भाग 3
“लेकिन हमारा विवाह?”
“पहले विवाह करेंगे। फिर तुम अपने काम पर जाओगे।”
“तुम्हें डर नहीं लगता कि वर्षों में सब बदल जाएगा?”
“गलत व्यक्ति के साथ एक दिन भी बहुत लंबा होता है। सही व्यक्ति के लिए कई वर्ष भी कम पड़ सकते हैं।”
निखिल ने उसकी ओर देखा।
“मीरा, मुझमें अभी बहुत कुछ टूटा हुआ है।”
“टूटी हुई चीजों को फेंका नहीं जाता, निखिल। उन्हें प्रेम और धैर्य से जोड़ा जाता है। बस एक बात याद रखना—मैं तुम्हें ठीक करने नहीं आई हूँ। मैं तुम्हारे साथ चलने आई हूँ।”
दोनों ने परिवार की उपस्थिति में साधारण रीति से विवाह-पंजीकरण करने का निर्णय लिया।
मीरा पंजीकरण प्रमाणपत्र को हाथों में लेकर इतनी प्रसन्न हुई, मानो उसे संसार की सबसे मूल्यवान वस्तु मिल गई हो।
उसने प्रमाणपत्र एक सुरक्षित संदूक में रख दिया।
निखिल ने हँसते हुए पूछा,
“इतनी सुरक्षा?”
“दस वर्ष की प्रतीक्षा का प्रमाण है। इसे रसोई की दराज में थोड़े ही रखूँगी।”
निखिल को वह दिन याद आया, जब उसने आर्या के साथ विवाह-पंजीकरण के लिए समय लिया था।
आर्या ने दस बार आने का वादा किया और दसों बार किसी न किसी कारण से नहीं आई। आखिरी बार निखिल कार्यालय बंद होने तक अकेला बैठा रहा था।
फोन करने पर आर्या ने कहा था—
“यह केवल एक प्रमाणपत्र है। कभी भी बन जाएगा। ज्यादा दबाव डाला तो विवाह ही नहीं करूँगी।”
निखिल ने उस स्मृति को मन से बाहर किया।
मीरा ने पूछा,
“क्या सोच रहे हो?”
“बस यह कि जिस वस्तु को कोई बोझ समझता था, वही किसी दूसरे के लिए सबसे बड़ा सम्मान हो सकती है।”
उधर देवगढ़ में आर्या के लिए निखिल की अनुपस्थिति धीरे-धीरे वास्तविकता बनने लगी थी।
पहले दिन उसने सोचा निखिल नाराज है।
दूसरे दिन लगा वह अपने मित्रों के साथ होगा।
तीसरे दिन उसने स्वयं को समझाया कि वह यात्रा पर गया है और लौट आएगा।
लेकिन चौथे दिन रात को आर्या के पेट में असहनीय पीड़ा उठी।
उसे वर्षों से आमाशय की समस्या थी। निखिल हमेशा उसकी औषधियाँ व्यवस्थित करके रखता था। कौन-सी गोली कब लेनी है, कौन-सी वस्तु नहीं खानी, सब निखिल याद रखता था।
आर्या ने अलमारी खोली।
अंदर छोटी-छोटी पर्चियाँ लगी थीं, मगर अधिकांश औषधियाँ समाप्त हो चुकी थीं।
वह फर्श पर बैठ गई और करण को फोन किया।
“करण, मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा है। मुझे चिकित्सालय जाना है।”
करण ने नींद भरी आवाज में कहा,
“अभी रात के दो बजे हैं। तुम्हें तो पुरानी समस्या है। औषधि ले लो, सुबह चलते हैं।”
“दर्द बहुत ज्यादा है।”
“आपात विभाग जाने की क्या जरूरत है? हम दोनों चिकित्सा जानते हैं। कुछ देर में ठीक हो जाएगा।”
आर्या ने फोन काट दिया।
उसने अपनी सहेली सुरभि को फोन किया, लेकिन वह दूसरे शहर में थी।
अंततः पड़ोस की मालती चाची ने उसके गिरने की आवाज सुनी और दरवाजा खुलवाकर उसे चिकित्सालय पहुँचाया।
सुबह होश आया तो विभागाध्यक्ष ने कहा,
“दस मिनट और देर होती तो स्थिति गंभीर हो सकती थी।”
आर्या ने मालती चाची का हाथ पकड़ लिया।
“आप न होतीं तो…”
मालती चाची बोलीं,
“मुझे धन्यवाद मत दो। निखिल ने हम सब पड़ोसियों की इतनी सहायता की थी कि हम पर तुम्हारा ध्यान रखने का अधिकार बन गया था।”
“निखिल ने?”
