भाग 2
दूसरे ने हँसते हुए कहा,
“पहले तो आर्या का एक संदेश आते ही तुम सब छोड़कर भाग जाते थे।”
निखिल ने गिलास उठाया।
“मैं अपने घर लौट रहा हूँ। शायद बहुत समय तक तुम सबसे न मिल सकूँ। इसलिए विदा लेने आया हूँ।”
“क्या आर्या भी साथ जा रही है?”
“नहीं।”
“तो तुम्हारी शादी?”
निखिल ने धीमे स्वर में कहा,
“वह किसी और से होगी।”
सभी मित्र चुप हो गए।
एक मित्र बोला,
“तुमने आर्या के लिए अनुसंधान का अवसर छोड़ा, परिवार छोड़ा, अपने मित्र छोड़े। अब इतने वर्षों बाद सच में चले जाओगे?”
“आर्या से प्रेम करना कभी मेरे लिए साँस लेने जैसा सहज था। उसकी छोटी-सी मुस्कान मुझे कई दिनों तक खुश रखती थी। लेकिन प्रेम यदि मनुष्य से उसका सम्मान, पहचान और भविष्य छीन ले, तो एक दिन वह प्रेम नहीं, आत्मविनाश बन जाता है।”
निखिल ने अपना यात्रा-पत्र दिखाया।
“कल रात मैं सूर्यनगर जा रहा हूँ।”
अचानक चिकित्सालय से आपात संदेश आया। निखिल के पुराने विभाग में एक हिंसक व्यक्ति ने करण को पकड़ लिया था। वह व्यक्ति अपनी पत्नी की मृत्यु के लिए चिकित्सालय को दोषी मानता था।
निखिल मित्रों के साथ वहाँ पहुँचा।
हाथ में चाकू लिए व्यक्ति ने करण की गर्दन पकड़ रखी थी।
करण चिल्लाया,
“आर्या, मुझे बचाओ!”
आर्या ने निखिल को देखते ही कहा,
“निखिल, तुम उससे बात करो। उसे शांत करने की कोशिश करो।”
हिंसक व्यक्ति ने चीखते हुए कहा,
“यह करण तुम्हारा प्रेमी है! मैं इसे मार दूँगा!”
आर्या ने घबराकर कहा,
“नहीं, यह मेरा प्रेमी नहीं है। मेरा होने वाला पति वह है।”
उसने निखिल की ओर संकेत किया।
“करण को छोड़ दो। निखिल को पकड़ लो।”
निखिल कुछ पल वहीं जम गया।
आर्या ने उससे कहा,
“निखिल, करण की जगह चले जाओ। सुरक्षा कर्मी अवसर मिलते ही उसे पकड़ लेंगे।”
“और यदि अवसर नहीं मिला?”
“अभी बहस का समय नहीं है। किसी की जान बचानी है।”
निखिल आगे बढ़ गया।
करण को छोड़कर हमलावर ने निखिल को पकड़ लिया। संघर्ष के दौरान चाकू निखिल की गर्दन के पास गहराई तक उतर गया। सुरक्षा कर्मियों ने हमलावर को पकड़ लिया, लेकिन निखिल बुरी तरह घायल हो चुका था।
आर्या पहले करण की ओर दौड़ी।
“करण, तुम्हारी गर्दन में दर्द है? धमनी को चोट तो नहीं लगी?”
करण ने कराहते हुए कहा,
“बहुत दर्द हो रहा है।”
आर्या उसे जाँच के लिए भीतर ले जाने लगी।
निखिल गर्दन से बहते रक्त को हाथ से दबाए वहीं बैठा था।
“आर्या…”
वह रुकी।
“क्या हुआ?”
“मेरी गर्दन से रक्त बह रहा है।”
“कुछ देर रुको। पहले करण की जाँच जरूरी है। हो सकता है उसकी धमनी को चोट लगी हो।”
निखिल हँस पड़ा। उस हँसी में पीड़ा से ज्यादा थकान थी।
“आर्या, हमारा संबंध समाप्त करते हैं।”
आर्या मुड़ी।
“क्या कहा?”
“मैं तुमसे अलग हो रहा हूँ।”
करण ने तुरंत कहा,
“निखिल, आर्या पहले मेरी सहायता कर रही है इसलिए तुम संबंध तोड़ने की धमकी दे रहे हो? क्या तुम्हारी ईर्ष्या किसी की जान से बड़ी है?”
