।
डायरी में उस आग का वर्णन था। उसमें लिखा था कि शारदा को बच्ची के कपड़े पर “रघुवंशी” नाम का आधा जला हुआ निशान मिला था।
जाँच शुरू हुई।
रक्त परीक्षण कराया गया।
और कुछ ही सप्ताह बाद यह प्रमाणित हो गया कि मालिनी वास्तव में महेंद्र और सविता रघुवंशी की खोई हुई बेटी थी।
दोस्तों, जरा सोचिए, जिसने बचपन से कभी अपने पिता का हाथ नहीं पकड़ा, जिसने माँ की गोद केवल सपनों में देखी हो, उसे जब पता चले कि उसका परिवार जीवित है और एक बड़ी हवेली में उसका इंतजार कर रहा है, तो उसके मन में कितने सपने जागेंगे।
मालिनी ने भी यही सोचा था।
उसे लगा था माँ उसे देखते ही गले लगा लेंगी। पिता उसकी हर खोई हुई वर्ष की भरपाई करेंगे। भाई उसे अपनी पलकों पर बैठाएँगे।
लेकिन जब वह पहली बार रघुवंशी हवेली पहुँची, वहाँ अवनी के जन्मदिन की तैयारियाँ चल रही थीं।
दरवाजे पर फूल लगे थे। भीतर संगीत बज रहा था। नौकर बड़े-बड़े उपहार सजा रहे थे।
मालिनी साधारण सलवार-कमीज पहने दरवाजे पर खड़ी थी। उसके हाथ में पुराना संदूक था।
सविता उसे देखकर कुछ पल स्तब्ध रह गई। फिर उसकी आँखों में आँसू आए। वह दो कदम आगे बढ़ी भी, लेकिन तभी अवनी ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।