“हाँ। किसी का नल खराब हो, किसी को औषधि चाहिए, किसी बुजुर्ग को चिकित्सालय ले जाना हो—वह सबसे पहले पहुँचता था। कहता था, ‘मैं कभी घर पर न रहूँ तो आप लोग आर्या का ध्यान रख लेना।’”
आर्या की आँखें भर आईं।
उसने निखिल को कई बार पड़ोसियों की सहायता करने पर डाँटा था।
“हर समय दूसरों के काम में क्यों लगे रहते हो?”
उसे लगता था निखिल लोगों को प्रसन्न करने के लिए यह सब करता है।
आज पता चला कि वह सब भी आर्या के लिए था।
आर्या चिकित्सालय से निकलकर सीधे विभागाध्यक्ष के कक्ष में पहुँची।
“निखिल किस बचाव दल के साथ गया है?”
विभागाध्यक्ष ने चौंककर कहा,
“किस बचाव दल के साथ?”
“उसने कहा था कि वह काम से बाहर जा रहा है।”
“आर्या, निखिल ने नौकरी छोड़ दी है।”
उन्होंने दराज से त्यागपत्र निकालकर सामने रख दिया।
आर्या के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई।
“यह संभव नहीं है। वह मेरे लिए इस चिकित्सालय में आया था।”
“शायद इसीलिए चला गया,” विभागाध्यक्ष ने शांत स्वर में कहा।
आर्या ने निखिल के साथ कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से पूछा। किसी को उसके वर्तमान स्थान की जानकारी नहीं थी।
घर लौटते समय एक संपत्ति अधिकारी उसका इंतजार कर रहा था।
“क्या आप आर्या सक्सेना हैं?”
“जी।”
“यह घर निखिल त्रिपाठी ने खरीदा था। उन्होंने स्वामित्व आपके नाम कर दिया है। ये कागज और चाबियाँ हैं।”
आर्या स्तब्ध रह गई।
निखिल कई महीने से एक घर खरीदने की बात कर रहा था। वह आर्या को स्थान दिखाने के लिए साथ चलने को कहता, मगर आर्या हमेशा करण के पिता की बीमारी या अपने कार्य का बहाना बना देती थी।
अधिकारी ने कहा,
“उन्होंने निर्माण कार्य रोक देने को कहा है। बोले कि अब इस घर से उनका कोई संबंध नहीं।”
आर्या को अचानक विश्वास हुआ कि निखिल शायद घर के भीतर छिपा उसका इंतजार कर रहा होगा।
वह तेजी से वहाँ पहुँची।
“निखिल!”
कमरों में उसकी आवाज गूँजती रही।
घर खाली था।
लेकिन हर कमरा आर्या की किसी पुरानी इच्छा का रूप था।
एक बड़ा स्नानकक्ष था, जैसा उसने कभी कहा था।
खिड़की के पास पढ़ने का कमरा था।
आँगन में उसके पसंदीदा रातरानी के पौधे लगे थे।
रसोई की ऊँचाई भी उसकी सुविधा के अनुसार रखी गई थी।
आर्या एक कमरे के बीच बैठ गई।
“तुमने मेरे लिए इतना सब किया… फिर तुम मुझे छोड़ कैसे सकते हो?”
उसने निखिल के पुराने मित्रों से संपर्क किया। बहुत प्रयास के बाद उसे निखिल के महाविद्यालय के साथी विनय की संख्या मिली।
“विनय, निखिल कहाँ है?”
“वह तुमसे मिलना नहीं चाहता।”
“मजाक मत करो। वह मुझसे प्रेम करता है। उसने मेरे लिए घर खरीदा है।”
“आर्या, घर खरीदना यह सिद्ध करता है कि वह तुमसे प्रेम करता था। यह सिद्ध नहीं करता कि वह अब भी तुम्हारे साथ रहना चाहता है।”
“उसका पता बताओ।”
विनय कुछ क्षण चुप रहा।
“वह सूर्यनगर लौट गया था। यदि तुमने कोई बड़ी गलती की है, तो शायद उसे सुधारने का तुम्हारे पास अंतिम अवसर था।”
“था? इसका क्या अर्थ है?”