आर्या ने भी नाराज होकर कहा,
“मैं चिकित्सक हूँ। जीवन बचाना मेरा कर्तव्य है। मैं मान लेती हूँ कि तुम दर्द में हो, इसलिए उलटी-सीधी बात कर रहे हो। दोबारा संबंध तोड़ने का मजाक मत करना।”
निखिल ने उसकी ओर देखते हुए कहा,
“कल रात के बाद तुम्हें पता चल जाएगा कि यह मजाक था या अंतिम निर्णय।”
उस रात वह घर लौटकर अपनी वस्तुएँ बाँटने लगा।
पड़ोस की मालती चाची आईं तो निखिल ने अलमारी से नए वस्त्र निकालकर कहा,
“चाची, आपको जो पसंद हो ले जाइए।”
उन्हें वही एक जैसे रात्रि-वस्त्र मिले।
“अरे, यह तो बिल्कुल नया है।”
“हाँ। जिसे पहनना था उसने कभी पहना ही नहीं।”
उसने दीवार से सगाई का चित्र उतारा और लोहे के पात्र में जला दिया।
उसी समय आर्या घर आई।
“क्या जला रहे हो?”
“कुछ बेकार कागज।”
“घर के भीतर मत जलाया करो। मुझे धुएँ की गंध पसंद नहीं है।”
निखिल ने राख की ओर देखा।
“अब दोबारा ऐसा नहीं होगा।”
आर्या ने दो महँगी घड़ियाँ निकालीं।
“इनमें से कौन-सी अच्छी है?”
निखिल के चेहरे पर हल्की चमक आई।
“मेरे लिए?”
“करण का जन्मदिन आने वाला है। उसके लिए ले रही हूँ। सोचा तुमसे पूछ लूँ।”
निखिल ने नजरें झुका लीं।
“दोनों ले लो। जिसे पसंद आएगा, वह चुन लेगा।”
आर्या ने एक घड़ी उसकी ओर बढ़ाई।
“तुम चाहो तो दूसरी रख सकते हो।”
निखिल मुस्कराया।
पहली बार मिलने वाला उपहार भी किसी दूसरे की अस्वीकृत वस्तु था।
“नहीं। मुझे अब किसी घड़ी की जरूरत नहीं। मेरा समय बदलने वाला है।”
अगली शाम निखिल ने अपना अंतिम भोजन स्वयं बनाया। केवल अपने लिए।
आर्या ने घर आते ही पूछा,
“मेरा भोजन कहाँ है?”
“मैंने नहीं बनाया।”
“अब भी चिकित्सालय वाली बात को लेकर नाराज हो?”
“नहीं। मुझे हवाई अड्डे पहुँचना है।”
“ठीक है, भोजन कर लो। मैं तुम्हें छोड़ दूँगी।”
तभी करण का फोन आया।
आर्या के चेहरे का रंग बदल गया।
“करण कह रहा है कि वह अपने जीवन को समाप्त कर देगा। मुझे जाना होगा।”
निखिल ने कुछ नहीं कहा।
आर्या दरवाजे तक पहुँची, फिर बोली,
“तुम गाड़ी कर लेना। लौटने की तारीख बता देना, मैं लेने आ जाऊँगी।”
दरवाजा बंद हो गया।
निखिल ने घर पर अंतिम दृष्टि डाली।
उसने आर्या को संदेश भेजा—
“आर्या, हमारा संबंध समाप्त हो चुका है। मैं अपने घर लौट रहा हूँ और विवाह करने जा रहा हूँ। अब कभी वापस नहीं आऊँगा। तुम्हारे जीवन के लिए शुभकामनाएँ।”
संदेश भेजकर उसने आर्या की संख्या रोक दी।
वर्षा फिर शुरू हो गई थी।
पर इस बार निखिल के हाथ में छाता था, कदमों में दृढ़ता थी और मन में लौटने की कोई आशा नहीं थी।
हवाई अड्डे की ओर जाती गाड़ी में बैठकर उसने खिड़की से देवगढ़ की रोशनियाँ देखीं।
यही वह शहर था, जहाँ वह प्रेम के पीछे आया था।
यही वह शहर था, जहाँ उसने स्वयं को खो दिया था।
और अब यही वह शहर था, जिसे वह बिना पीछे देखे छोड़ रहा था।
उधर करण के घर पहुँचने पर आर्या ने देखा कि वहाँ किसी संकट का नामोनिशान नहीं था। करण ने फूलों और दीपों से कमरा सजाया हुआ था।
“तुमने अपने जीवन को समाप्त करने की बात कही थी!”