विनय ने फोन काट दिया।
आर्या उसी दिन सूर्यनगर के लिए निकल पड़ी।
उसे निखिल के घर का पता नहीं था। वह हवाई अड्डे, बस अड्डे, महाविद्यालय और पुराने छात्रावास तक गई। स्थानीय कार्यालय में उसका नाम पूछा, लेकिन कोई नवीन जानकारी नहीं मिली।
वास्तव में उसी सुबह निखिल अनुसंधान केंद्र में प्रवेश कर चुका था। गोपनीयता के कारण उसकी वर्तमान पहचान और स्थान सभी सामान्य अभिलेखों से हटा दिए गए थे।
आर्या ने सड़क पर एक काली गाड़ी गुजरते देखी।
उसे क्षणभर के लिए लगा कि पिछली सीट पर निखिल बैठा है।
वह गाड़ी के पीछे दौड़ी।
“निखिल!”
गाड़ी आगे निकल गई।
अंदर बैठे निखिल को मानो कोई परिचित आवाज सुनाई दी।
उसने शीशे से बाहर देखा।
लेकिन सड़क पीछे छूट चुकी थी।
उसने मन ही मन कहा—
“वह यहाँ क्यों आएगी? वह तो करण के साथ होगी।”
अनुसंधान केंद्र पहुँचने से पहले निखिल मीरा और उसके माता-पिता से मिलने गया था।
मीरा के पिता ने उसे गले लगाते हुए कहा,
“बेटा, कार्य जरूरी है। मगर लौटने में बहुत देर मत करना।”
मीरा की माँ ने कहा,
“हमारी बेटी बाहर से मजबूत है, लेकिन वर्षों की प्रतीक्षा आसान नहीं होती।”
मीरा मुस्कराई।
“आप लोग निखिल को डराइए मत।”
विदा होते समय उसने निखिल का हाथ पकड़कर कहा,
“मैं तुम्हें रोकूँगी नहीं। बस इतना वादा करो कि लौटते समय अपराधबोध लेकर नहीं, उपलब्धियाँ लेकर आओगे।”
“और तुम?”
“मैं हमारा घर सँभालूँगी, माता-पिता का ध्यान रखूँगी और तुम्हारे लौटने की तारीख गिनने के बजाय अपना जीवन भी जीती रहूँगी।”
“मीरा…”
“जाओ, निखिल। इस बार किसी के लिए अपना सपना मत छोड़ना।”
अगले तीन वर्षों तक निखिल बाहरी संसार से लगभग पूरी तरह कट गया।
उसका दिन प्रयोगशाला में शुरू होता और वहीं समाप्त होता। उसने ऐसी सूक्ष्म चिकित्सा प्रणाली पर काम किया, जिसमें शरीर के भीतर अत्यंत छोटे उपकरण पहुँचाकर रोगग्रस्त ऊतकों तक औषधि भेजी जा सकती थी।
कई प्रयोग असफल हुए।
कभी महीनों का काम एक रात में बेकार हो जाता।
कभी निखिल निराश होकर मीरा को लिखे बिना भेजे पत्रों के सामने बैठ जाता।
वह जानता था कि वे पत्र बाहर नहीं भेजे जा सकते, फिर भी हर सप्ताह एक पत्र लिखता।
“मीरा, आज तीसरा प्रयोग असफल हुआ।”
“मीरा, आज पहली बार प्रणाली ने सही कोशिका पहचानी।”
“मीरा, मैं लौटकर तुम्हारे हाथ की जली हुई सब्जी भी खुशी से खाऊँगा।”
इधर मीरा भी उसके नाम पत्र लिखती और सुरक्षित संदूक में रखती जाती।
देवगढ़ में आर्या ने निखिल के खरीदे हुए घर को पूरा करवाया।
वह उसी घर में रहने लगी।
उसने निखिल की पसंद के बारे में जानने की कोशिश की, मगर उसे एहसास हुआ कि वह जानती ही नहीं थी कि निखिल को क्या पसंद है।
वह कभी मित्रों के साथ खेल देखने जाता था, मगर आर्या ने धुएँ और शोर का बहाना बनाकर रोक दिया था।
उसे छोटे प्रतिरूप और वैज्ञानिक नमूने एकत्र करना पसंद था, मगर आर्या ने उन्हें बच्चों के खिलौने कहकर वापस करवा दिया था।
उसे संगीत पसंद था, मगर आर्या को शांति चाहिए होती थी।
धीरे-धीरे निखिल ने अपनी प्रत्येक पसंद छोड़ दी थी।
और आर्या ने कभी ध्यान नहीं दिया कि उसके साथ रहने वाला मनुष्य दिन-ब-दिन एक खाली खोल बनता जा रहा है।
करण इन तीन वर्षों में लगातार आर्या के पास बना रहा। उसने कई बार विवाह का प्रस्ताव रखा।
लेकिन आर्या हर बार कहती,
“निखिल लौटेगा।”
“वह तुम्हें छोड़ चुका है।”
“वह नाराज है।”
“तीन साल तक कोई नाराज रहता है?”
“निखिल रह सकता है। वह मुझसे बहुत प्रेम करता था।”
करण के मन में निखिल के प्रति घृणा गहरी होती गई।
उधर तीन वर्षों बाद अनुसंधान सफल हुआ।
आचार्य देवेंद्र ने पूरे दल के सामने कहा,
“हमने जिस उपलब्धि के लिए वर्षों तक प्रयास किया, उसे निखिल ने एक नई दिशा दी है। अब यह तकनीक केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहेगी।”
उन्होंने निखिल के कंधे पर हाथ रखा।
“सूर्यनगर में इसके निर्माण और चिकित्सकीय उपयोग के लिए एक राष्ट्रीय परियोजना शुरू हो रही है। हम चाहते हैं कि तुम उसके मुख्य तकनीकी अध्यक्ष बनो।”
निखिल ने कहा,
“मुझे तकनीक आती है, निविदाएँ और प्रशासन नहीं।”
आचार्य देवेंद्र हँसे।
“प्रशासन सीख लोगे। वैसे भी तुम्हारी पत्नी तीन वर्षों से प्रतीक्षा कर रही है। घर जाओ, विवाह का उत्सव पूरा करो और फिर परियोजना सँभालो।”
निखिल की आँखें चमक उठीं।
“मैं तैयार हूँ।”
सूर्यनगर लौटने पर उसका स्वागत सामान्य यात्री की तरह नहीं हुआ। अनुसंधान की सुरक्षा और राष्ट्रीय महत्व के कारण विशेष सुरक्षा वाहन उसे लेने आए थे।
उसी समय देवगढ़ चिकित्सालय का दल भी सूर्यनगर पहुँचा था। उन्हें नई सूक्ष्म चिकित्सा परियोजना की आपूर्ति संबंधी निविदा में भाग लेना था।
आर्या, करण और उनकी सहेली सुरभि गाड़ी में बैठे थे।
सड़क पर सुरक्षा कर्मियों का दल देखकर करण बोला,
“लगता है कोई बड़ा अधिकारी आ रहा है।”
आर्या ने काली गाड़ी की खिड़की में एक चेहरा देखा।
उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।
“निखिल?”
“क्या हुआ?” सुरभि ने पूछा।
आर्या ने पलटकर देखा, लेकिन गाड़ी दूर जा चुकी थी।
“कुछ नहीं। शायद भ्रम था।”
उधर निखिल सीधे मीरा के घर पहुँचा।
दरवाजा खुलते ही मीरा कुछ क्षण उसे देखती रही। फिर दौड़कर उससे लिपट गई।
“तुम सच में लौट आए?”
“इस बार हमेशा के लिए।”
“झूठ मत बोलना। फिर कोई दस वर्ष वाला काम निकला तो?”
निखिल हँस पड़ा।
“काम रहेगा, मगर अब घर भी रहेगा।”
मीरा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“तीन साल में तुम बदल गए हो।”
“अच्छा या बुरा?”
“तुम्हारी आँखों में अब किसी की अनुमति माँगने वाला डर नहीं है।”
निखिल ने उसके हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“मीरा, मैंने वादा किया था कि लौटकर तुम्हें विवाह का सुंदर उत्सव दूँगा।”
“मुझे उत्सव नहीं चाहिए।”
“मुझे चाहिए। क्योंकि इस बार मैं अपने संबंध को संसार से छिपाना नहीं चाहता।”
अगले दिन वे विवाह के वस्त्र देखने बाजार गए।
उसी भवन में आर्या, करण और सुरभि भोजन करने पहुँचे थे।
सुरभि ने दूर जाते निखिल और मीरा को देखा।
“आर्या, वह व्यक्ति निखिल जैसा लग रहा था।”
आर्या तुरंत मुड़ी, मगर सुरक्षा कर्मियों के कारण चेहरा दिखाई नहीं दिया।
करण बोला,
“निखिल कोई बड़ा अधिकारी नहीं है कि उसके साथ सुरक्षा कर्मी चलेंगे। तुम्हें भ्रम हुआ होगा।”
रात को सभी एक भोजनालय में पहुँचे।