करण हँस पड़ा।
“मैं बस तुम्हें आश्चर्य देना चाहता था। तुम्हारी पदोन्नति हुई है।”
आर्या का चेहरा कठोर हो गया।
“दोबारा ऐसा मजाक किया तो मैं तुम्हें क्षमा नहीं करूँगी।”
वह बाहर निकली और निखिल का संदेश पढ़ा।
पहले उसने उसे मजाक समझा।
फिर घर पहुँचकर उसने खाली अलमारी देखी।
दीवार पर सगाई का चित्र नहीं था।
राख के बीच चित्र का जला हुआ कोना पड़ा था।
आर्या ने निखिल को फोन किया।
फोन नहीं लगा।
उसने संदेश भेजा—
“निखिल, मैं तुमसे प्रेम करती हूँ। वापस आ जाओ।”
संदेश पहुँच नहीं पाया।
निखिल ने उसे रोक दिया था।
आर्या की साँस अटक गई।
“उसने… मुझे रोक दिया?”
उसे अब भी विश्वास था कि निखिल कुछ दिनों में लौट आएगा। वही निखिल, जो उसकी एक आवाज पर महाविद्यालय की परीक्षा छोड़कर पहुँच गया था। वही निखिल, जिसने अपना भविष्य उसके लिए बदल दिया था।
वह उसे छोड़कर कैसे जा सकता था?
इधर कई सौ किलोमीटर दूर सूर्यनगर के छोटे-से हवाई अड्डे पर निखिल बाहर निकला।
सामने पीले वस्त्रों में एक युवती खड़ी थी। उसके हाथ में गेंदे के फूलों की माला थी और आँखों में बरसों की प्रतीक्षा।
वह दौड़कर निखिल के पास आई।
“निखिल!”
निखिल ने उसे पहचान लिया।
“मीरा…”
मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“आखिर तुम लौट आए। मैंने कहा था न, चाहे दस वर्ष लगें, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगी।”
निखिल ने उस लड़की को देखा, जिसे वह वर्षों तक केवल बचपन की सहेली समझता रहा था।
जिस समय वह किसी ऐसी स्त्री के पीछे भाग रहा था, जिसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, उस समय कोई और उसी स्थान पर खड़ा उसकी वापसी की राह देख रहा था।
दोस्तों, अब कहानी में वह मोड़ आ चुका था, जहाँ निखिल का जीवन समाप्त नहीं होने वाला था।
अब पहली बार उसका अपना जीवन शुरू होने वाला था।
सूर्यनगर की हवा में देवगढ़ जैसी ठंडक नहीं थी।
यहाँ सुबह की धूप मकानों की छतों पर सुनहरी चादर-सी फैल जाती थी। गलियों में चाय, तुलसी और गीली मिट्टी की मिली-जुली सुगंध रहती थी। वर्षों बाद अपने शहर लौटते हुए निखिल को ऐसा लग रहा था, जैसे वह किसी स्थान पर नहीं, अपने खोए हुए अस्तित्व के पास वापस आया हो।
मीरा ने हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही निखिल का सामान स्वयं उठाने की कोशिश की।
निखिल ने कहा,
“रहने दो, हाथ में चोट लग जाएगी।”
मीरा ने मुस्कराकर उत्तर दिया,
“तुम दस साल किसी और के लिए बोझ उठाते रहे। अब कुछ बोझ मुझे भी उठा लेने दो।”
निखिल उसके चेहरे की ओर देखता रह गया।
मीरा वैसी ही स्पष्ट और निर्भीक थी, जैसी महाविद्यालय के दिनों में हुआ करती थी। अंतर केवल इतना था कि अब उसकी आँखों में बचपन की चंचलता के साथ एक परिपक्व आत्मविश्वास भी था।
मीरा सूर्यनगर के एक प्रतिष्ठित औषधि निर्माण परिवार की इकलौती संतान थी। अपने पिता का व्यवसाय सँभालते हुए उसने उसे देश के कई नगरों तक पहुँचा दिया था। लोग उसे सफल व्यवसायी मानते थे, मगर उसके माता-पिता जानते थे कि निजी जीवन के एक कोने में वह आज भी उसी लड़के की प्रतीक्षा कर रही थी, जो एक दिन आर्या के पीछे देवगढ़ चला गया था।
गाड़ी शहर से बाहर एक शांत आवासीय क्षेत्र में पहुँची।
मीरा ने एक सुंदर दोमंजिला घर के सामने गाड़ी रोकी।
“यह किसका घर है?” निखिल ने पूछा।
“हमारा।”
निखिल चौंक गया।
मीरा ने जल्दी से कहा,
“स्थान पसंद न हो तो बदल देंगे। कमरों की सजावट भी बदल सकती है। मैंने बस सोचा था कि जब तुम लौटोगे तो तुम्हें फिर किसी किराए के घर से जीवन शुरू न करना पड़े।”
“मीरा, घर तुम्हें अकेले नहीं खरीदना चाहिए था।”
“एक घर ही तो है। तुम्हारी प्रतीक्षा में मैंने दस वर्ष निकाल दिए। उसके सामने यह क्या है?”
वह निखिल को भीतर ले गई।
घर में एक बड़ा अध्ययन कक्ष था। दीवारों पर पुस्तकों के लिए खाली अलमारियाँ बनी थीं। एक कमरे में प्रयोगों और तकनीकी कार्य के लिए मेज लगाई गई थी। खिड़की के बाहर नीम का पेड़ था।
निखिल ने पूछा,
“तुम्हें कैसे पता कि मुझे ऐसा कमरा पसंद आएगा?”
“क्योंकि मैंने तुम्हारी बातें सुनी थीं, निखिल। केवल तुम्हारे शब्द नहीं, तुम्हारे सपने भी।”
निखिल के मन में अनायास देवगढ़ वाला घर कौंध गया।
उसने वह घर आर्या की हर इच्छा के अनुसार बनाया था। मगर आर्या ने कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया था कि निखिल स्वयं कैसा घर चाहता है।
मीरा ने उसके सामने एक कागज रख दिया।
“इस पर हस्ताक्षर करो।”
निखिल ने पढ़ा और हँस पड़ा।
कागज के ऊपर लिखा था—विवाह के बाद के नियम।
पहला नियम था—
“पति अपने अनुसंधान, स्वास्थ्य और पसंद की वस्तुओं पर ध्यान देगा। घर के सारे काम केवल उसकी जिम्मेदारी नहीं होंगे।”
दूसरा नियम—
“पति को मित्रों से मिलने, अपने शौक पूरे करने और आराम करने का पूरा अधिकार होगा।”
तीसरा नियम—
“किसी असहमति की स्थिति में दोनों अपनी बात कहेंगे। कोई किसी को चुप रहने की धमकी नहीं देगा।”
चौथे नियम में लिखा था—
“पत्नी को पति के लिए भोजन बनाने का अधिकार होगा, चाहे भोजन का स्वाद कैसा भी हो।”
निखिल की हँसी छूट गई।
“तुम भोजन बना सकती हो?”
मीरा ने गर्व से कहा,
“आज बनाकर दिखाऊँगी।”
कुछ देर बाद रसोई से जलने की गंध आने लगी।
निखिल दौड़कर पहुँचा तो मीरा सब्जी के सामने चिंतित खड़ी थी।
“यह सब्जी है या कोयला?” निखिल ने पूछा।
“रूप पर मत जाओ। भावनाएँ देखो।”
निखिल ने चखकर कहा,
“नमक अधिक है।”
“झूठ बोलना भी तुम्हें नहीं आता। बहुत अधिक है।”
दोनों हँस पड़े।
दोस्तों, कई बार प्रेम बड़े-बड़े वादों में नहीं मिलता। वह जली हुई सब्जी के पास खड़े दो लोगों की हँसी में मिलता है, जहाँ कोई स्वयं को श्रेष्ठ साबित नहीं कर रहा होता।
अगली सुबह निखिल ने मीरा को आचार्य देवेंद्र के प्रस्ताव के बारे में बताया।
“यह एक अत्यंत गोपनीय अनुसंधान है,” उसने कहा। “मुझे तीन से पाँच वर्ष तक केंद्र में रहना पड़ सकता है। बाहरी लोगों से संपर्क लगभग समाप्त रहेगा। मेरी पहचान और कार्य की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं होगी।”
मीरा कुछ देर शांत रही।
निखिल ने कहा,
“तुमने इतने वर्ष प्रतीक्षा की है। मैं लौटते ही फिर तुम्हें प्रतीक्षा करने को नहीं कह सकता।”
मीरा की आँखों में नमी उतर आई, लेकिन स्वर दृढ़ था।
“मैंने तुम्हारी प्रतीक्षा इसलिए नहीं की कि लौटने के बाद तुम्हारे पंख काट दूँ। मैं चाहती हूँ कि तुम वहीं जाओ, जहाँ तुम्हें पाँच साल पहले जाना चाहिए था।”